Saturday, 21 May, 2022
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महंगाई दर में और कमी की उम्मीद लेकिन भारत में कीमतों के आंकड़ों के बेहतर विश्लेषण की ज़रूरत

महंगाई आकलन की साल-दर-साल वाली विधि में कीमतों में उतार-चढ़ाव की अनदेखी होती है, इसलिए माह-दर-माह मौसमी समायोजन का तरीका अपनाया जाना चाहिए.

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पिछले कुछ महीनों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में एक प्रमुख चिंता मुद्रास्फीति की रही है, जो लगातार मौद्रिक नीति के 4 प्रतिशत के लक्ष्य के ऊपर थी. मुद्रास्फीति में यह अस्थिरता लॉकडाउन के चलते पड़े आपूर्ति संबंधी व्यवधानों के कारण आई थी. अर्थव्यवस्था के वापस खुलने के बाद अपर्याप्त आपूर्ति और लॉजिस्टिक्स संबंधी समस्याएं कम हुईं, और कीमतें वापस सामान्य स्तर पर आ गईं. कीमतों का ये हाल मुद्रास्फीति के हालिया आंकड़ों में परिलक्षित होता है. हमारा आकलन है कि जनवरी में आने वाले नवीनतम आंकड़ों में महंगाई की दर में और कमी नज़र आएगी.

महंगाई कम होने से न केवल लोगों के घरेलू बजट और कंपनियों पर से दबाव कम होगा, बल्कि इस गलत दलील का भी ज़ोर कम हो सकेगा कि मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की प्रणाली भारत के लिए उपयुक्त नहीं है. महंगाई के आंकड़ों में हालिया उतार-चढ़ाव के बाद, कई अर्थशास्त्रियों ने यह तर्क देना शुरू कर दिया था कि मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण प्रणाली से छुटकारा पाने का समय आ गया है; जबकि कइयों ने आशंका जताई कि लॉकडाउन के चलते आपूर्ति संबंधी अल्पकालिक अड़चनों के कारण बढ़ी महंगाई ब्याज दरों में बढ़ोतरी की वजह बनेगी. यह सोच बिल्कुल त्रुटिपूर्ण है. स्पष्टतया आपूर्ति संबंधी अल्पकालिक अवरोधों के कारण मुद्रास्फीति में आई तेजी न केवल अस्थायी थी, बल्कि मौद्रिक नीति समिति ने भी सही रुख अपनाते हुए ब्याज दर बढ़ाने से परहेज किया.

ताजा आंकड़ों की बात करें, तो हम देखते हैं कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित खुदरा महंगाई दर तेज गिरावट के साथ नवंबर के 6.93 प्रतिशत के मुकाबले दिसंबर में 4.59 प्रतिशत रह गई. इस गिरावट की मुख्य वजह थी खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति में कमी, जो दिसंबर में घटकर 3.87 प्रतिशत रह गई, जोकि नवंबर में 8 प्रतिशत से ऊपर थी. खाद्य पदार्थों की कीमतों में गिरावट में मुख्य योगदान सब्जियों के दाम में नरमी का रहा — दिसंबर में सब्जियों की महंगाई दर 10.41 प्रतिशत रही, जबकि नवंबर में यह 15.6% थी.


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मौसमी रूप से समायोजित डेटा के उपयोग की ज़रूरत

भारत में महंगाई को समझने से जुड़ी कठिनाइयों में से एक है, अन्य देशों के विपरीत, आधिकारिक सांख्यिकी संगठनों का मौसमी रूप से समायोजित मुद्रास्फीति डेटा उपलब्ध नहीं कराना. आधिकारिक सरकारी डेटा में सीपीआई में वर्ष-दर-वर्ष हुए प्रतिशत परिवर्तनों को प्रदर्शित किया जाता है. इस तरीके में, उदाहरण के लिए, दिसंबर 2019 की तुलना में दिसंबर 2020 में मुद्रास्फीति में हुए प्रतिशत परिवर्तन की गणना की जाती है. यानि यदि दिसंबर 2020 में मुद्रास्फीति के 5 प्रतिशत रहने की बात की जाए, तो उसका मतलब है दिसंबर 2019 में 100 रहे सीपीआई 100 का दिसंबर 2020 में 105 हो जाना.

