मध्य पूर्व में एक कमजोर संघर्षविराम लागू है और दुनिया भर में भू-राजनीतिक हालात तेज़ी से बदल रहे हैं. ऐसे में रणनीतिक हलकों में एक मुश्किल सवाल उठने लगा है: क्या भारत ने पर्याप्त कोशिश की, या उसने जानबूझकर बहुत कम करने का रास्ता चुना?
मुद्दा सिर्फ कूटनीतिक दिखावे का नहीं है. बात भारत की बदलती वैश्विक स्थिति की है. अगर नई दिल्ली खुद को सिर्फ ग्लोबल साउथ की आवाज़ से आगे बढ़ाकर एक प्रभावशाली वैश्विक ताकत बनाना चाहती है, तो संकट के ऐसे मौके रुकावट नहीं बल्कि परीक्षा होते हैं और इस परीक्षा में भारत की साफ दिखने वाली गैरमौजूदगी ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं.
आज भारत के संबंध सभी प्रमुख पक्षों—अमेरिका, ईरान और इज़रायल के साथ कामकाजी स्तर पर बने हुए हैं, लेकिन जब बातचीत शुरू हुई और बैकचैनल संपर्क सक्रिय हुए, तब कमरे में भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान मौजूद था. उम्मीदों के उलट इस स्थिति ने एक बड़ी बहस छेड़ दी है: क्या भारत की खुद पर लगाई गई सतर्कता ने उसकी रणनीतिक जगह कमजोर कर दी है?
सतर्क रहने के पक्ष में तर्क
सच कहें तो भारत के रुख के समर्थन में मजबूत तर्क भी मौजूद हैं. मध्य पूर्व में भारत के हित काफी जटिल हैं और सीधे तौर पर आर्थिक ज़रूरतों से जुड़े हुए हैं. ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है. यह क्षेत्र भारत को तेल और गैस की बड़ी आपूर्ति करता है, खाद की उपलब्धता बनाए रखने में मदद करता है और यहां बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं, जिनसे आने वाला पैसा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. खाड़ी क्षेत्र में समुद्री स्थिरता कोई सिर्फ सैद्धांतिक बात नहीं है; यह कुछ हद तक भारत की आर्थिक जीवनरेखा है.
ऐसे हालात में जोखिम से बचना कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी माना जा सकता है. पिछले एक दशक में भारत ने इस क्षेत्र के देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों में काफी निवेश किया है. भारत ने सावधानी से अपने रिश्तों को अलग-अलग ट्रैक पर रखा है—इज़रायल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ एक साथ संबंध बनाए, बिना इस बात के कि एक रिश्ता दूसरे को नुकसान पहुंचाए. इस संतुलित बहु-संरेखण नीति से भारत को वास्तविक फायदे मिले हैं.
इसके अलावा हर रणनीति के लिए खुलकर एक्टिव होना ज़रूरी नहीं होता. शांत कूटनीति, संयम और बातचीत व तनाव कम करने पर लगातार जोर देना लंबे समय से भारत के पसंदीदा तरीके रहे हैं. मौजूदा संकट की अस्थिरता को देखते हुए, जहां गलत आकलन, नेताओं को निशाना बनाए जाने और तनाव बढ़ने का लगातार खतरा मौजूद है—ऐसे में खुद को सीधे उलझने से बचाने के पीछे तर्क नज़र आता है.
लेकिन सतर्कता की भी कीमत होती है, खासकर जब वह निष्क्रियता जैसी दिखने लगे. हाल की घटनाओं पर भारत की प्रतिक्रिया इतनी संतुलित दिखी कि वह लगभग नजर ही नहीं आई. संप्रभुता के उल्लंघन, चुनिंदा हत्याओं या समुद्री सुरक्षा में बाधा जैसे मुद्दों पर खुलकर प्रतिक्रिया देने से बचना, अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति भारत की पारंपरिक प्रतिबद्धता से मेल नहीं खाता. यहां तक कि जब भारत ने अपने पुराने “4 Ds”—dialogue, diplomacy, de-escalation और de-hyphenation का ज़िक्र किया, तब भी उसका संदेश उद्देश्यपूर्ण के बजाय एक सामान्य बयान जैसा लगा.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय नियम सिर्फ कार्रवाई से नहीं, बल्कि चुप्पी से भी कमज़ोर होते हैं. अगर पहले हमला करना, चुनिंदा हत्याएं या नाकेबंदी जैसी चीजें सामान्य बन जाती हैं, तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा. भारत जैसे देश के लिए, जिसने हमेशा नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की बात की है, चुनिंदा चुप्पी उसके अपने लंबे समय के हितों को कमजोर कर सकती है.
ऐसे कई तरीके थे, जिनसे भारत बिना ज्यादा जोखिम उठाए ज्यादा सक्रिय दिख सकता था. भारत को मध्यस्थता करने या बातचीत में सीधे शामिल होने की जरूरत नहीं थी. लेकिन वह बिना किसी देश का नाम लिए यह साफ कर सकता था कि कौन-से कदम स्वीकार नहीं किए जा सकते. भारत BRICS जैसे बहुपक्षीय मंचों का इस्तेमाल करके संयम की बड़ी अपील तैयार कर सकता था. यहां तक कि समय पर दिए गए बयान और संतुलित कूटनीतिक संपर्क जैसे प्रतीकात्मक कदम भी भारत की मंशा दिखा सकते थे.
