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Friday, 8 May, 2026
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कैसे इस IAS ने बदली हरियाणा पुरातत्व की तस्वीर, नारनौल बना विरासत का नया चेहरा

चमगादड़ों से भरे नारनौल के खंडहरों की मरम्मत से लेकर राखीगढ़ी वॉक और सिंधु-सरस्वती कॉमिक्स तक, हरियाणा पुरातत्व विभाग राज्य के इतिहास को नए अंदाज़ में पेश कर रहा है. इसकी कमान IAS अधिकारी अमित खत्री संभाल रहे हैं.

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नारनौल/चंडीगढ़: दशकों तक नारनौल के भूले-बिसरे 17वीं सदी के स्मारकों पर सिर्फ दो तरह के लोग नज़र आते थे—छांव ढूंढते शराबी और हुक्का पीते गांव के बुजुर्ग, जिनका धुआं टूटते मेहराबों में भर जाता था. यहां कोई टूरिस्ट नहीं आता था. अब हरियाणा आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट नारनौल के इतिहास को फिर से पहचान दिलाने और लोगों को उससे जोड़ने की कोशिश कर रहा है.

छत्ता राय बाल मुकंद दास, जो कभी शाहजहां के दीवान का शानदार महल था—वहां अब 2022 में शुरू हुए जीर्णोद्धार का अंतिम काम चल रहा है. अप्रैल की तेज़ गर्मी में लकड़ी की सीढ़ी पर खड़ा एक कारीगर पांच मंजिला इमारत के ऊपरी हिस्से के पत्थरों को बहुत सावधानी से साफ कर रहा है. उसकी सबसे बड़ी चुनौती है—पुरानी चीज़ को नया बनाए बिना उसे फिर से ठीक करना.

मरम्मत कार्य की निगरानी कर रहे दानिश ने कहा, “मजदूरों को कहा गया है कि वे अपनी तरफ से कुछ नया न करें. उन्हें सिर्फ पहले की बनावट के हिसाब से काम करना है. मकसद कुछ नया बनाना नहीं, बल्कि पुराने को उसी रूप में वापस लाना है.”

हरियाणा की विरासत को नई पहचान देने की यह कोशिश सिर्फ नारनौल तक सीमित नहीं है. पिछले एक दशक से राजनीतिक स्तर पर इसकी इच्छा तो थी, लेकिन 2011 बैच के आईएएस अधिकारी और हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक अमित खत्री के आने के बाद इसमें नई तेज़ी आई है.

अमित खत्री हरियाणा के भूले हुए इतिहास को सामने लाकर राज्य को पर्यटन के नक्शे पर मजबूत जगह दिलाना चाहते हैं. उनका कहना है कि हरियाणा का इतिहास सिर्फ कुरुक्षेत्र के युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां महल, किले, बावड़ियां और हड़प्पा सभ्यता के कई टीले भी हैं जिनके बारे में कम लोग जानते हैं.

हरियाणा पुरातत्व विभाग की पूर्व उपनिदेशक बनानी भट्टाचार्य ने कहा, “इस साइट (छत्ता राय बाल मुकंद दास) से 25 ट्रॉली गंदगी हटाई गई थी. पिछले कुछ सालों में हरियाणा पुरातत्व विभाग में बहुत बड़े बदलाव हुए हैं. सदियों से उपेक्षित स्मारक अब देखने लायक जगहों में बदल रहे हैं. यह एक स्वर्णिम दौर है.”

चमगादड़ों से भरे खंडहरों और टूटी मेहराबों की मरम्मत से लेकर हेरिटेज वॉक और कॉमिक बुक तैयार करने तक, विभाग हरियाणा के भूले हुए इतिहास को नए तरीके से लोगों के सामने ला रहा है. मकसद नारनौल की मुगलकालीन इमारतों और राखीगढ़ी के प्राचीन अवशेषों को लोगों से जुड़े विरासत केंद्र बनाना है.

