मुंबई: महाराष्ट्र में जनगणना 2027 की तैयारियां चल रही हैं. इसी बीच बौद्ध नेताओं ने नव-बौद्धों से अपील की है कि वे अपनी अनुसूचित जाति (एससी) की पहचान जनगणना फॉर्म में ज़रूर लिखें. उनका कहना है कि अगर आबादी कम दिखाई गई या स्थिति जस की तस रही, तो समुदाय को मिलने वाले फंड, आरक्षण और दूसरे लाभ प्रभावित हो सकते हैं.
4 मार्च को बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया, जिसे भारतीय बौद्ध महासभा भी कहा जाता है, ने एक अपील जारी की. इसमें नव-बौद्धों से कहा गया कि वे धर्म वाले कॉलम में ‘बौद्ध’ लिखें और जाति वाले कॉलम में अपने पूर्वजों की जाति—जैसे महार, मांग, चांभार और दूसरी अनुसूचित जातियां—लिखें.
नव-बौद्ध मुख्य रूप से दलित समुदाय के वे लोग हैं, जो समाज सुधारक बी. आर. आंबेडकर के अनुयायी हैं. आंबेडकर ने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बौद्ध धर्म अपनाया था ताकि जाति व्यवस्था से अलग हुआ जा सके.
बौद्ध धर्म मूल रूप से जाति व्यवस्था को नहीं मानता, क्योंकि इसकी मुख्य सोच समानता, व्यक्ति की योग्यता और दुख कम करने पर आधारित है. यह भारत की जन्म आधारित वर्ण और जाति व्यवस्था के बिल्कुल उलट है.
महासभा ने अपनी अपील में कहा, “यह सर्वसम्मति से माना गया है कि भारत की जनगणना में बौद्धों की सही आबादी दिखाई देना ज़रूरी है.” महासभा के अनुसार, इसका सीधा असर एससी आबादी के आधार पर मिलने वाले कल्याण फंड, आरक्षण और प्रतिनिधित्व पर पड़ता है.
बी. आर. आंबेडकर द्वारा 4 मई 1956 को स्थापित यह महासभा एक धार्मिक सार्वजनिक ट्रस्ट है, जो बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार करती है और नए बौद्ध बने लोगों को एक संगठित समुदाय के रूप में जोड़ने का काम करती है.
फिलहाल इस महासभा की अगुवाई मीरा आंबेडकर कर रही हैं, जो डॉ. आंबेडकर की बहू हैं. महासभा पूरे भारत में सामाजिक सुधार, शिक्षा और समुदाय को मजबूत बनाने के लिए काम करती है. मीरा के बेटे भीमराव आंबेडकर महासभा के ट्रस्टी और राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हैं.
महाराष्ट्र में जनगणना की प्रक्रिया औपचारिक रूप से 1 मई से शुरू हुई. राज्य सरकार ने 1 मई को सेल्फ-एन्यूमरेशन पोर्टल शुरू किया और 15 मई तक इसमें जानकारी भरने की सुविधा रहेगी. इसके बाद 16 मई से 14 जून तक हाउस-लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना चरण चलेगा, जिसमें कर्मचारी घर-घर जाकर जांच करेंगे.
महासभा का कहना है कि आंबेडकर से प्रेरित धर्म परिवर्तन आंदोलनों के बाद नव-बौद्धों की आबादी लगातार बढ़ी है, लेकिन रिकॉर्ड में एससी आबादी तुलनात्मक रूप से कम दिख रही है, क्योंकि धर्म परिवर्तन के बाद कई बौद्ध लोग अपनी जाति पहचान लिखना बंद कर देते हैं.
महासभा ने बौद्धों को यह सलाह भी दी है कि वे मराठी या दूसरी भाषाओं की जगह अपनी मातृभाषा के रूप में पाली भाषा लिखें. महासभा का कहना है कि पाली भाषा का समुदाय के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है.
अपील में कहा गया, “केंद्र सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त पाली भाषा हमारी मातृभाषा है. हम वंदना, स्मरण और सभी धार्मिक कर्मकांड पाली भाषा में करते हैं. इसका मतलब पाली हमारी भाषा है. इसलिए पाली भाषा को बचाने के लिए मातृभाषा वाले कॉलम में मराठी या दूसरी भाषा की जगह पाली भाषा लिखें.”
भीमराव आंबेडकर ने दिप्रिंट से कहा कि यह मुद्दा सामाजिक या धार्मिक रूप से जाति को स्वीकार करने का नहीं है.
उन्होंने कहा, “यह संवैधानिक भागीदारी और उन अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा है, जो जनगणना के आंकड़ों से जुड़े हुए हैं. पाली भाषा बौद्ध विरासत का हिस्सा है और जब हम धर्म अपनाते हैं, तो हमें उस भाषा को भी अपनाना चाहिए, जिसे हम अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल करते हैं.”
उन्होंने समझाया कि अगर लोग अपनी जाति पहचान लिखना पूरी तरह बंद कर देंगे, तो रिकॉर्ड में अनुसूचित जाति की आबादी कम हो जाएगी. “इसका असर सामाजिक कल्याण विभाग से मिलने वाले फंड, शिक्षा योजनाओं और राजनीतिक आरक्षण पर पड़ेगा.”
