नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह और उनके सहयोगी विनोद तोमर से उन चार महिला पहलवानों की अपील पर जवाब मांगा है, जिन्होंने पिछले महीने दोनों को बरी किए जाने को चुनौती दी है. यह मामला देश की कुछ शीर्ष महिला पहलवानों की ओर से दर्ज यौन उत्पीड़न के मामले से जुड़ा है.
तीन अगस्त को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM) अश्विनी पंवार ने सिंह और तोमर को इस मामले में बरी कर दिया था. अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष यौन उत्पीड़न के आरोपों को उचित संदेह से परे साबित करने में “बुरी तरह विफल” रहा.
25 सितंबर को चारों पहलवानों की ओर से दायर बरी किए जाने के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए राउज एवेन्यू कोर्ट के विशेष जज दिग विनय सिंह ने सोमवार को भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के पूर्व प्रमुख सिंह और पूर्व WFI सहायक सचिव तोमर को नोटिस जारी किया. अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 9 अक्टूबर की तारीख तय की है.
इस मामले को लेकर 2023 में देश के शीर्ष भारतीय पहलवानों ने पूरे देश में विरोध प्रदर्शन किया था. मामले में छह महिला पहलवानों ने सिंह पर कई तरह के आरोप लगाए थे. इनमें गलत तरीके से छूना, अनुचित तरीके से हाथ लगाना, जबरन शारीरिक संपर्क करना और एक मामले में मेडिकल मदद के बदले यौन संबंध बनाने की मांग करना शामिल था.
3 अगस्त के फैसले में अदालत ने कहा था कि सबूतों में “महत्वपूर्ण विरोधाभास”, “तथ्यात्मक रूप से असंभव बातें” और “राजनीति से प्रेरित” साजिश के संकेत थे.
3 अगस्त को सिंह को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देते हुए पहलवानों ने आरोप लगाया है कि मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले का एक बड़ा हिस्सा यौन उत्पीड़न और हमले की पीड़िताओं के व्यवहार को लेकर पुरानी और रूढ़िवादी धारणाओं पर आधारित था. उनके मुताबिक, अदालत ने पीड़िताओं की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सबूतों का निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित आकलन करने के बजाय यह देखा कि पीड़िता से किस तरह के व्यवहार की उम्मीद की जाती है.
पहलवानों ने अपनी याचिका में कहा है कि पूरे फैसले को देखने पर पता चलता है कि अदालत ने बार-बार “पीड़िता से अपेक्षित व्यवहार के ऐसे मानक को लागू किया है, जिसका कानून में कोई आधार नहीं है”.
उनकी याचिका के मुताबिक, ACJM के फैसले में यह उम्मीद की गई है कि एक वास्तविक पीड़िता को यौन उत्पीड़न की जगह और साल बिल्कुल तस्वीर की तरह याद होने चाहिए, जबकि कई साल पहले हुए टूर्नामेंट की सही तारीखें उसे याद न हों. साथ ही, यह भी उम्मीद की गई कि वह उसी समय जवाब देगी या अपने आसपास के लोगों से आरोपी के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करवाएगी.
ACJM कोर्ट ने यह भी उम्मीद की कि पीड़िता आरोपी से आगे सभी तरह के दोस्ताना या पेशेवर संपर्क खत्म कर देगी, चाहे आरोपी का उसकी रोजी-रोटी पर नियंत्रण बना हुआ हो. कोर्ट ने यह भी उम्मीद की कि वह हर घटना के बारे में उसी समय और उसी तरह अपने सभी करीबी लोगों को बताएगी. याचिका में कहा गया है कि इन सब से अलग किसी भी व्यवहार को “महत्वपूर्ण” और “घातक” विरोधाभास माना गया.
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील भावूक चौहान, हर्ष बोरा, चिन्मय कनोजिया, प्राविता कश्यप, प्रवीर सिंह और अनुष्का बरुआ पेश हुए.