चंडीगढ़ स्थित अपने कार्यालय में अमित खत्री ने कहा, “जब मैं यहां आया, तब विभाग खुद खंडहरों जितना खराब और बिल्कुल नीरस था.”

पुरातत्व विभाग में पोस्टिंग को अक्सर साइडलाइन या सज़ा की पोस्टिंग माना जाता है, लेकिन खत्री ने इसे एक बड़े प्रोजेक्ट की तरह लिया. हरियाणा कौशल रोजगार निगम के सीईओ और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के निदेशक जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां संभालने के बावजूद उन्होंने पुरातत्व विभाग को नया और आकर्षक रूप दिया है.

उन्होंने कहा, “विरासत और इतिहास कोई साइड टॉपिक नहीं हैं, बल्कि अतीत को वर्तमान से जोड़ने का बड़ा अवसर हैं.” उनके दफ्तर की अलमारी में स्मारकों की मरम्मत से पहले और बाद की तस्वीरों वाली पुस्तिकाएं, संक्षिप्त इतिहास और मरम्मत करने वाली एजेंसियों की जानकारी रखी हुई है.

2011 बैच के आईएएस अधिकारी और हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक अमित खत्री | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
2011 बैच के आईएएस अधिकारी और हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक अमित खत्री | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

पीपीपी मॉडल पर विरासत संरक्षण

पुरातत्व विभाग हर जिले में पार्टनर ढूंढ रहा है ताकि विरासत संरक्षण को सिर्फ सरकारी व्यवस्था तक सीमित न रखकर आम लोगों, एनजीओ और स्थानीय इतिहास प्रेमियों से जोड़ा जा सके. पिछले 27 महीनों में 18 जिलों में 117 हेरिटेज वॉक, बैठकों और संगीत कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है, जिनमें कम से कम 5,000 लोग शामिल हुए.

हेरिटेज वॉक के लिए विभाग ने फरीदाबाद में शोधकर्ता और संरक्षण विशेषज्ञ सुनील हरसाना और कुरुक्षेत्र में पीएचडी स्कॉलर सुमित जमवाल जैसे स्थानीय विशेषज्ञों को जोड़ा है. विभाग ने अग्रोहा में INTACH हिसार चैप्टर, नूंह में मेवात कल आज कल और राखीगढ़ी में दिल्ली रूट्स जैसी संस्थाओं के साथ भी पार्टनरशिप की है.

मार्च में सुनील हरसाना ने फरीदाबाद की अरावली पहाड़ियों में नेचर और हेरिटेज ट्रेक कराया, जिसमें प्राचीन शैल चित्रों और पत्थर के औज़ारों को दिखाया गया.

इस वॉक के बारे में विभाग ने इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा, “इतिहास और प्रकृति की जीवित दुनिया में कदम रखिए.”

हिसार में आयोजित एक हेरिटेज वॉक. राज्य पुरातत्व विभाग ने पिछले 27 महीनों में ऐसी 117 वॉक कराई हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
हिसार में आयोजित एक हेरिटेज वॉक. राज्य पुरातत्व विभाग ने पिछले 27 महीनों में ऐसी 117 वॉक कराई हैं | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

रणनीति का एक हिस्सा कॉरपोरेट फंडिंग भी है. 1972 में विभाग बनने के बाद पहली बार सीएसआर फंड का इस्तेमाल विरासत संरक्षण और प्रचार के लिए किया जा रहा है.

खत्री ने कहा कि कई कॉरपोरेट कंपनियां इसमें रुचि दिखा रही हैं और गुरुग्राम की बादशाहपुर बावड़ी और तावड़ू के मकबरों जैसे स्थलों पर सुविधाओं के लिए फंड दिया जा रहा है.

अमित खत्री ने कहा, “जब मैं आया, तब विभाग खुद खंडहरों जैसा था और उसमें कोई उत्साह नहीं था.”

