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Friday, 8 May, 2026
होममत-विमतविपक्ष को नहीं पता BJP को कैसे हराना है. हंगरी के माज्यार की रणनीति से क्या सीख सकता है विपक्ष

विपक्ष को नहीं पता BJP को कैसे हराना है. हंगरी के माज्यार की रणनीति से क्या सीख सकता है विपक्ष

राहुल गांधी ने उन क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन चुना है जिन्होंने कांग्रेस को आज की स्थिति तक पहुंचाया. पार्टी की प्राथमिकता पुनर्जीवन नहीं, बल्कि सिर्फ अस्तित्व बचाना दिखती है.

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पश्चिम बंगाल में दूसरे चरण की वोटिंग से पहले मैं कोलकाता के साल्ट लेक इलाके के आईए मार्केट से गुज़र रहा था. वहां 40-50 लोगों की भीड़ के सामने एक युवा नेता का जोशीला भाषण सुनने के लिए मैं रुक गया. वह बिधाननगर सीट से कांग्रेस उम्मीदवार रणजीत मुखर्जी थे. बाद में मैंने उनसे पूछा, “क्या आपको सच में अपनी जीत की उम्मीद है?”

उन्होंने साफ जवाब दिया, “नहीं, लेकिन मैं अगला चुनाव ध्यान में रखकर लड़ रहा हूं. मैं चाहता हूं कि लोग अभी मेरा चेहरा पहचान लें. अगले पांच साल मैं उनके लिए काम करूंगा. 2031 तक कांग्रेस बिधाननगर में मजबूत ताकत बन जाएगी.”

कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर हमला बोलते हुए कहा था कि अगर उन्होंने साफ-सुथरी सरकार चलाई होती और बंगाल में ध्रुवीकरण नहीं किया होता, तो भारतीय जनता पार्टी को राज्य में जगह नहीं मिलती. मैंने रणजीत से राहुल गांधी के इस बयान के बारे में पूछा. रणजीत ने जोरदार तरीके से राहुल गांधी का बचाव किया और कहा कि दो दशक तक गठबंधन में रहने से कांग्रेस को नुकसान हुआ. उन्होंने बताया कि चुनाव प्रचार के लिए उन्हें पूरे विधानसभा क्षेत्र में मुश्किल से 20 पार्टी कार्यकर्ता मिले.उन्होंने कहा, “राहुल जी ने सही किया है. अब समय आ गया है कि कांग्रेस अपने दम पर खड़ी हो और अपने उन वोटरों और कार्यकर्ताओं को वापस लाए जो पार्टी छोड़ चुके हैं. कांग्रेस को ममता बनर्जी की हार से फायदा हो सकता है क्योंकि 1997 में पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने कांग्रेस के वोटरों को अपने साथ कर लिया था. हालांकि, रणजीत ने जल्द ही साफ किया, “बीजेपी अब भी हमारी मुख्य विरोधी है.”

बिधाननगर से कांग्रेस उम्मीदवार रणजीत मुखर्जी को आखिर में सिर्फ 1,498 वोट मिले. ज़ाहिर है कि वह खुद भी एक दुविधा में थे—कांग्रेस के लिए किसकी हार बेहतर है, ममता बनर्जी की या बीजेपी की? उनकी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी कम उलझन में नहीं दिखता. ममता बनर्जी पर तीखा हमला करने के कुछ ही दिन बाद राहुल गांधी ने उन लोगों की आलोचना शुरू कर दी जो “टीएमसी की हार पर खुशी मना रहे थे”. उन्होंने बीजेपी पर “बंगाल के जनादेश की चोरी” का आरोप भी लगाया. मेरी सहयोगी मौसमी दास गुप्ता द्वारा किए गए चुनावी नतीजों के विश्लेषण से पता चलता है कि 26 सीटें ऐसी थीं जहां बीजेपी की जीत का अंतर हटाए गए विवादित वोटरों की संख्या से कम था. वहीं 86 सीटें ऐसी थीं जहां बीजेपी की जीत का अंतर हटाए गए वोटरों की संख्या से ज्यादा था, लेकिन उन 27 लाख विवादित वोटरों के नाम हटाए नहीं जाते, तब भी बीजेपी तृणमूल कांग्रेस सरकार को सत्ता से बाहर कर देती. जैसा कि हम जानते हैं, तथ्यों से अक्सर साजिश की कहानियों पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता.

