Tuesday, 18 January, 2022
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तेज ग्रोथ, तीव्र अस्थिरता— भारतीय अर्थव्यवस्था नए वित्तीय वर्ष में क्या उम्मीद कर सकती है

भारत और विदेशों में जिस तरह कोविड-19 की लहर के बाद लहर आ रही है, यह साल अच्छी और बुरी खबरों का गवाह बनता रहेगा, जिससे वित्तीय बाजारों में अस्थिरता की स्थिति बनी रह सकती है.

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वित्तीय वर्ष 2020-21 समाप्त होने जा रहा है. अर्थव्यवस्था तो तेजी से रफ्तार पकड़ेगी लेकिन आने वाले साल में वित्तीय बाजारों में काफी अस्थिरता दिखाई दे सकती है. एक तरफ घरेलू और विदेशी वित्तीय और मौद्रिक गतिविधियां बढ़ने और दूसरी तरफ अनिश्चितता के कारण संपत्ति मूल्यों में उतार-चढ़ाव आ सकता है.

2020-21 को जहां उत्पादन घटने के लिए याद रखा जाएगा, वहीं अर्थव्यवस्था में सुधार के बीच नई संभावनाओं के आकार लेने और ब्याज दरों में उछाल के कारण 2021-22 में तेजी से वृद्धि और तीव्र अस्थिरता की स्थिति बने रहने के आसार है.

भारत और विदेश दोनों जगह जिस तरह कोविड-19 की लहर के बाद लहर आ रही है, यह साल अच्छी और बुरी खबरों का गवाह बनता रहेगा, जिससे वित्तीय बाजारों में अस्थिरता की स्थिति बनी रह सकती है. भारत और विदेशों में, बांड बाजारों और सरकारों और केंद्रीय बैंकरों के बीच उठापटक आने वाले महीनों में भी जारी रहने की संभावना है, जो सरकारी बॉन्ड बेचने और यील्ड कम रखने की कोशिश करेंगे.

आउटपुट बढ़ने की उम्मीदों और मुद्रास्फीति से ब्याज दरें चढ़ने का दबाव बनेगा. यह बॉन्ड बाजार और स्टॉक मार्केट दोनों पर असर डालेगा. यदि लोग अधिक खर्च करना शुरू करते हैं, और सरकारें अधिक उधार लेने की कोशिश करती हैं, तो ब्याज दरें नीचे आने की संभावना नहीं रहती. ऐसे में पहले की तरह जब ग्रोथ धीमी थी, पूंजी प्रवाह बढ़ने पर ब्याज दरें नीचे आने जैसी स्थिति नहीं बन सकती है.


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अमेरिका में हायर यील्ड

भारत में पिछले कुछ हफ्तों में सरकार की तरफ उम्मीद से ज्यादा उधार लेने की घोषणा किए जाने से सरकारी बॉन्ड पर ब्याज में तेजी आनी शुरू हुई है. यद्यपि आरबीआई ने पूंजी प्रवाह और बॉन्ड पर निगाहें टिकाए रखने वालों की निश्चिंतता बढ़ाने के लिए खुले बाजार में खरीदारी और संचालन में सुधार वाले कई कदम उठाए हैं, लेकिन यील्ड में तेजी का दबाव बरकरार है. 1.9 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के राजकोषीय प्रोत्साहन के कारण अपेक्षा से अधिक सुधार ने मुद्रास्फीति बढ़ने की आशंका उत्पन्न कर दी है. फेडरल रिजर्व नीतियों के जरिये उदार रुख के आश्वासनों के बावजूद अमेरिकी राजकोषीय यील्ड अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के कारण घरेलू बाजार में यील्ड ने फिर मजबूती पकड़ी है.

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आरबीआई ने बाजारों की स्थिरता के लिए फिर से पूंजी प्रवाह बढ़ाने संबंधी कई कदम उठाए हैं लेकिन अमेरिका में बदली स्थितियां भारत के बांड बाजार को अस्थिर करने की क्षमता रखती हैं.

