कोरोना महामारी के बाद अर्थव्यवस्था में सुधार उम्मीद से ज्यादा तेजी से हो रहा है लेकिन अगले महीने बजट पेश करने से पहले निम्नलिखित पांच मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है.
वित्त वर्ष 2021 में भारत की जीडीपी में सिकुड़न जारी रहने के ही अनुमान हैं लेकिन प्रतिबंधों में छूट, सप्लाई चेन की रुकावटों को दूर करने के उपायों से मांग में वृद्धि के साथ अर्थव्यवस्था में उछाल आने की उम्मीद की जा रही है.
सरकार और रिजर्व बैंक की ओर से दिया गया रियायती ऋण पहले भी कोई टिकाऊ वित्तीय साधन नहीं साबित हुआ है, और वैसे भी भारत के बॉन्ड मार्केट अभी भी सुधारों का इंतजार कर रहा है.
मुद्रास्फीति दर का लक्ष्य फिलहाल 4 प्रतिशत का रखा गया है, जिसमें 2 प्रतिशत का इधर-उधर हो सकता है, वैसे इसकी समीक्षा मार्च 2021 में होनी ही है लेकिन इस लक्ष्य को 5 साल के लिए बढ़ाना कोई अच्छी बात नहीं होगी.
परामर्श और भागीदारी की प्रक्रिया के ज़रिए बदलाव किए जाने पर लोग बगैर टकराव के नए विचारों के अभ्यस्त हो सकते हैं. बुरे प्रस्तावों को छोड़ा जा सकता है जबकि अच्छे को बेहतर बनाया जा सकता है.
दूसरी तिमाही के लिए जीडीपी के आंकड़े उम्मीद से बेहतर रहे, लेकिन अब भी कोविड के मामले बढ़ने से विकास पर असर पड़ सकता है. लगातार आपूर्ति-पक्षीय मुद्रास्फीति भी एक समस्या है.
हाल में कई बैंक जिस तरह फेल हुए हैं वे जाहिर करते हैं कि रिजर्व बैंक की निगरानी क्षमता को लेकर शंकाएं बेजा नहीं हैं, जिसकी एक मिसाल यह है कि रिजर्व बैंक ने खराब कर्जों की समस्या को पनपने दिया.
पीएलआई योजना भारत में विनिर्माण और निर्यात संभावनाओं को बढ़ाने के उद्देश्य से प्रोत्साहन के जरिये कंपनियों की तीव्र प्रगति पर केंद्रित है. लेकिन लंबे समय में इन क्षेत्रों को अपने हाल पर ही छोड़ देने की जरूरत है.
शहरों में नहरों की खुदाई जैसे शारीरिक श्रम वाले कार्यों की गुंजाइश बहुत कम है. शहरी मनरेगा के लिए अपेक्षानुरूप रोज़गार प्रदान करना और बुनियादी सुविधाएं तैयार करना शायद संभव नहीं हो.
जब वामपंथी दल आक्रामक तरीके से हिंदू वोटों में सेंध लगा रहे हैं, तो बीजेपी के लिए तुरंत फायदा अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने में हो सकता है, उससे पहले कि वह अपना दायरा और फैलाए.