कांग्रेस के लिए पुनर्जीवन नहीं, अस्तित्व बचाना ज्यादा ज़रूरी

तमिलनाडु में कांग्रेस अब अपने पुराने सहयोगी एमके स्टालिन की द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) का साथ छोड़कर अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के साथ जाने का निर्णय लिया. मकसद सिर्फ जीतने वाले पक्ष में बने रहना लगता है. कुछ समय पहले तक राहुल गांधी की अगुवाई वाले यूथ कांग्रेस नेता तमिलनाडु में ‘कामराज राज’ वापस लाने के नारे लगाते थे. यह उस दौर की बात थी जब राज्य में कांग्रेस का दबदबा था, लेकिन अब राहुल गांधी उस मिशन को भूल चुके हैं.

2018 में तब के बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि उनकी पार्टी 2050 तक भारत पर शासन करेगी. उस समय सत्ता पक्ष में इस बयान पर लालसा से भरी मुस्कान थी, जबकि विपक्षी नेताओं ने इसका मज़ाक उड़ाया था. आठ साल बाद शाह की यह भविष्यवाणी याद आती है क्योंकि मुख्य विपक्षी पार्टी आज भी साजिश की कहानियां बेचने में लगी है और क्षेत्रीय पार्टियों के सहारे टिके रहने की कोशिश कर रही है, जबकि यही वे पार्टियां हैं जिन्होंने कांग्रेस को आज की हालत तक पहुंचाया. डीएमके से लेकर टीएमसी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), राष्ट्रीय जनता दल—लगभग हर क्षेत्रीय पार्टी ने कांग्रेस को धीरे-धीरे कमजोर किया.

अगर राहुल गांधी सच में कांग्रेस को फिर से मजबूत करना चाहते, तो उन्हें इन पार्टियों के मौजूदा वोट बैंक को वापस हासिल करने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने इन पार्टियों को अपना सहयोगी बना लिया है और बीजेपी के खिलाफ वैचारिक लड़ाई में कई जगह खुद को इनके पीछे भी खड़ा कर लिया है. ऐसा लगता है कि कांग्रेस की प्राथमिकता पार्टी को फिर से खड़ा करना नहीं, बल्कि किसी तरह बचाए रखना है.

क्या कांग्रेस के पास बीजेपी को हराने की कोई योजना है? हालिया चुनावों से तो ऐसा नहीं लगता. पार्टी को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सक्रिय राजनीति छोड़ने के बाद उसका प्रदर्शन बेहतर होगा, लेकिन कांग्रेस शायद यह समझ नहीं पा रही कि बीजेपी अब एक बहुत बड़ी चुनावी मशीन बन चुकी है और मोदी के बाद के दौर के लिए भी खुद को तैयार कर चुकी है.

ममता बनर्जी सरकार को सत्ता से हटाने की रणनीति बीजेपी के मुख्य रणनीतिकार और गृह मंत्री अमित शाह ने तैयार की थी. वहीं असम चुनाव पूरी तरह हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में लड़ा गया. हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में भी ऐसी ही कहानियां देखने को मिलीं. विपक्ष भी सिर्फ इंतज़ार की राजनीति कर रहा है क्योंकि उसके पास खुद कोई ठोस योजना नहीं है. यहां डीके शिवकुमार या रेवंत रेड्डी और वहां हेमंत सोरेन ज़रूर मुकाबला करते दिखते हैं, लेकिन कुल मिलाकर विपक्ष को समझ नहीं आ रहा कि बीजेपी को हराया कैसे जाए.

विपक्षी नेता इसके लिए कई कारण या बहाने गिनाते हैं—भाजपा का मजबूत संगठन, उसके पास भारी संसाधन, पूंजीपतियों का समर्थन, कमजोर हो चुकी संस्थाएं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), पक्षपाती मीडिया और न जाने क्या-क्या. सच यह है कि हंगरी में विपक्ष भी लगभग यही वजहें गिनाता था—बस आरएसएस को छोड़कर—ताकि तब के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान और उनकी पार्टी फिदेस की मजबूत पकड़ को समझाया जा सके.