उनके बरी किए जाने को चुनौती देने की वजह
महिला खिलाड़ियों ने आरोप लगाया है कि ACJM की ओर से दिए गए कारणों को एक-एक घटना और फिर पूरे मामले के तौर पर देखने पर “सबूतों को चुन-चुनकर इस तरह पढ़ने का एक तरीका सामने आता है, जो सिंह और तोमर के पक्ष में जाता है” और कानून के खिलाफ है.
याचिका में कहा गया है कि अदालत का अपना विश्लेषण “उसकी अपनी राय से ही अंदरूनी तौर पर विरोधाभासी है”.
याचिका में कहा गया है कि एक तरफ अदालत ने कहा कि सुरक्षित गवाह संख्या 5 का बयान हलफनामे के लिए कानून में तय “जरूरी शर्तों को पूरी तरह/तकनीकी रूप से पूरा नहीं करता”. दूसरे शब्दों में, यह न तो शपथ लेकर दिया गया दस्तावेज़ था और न ही प्रमाणित दस्तावेज.
लेकिन इसके बाद अदालत ने उसी दस्तावेज में किसी बात के छूट जाने और एक तथ्यात्मक गलती को “महत्वपूर्ण विरोधाभास” माना और इसे पहली और शुरुआती घटना के बारे में सिंह की पूरी गवाही को खारिज करने के लिए आधार बनाया.
इसलिए, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ट्रायल कोर्ट ने “हलफनामे को गवाह के पिछले बयान के तौर पर गलत तरीके से माना, जैसे कि वह कानूनी तरीके से बनाया गया हलफनामा या पुलिस को दिया गया पिछला बयान हो”, जबकि वह ऐसा नहीं था.
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि ट्रायल कोर्ट ने यह “पूरी तरह गलत और बिना समझ के” निष्कर्ष निकाला कि दोनों सुरक्षित गवाहों में से किसी ने भी अपीलकर्ता नंबर 1 के बारे में यह बयान नहीं दिया था कि तोमर को दूर धकेलने की कोशिश की गई थी.
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जब शिकायतकर्ता ने जबरन शारीरिक संपर्क की घटना के बारे में गवाही दी है और दूसरे गवाहों ने भी उसकी बात की पुष्टि की है, तो अपीलकर्ता ने सिंह को दूर नहीं धकेला, यह बात अकेले उसकी गवाही पर विश्वास न करने की वजह नहीं हो सकती. खासकर “क्योंकि वह (सिंह) WFI के अध्यक्ष थे और उनके पास सार्वजनिक रूप से उनकी बात ठुकराने पर पहलवानों के करियर की संभावनाओं को प्रभावित करने की ताकत थी.”
याचिका में यह भी कहा गया है कि भीड़ वाली सार्वजनिक जगह पर कोई भी महिला अपने असहज होने को खुले तौर पर दिखाने में हिचकिचा सकती है.
महिला पहलवानों ने याचिका में लिखा है कि ट्रायल कोर्ट ने “कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न किस तरह होता है, इसकी बुनियादी समझ की कमी दिखाई है. कई महिलाएं पीड़ित होने के बावजूद अपनी नौकरी/सेवा/रोजगार बचाने के लिए चुप रहना चुनती हैं.”
घटना के बाद शिकायतकर्ता के व्यवहार पर सवाल उठाते समय अदालत ने “सुविधाजनक तरीके से नजरअंदाज कर दिया” कि उसने बताया था कि पिता की मौत और मां को कैंसर होने के बाद वह परिवार की अकेली कमाने वाली सदस्य थी और उसकी छोटी बहन-भाइयों की देखभाल की जिम्मेदारी भी उसी पर थी.
याचिका में कहा गया है, “जब यौन उत्पीड़न और हमले की पीड़िता ने बताया है कि परिस्थितियों ने उसे अपनी रोजी-रोटी और आत्मसम्मान के बीच चुनाव करने के लिए मजबूर किया, तो माननीय ट्रायल कोर्ट को अपनी निजी और व्यक्तिगत राय के आधार पर यह तय करने का अधिकार नहीं है कि उसे क्या चुनाव करना चाहिए था.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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