दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में, आत्मसमर्पण करने वाले नेता ने कहा कि यह आंदोलन अपने उस मूल सिद्धांत से भटक गया है, जिसके तहत राजनीतिक दल ही अपनी सैन्य शाखा की गतिविधियों का मार्गदर्शन करता था.
तीन कारकों—राजनीतिक समर्थन, कलेक्टर के कार्यालय का एक 'लिसनिंग पोस्ट' (सूचना केंद्र) के रूप में कार्य करना, और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में हस्तक्षेप न करना—ने यह सुनिश्चित किया कि दंतेवाड़ा अभियान सफल रहा.