हरियाणा सरकार के भीतर भी उनके काम की चर्चा हो रही है.

विरासत और पर्यटन विभाग के एक पूर्व आयुक्त एवं सचिव, जो अब दूसरे विभाग में जा चुके हैं, उन्होंने कहा, “खत्री बेहद स्पष्ट सोच वाले और तकनीक समझने वाले अधिकारी हैं. कुछ ही सालों में उन्होंने अपने विचारों और योजनाओं से एक उबाऊ विभाग को रोचक बना दिया. अब उनका विभाग सरकार के महत्वपूर्ण विभागों में गिना जाता है.”

उनका काम हरियाणा की नायब सिंह सैनी सरकार की नई प्राथमिकताओं के साथ भी मेल खाता है.

पिछले दिसंबर दूसरे राखीगढ़ी महोत्सव में मुख्यमंत्री सैनी ने कहा था, “यह नया भारत है, जहां हम अतीत से प्रेरणा लेकर भविष्य की ओर बढ़ते हैं.”

इसी कार्यक्रम में उन्होंने 5,000 साल पुराने हड़प्पा स्थल राखीगढ़ी के लिए 500 करोड़ रुपये देने की घोषणा भी की थी.

रेवाड़ी के एक स्मारक पर हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा आयोजित संगीत कार्यक्रम | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
रेवाड़ी के एक स्मारक पर हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा आयोजित संगीत कार्यक्रम | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

सोशल मीडिया, कॉमिक्स और कैंपेन

पिछले तीन सालों में डिपार्टमेंट के सोशल मीडिया अकाउंट को भी पूरी तरह एक्टिव किया गया है. जिम्मेदारी संभालने के कुछ ही हफ्तों बाद अमित खत्री ने प्रचार अभियानों को नया रूप देने के लिए एक युवा कॉन्ट्रैक्ट टीम बनाई.

पुणे के डेक्कन कॉलेज से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व में पीएचडी कर चुके ग्राफिक नॉवेलिस्ट कुश ढेबर को प्रकाशनों की जिम्मेदारी दी गई. वहीं 29 साल के विनीत भनवाला, जिन्होंने दिल्ली इंस्टीट्यूट ऑफ हेरिटेज रिसर्च एंड मैनेजमेंट से हेरिटेज मैनेजमेंट में मास्टर्स किया है, उन्हें सोशल मीडिया आउटरीच का काम सौंपा गया.

हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग चंडीगढ़ के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट परिसर में किराए के दफ्तर से काम करता है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग चंडीगढ़ के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट परिसर में किराए के दफ्तर से काम करता है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

खत्री ने भनवाला को उनके इंस्टाग्राम पेज ‘Heritage Haryana’ के जरिए खोजा. उस पेज पर उन्होंने हरियाणा के करीब 300 ऐतिहासिक स्थलों की यात्राओं के बारे में पोस्ट किया था. आईएएस अधिकारी ने तुरंत उनसे संपर्क किया.

खत्री ने कहा, “मुझे अपनी टीम में ऐसे क्रिएटिव लोग चाहिए थे जो लोगों को जोड़ सकें और हमारी सोच को ज़मीन पर उतार सकें. विभाग में बजट की कोई कमी नहीं है.”

यह रणनीति काम भी कर रही है. विभाग के इंस्टाग्राम अकाउंट पर अब 13,000 फॉलोअर्स हैं, जो हरियाणा पुलिस के बाद राज्य में दूसरा सबसे ज्यादा फॉलो किया जाने वाला सरकारी अकाउंट है.

यह अकाउंट लोगों को जोड़ने के लिए नियमित सीरीज चलाता है, जैसे Facts of Haryana, Sculptures of Haryana और क्विज़. अप्रैल में 6वीं सदी के राजा हर्षवर्धन पर की गई एक पोस्ट में लिखा था, “उनके शासन में हरियाणा समृद्धि, संस्कृति और शिक्षा की भूमि के रूप में फला-फूला.”