महासभा की अपील
अपील में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश और बाद में किए गए उन संशोधनों का ज़िक्र किया गया है, जिनके जरिए अनुसूचित जातियों से बौद्ध धर्म अपनाने वाले लोगों को एएसी के लाभ दिए गए. इसमें कहा गया है कि जनगणना के आंकड़ों का सीधा असर कल्याण योजनाओं और स्थानीय निकायों, विधानसभा और संसद में आरक्षण के बंटवारे पर पड़ता है.
अपील में कहा गया कि बी. आर. आंबेडकर ने संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत राष्ट्रपति को अनुसूचित जातियां तय करने का अधिकार दिया था. इसके बाद संसद और राष्ट्रपति ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 को मंजूरी दी.
अपील में यह भी कहा गया कि जब पूर्व प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी, तब आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर ने उत्तर प्रदेश में दोबारा चुनाव जीतने में उनकी मदद के लिए राजनीतिक समर्थन दिया था. इसके बदले यह शर्त रखी गई थी कि उनकी सरकार बनने के बाद बौद्धों को केंद्र सरकार की रियायतें और लाभ दिए जाएं.
अपील में कहा गया, “उस वादे को पूरा करने के लिए वी. पी. सिंह सरकार ने 4 जून 1990 को संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 (संशोधन), 1990 के जरिए संवैधानिक संशोधन किया और अनुसूचित जाति की सूची बौद्धों पर भी लागू की. इसका मतलब है कि बौद्धों को भी अनुसूचित जाति के लाभ दिए गए.”
अपील में यह भी कहा गया कि एससी आबादी कम होने से सामाजिक कल्याण विभाग के जरिए मिलने वाले फंड, अनुसूचित जातियों के लिए चलाई जाने वाली योजनाएं, सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक विकास, और राजनीतिक आरक्षण प्रभावित होते हैं.
अपील में कहा गया, “क्योंकि सरकार, प्रशासन और सामाजिक व्यवस्था हमारे खिलाफ है, इसलिए अगर जनगणना फॉर्म सही तरीके से नहीं भरा गया, तो ऊपर बताए गए नुकसान हो सकते हैं.”
भीमराव आंबेडकर के मुताबिक, 2011 की जनगणना सही तरीके से नहीं हुई थी.
महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष ने कहा, “2011 की जनगणना ठीक से नहीं हुई थी, इसलिए एससी की संख्या को लेकर शक है.” उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में ज्यादातर एससी समुदाय महार जाति से आते हैं. “उनके लिए और बाकी लोगों के लिए भी यह ज़रूरी है कि वे इसे साफ तौर पर लिखें.”
उन्होंने कहा, “भारत में राजनीतिक आरक्षण के लिए जाति का उल्लेख जरूरी है. इसके अलावा शिक्षा से जुड़े लाभों के लिए भी जाति प्रमाण पत्र जरूरी होता है, जैसे डॉक्टर बनने वाले छात्रों या आईएएस, आईपीएस अधिकारी बनने की तैयारी करने वालों के लिए.”
उन्होंने दावा किया कि जनगणना फॉर्म में जाति वाला हिस्सा खाली छोड़ने से फॉर्म अधूरा माना जाएगा.
भीमराव अंबेडकर समता सैनिक दल (एसएसडी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. यह संगठन 1927 में बी. आर. आंबेडकर ने बनाया था. इसका उद्देश्य भारत में वंचित और दबे-कुचले समुदायों के अधिकारों की रक्षा करना था.
महासभा की अपील में कहा गया कि लोकसभा, विधानसभा, नगर निगम, नगरपालिका और ग्राम पंचायत जैसे चुनावों में भी आरक्षण दिया जाता है.
भीमराव आंबेडकर ने कहा, “आज हमें महाराष्ट्र में एससी के लिए 13 प्रतिशत आरक्षण मिलता है. जैसे-जैसे हमारी संख्या बढ़ेगी, वैसे-वैसे आरक्षण भी बढ़ेगा. यह 18 या 19 प्रतिशत तक भी जा सकता है.”
उन्होंने कहा, “1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट के उप वर्गीकरण वाले फैसले के बाद हम जनगणना के असली आंकड़ों के आधार पर संख्या और आरक्षण प्रतिशत बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.”
1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने फैसला दिया था कि राज्य सरकारें एससी और एसटी समुदायों के अंदर उप वर्गीकरण कर सकती हैं, ताकि इन समुदायों के सबसे ज्यादा पिछड़े लोगों को आरक्षण का फायदा मिल सके, न कि सिर्फ अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति वाले लोगों को.
विकास अर्थशास्त्री भालचंद्र मुंगेकर ने दिप्रिंट से कहा कि वह महासभा के रुख का समर्थन करते हैं.
उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र में 59 समुदाय या उप-जातियां अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता प्राप्त हैं. धर्म वाले कॉलम में ‘बौद्ध’ और जाति वाले कॉलम में संबंधित अनुसूचित जाति लिखने की अपील इसलिए जरूरी है, क्योंकि इससे इन सभी उप-जातियों की सही संख्या सामने आएगी.”
इस आंबेडकरवादी नेता ने कहा, “यह जानकारी और उनकी आर्थिक स्थिति से जुड़े आंकड़े यह तय करने में मदद करेंगे कि कौन-से समुदाय अभी भी आरक्षण की सबसे ज्यादा जरूरत में हैं और किन पर ज्यादा या कम ध्यान देने की जरूरत है.”
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