चिंता इस बात की है कि अमेरिका में हायर यील्ड की वजह से भारत सहित तमाम उभरती अर्थव्यवस्थाओं की पूंजी बाहर जा सकती है. इससे रुपये पर दबाव बढ़ सकता है. लेकिन करीब 600 बिलियन डॉलर का रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार और इस वर्ष करंट एकाउंट सरप्लस होने की संभावना के साथ भारत 2013 का टेपर टैंट्रम जैसा संकट फिर खड़ा होने पर उनसे निपटने के लिए बेहतर स्थिति में नजर आ रहा है—उस समय भारत में मुद्रास्फीति लगभग 10 प्रतिशत थी, जबकि इस समय यह उससे लगभग आधे स्तर पर है.

वैश्विक स्तर पर ईंधन की बढ़ी कीमतें आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति की चाल के लिए खतरा पैदा कर सकती हैं. फरवरी महीने में मुद्रास्फीति 5 प्रतिशत से अधिक हो गई है जिसकी मुख्य वजह ईंधन की बढ़ी कीमतें हैं. लगातार उच्च मुद्रास्फीति आरबीआई के लिए उदार रुख अपनाए रखने में चुनौती बन सकती है. इससे आरबीआई को ब्याज दरें बढ़ाने पर विचार करना पड़ सकता है, जिससे हाल के महीनों में अर्थव्यवस्था में आई रफ्तार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. यह चुनौतीपूर्ण होगा, खासकर यह देखते हुए कि बैंक ऋण की ग्रोथ असमान और कमजोर बनी हुई है.

सकारात्मक वृद्धि

2020-21 में सरकार ने महामारी के कारण उपजे आर्थिक संकट को दूर करने और व्यवसायों को फिर खड़ा करने में मदद के लिए विभिन्न चरणों में कई उपायों की घोषणा की. इनमें एमएसएमई को कोलैटरल-फ्री लोन, एनबीएफसी की मदद के लिए आंशिक ऋण गारंटी, और पूंजीगत व्यय और रोजगार को बढ़ावा देने के उपाय शामिल थे.

आरबीआई ने बैंको को व्यवसायों को कम ब्याज पर कर्ज देने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से पूंजी तरलता बढ़ाने संबंधी कई उपायों की घोषणा की थी. आरबीआई ने कोविड-19 महामारी से प्रभावित कंपनियों को सहारा देने के लिए 31 अगस्त 2020 तक पूरे छह महीने के लिए बैंक ऋण पर मोराटोरियम घोषित कर दिया था. इसके बाद जरूरी हो ऋण फिर से जारी करने के लिए बैंकों द्वारा अधिक लचीलापन अपनाए जाने के लिए ऋणों का एकमुश्त पुनर्गठन किया गया. कर्जदारों की मुश्किलें और घटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर में एनपीए के वर्गीकरण पर अंतरिम रोक लगा दी थी.

आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे जोर पकड़ने और सरकार और आरबीआई की तरफ से अर्थव्यवस्था को मजूबती देने वाले कदमों की बदौलत अर्थव्यवस्था ने तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की है. 2021 के पहले दो महीनों में अर्थव्यवस्था सुधरने में तेजी देखी जा रही है. पीएमआई विनिर्माण और सेवाएं, बिजली उत्पादन, जीएसटी संग्रह और यात्री वाहनों की बिक्री में निरंतर वृद्धि जैसे संकेतक मजबूती से इस बात को दर्शाते भी हैं. सरकार ने चालू वर्ष में जीडीपी 8 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया है.

अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने के साथ ही नियामक प्रतिबंध संबंधी विभिन्न कदम धीरे-धीरे वापस हो रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने एनपीए वर्गीकरण पर रोक हटा दी है. एनपीए की पहचान और वर्गीकरण पर रोक हटने से बैंक ऐसे खातों की पहचान कर पाएंगे जो गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के रूप में ब्याज का भुगतान नहीं कर रहे. इससे बैंकिंग प्रणाली में अनिश्चितता समाप्त होगी, वहीं बैड लोन में वृद्धि हो सकती है.

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड के निलंबन को हटा दिया जाएगा. हालांकि, चिंता इस बात की है कि इससे नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) के तहत दायर होने वाले मामलों की संख्या बढ़ सकती है, कंपनी दिवालिया होने से पहले लेनदारों को सभी विकल्पों का आकलन करना होगा.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

(श्रेयस शर्मा ने एडिट किया है)

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री हैं और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं राधिका पाण्डेय एनआईपीएफपी में कंसल्टेंट हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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