कुश ढेबर ने कहा, “हमने अच्छी योजना और बेहतर कंटेंट के ज़रिए विभाग की पहचान को नया रूप दिया है. हम अकादमिक किताबों की जगह चित्रों वाली किताबों पर ध्यान दे रहे हैं.” उनकी कॉमिक्स की 1,000 से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं.

हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा तैयार की गई चित्रों वाली किताबें | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
हरियाणा पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा तैयार की गई चित्रों वाली किताबें | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

उनकी किताब Our Haryana: Protohistoric Period Urbanisation and the Sindhu Saraswati Civilisation में गुड्डू और पापा नाम के दो किरदार पाठकों को सिंधु घाटी सभ्यता और उसके चंडीगढ़ से संबंध के बारे में बताते हैं.

इस किताब की प्रस्तावना अमित खत्री ने लिखी है.

उन्होंने लिखा, “इस प्रकाशन की सबसे खास बात यह है कि यह सिंधु-सरस्वती सभ्यता को आज की पीढ़ी के लिए प्रासंगिक बनाती है. इसमें नगर योजना, कला, वास्तुकला और सामाजिक-आर्थिक ढांचे की तुलना आज के चंडीगढ़ शहर से की गई है.”

जो विभाग पहले सिर्फ हेरिटेज डे या म्यूजियम डे जैसे मौकों पर सक्रिय होता था, वह अब पूरे साल लोगों से जुड़ा रहता है.

प्रसिद्ध हड़प्पा स्थल राखीगढ़ी में घूमते लोग. विभाग ने गाइडेड टूर के दौरान विजिटर्स के लिए लस्सी और चूरमा की व्यवस्था भी की है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
प्रसिद्ध हड़प्पा स्थल राखीगढ़ी में घूमते लोग. विभाग ने गाइडेड टूर के दौरान विजिटर्स के लिए लस्सी और चूरमा की व्यवस्था भी की है | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

दिसंबर 2025 में आयोजित राखीगढ़ी महोत्सव, जिसका थीम ‘माटी से महोत्सव तक’ था, में हड़प्पा स्थल को एक क्लासरूम जैसा बना दिया गया. वहां केबीसी स्टाइल क्विज़ और नकली खुदाई जैसी गतिविधियां कराई गईं.

स्टॉलों पर सिंधु घाटी थीम वाली टी-शर्ट, हड़प्पा सील और प्राचीन वस्तुओं की प्रतिकृतियां बेची गईं. सिंधु स्मारिका स्टॉल पर लगे पोस्टर में लिखा था, “भूली सभ्यता की महक अपने घर में बसाएं.”

यह सामान, जिनमें किताबें भी शामिल हैं, अमेजन पर और सूरजकुंड मेले (फरीदाबाद) व मैंगो मेले (पंचकूला) जैसे आयोजनों में भी बेचा जाता है.

ढेबर ने कहा, “स्मारकों की यादगार चीजें और थ्रीडी प्रतिकृतियां ई-कॉमर्स साइट्स पर भी उपलब्ध हैं. हम भारत का इकलौता पुरातत्व विभाग हैं जो ई-कॉमर्स साइट्स पर बिक्री कर रहा है.”

नारनौल की मिर्जा अलीजान बावली के बाहर लगा बोर्ड | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
नारनौल की मिर्जा अलीजान बावली के बाहर लगा बोर्ड | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

चमगादड़ों की गंदगी से ‘स्वर्णिम दौर’ तक

छत्ता राय बाल मुकंद दास के अंदर राज्य पुरातत्व विभाग के कर्मचारी अशोक मरम्मत से पहले और बाद की तस्वीरों वाली एक पुस्तिका दिखाते हैं. हर पन्ने पर वही स्मारक पहले खंडहर की हालत में और फिर मरम्मत के बाद नज़र आते हैं.

