एक ओर जहां भाजपा अभी भी ज्ञानवापी मुद्दे पर अपना रुख तलाश रही है, वहीं इसके नेता व्यक्तिगत तौर इस मामले पर अपनी राय सार्वजनिक कर रहे हैं और 1991 के कानून पर फिर से विचार करने की मांग कर रहे हैं.
तीन कारकों—राजनीतिक समर्थन, कलेक्टर के कार्यालय का एक 'लिसनिंग पोस्ट' (सूचना केंद्र) के रूप में कार्य करना, और उग्रवाद-विरोधी अभियानों में हस्तक्षेप न करना—ने यह सुनिश्चित किया कि दंतेवाड़ा अभियान सफल रहा.