Saturday, 28 May, 2022
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हिंदुत्व और राष्ट्रवाद से परे, एक चीज जो मोदी को सफल बनाती है वह है- उनकी योजनाओं की प्रभावी डिलीवरी

पीएम मोदी ने उज्ज्वला, आवास योजना और नल जल - जैसी कल्याणकारी योजनाओं की कल्पना की और फिर लाभार्थियों तक यह पहुंचे यह भी सुनिश्चित करने के आदेश दिए.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक और चुनावी सफलता का एक मज़बूत आधार है  — उनकी कल्याणकारी योजनाएं और साथ ही विकास परियोजनाएं तथा उनकी प्रभावी डिलीवरी. बेशक, मुखर हिंदुत्व और उग्र राष्ट्रवाद उनकी राजनीति की कुंजी है, लेकिन वे इनके बल पर चुनाव नहीं जीतते. केंद्र में 2014 में सत्ता में आने के बाद से नई योजनाएं तैयार करने और व्यापक पहुंच वाली परियोजनाओं को क्रियान्वित करने की क्षमता मोदी के लिए बहुत फायदेमंद सिद्ध हुई है.

‘नल से जल’ कार्यक्रम पर दिप्रिंट की नवीनतम श्रृंखला से भी यही बात उजागर होती है — सभी के लिए नल के ज़रिए पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने की इस योजना के प्रभावी परिणाम दिखे हैं. हालांकि हमारे संवाददाताओं ने ये भी पाया कि अन्य नई योजनाओं की तरह इस कार्यक्रम को भी आरंभिक समस्याओं से जूझना पड़ा है. लेकिन मोदी की सफलता बुनियादी सुविधाओं की अनुपलब्धता वाले क्षेत्रों की पहचान करने और फिर लोगों तक उनकी पहुंच सुनिश्चित कराने में निहित है. और यही काम चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वोट दिलाता है.

ग्रामीण आवास, रसोई गैस, ग्रामीण बिजली, बैंक खाते और अब नल जल — मोदी का मॉडल स्पष्ट है, और परिणाम तो और भी अधिक स्पष्ट. आप उनकी राजनीति से सहमत या असहमत हो सकते हैं, या ध्रुवीकरण की रणनीति से को ख़ारिज कर सकते हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी मतदाताओं से जुड़ने की कला में माहिर हैं. और इसके लिए उनका मुख्य तरीका है पहले लोगों की ज़रूरतों की पहचान करना और फिर उन्हें पूरा करने के लिए योजनाएं लागू करना.


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हिंदुत्व बनाम राष्ट्रवाद

मुखर हिंदुत्व भाजपा की अभिन्न पहचान है. इसी के बल पर पार्टी 1990 के दशक आरंभ में राष्ट्रीय क्षितिज पर छायी थी, और सवाल ही नहीं उठता कि वह भविष्य में इसका दामन छोड़ेगी. वास्तव में हिंदुत्व का परचम उठाए रखने को भाजपा शान की बात मानती है.

कोई भी चुनाव हिंदू-मुस्लिम मुद्दे पर बयानबाज़ी के बिना पूरा नहीं होता है — चाहे वह 2017 का उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव हो, जिसमें मोदी का ‘श्मशान-कब्रिस्तान’ मुद्दा छाया रहा था, या 2019 का लोकसभा चुनाव जब गृह मंत्री अमित शाह का सीएए-एनआरसी मुद्दा चर्चा के केंद्र में रहा. सांप्रदायिक नज़रिए के अलावा, राष्ट्रवाद भी भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण साधन रहा है. जो कोई भी पार्टी के उद्देश्यों के अनुरूप नहीं दिखता उसे देश के ‘टुकड़े’ करने की कोशिश में लगा ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दिया जाता है.

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लेकिन भरोसेमंद वोट जुटाऊ फार्मूला होने के बावजूद हिंदुत्व और राष्ट्रवाद ही सब कुछ नहीं हैं, वरना भाजपा को अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 2004 के लोकसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय नहीं झेलनी पड़ती.

मोदी ने अपनी योजनाओं के कार्यान्वयन को अपने सफल फार्मूले में एक प्रमुख घटक के रूप में शामिल किया है — हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की भूमिका तो बस तड़के वाली है, जो पार्टी के अभियान को आकर्षक बनाने के काम आते हैं.


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जनकल्याण, डिलीवरी, विकास

जनकल्याण और विकास को मुख्य मुद्दे के रूप में आगे बढ़ाने की बात 2018 की शुरुआत में स्पष्ट हो गई थी, जब मोदी ने भाजपा शासित 14 राज्यों के नेताओं को कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए कहा था, और प्रमुख कार्यक्रमों के लिए निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के महत्व पर जोर दिया था.

