चालू लॉकडाउन, आशंकाएं और अनिश्चितता आर्थिक वृद्धि दर को नीचे खींच रही हैं लेकिन महामारी की दूसरी लहर जब शांत पड़ने लगी है तब अगली तिमाही में आर्थिक कारोबार में सुधार की उम्मीद जागने लगी है.
उम्मीद है भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले साल के मुकाबले इस साल बेहतर हाल में रहेगी लेकिन कोविड की दूसरी लहर से पहले वृद्धि दर 13% से ज्यादा रहने का जो अनुमान लगाया जा रहा था उसकी जगह यह दर 11% या उससे नीचे ही रह सकती है.
रिजर्व बैंक ने छोटे ऋण लेने वालों और असंगठित क्षेत्र की इकाइयों को केंद्र में रखकर कदम उठाए हैं, स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की जरूरतों को भी पूरा करने की कोशिश की है लेकिन असली बात तो यह है कि उपायों को कितनी गंभीरता से लागू किया जाता है
1 मई से वैक्सीन की मांग और आपूर्ति केंद्र सरकार के काबू में नहीं रह जाएगी, कोई भी वयस्क वैक्सीन लगवाने का फैसला कर सकता है, और सभी राज्यों तथा संस्थाओं को वैक्सीन खरीदने की छूट होगी.
टीकाकरण की मौजूदा गति से तो भारत में पूरी आबादी को कवर करने में 2 साल का समय लगेगा. नए टीके यह प्रक्रिया तेज कर सकते हैं और साथ ही इनके अन्य फायदे भी हैं.
सरकार पर ब्याज के बोझ को कम करने के लिए रिजर्व बैंक ने ‘जी-एसएपी’ नाम का नया उपाय किया है लेकिन मुद्रास्फीति में वृद्धि के खतरे के मद्देनज़र महंगाई पर लगाम लगाने के लिए उसे ब्याज दरें बढ़ानी भी होगी.
भारत और विदेशों में जिस तरह कोविड-19 की लहर के बाद लहर आ रही है, यह साल अच्छी और बुरी खबरों का गवाह बनता रहेगा, जिससे वित्तीय बाजारों में अस्थिरता की स्थिति बनी रह सकती है.
इन्फ्रास्ट्रक्चर की परियोजनाओं के लिए पैसे देने की ताकत खो चुके हैं बैंक, इसलिए अब डीएफआई फिर से चलन में है. उसके अंतर्गत इन परियोजनाओं के लिए 3 लाख करोड़ जुटाने का लक्ष्य है.
जब वामपंथी दल आक्रामक तरीके से हिंदू वोटों में सेंध लगा रहे हैं, तो बीजेपी के लिए तुरंत फायदा अपने कोर वोट बैंक को मजबूत करने में हो सकता है, उससे पहले कि वह अपना दायरा और फैलाए.