अशोक ने बताया कि इस महल की छतें टूटी हुई थीं और हर जगह चमगादड़ों ने डेरा बना रखा था. इमारत इतनी जर्जर थी कि शुरुआत में मजदूर अंदर काम करने से भी डरते थे.

नारनौल के छत्ता राय बाल मुकंद दास में मरम्मत कार्य से पहले और बाद की तस्वीरें | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
नारनौल के छत्ता राय बाल मुकंद दास में मरम्मत कार्य से पहले और बाद की तस्वीरें | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

विभाग की पूर्व उपनिदेशक बनानी भट्टाचार्य भी इस इमारत को इसी तरह याद करती हैं.

उन्होंने बताया कि जब संरक्षण का काम शुरू हुआ तो वहां चमगादड़ों की बीट का इतना बड़ा ढेर था कि उनका पैर उसमें फंस गया था.

भट्टाचार्य, जिन्होंने इस साल की शुरुआत तक करीब एक दशक विभाग में काम किया, ने कहा, “साइट से 25 ट्रॉली गंदगी हटाई गई थी.” आज इस इमारत की हल्के रंग की दीवारें, मेहराबें, जालियां और झरोखे बिल्कुल नए जैसे चमक रहे हैं.

छत्ता राय बाल मुकंद दास का अंदरूनी हिस्सा, जो कभी चमगादड़ों की गंदगी से भरा था, अब पूरी तरह चमक रहा है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
छत्ता राय बाल मुकंद दास का अंदरूनी हिस्सा, जो कभी चमगादड़ों की गंदगी से भरा था, अब पूरी तरह चमक रहा है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

यह राज्य के मध्यकालीन स्मारकों पर पहला बड़ा संरक्षण अभियान था.

इस समय हरियाणा में 20 ऐतिहासिक स्थलों पर कुल 95.17 करोड़ रुपये की लागत से संरक्षण कार्य चल रहा है. इनमें से अकेले नारनौल के नौ स्मारकों पर 48 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं. पिछले साल विरासत मंत्री अरविंद शर्मा ने कहा था कि वह मुख्यमंत्री से नारनौल को आधिकारिक तौर पर हेरिटेज सिटी घोषित करने की सिफारिश करेंगे.

अन्य परियोजनाओं में गुरुग्राम के लाल गुंबद के लिए 6.7 करोड़ रुपये, जींद के जफरगढ़ किले के लिए 5.5 करोड़ रुपये, भिवानी के तोशाम किले के लिए 5.4 करोड़ रुपये, फरुखनगर के शीश महल के लिए 4.5 करोड़ रुपये, कैथल की भाई की बावड़ी के लिए 4.46 करोड़ रुपये और पलवल के केसुरिया खेड़ा के लिए 2.16 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं.

भट्टाचार्य ने कहा, “पिछले कुछ सालों में हरियाणा पुरातत्व विभाग में बहुत बड़े बदलाव हुए हैं. सदियों से उपेक्षित स्मारक अब देखने लायक जगहों में बदल गए हैं. यह राज्य के पुरातत्व का स्वर्णिम दौर है.”

मरम्मत कार्य की निगरानी कर रहे दानिश ने कहा, “जब भी (हरियाणा सरकार) के अधिकारी यहां आते हैं, तो मज़ाक में कहते हैं कि राज्य सरकार के संरक्षण वाला स्मारक एएसआई के संरक्षण वाले स्मारक से ज्यादा बेहतर हालत में है.”

नारनौल की तंग गलियों में स्थित 12वीं सदी की पीर तुर्कमान दरगाह और मस्जिद भी संरक्षण की एक बड़ी सफलता मानी जा रही है.

यह जगह पहले शराब पीने वालों का अड्डा बन चुकी थी. यहां काम शुरू करने से पहले चमगादड़ों की गंदगी नहीं, बल्कि हज़ारों शराब की बोतलें हटानी पड़ीं.

