Thursday, 26 May, 2022
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क्यों मोदी सरकार को मुश्किल वित्तीय हालात से उबरने के लिए तेल की आय पर निर्भरता खत्म करनी चाहिए

तेल पर टैक्स को सरकार कठिन वित्तीय परिस्थितियों से बाहर निकलने के उपाय के तौर पर इस्तेमाल करती है, लेकिन इससे मुद्रास्फीति और पेट्रोलियम उत्पादों पर अत्यधिक निर्भरता जैसी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं.

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पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें पिछले कई हफ्तों से बढ़ रही हैं. देश के कुछ हिस्सों में तो पेट्रोल की खुदरा कीमत प्रति लीटर 100 रुपये को पार कर गई है. मांग में नए सिरे से तेज़ी आने के कारण वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, और अपने यहां पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोत्तरी उसी का परिणाम है.

पेट्रोल के खुदरा मूल्य का एक बड़ा हिस्सा टैक्सों का होता है. जब कोविड-19 महामारी के कारण कर राजस्व में भारी गिरावट आने लगी, तो राजस्व बढ़ाने के लिए मोदी सरकार ने मार्च 2020 में, और फिर मई 2020 में, पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया. उस समय आमलोगों को उत्पाद शुल्क बढ़ाए जाने का असर महसूस नहीं हुआ क्योंकि वैश्विक बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई हुई थी.

महामारी के कारण अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बावजूद यहां पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम नहीं हुईं. क्योंकि सरकार की खस्ताहाल वित्तीय स्थिति को सहारा देने के लिए कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट को उत्पाद शुल्क में वृद्धि से संतुलित कर दिया गया.


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बढ़े टैक्स का असर

ऊंचे टैक्स के दो परिणाम होते हैं. सबसे पहले, यह उपभोक्ता की जेब पर भारी पड़ता है और यह महंगाई भी बढ़ा सकता है. बढ़ाए गए उत्पाद शुल्क के बीच हाल के सप्ताहों में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई तेज़ी पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में उछाल का कारण बन गई है. ईंधन की ऊंची कीमतों से मुद्रास्फीति का दबाव बनेगा.

ऐसा दो तरीकों से हो सकता है: पहला, प्रत्यक्ष रूप से क्योंकि कच्चा तेल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के लिए निर्धारित उत्पादों की बास्केट (‘ईंधन एवं प्रकाश’ और ‘परिवहन एवं संचार’ श्रेणियों में) का घटक है; और परोक्ष रूप से, ईंधन की बढ़ी कीमत के फलस्वरूप परिवहन लागत बढ़ने से ऐसा होगा. खासकर इस परोक्ष असर के कारण सब्जियों, अंडा, मांस, दूध, से लेकर सीमेंट, उर्वरक, रसायन जैसे विभिन्न उत्पादों की कीमतें बढ़ती हैं. ईंधन की बढ़ी कीमतों के कारण सेवाओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं.

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दूसरे, यह पेट्रोलियम उत्पादों पर अत्यधिक राजकोषीय निर्भरता का कारण बनता है. पेट्रोल और डीजल सरकार के लिए राजस्व बढ़ाने का आसान साधन रहे हैं. सरकार को राजस्व के अपने स्रोतों में विविधता लाने और राजकोषीय घाटे को कम करने हेतु तेल पर निर्भरता घटाने की आवश्यकता है.

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों तथा पेट्रोल और डीजल पर ऊंचे अप्रत्यक्ष करों के मुद्रास्फीति पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता जताई है. एमपीसी ने अर्थव्यवस्था पर मुद्रास्फीति के दबाव को काबू में रखने लिए पेट्रोल और डीजल पर लागू ऊंचे अप्रत्यक्ष करों में क्रमिक कमी किए जाने की ज़रूरत बताई है.


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भारत में तेल की कीमतों पर नियंत्रण

पिछले कुछ वर्षों के राजस्व के आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि तेल सरकार के लिए राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है. सरकार के सकल कर राजस्व में तेल से मिलने वाली आय की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती रही है. 2014 और 2016 के बीच जब वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें घट रही थीं, सरकार ने कई बार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में वृद्धि की. राजस्व के लिए तेल क्षेत्र पर सरकार की भारी निर्भरता की ये स्थिति अगले साल भी जारी रहने की संभावना है.

दीर्घावधि में, भारत पेट्रोल के मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था से अलग हटता जा रहा है. भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है और चूंकि घरेलू कीमतों को अंतरराष्ट्रीय दरों से जोड़ दिया गया है, अभी खुदरा कीमतें बढ़ रही हैं.

