नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से पूछा था कि क्या चीन अमेरिका में बने हथियार खरीदने में दिलचस्पी रखता है. चीन में अमेरिका के राजदूत डेविड पर्ड्यू ने रविवार को यह अहम बात कही.
फॉक्स न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में पर्ड्यू ने कहा, “राष्ट्रपति ट्रंप लगातार कहते हैं: हम दुनिया भर के दूसरे लोगों को हथियार बेचते हैं. उन्होंने एक समय राष्ट्रपति शी से यह भी पूछा था कि क्या वह कुछ हथियार खरीदना चाहेंगे?”
ट्रंप की ओर से शी को हथियार बेचने का ऑफर इसलिए भी अहम है क्योंकि अमेरिका अब भी चीन को आर्थिक और सैन्य, दोनों स्तरों पर अपना सबसे बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता है. ट्रंप प्रशासन लगातार ईरान और रूस को चीन की ओर से मिल रही ऐसी मदद का मुद्दा उठाता रहा है, जिसका इस्तेमाल सैन्य और दूसरे दोनों तरह के कामों में हो सकता है.
पर्ड्यू की इस बात से यह साफ नहीं है कि यह ऑफर पिछले हफ्ते ट्रंप और शी की बैठक के दौरान दिया गया था या इससे पहले हुई उनकी किसी बैठक में. हालांकि, यह दावा उन खबरों के बीच आया है जिनमें कहा गया है कि ट्रंप ने चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश में ताइवान के लिए 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज में देरी की है.
व्हाइट हाउस ने कहा कि “चीन को हथियार बेचने की कोई योजना नहीं है.” वहीं, अमेरिकी विदेश विभाग ने कहा कि अमेरिकी कानून ऐसी बिक्री पर रोक लगाता है, जैसा कि द न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया है.
अमेरिका लंबे समय से ‘वन चाइना’ नीति को मानता रहा है, लेकिन ताइवान की सुरक्षा को लेकर उसने अपनी नीति में रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखी है. वॉशिंगटन लगातार बीजिंग से बातचीत करता रहा है. साथ ही उसने यह भी कहा है कि क्षेत्र में मौजूदा स्थिति को बदलने के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.
ताइवान का चीन के साथ एकीकरण राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लंबे समय से चले आ रहे लक्ष्यों में से एक है.
अमेरिका ताइवान को लगातार हथियारों के पैकेज देता रहा है. इसमें करीब एक साल पहले घोषित 14 अरब डॉलर का पैकेज भी शामिल है. हालांकि, ताइवान के लिए ट्रंप की प्रतिबद्धता पर बार-बार सवाल उठे हैं.
मई में शी से मुलाकात के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा था कि हथियारों का यह पैकेज “बातचीत में इस्तेमाल किया जा सकने वाला अच्छा साधन” है. ताइवान का चीन के साथ एकीकरण बीजिंग की सबसे संवेदनशील कूटनीतिक प्राथमिकताओं में से एक है. चीन लंबे समय से अमेरिका पर ताइवान को हथियार भेजना बंद करने का दबाव डालता रहा है. वहीं, वॉशिंगटन ने ताइपे को लगातार समर्थन देने का भरोसा दिया है.
पिछले हफ्ते ट्रंप और शी की आमने-सामने की बैठक के दौरान शी ने ट्रंप से ताइवान की स्वतंत्रता का विरोध करने को कहा था. चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की ओर से जारी बैठक के विवरण में यह बात कही गई.
फॉक्स न्यूज़ से बातचीत में पर्ड्यू ने एक और अहम बात कही. उन्होंने बताया कि ट्रंप और शी ने ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री पर भी चर्चा की थी.
1982 में चीन के साथ रिश्तों में सुधार की प्रक्रिया के दौरान अमेरिका ने ताइवान को छह आश्वासन दिए थे. इनमें ऐसी भाषा भी शामिल थी, जिसमें कहा गया था कि वॉशिंगटन ताइपे को हथियार बेचने के मामले में बीजिंग से सलाह नहीं करेगा.
चीन की सेना तेज़ी से बढ़ रही है. यूक्रेन और अमेरिका के साथ क्रमशः युद्ध में शामिल रूस और ईरान को तकनीकी मदद देने में चीन अब भी एक अहम देश बना हुआ है.
चीन के सैन्य विस्तार ने जापान और दक्षिण कोरिया जैसे क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों की चिंता बढ़ाई है. चीन ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ाई हैं.
पिछले करीब दो साल से ज्यादा समय में चीनी तटरक्षक बल और फिलीपींस की नौसेना के बीच दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय दावों को लेकर कई बार टकराव हुआ है. फिलीपींस भी इस क्षेत्र में अमेरिका का सहयोगी है.
चीन ने पिछले कुछ सालों में ताइवान को निशाना बनाकर कई सैन्य अभ्यास किए हैं. ट्रंप प्रशासन ने 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज पर आगे कार्रवाई न होने को अमेरिका के मौजूदा हथियार भंडार को ध्यान में रखने से जोड़ने की कोशिश की है.
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले बुधवार को कहा था कि यह समझना जरूरी है कि वॉशिंगटन को ये हथियार खुद के लिए चाहिए या इन्हें ताइवान भेजा जा सकता है.
अमेरिकी मीडिया की खबरों के मुताबिक, ईरान के साथ युद्ध और यूक्रेन को लंबे समय से मिल रहे समर्थन के कारण अमेरिका के सैन्य हथियारों के भंडार कम हो रहे हैं. वहीं, अमेरिकी रक्षा कंपनियों के लिए मौजूदा जरूरतों को पूरा करने के लिए हथियारों का उत्पादन बढ़ाना मुश्किल हो रहा है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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