कॉरपोरेट वकील पीटर माज्यार ने फिदेस छोड़कर निष्क्रिय पड़ी तिस्जा पार्टी को फिर से ज़िंदा किया और सिर्फ दो साल में पिछले महीने ओर्बान को सत्ता से बाहर कर दिया. बेशक, प्रधानमंत्री मोदी विक्टर ओर्बान नहीं हैं और बीजेपी भी फिदेस नहीं है, लेकिन भारतीय विपक्ष पीटर माज्यार से बहुत कुछ सीख सकता है. माज्यार ने पारंपरिक और बिखरे हुए वामपंथी विपक्षी दलों के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया था. ये वही दल थे जिन्होंने हंगरी के पिछले संसदीय चुनाव में ओर्बान को हटाने के लिए एकजुट होने की कोशिश की थी.

लेकिन राहुल गांधी ने उन्हीं पुराने दलों के साथ जाने का रास्ता चुना है. यह भी कहा जा सकता है कि गांधी, माज्यार की तरह नई और ताजा उम्मीद देने वाले नेता नहीं दिखते.

विरोधी दल के वोटरों को अपने पक्ष में लाना

कांग्रेस नेता ने शायद द गार्डियन की यह हेडलाइन देखी होगी: “पीटर माज्यार की असली सफलता यह थी कि उन्होंने ओर्बान के वफादार वोटरों को अपने पक्ष में किया—सिर्फ पहले से सहमत लोगों को भाषण नहीं दिया.”

राहुल गांधी लगातार उन्हीं लोगों से बात कर रहे हैं जो पहले से उनके समर्थक हैं. वह ऐसे मुद्दों और विचारों पर जोर देते हैं जो भारत और विदेश में वामपंथी और उदारवादी बुद्धिजीवियों को पसंद आते हैं. हंगरी की राजनीतिक विचारक नोरा शुल्ट्ज, जिन्होंने यह लेख लिखा, उन्होंने कहा: “रास्ते की मुश्किलों का रोना रोने या संसद और बुडापेस्ट के टीवी स्टूडियो में बैठकर खुद को पीड़ित बताने के बजाय—जैसा पुराने विपक्षी दल करते रहे—माज्यार ने पूरे देश का दौरा शुरू किया और रैलियां कीं, यहां तक कि फिदेस के मजबूत इलाकों में भी.”

उन्होंने लिखा कि माज्यार की सभाओं में हंगरी के झंडे, लोकगीत, कविताएं और ऐतिहासिक संदर्भ शामिल होते थे. हंगरी की राजनीति में राष्ट्रीय संस्कृति की भूमिका पर बात करते हुए उन्होंने लिखा, “फिदेस ने देशभक्ति के प्रतीकों को अपने कब्ज़े में लेने की कोशिश की और फुटबॉल मैच देखने जैसी रोजमर्रा की चीज़ों को दक्षिणपंथ के समर्थन से जोड़ दिया. वामपंथी-उदारवादी दलों ने इसकी आलोचना तो की, लेकिन उन्होंने हंगरी की राष्ट्रीय पहचान की कोई वैकल्पिक सोच पेश नहीं की. ज्यादातर समय वे इस मुद्दे से बचते रहे, राष्ट्रीय प्रतीकों से दूरी बनाते रहे और इस तरह फिदेस को मैदान दे दिया.”

माज्यार ने उन मुद्दों पर ध्यान दिया जो लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़े थे—महंगाई, जीवनयापन का खर्च, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और परिवहन की समस्याएं, भ्रष्टाचार, कम वेतन आदि. राहुल गांधी भी इन मुद्दों का जिक्र करते हैं, लेकिन ज्यादातर सिर्फ भाषणों में और हल्के तरीके से. इन मुद्दों पर लगातार और मजबूत अभियान नहीं दिखता.

द गार्डियन के एक दूसरे लेख में विक्टर ओर्बान की कमजोरियों की ओर इशारा किया गया. उसमें लिखा था: “फिदेस की वह प्रचार मशीन, जो कभी प्रवासन से लेकर महंगाई तक हर चीज के लिए देश के दुश्मनों को जिम्मेदार ठहराती थी, धीरे-धीरे लोगों पर अपना असर खोने लगी. बाहरी दुश्मन की कहानी जरूरत से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाने लगी. चार साल बाद युद्ध जैसी भाषा का असर खत्म हो गया.”