इस परिसर में एक मस्जिद और सूफी संत की दरगाह है, जिनके बारे में माना जाता है कि वे 1137 ईस्वी के आसपास इस इलाके में आए थे. अब यहां बहुत सावधानी से मरम्मत का काम चल रहा है. प्रवेश द्वार पर मजदूर कई दिनों से बारीक मोज़ेक डिजाइन को फिर से जीवित करने में लगे हैं.

नारनौल की मरम्मत की गई पीर तुर्कमान दरगाह, जो 12वीं सदी के एक सूफी संत से जुड़ी है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
नारनौल की मरम्मत की गई पीर तुर्कमान दरगाह, जो 12वीं सदी के एक सूफी संत से जुड़ी है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

दानिश ने कहा, “पीर तुर्कमान दरगाह की मरम्मत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इसकी वास्तुकला बहुत बारीक है. इसमें काफी समय लगता है.”

उन्होंने कहा कि काम इतना सफाई से किया जा रहा है कि कोई पहचान नहीं सकता कि क्या नया है और क्या पुराना.

इस परिसर के बिल्कुल पास शाह इब्राहिम खान का मकबरा है, जो एएसआई के संरक्षण में है. उसके गुंबद पर झाड़ियां उग आई हैं और दीवारें टूटती जा रही हैं.

दानिश मुस्कुराते हुए बोले, “जब भी हरियाणा सरकार के अधिकारी आते हैं, तो कहते हैं कि राज्य सरकार के संरक्षण वाला स्मारक एएसआई वाले स्मारक से बेहतर हालत में है.”

नारनौल की पीर तुर्कमान दरगाह के गेट पर बनी बारीक मोज़ेक डिजाइन को उसके पुराने रूप में दोबारा तैयार किया गया है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
नारनौल की पीर तुर्कमान दरगाह के गेट पर बनी बारीक मोज़ेक डिजाइन को उसके पुराने रूप में दोबारा तैयार किया गया है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

अमित खत्री मानते हैं कि नारनौल में जयपुर और मैसूर जैसे बड़े हेरिटेज शहरों को टक्कर देने की क्षमता है.

कुश ढेबर की किताब The Splendours of Narnaul का ज़िक्र करते हुए खत्री ने कहा, “नारनौल के स्मारकों में अफगान, राजपूत और मुगल शैली का बेहतरीन मेल है, जिसमें स्थानीय कला की झलक भी दिखती है. हम लगातार इनके संरक्षण और मरम्मत पर काम कर रहे हैं ताकि ये अपनी पुरानी शान फिर हासिल कर सकें.”

लेकिन मरम्मत के बावजूद पर्यटन सुविधाओं की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है.

भट्टाचार्य के मुताबिक, इन स्थलों के आसपास रहने की सुविधा सबसे बड़ी समस्या है.

नारनौल की 16वीं सदी की मिर्जा अलीजान बावड़ी | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
नारनौल की 16वीं सदी की मिर्जा अलीजान बावड़ी | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

उन्होंने कहा, “लोग इन छिपे हुए खजानों को देखने तभी आएंगे जब यहां सुविधाएं होंगी. अभी सुविधाओं की कमी सबसे बड़ी बाधा है.”

उन्होंने बताया कि विभाग छोड़ने से पहले उन्होंने ‘वन स्टेट वन ग्लोबल डेस्टिनेशन’ योजना के तहत होटल बनाने का प्रस्ताव दिया था. यह योजना बजट 2025-26 में घोषित की गई थी, जिसके तहत हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में कम से कम एक विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल विकसित करने की बात कही गई है.

फिलहाल विभाग कुछ जगहों पर खाने के जरिए पर्यटकों को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है. राखीगढ़ी में साइट विजिट के बाद लोगों को चूरमा, बाजरे की रोटी और लस्सी परोसी जाती है.

एएसआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “विरासत को लोगों के बीच लोकप्रिय और आकर्षक बनाने की कोशिश तेजी पकड़ रही है, लेकिन सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या संस्थागत ढांचा इतना मजबूत है कि इस बदलाव को लंबे समय तक बनाए रख सके.”

नारनौल का छत्ता राय बाल मुकंद दास, जो हरियाणा पुरातत्व विभाग के बड़े बदलाव का सबसे शानदार उदाहरण बन चुका है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
नारनौल का छत्ता राय बाल मुकंद दास, जो हरियाणा पुरातत्व विभाग के बड़े बदलाव का सबसे शानदार उदाहरण बन चुका है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

क्रैक्स इन द फाउंडेशन

विभाग खुद को नया रूप देने में लगा है, लेकिन उसके अपने हालात अभी भी ठीक नहीं हैं. विभाग चंडीगढ़ के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट के अंदर किराए के एक हिस्से से चलता है, जहां दीवारों का प्लास्टर उखड़ा हुआ है और स्टाफ भी बहुत कम है.

पूरे राज्य में विभाग के पास सिक्योरिटी गार्ड समेत सिर्फ करीब 70 कर्मचारी हैं.

खत्री ने कहा, “इतने बदलाव के बावजूद विभाग कई चुनौतियों का सामना कर रहा है. हमारे पास कोई इंजीनियरिंग विंग नहीं है और बहुत कम स्टाफ के साथ काम करना पड़ रहा है.”

उन्होंने बताया कि विभाग अपने मौजूदा ऑफिस पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं कर रहा क्योंकि पंचकूला में बिहार म्यूजियम की तर्ज पर एक नया आधुनिक म्यूजियम बन रहा है और विभाग को वहां शिफ्ट किया जाएगा.

चंडीगढ़ में हरियाणा आर्कियोलॉजी एंड म्यूजियम्स डिपार्टमेंट का पुराना दिखने वाला प्रवेश द्वार | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
चंडीगढ़ में हरियाणा आर्कियोलॉजी एंड म्यूजियम्स डिपार्टमेंट का पुराना दिखने वाला प्रवेश द्वार | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

लेकिन समस्याएं सिर्फ इमारतों तक सीमित नहीं हैं. हरियाणा पुरातत्व विभाग कब्जे वाली साइट्स, बंटी हुई मालिकाना व्यवस्था और लंबे समय से रुकी खुदाई रिपोर्टों जैसी दिक्कतों से जूझ रहा है.

विभाग में सिर्फ दो आर्कियोलॉजिस्ट हैं. पिछले दस साल में विभाग सिर्फ दो खुदाइयां कर पाया है—एक प्री-हड़प्पा साइट कुनाल में और दूसरी अग्रोहा में, जो कभी महाराजा अग्रसेन की राजधानी थी. दोनों की खुदाई रिपोर्ट अब तक लंबित हैं.

जब खत्री ने जिम्मेदारी संभाली थी, तब हरियाणा में करीब 35 संरक्षित साइट्स थीं. अब यह संख्या 100 हो गई है, लेकिन ज़मीन पर इनमें से कई जगहों पर कब्ज़ा है.

2024 में जब दिप्रिंट ने कैथल की बालू साइट का दौरा किया, तो टीले का एक हिस्सा खेती की जमीन में बदल चुका था. टीले के ऊपर बिखरे मिट्टी के बर्तनों के पास मरे हुए जानवर पड़े सड़ रहे थे.

“विभाग सिर्फ उन्हीं साइट्स पर ध्यान दे रहा है जो देखने में अच्छी लगती हैं, छोटी साइट्स को ठीक से नहीं संभाला जा रहा.”