पाकिस्तान फैक्टर
हाल की कूटनीतिक बातचीत में पाकिस्तान की दिखने वाली भूमिका ने भारत के लिए रणनीतिक असहजता बढ़ा दी है. एक सीमित स्तर पर ही सही, लेकिन मध्यस्थ की तरह उसकी मौजूदगी ने इस चिंता को जन्म दिया है कि क्षेत्रीय महत्व का संतुलन बदल रहा है.
लेकिन इसे सही नज़रिए से देखने की ज़रूरत है. पाकिस्तान की भूमिका किसी स्थायी बदलाव की नहीं, बल्कि उस समय बने रणनीतिक हितों की वजह से सामने आई. खासकर अमेरिका के साथ उसके हितों के मेल और उस समय उसकी उपयोगिता ने उसे यह जगह दिलाई. ऐसी भूमिकाएं अक्सर अस्थायी होती हैं और लंबे समय तक भरोसे या प्रभाव में नहीं बदलतीं.
दरअसल इतिहास बताता है कि पाकिस्तान को भू-राजनीतिक मौकों का फायदा कभी-कभार ही मिलता है. उसके अंदरूनी विरोधाभास, कमजोर अर्थव्यवस्था और लंबे समय से चली आ रही भरोसे की कमी उसकी सीमाएं साफ कर देती हैं. कई अनुभवी विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यस्थता सिर्फ क्षमता का नहीं, बल्कि स्वीकार्यता का भी सवाल होती है, और लंबे समय में पाकिस्तान के पास इन दोनों की कमी है.
इसलिए असली सवाल पाकिस्तान की थोड़ी देर की अहमियत नहीं, बल्कि भारत की अपनी रणनीतिक स्थिति है.
क्या भारत विदेश नीति में जरूरत से ज्यादा जोखिम से बचने वाला देश बन गया है? क्या कई देशों के साथ संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत, खासकर अमेरिका के साथ बढ़ते रिश्तों का असर, भारत की स्वतंत्र तरीके से कदम उठाने की इच्छा को सीमित कर रहा है? और क्या टकराव से बचने की कोशिश में भारत अनजाने में अपनी आवाज कमजोर कर रहा है?
इसका एक घरेलू पहलू भी है. कई बार भारत के वैश्विक उभार की कहानी उसकी वास्तविक कूटनीतिक पसंदों से आगे निकलती दिखती है. बड़ी ताकतों को सिर्फ उनकी आर्थिक या सैन्य शक्ति से नहीं आंका जाता, बल्कि इस बात से भी देखा जाता है कि वे संकट के समय हालात को किस हद तक प्रभावित कर पाती हैं.
बिना ज़रूरत से ज्यादा आगे बढ़े नई रणनीति बनाना
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारत समझदारी छोड़ दे या जल्दबाजी में जोखिम भरे कदम उठाने लगे. इस क्षेत्र की जटिलताएं और भारत के हित, दोनों ही बहुत सावधानी से संतुलन बनाने की मांग करते हैं. लेकिन संतुलन का मतलब चुप रहना नहीं होता.
भारत को ऐसे तरीके खोजने होंगे, जिनसे वह मौजूद भी रहे, लेकिन ज़रूरत से ज्यादा दखल देने वाला न लगे; सिद्धांतों पर कायम भी रहे लेकिन पक्षपाती न दिखे; और सक्रिय भी रहे लेकिन लापरवाह न बने. इसके लिए ज्यादा लचीले कूटनीतिक तरीकों की जरूरत होगी—ऐसे तरीके, जिनमें शांत बातचीत के साथ जरूरत पड़ने पर स्पष्ट रुख भी शामिल हो.
इसके लिए उद्देश्य की स्पष्टता भी जरूरी है. अगर भारत वैश्विक व्यवस्था में बड़ी भूमिका चाहता है, तो वह उन संकटों में सिर्फ दर्शक बनकर नहीं रह सकता जो सीधे उसके हितों को प्रभावित करते हैं. और जब क्षेत्रीय हालात व्यापक भागीदारी की मांग करते हों, तब सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों के भरोसे भी नहीं रहा जा सकता.
मध्य पूर्व भारत के लिए कोई दूर का क्षेत्र नहीं है—यह उसकी आर्थिक सुरक्षा और रणनीतिक भविष्य का अहम हिस्सा है. इसलिए मौजूदा संकट सिर्फ एक और घटना नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संकेत है.
हो सकता है भारत का संयम सही रहा हो. लेकिन उसकी गैरमौजूदगी सबने नोट की है. अब चुनौती अतीत बदलने की नहीं, बल्कि भविष्य की रणनीति को नए तरीके से तय करने की है. क्योंकि भू-राजनीति में एक बार छोड़ी गई जगह आसानी से वापस नहीं मिलती.
शिशिर प्रियदर्शी चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं. विचार निजी हैं.
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