वर्ष-दर-वर्ष वाले डेटा से कीमतों में उतार-चढ़ाव का पता नहीं चलता है. महंगाई में माह-दर-माह बदलाव या पॉइंट-ऑन-पॉइंट बदलाव (पीओपी) से इसका अंदाजा लग सकता है. मासिक डेटा की बात करें, तो मुद्रास्फीति में वार्षिक बदलाव की प्रत्येक संख्या पीओपी मुद्रास्फीति के पिछली 12 संख्याओं का औसत है. पीओपी पद्धति का उपयोग कर महंगाई के बारे में अधिक हालिया जानकारी प्राप्त की जा सकती है.

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हालांकि, माह-दर-माह बदलावों को मौसमी उतार-चढ़ाव के लिए समायोजित करने की आवश्यकता है. आंकड़ों में मौसमी उतार-चढ़ाव शामिल रहने पर ऐसा लग सकता है कि कीमतों में वृद्धि हुई है और नीतिगत कदम उठाए जाने की ज़रूरत है, जोकि गलत होगा. उदाहरण के लिए, आमों का मौसम खत्म होने के बाद उनकी कीमतों में वृद्धि चिंता की वजह नहीं होनी चाहिए. अगले सीजन में आमों की कीमतें स्वयं कम हो जाएगी.

डेटा की इस त्रुटि को मासिक मूल्य स्तरों के मौसमी समायोजन के ज़रिए दूर किया जाता है. डेटा के मौसमी समायोजन के तरीके लगभग सौ साल पुराने हैं, और उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में उनका व्यापक उपयोग किया जा रहा है. इन अर्थव्यवस्थाओं के सांख्यिकी विभाग अपरिष्कृत डेटा के साथ-साथ मौसमी रूप से समायोजित डेटा भी जारी करते हैं. जिनका इस्तेमाल आगे चलकर सरकारें और केंद्रीय बैंक नीतिगत उपायों की योजना बनाने में करते हैं.

वित्तीय वर्ष 2020-21 पर माह-दर-माह नज़र

एनआईपीएफपी के एक अध्ययन में भारत में मौसमी समायोजित मुद्रास्फीति की माह-दर-माह सिरीज़ प्राप्त करने के लिए मानक मौसमी समायोजन प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया गया. इस अध्ययन के अनुसार यह सिरीज़ हमें साल-दर-साल मुद्रास्फीति के शुरुआती रुझान देती है.

मुद्रास्फीति के मौसमी रूप से समायोजित हालिया माह-दर-माह आंकड़ों से हमें क्या पता चला है? लॉकडाउन के पहले महीने अप्रैल 2020 में, माह-दर-माह मुद्रास्फीति छलांग लगाते हुए 21.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी. संभव है ऐसा लॉकडाउन के दौरान आपूर्ति व्यवस्था में पड़ी बाधा के कारण हुआ हो.

उसके बाद महंगाई दर में तेज गिरावट आई जो लॉकडाउन के कारण उपभोक्ता मांग में आई कमी को दर्शाती है. मई 2020 में, मौसमी रूप से समायोजित माह-दर-माह मुद्रास्फीति घटकर 6 प्रतिशत रह गई. सितंबर और अक्टूबर के महीनों को छोड़कर, माह-दर-माह मुद्रास्फीति में नरमी बनी रही.

मई से दिसंबर तक की औसत माह-दर-माह मुद्रास्फीति 4.05 प्रतिशत रही. अर्थव्यवस्था के लिए यह महंगाई की सामान्य दर मानी जाएगी. यदि आपूर्ति व्यवस्था में व्यवधान नहीं पड़ा होता, तो माह-दर-माह मुद्रास्फीति का औसत स्तर और भी कम रहता.


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रिज़र्व बैंक का यथास्थिति पर ज़ोर

भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने ब्याज दरों में 115 आधार अंकों की कटौती की और अगस्त 2020 से दरों को अपरिवर्तित रखने का सही काम किया है. सामान्य परिस्थितियों में एमपीसी ने कीमतें बढ़ने की प्रतिक्रिया में ब्याज दरों को बढ़ाया होता, लेकिन वह हाल के महीनों में मुद्रास्फीति में वृद्धि को मुख्यतया आपूर्ति व्यवस्था में व्यवधान से जोड़कर देखती है. एमपीसी ने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि आर्थिक विकास को पटरी पर लाने और मांग में कमी की समस्या से पार पाने के लिए जब तक ज़रूरी हुआ वह उदार रुख ही अपनाएगी.

खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी गिरावट के सहारे दिसंबर में महंगाई दर में आई कमी से स्पष्ट है कि आपूर्ति पक्ष पर दबाव कम हो रहा है. जब तक मांग कमज़ोर रहती है, रिज़र्व बैंक संभवत: ब्याज दरों के संबंध में यथास्थिति बनाए रखेगा.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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