Thursday, 27 January, 2022
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विकास वित्त संस्थान जो फिर स्थापित हुआ है, मोदी सरकार इस बार कैसे उसे सफल बना सकती है

इन्फ्रास्ट्रक्चर की परियोजनाओं के लिए पैसे देने की ताकत खो चुके हैं बैंक, इसलिए अब डीएफआई फिर से चलन में है. उसके अंतर्गत इन परियोजनाओं के लिए 3 लाख करोड़ जुटाने का लक्ष्य है.

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नेशनल बैंक फॉर फाइनांसिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड डेवलपमेंट नाम के सरकारी स्वामित्व वाले विकास वित्त संस्थान (डीएफआई) के गठन की मंजूरी दे दी है. 20,000 करोड़ रुपये के कोष वाले इस बैंक के लिए शुरुआती अनुदान के रूप में 5,000 करोड़ रुपए दिए गए हैं. शुरुआती पूंजी का इस्तेमाल इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के वास्ते अगले कुछ वर्षों में 3 लाख करोड़ रुपए उगाहने के लिए किया जाएगा.

डीएफआई के गठन के पीछे इरादा इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए दीर्घकालिक वित्त का इंतजाम करना है. इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं जटिल, पूंजीखोर और लंबे समय बाद लाभ देने वाली होती हैं इसलिए इन्हें वित्त उपलब्ध कराने वालों के लिए जोखिम भरा माना जाता है. इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं का आकार और उनकी जटिलता वित्त पोषण के लिए चुनौती होती हैं. इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए बैंकों से फाइनान्स उपलब्ध करवाने में मुश्किलें भी हैं- उनका प्रोफाइल ऊंचे जोखिम वाली इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की दीर्घकालिक फाइनान्सिंग के लिए उपयुक्त नहीं होता.

2003 से 2008 के बीच इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को बैंकों से फाइनान्स उपलब्ध कराने की रणनीति अपनाई गई. लेकिन ग्लोबल फाइनान्सिंग संकट के कारण और 2012 से अर्थव्यवस्था में मंदी के चलते कर्जों का भुगतान मुश्किल हो गया. उसके बाद की अवधि में नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) में भारी वृद्धि हुई. रिजर्व बैंक की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट का अनुमान है कि बैंकों के एनपीए, जो सितंबर 2020 में 7.5 प्रतिशत थे वे सितंबर 2021 तक बढ़कर 13.5 प्रतिशत पर पहुंच सकते हैं. यानी इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को फाइनान्स करने की बैंकों की क्षमता कमजोर हो चुकी है.


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घरेलू व विदेशी स्रोतों से दीर्घकालिक फाइनान्स

इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए कोष उपलब्ध कराने के मकसद से विकास वित्त संस्थान के गठन का विचार भारत के लिए कोई नया नहीं है. 1950 और 1960 के दशकों में उद्योग जगत की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसे कई संस्थान बनाए गए थे. डीएफआई को सरकार और रिजर्व बैंक से रियायती दर पर कर्ज मिलता था. डीएफआई द्वारा जारी बॉन्ड को बैंकों के एसएलआर (वैधानिक तरलता अनुपात) वाला निवेश माना जाता था.

नब्बे के दशक में रियायती कर्ज बंद कर दिए गए तो डीएफआई को मजबूरन बाज़ार से कर्ज लेना पड़ गया. मजबूत उधार बाज़ार न होने की वजह से डीएफआई सस्ते कोष नहीं हासिल कर पाते हैं. इसलिए प्रतिस्पर्द्धी दरों पर उद्योग को कर्ज देने की उनकी क्षमता कमजोर हो गई. कई डीएफआई को बाद में वाणिज्य बैंकों में तब्दील होना पड़ा.

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डीएफआई मॉडल अब फिर से वापस आ गया है. प्रस्तावित संस्थान इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर सकें, इसके लिए उन्हें घरेलू तथा विदेशी स्रोतों से दीर्घकालिक वित्त हासिल करने की छूट देनी चाहिए. उन्हें पेंशन फंड, बीमा कंपनी और म्यूचुअल फंड के रूप में पूंजी हासिल करने की भी छूट मिलनी चाहिए. खबर है कि सरकार डीफआई में निवेशित कोष पर 10 साल के लिए करों में छूट देने पर विचार कर रही है ताकि बीमा और पेंशन फंड जैसे लंबे समय के खिलाड़ियों को प्रोत्साहित किया जा सके. यह स्वागत योग्य कदम है.