पेट्रोल और डीजल की कीमतें सरकार द्वारा प्रशासित मूल्य तंत्र (एपीएम) के तहत तय की जाती थीं, जो 1975 से अस्तित्व में थी. प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए, सरकार ने 1 अप्रैल 2002 से प्रशासित मूल्य तंत्र को समाप्त कर दिया.

एपीएम समाप्त किए जाने के बाद, देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें वैश्विक कीमतों से निर्धारित होने की उम्मीद थी, लेकिन सरकार ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव के मद्देनज़र कीमतों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पेट्रोल, डीजल, केरोसिन और रसोई गैस की कीमतें निर्धारित करना शुरू कर दिया. इस व्यवस्था के तहत डीजल और मिट्टी के तेल पर सब्सिडी दी जा रही थी.

मूल्य नियंत्रण प्रणाली ने सरकार के साथ-साथ तेल विपणन कंपनियों के वित्तीय स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव डाला. 2010 में, पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य निर्धारण की व्यवहार्य और स्थाई प्रणाली पर विशेषज्ञ समूह की सिफारिशों के अनुरूप पेट्रोल की कीमतों के बाजार निर्धारित होने की व्यवस्था को लागू किया गया. आगे चलकर 2014 में डीजल की कीमत को भी नियंत्रणमुक्त कर दिया गया. उसके बाद से, देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों के अंतरराष्ट्रीय बाजारों के मूल्यों से निर्धारित होने की अपेक्षा की जाती है. अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बदलाव के आधार पर तेल विपणन कंपनियों द्वारा पेट्रोल और डीजल की घरेलू कीमतों को पुनरीक्षित किया जाता है.


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वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत

ग्लोबल वार्मिंग के बारे में चिंतित पर्यावरणविद पेट्रोल और डीजल पर भारी टैक्स लगाए जाने पर कोई आपत्ति नहीं करेंगे क्योंकि ये कार्बन टैक्स के तहत आते हैं और इन उत्पादों के अधिक उपयोग को हतोत्साहित करते हैं. अध्ययनों से ये संकेत मिलता है कि 2040 तक भारत की तेल की जरूरतें किसी भी अन्य देश के मुकाबले अधिक होंगी. लेकिन केवल कार्बन टैक्स के सहारे ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों की ओर कदम बढ़ाने का बाध्यकारी दबाव नहीं बन सकता. इसलिए प्राकृतिक गैस और सौर ऊर्जा जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को प्रोत्साहित करने की भी आवश्यकता है.

सरकार ने देश में तेल और गैस के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए पहलकदमियों की घोषणा की है. सरकार देश की ऊर्जा बास्केट में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को 6.3 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की दिशा में काम कर रही है.

एक अन्य पहल जो ईंधन पर निर्भरता को कम करने में मदद कर सकती है, वो है इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के उपयोग को प्रोत्साहित करना. इससे वायु प्रदूषण को कम करने के भारत के प्रयासों को भी बढ़ावा मिलेगा. बजट में घोषित स्वैच्छिक वाहन स्क्रैपेज नीति का उद्देश्य उन वाणिज्यिक और निजी वाहनों को प्रचलन से बाहर करना है जो क्रमश: 15 और 20 वर्ष से अधिक पुराने हैं. इन पुराने वाहनों को हटाने से कम ईंधन खपत वाले और पर्यावरण अनुकूल वाहनों के लिए जगह बनेगी, और इससे भारी आयात बिल को कम करने में भी मदद मिलेगी.

इस उद्देश्य के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अधिक लागत-प्रतिस्पर्धी बनाने की भी आवश्यकता है, जिसके लिए आयात शुल्क को तर्कसंगत बनाना पड़ेगा.

तेल पर अत्यधिक राजकोषीय निर्भरता ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोतों की ओर बढ़ने के प्रयासों को हतोत्साहित कर सकती है. इसके अलावा, जब तक नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित सार्वजनिक परिवहन हकीकत नहीं बन जाता, भारी उत्पाद शुल्क के कारण ईंधन की बढ़ी कीमतें केवल आम लोगों की जेब पर बोझ बनेंगी, और दीर्घकालिक समाधान की दिशा में उसका कोई योगदान नहीं होगा.

ईंधन आयात के मद में अरबों डॉलर बचाने, व्यापार घाटे में वृद्धि को रोकने और तेल की कीमतों में उछाल के झटके से बचने के लिए ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के उपयोग को सुलभ बनाने वाले कदमों की दरकार है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(इला पटनायक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं और राधिका पांडेय एनआईपीएफपी में कंसल्टेंट हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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