लेख में बताया गया कि माज्यार ने विपक्ष की पुरानी रणनीति को पूरी तरह बदल दिया. “वामपंथ की तरफ राजनीति करने के बजाय, उन्होंने ओर्बान की राजनीतिक जमीन पर दावा ठोक दिया. तिस्जा पार्टी का संदेश था कि फिदेस अब असली देशभक्त पार्टी नहीं रही और अब माज्यार की तिस्जा ही उस भूमिका को निभाएगी.”

राष्ट्रवाद BJP का मजबूत क्षेत्र है

कोई यह तर्क दे सकता है कि पीटर माज्यार उस राजनीतिक जगह पर दावा इसलिए कर पाए क्योंकि वह पहले फिदेस पार्टी के सदस्य थे और तिस्जा पार्टी भी सेंटर-राइट विचारधारा वाली थी. वहीं राहुल गांधी की कांग्रेस अब केंद्र की राजनीति से हटकर वामपंथ की तरफ चली गई है.

हाल ही में ग्लोबल निवेशक रुचिर शर्मा ने कहा था कि बीजेपी इसलिए मजबूत बनी हुई है क्योंकि दक्षिणपंथ में उसका कोई असली मुकाबला नहीं है. हालांकि, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल ने उस राजनीतिक जगह को लेने की कोशिश ज़रूर की थी. उन्होंने हनुमान चालीसा पढ़ी, परिवार और कैबिनेट सहयोगियों के साथ दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में बने अयोध्या राम मंदिर की प्रतिकृति में पूजा की, बाद में अयोध्या जाकर भी दर्शन किए, अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन किया, सरकारी स्कूलों में देशभक्ति की कक्षाएं शुरू कीं और शाहीन बाग प्रदर्शन से दूरी बनाए रखी.

शायद यही वजह थी कि बीजेपी ने उनके खिलाफ बेहद आक्रामक रणनीति अपनाई. कांग्रेस को बीजेपी के “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” वाले आरोपों का जवाब देने में मुश्किल होती है. चार राज्यों में कांग्रेस के जो नए विधायक चुने गए हैं, उनमें लगभग 55 प्रतिशत मुस्लिम और ईसाई हैं.

असम में कांग्रेस के 19 में से 18 विधायक मुस्लिम हैं. इसी वजह से AIUDF प्रमुख बदरुद्दीन अजमल और बीजेपी के अमित मालवीय ने कांग्रेस को “मुस्लिम लीग” तक कह दिया.

हालांकि, यह आलोचना पूरी तरह उचित नहीं है. कांग्रेस अगर खुलकर धर्मनिरपेक्षता की बात करती है, अल्पसंख्यकों के मुद्दे उठाती है और उनका समर्थन चाहती है, तो इसमें कुछ गलत नहीं है, लेकिन कांग्रेस वहां बीजेपी के हाथ मजबूत कर देती है, जब उसकी कर्नाटक सरकार अल्पसंख्यकों की कॉलोनियों के विकास के लिए 600 करोड़ रुपये आवंटित करती है.

असम चुनाव से पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने वादा किया था कि हिमंत बिस्वा सरमा सरकार के अतिक्रमण विरोधी अभियान में हटाए गए लोगों को फिर से बसाया जाएगा. इससे हंगरी के वामपंथी दलों की याद आती है, जिन्होंने विक्टर ओर्बान की प्रवासियों के खिलाफ सीमा पर बाड़ लगाने की नीति का विरोध किया था.

इसी तरह, जो पार्टी ऑपरेशन सिंदूर की उपलब्धियों पर सवाल उठाए और भारतीय लड़ाकू विमानों के गिराए जाने की बात करे, वह BJP के राष्ट्रवाद वाले मुद्दे का मुकाबला नहीं कर सकती. इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से “डरा हुआ” बताकर खुशी जताना भी किसी पार्टी की राष्ट्रवादी छवि मजबूत नहीं करता.

बीजेपी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को सेंटर-राइट राजनीति अपनाने की ज़रूरत नहीं है. उसे सिर्फ वामपंथ से वापस केंद्र की राजनीति में लौटने की ज़रूरत है. आखिरकार, 2024 लोकसभा चुनाव में 63 प्रतिशत वोटरों ने उस पार्टी को वोट नहीं दिया जिसे भारत की इकलौती सेंटर-राइट पार्टी माना जाता है.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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