-प्रदीप श्योराण, जो Haryana Heritage Teller इंस्टाग्राम पेज चलाते हैं

समस्या का एक हिस्सा यह भी है कि संरक्षित साइट्स अलग-अलग मालिकों के पास हैं—ग्राम पंचायत, फॉरेस्ट डिपार्टमेंट, वक्फ बोर्ड, पुरातत्व विभाग, PWD, शिक्षा विभाग और निजी संस्थाएं. दिप्रिंट के विश्लेषण के मुताबिक 100 संरक्षित साइट्स में से 21 प्रतिशत निजी मालिकों की हैं, 11 प्रतिशत पुरातत्व विभाग की और 7 प्रतिशत वक्फ बोर्ड की हैं.

2021 की नीति आयोग की रिपोर्ट Challenges faced in Heritage Management in India and Policy Imperatives के मुताबिक हरियाणा की 1,500 से ज्यादा हड़प्पा काल की साइट्स “ज्यादातर असुरक्षित” हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, “टीले तेजी से गायब हो रहे हैं” और यह भी कहा गया कि जमीन का मालिकाना हक लिए बिना खुदाई की अनुमति मिलनी चाहिए.

खत्री ने कहा, “विभाग को दिक्कतें आ रही हैं क्योंकि कई साइट्स निजी ज़मीन पर हैं.”

चंडीगढ़ में हरियाणा पुरातत्व कार्यालय का साइनबोर्ड. विभाग जल्द ही निर्माणाधीन पंचकूला म्यूजियम में शिफ्ट होगा | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
चंडीगढ़ में हरियाणा पुरातत्व कार्यालय का साइनबोर्ड. विभाग जल्द ही निर्माणाधीन पंचकूला म्यूजियम में शिफ्ट होगा | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

विभाग को सबसे बड़ा झटका जनवरी में लगा, जब पूर्व डिप्टी डायरेक्टर बनानी भट्टाचार्य पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. उन पर फंड में गड़बड़ी, टेंडर नियमों के उल्लंघन और Ground Penetrating Radar Survey (GPRS) करने वाली एजेंसी को गलत तरीके से फायदा पहुंचाने का आरोप लगा. उनके खिलाफ IPC की धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश वाली धाराओं के साथ-साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत मामला दर्ज किया गया.

भट्टाचार्य ने सभी आरोपों से इनकार किया है.

उन्होंने कहा, “मैंने अपनी नियुक्ति से अब तक ईमानदारी से काम किया है. दुख की बात है कि इसके बावजूद यह सब हो रहा है.”

इस बीच हरियाणा के कुछ हेरिटेज वॉचर्स का कहना है कि विभाग का यह बदलाव सिर्फ ऊपर-ऊपर का है.

Haryana Heritage Teller नाम का इंस्टाग्राम पेज चलाने वाले UPSC शिक्षक प्रदीप श्योराण ने कहा, “टीले और साइट्स की हालत अच्छी नहीं है. लोगों ने पुरातात्विक जगहों पर कब्जा कर लिया है, पुरानी चीज़ें नष्ट हो रही हैं और जमीन पर बुनियादी सुविधाओं की कमी है.” इस पेज के 5,200 से ज्यादा फॉलोअर्स हैं और इसका टैगलाइन है “No Competition – Only collaboration”.

श्योराण का कहना है कि विभाग छोटी और कम चर्चित साइट्स को नज़रअंदाज कर रहा है. उनके मुताबिक भिवानी का मिताथल, कैथल का बालू और फतेहाबाद का भिरड़ाना खराब हालत में हैं. हालांकि राज्य सरकार ने पिछले साल मिताथल, तिगराना और पृथ्वीराज की कचहरी को संरक्षित साइट घोषित किया था, लेकिन श्योराण का दावा है कि अब भी उन्हें सही देखभाल नहीं मिल रही.

श्योराण ने कहा, “मिताथल में लोगों ने JCB मशीनों से प्राचीन टीले काट दिए. विभाग सिर्फ उन्हीं साइट्स पर ध्यान दे रहा है जो देखने में अच्छी लगती हैं, छोटी साइट्स को ठीक से नहीं संभाल रहा.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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