आरबीआई के लिए बतौर सरकारी ऋण प्रबंधक अपनी सेवाएं देते हुए मुद्रास्फीति काबू रखने की जिम्मेदारी निभाने को लेकर चलने वाला अंतर्द्वंद अगले कुछ सालों में और बढ़ने वाला है.
भारतीय कॉरपोरेट जगत ने अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में तेज़ रिकवरी के रुझान दिखाए हैं. कोविड-19 मामलों में गिरावट और टीकाकरण अभियान में तेज़ी से आने वाले महीनों में आर्थिक रिकवरी की प्रक्रिया और रफ़्तार पकड़ सकेगी.
तेल पर टैक्स को सरकार कठिन वित्तीय परिस्थितियों से बाहर निकलने के उपाय के तौर पर इस्तेमाल करती है, लेकिन इससे मुद्रास्फीति और पेट्रोलियम उत्पादों पर अत्यधिक निर्भरता जैसी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.
दूरसंचार और नेटवर्किंग उत्पादों के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना शुरू की गई है, लेकिन सरकार को स्थिर और निश्चित नीतिगत परिवेश भी तैयार करना चाहिए.
भारत में रोगों के बोझ का ताल्लुक गरीबी से है लेकिन वह कारणों को हमेशा आर्थिक वृद्धि में ढूंढता रहा है, जो स्वास्थ्य के लिए उभरते नये जोखिमों पर ध्यान नहीं देता रहा है.
अगर सरकार निजीकरणके लिए पूरा ज़ोर लगाती है तथा यूनियनों, नौकरशाही या विपक्ष को अपनी योजनाओं को बेपटरी करने की अनुमति नहीं देती है, तोवास्तव में भारत के लिए यह एक परिवर्तनकारी बजट साबित होगा.
इस बजट के बाद मोदी सरकार को लालफ़ीताशाही खत्म करने, टैक्स के ढांचे और नियमन की व्यवस्था को सरल बनाने, और वित्तीय क्षेत्र में सुधार पर ध्यान देना चाहिए ताकि निवेश के लिए माहौल बने.
संस्थागत बदलाव जिनमें बड़ा ख़र्च नहीं है और जो सुधारोंके प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं, निर्मला सीतारमण के बजट में एक मज़बूत सकारात्मक संकेत हो सकते हैं.
अर्थशास्त्री विस्तारवादी बजट की तरफदारी कर रहे हैं, इसलिए संतुलित उपाय नहीं करने के लिए उसकी अधिक आलोचना नहीं होगी. इसमें मांग बढ़ाकर आर्थिक विकास तेज़ करने का लक्ष्य होना चाहिए.
जब वामपंथी दल आक्रामक तरीके से हिंदू वोटों में सेंध लगा रहे हैं, तो बीजेपी के लिए तुरंत फायदा अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने में हो सकता है, उससे पहले कि वह अपना दायरा और फैलाए.