मोदी का पहला कार्यकाल ज़रूरतमंदों के लिए योजनाएं शुरू करने के बारे में था — प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, जन धन योजना आदि-आदि. इनमें से प्रत्येक की उस रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका थी जिसने कि 2019 में मोदी को पांच साल पहले के मुकाबले कहीं बड़े जनादेश के साथ सत्ता में वापसी में मदद की.
दस वर्षों तक संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की कमान संभालने वाली कांग्रेस के पास इस तरह का संभवत: एक ही कार्यक्रम था — मनरेगा. हालांकि 2009 में पार्टी को निश्चित रूप से फायदा दिलाने वाली इस योजना का असर यूपीए-2 के कार्यकाल में घटने लगा था, जब इसकी अपर्याप्त उपलब्धता, त्रुटिपूर्ण कार्यान्वयन और छद्म लाभार्थियों की बातें सामने आने लगी थीं.

मोदी की बात करें, तो उद्देश्य सिर्फ लोगों की सरकार से अपेक्षाओं को जानने का ही नहीं होता बल्कि उन्हें पूरा करने पर भी ज़ोर दिया जाता है. उदाहरण के लिए ग्रामीण आवास का विषय लिया जा सकता है. इंदिरा आवास योजना के रूप में, इस कार्यक्रम में अनेकों कमियां थीं. लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना – ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के रूप में रीपैकेजिंग किए जाने के बाद केवल दो वर्षों में उसकी क्षमता दोगुना बढ़ गई.

त्रिपुरा, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनावों की रिपोर्टिंग इन राज्यों में जाकर करने के दौरान मेरा सामना ऐसे मतदाताओं से हुआ था जो केंद्र सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों के कारण भाजपा को सत्ता में देखना चाहते थे. बहुत कम लोगों ने भाजपा के पक्ष में उग्र राष्ट्रवाद या हिंदुत्व का हवाला दिया था. बेशक, इन कारकों की हमेशा ही एक भूमिका होती है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी ने सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन को अपनी रणनीति के केंद्र में रखकर चुनावों में जीत हासिल की है.


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उनके दूसरे कार्यकाल में, शासन की बात राजनीतिक शोर में खो गई लगती है. लेकिन मोदी चीज़ों की गहरी समझ रखते हैं और चतुर हैं. वह जानते हैं कि राम मंदिर उन्हें थोड़ी बढ़त भले ही दिला दे, लेकिन ये उत्तरप्रदेश से आगे उन्हें शायद ही चुनाव जिता सकता है. ‘नल से जल’ योजना का रिपोर्ट कार्ड काफी हद तक सकारात्मक है, भले ही अभी भी ये सभी तक नहीं पहुंची है और इसमें सुधार की बहुत गुंजाइश है. इस योजना के ज़मीनी स्तर पर आकलन के लिए समुदायों के बीच जाने वाली मेरी सहकर्मी मौसमी दासगुप्ता ने पाया कि ग्रामीण गरीबों, विशेषकर अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों के जीवन में इससे भारी बदलाव आया है. उन्होंने लोगों को इस योजना के लिए केंद्र सरकार की सराहना करते भी पाया — पीएमएवाई-जी और उज्जवला योजनाओं पर दिखने वाली प्रतिक्रिया की ही तरह.

यदि आप बजट 2021 में चुनाव वाले राज्यों के लिए बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर, और साथ ही इन राज्यों में प्रधानमंत्री द्वारा तूफानी गति से विभिन्न परियोजनाओं के उद्घाटन पर गौर करें, तो पैटर्न स्पष्ट हो जाता है.

कुछ लोग मोदी को महज हिंदुत्व और ’56 इंच का सीना’ से जोड़कर देखना चाहते हैं. लेकिन उत्तेजक, भावनात्मक और अक्सर ध्रुवीकरण कराने वाले सांप्रदायिकता और राष्ट्रवाद के मुद्दों के साथ एक अन्य रणनीति भी है जिसे मोदी अपनी राजनीतिक पकड़ के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं — मतदाताओं को बुनियादी सुविधाएं देने वाली योजनाओं का कार्यान्वयन. आप इसे चूल्हा, मकान और पानी अभियान कह सकते हैं — रोटी, कपड़ा और मकान की तर्ज पर मोदी की विशेष पेशकश.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

(लेखक द्वारा व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)


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