इन्फ्रास्ट्रक्चर में बीमा कंपनियों द्वारा निवेश के मौजूदा निर्देशों को ऐसा बनाने की जरूरत है कि वे ज्यादा निवेश के लिए प्रोत्साहित हों. बीमा कंपनियों को उच्च दर्जे के बॉन्डों में थोक में निवेश करना चाहिए, इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनान्सिंग के लिए जारी बॉन्डों और डीएफआई द्वारा जारी बॉन्डों को एए या एएए रेटिंग नहीं मिल सकती हैं. इसलिए उक्त निर्देशों की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों जैसे लंबे समय के निवेशकों की दिलचस्पी बढ़े.

प्रस्तावित डीएफआई को विदेशी बाज़ारों और मल्टीलैटरल वित्त संस्थाओं से दीर्घकालिक वित्त हासिल करने की छूट मिलनी चाहिए. 5,000 करोड़ का अनुदान हानि से बचाव करने के काम आ सकता है. डीएफआई को विदेश से संसाधन हासिल करने के लिए ‘सॉवरेन गारंटी’ की भी जरूरत होगे. शुरुआती अनुदान शुरू में नुकसान से बचाव के काम आ सकता है लेकिन आगे के लिए मजबूत और तरल बॉन्ड मार्केट की जरूरत होगी और इसके साथ मुद्रा, उधार और ब्याज दर जैसे जोखिम से बचाव के साधन की भी जरूरत होगी.


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मजबूत प्रबंधन ढांचा

प्रस्तावित डीएफआई के लिए प्रबंधन के मजबूत ढांचे की जरूरत होगी. सरकार ने एक ऐसा पेशेवर बोर्ड बनाने का वादा किया है जिसमें आधे सदस्य गैर-कार्यकारी होंगे. यह सही कदम होगा. डीएफआई से उम्मीद की जाएगी कि वह इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को उनके विभिन्न चरणों में समर्थन दे, उसे इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश ट्रस्ट जैसे संस्थानों की मदद करनी पड़ सकती है और ‘प्रोजेक्ट फीजीबिलिटी’ अध्ययन भी करने पड़ सकते हैं.

सही समय पर ये फैसले करने के लिए बोर्ड को निर्णय करने की आज़ादी देनी होगी. डीएफआई के इस नये अवतार की सफलता के लिए उसे मुकदमों, बाज़ार के हिसाब से वेतन आदि देने से छूट देने और इसके प्रबंध निदेशकों को लंबा कार्यकाल देने की जरूरत होगी. वह निवेश मामलों के प्रोफेशनलों और दूसरे विशेषज्ञों को आकर्षित करने लायक बनाया जाए, जो परियोजनाओं का आकलन विकास और जोखिमों के नजरिए से करें.

प्रस्तावित डीएफआई से उम्मीद की जाती है कि वह इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनान्सिंग के लिए 3 लाख करोड़ उपलब्ध कराएगा. 2024-25 तक के लिए नेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन में जो 7,000 परियोजनाएं हैं उनमें निवेश किए जाने वाले 111 लाख करोड़ का यह महज 3 प्रतिशत ही है. यह डीएफआई बॉन्ड मार्केट की खामियों को दूर करने में भी मदद कर सकता है. इससे बड़े निजी निवेशक डीएफआई के साथ निवेश करेंगे, जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर में ज्यादा निवेश हो पाएगा.

डीएफआई का पूरा स्वामित्व सरकार के हाथ में होगा लेकिन अगले कुछ वर्षों में सरकार इसमें अपनी हिस्सेदारी घटाकर 26 प्रतिशत कर देगी. यह एक सकारात्मक कदम होगा. पेंशन फंड और ‘सॉवरेन फंड’ जैसे कई दीर्घकालिक निवेशक डीएफआई द्वारा जारी बॉन्डों के निवेशक के रूप में ही बने रहना नहीं चाह सकते हैं बल्कि इसमें दावेदार भी बनना चाह सकते हैं.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री हैं और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं राधिका पाण्डेय एनआईपीएफपी में कंसल्टेंट हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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