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Monday, 11 May, 2026
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IIT, PhD स्कॉलर, मिट्टी और इंस्टाग्राम—वाराणसी का 400 साल पुराना अखाड़ा कैसे बचा रहा है अपनी विरासत

नीदरलैंड, फ्रांस और पुर्तगाल के पहलवान अब 400 साल पुराने तुलसीदास अखाड़े में आ रहे हैं. इसके पीछे एक महंत का इंजीनियर बेटा है— ‘अगर हम खुद को नहीं बदलेंगे, तो यह परंपरा ज़िंदा नहीं रहेगी.’

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वाराणसी: फ्रांस के लेनी रोमेन भारत एक ऐसी कसरत सीखने आए हैं, जो उनके देश में नहीं होती. उन्होंने सोशल मीडिया पर भारतीय पहलवानों को अखाड़े में कुश्ती करते हुए देखा था और वहीं से उन्हें प्रेरणा मिली. अब मिट्टी में लथपथ होकर वह गदा चलाना सीख चुके हैं, हालांकि अभी भी वह ‘अखाड़ा’ शब्द ठीक से बोल नहीं पाते.

रोमेन दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर वहां की वर्कआउट संस्कृति को समझते हैं और इस बार उन्होंने वाराणसी को चुना. यहां वह बॉक्सिंग से जुड़े नए रीति-रिवाज भी सीख रहे हैं.

टिन की छत वाले तुलसीदास गोस्वामी अखाड़े में वह बाकी पहलवानों की तरह अपने जूते बाहर उतारते हैं और मिट्टी को हाथ लगाकर सम्मान देते हैं.

रोमेन ने कहा, “इन मिट्टी के अखाड़ों ने मुझे शारीरिक और मानसिक ताकत के बारे में बहुत कुछ सिखाया.”

अखाड़े में उनका चौथा दिन था और वह देसी पुशअप्स करना सीख चुके थे. साथ ही उन्होंने यह भी समझा कि गदा और मुगदर — भारी लकड़ी के मूसल और डंडे — शरीर की मांसपेशियों को मजबूत बनाने का तेज तरीका हैं. वह हर दिन इनसे अभ्यास करते हैं और दोनों हाथों में 8 किलो के मुगदर उठाकर पीठ, बाइसेप्स और ट्राइसेप्स की एक साथ कसरत करते हैं.

नीयन रंग की स्पोर्ट्स टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने रोमैंन ने मिट्टी के अखाड़े में कहा, “जिम में मुझे इन तीनों मांसपेशियों के लिए अलग-अलग तीन एक्सरसाइज करनी पड़ती हैं, लेकिन यहां एक ही अभ्यास में सबका स्ट्रेच हो जाता है.”

फ्रांसीसी बॉक्सर लेनी रोमेन फ्रांस से चलकर तुलसीदास अखाड़े में प्रशिक्षण लेने आए | फ़ोटो: नूतन शर्मा | दप्रिंट

गंगा किनारे तुलसी घाट पर स्थित 400 साल पुराना तुलसीदास अखाड़ा — जिसे स्वामीनाथ अखाड़ा भी कहा जाता है — उस दौर की जीवित निशानी है, जब शहर पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा वाले अखाड़ों से भरा हुआ था. माना जाता है कि इसकी स्थापना मुगल काल में उन जगहों पर हुई थी, जहां कवि-संत तुलसीदास ने रामचरितमानस के कुछ हिस्से लिखे थे.

अब जब वाराणसी में अखाड़ों की परंपरा स्पोर्ट्स क्लब और जिम के बढ़ते चलन के कारण कमजोर पड़ रही है, तब तुलसीदास अखाड़ा अपनी विरासत को बचाए रखते हुए समय के साथ बदलना सीख रहा है.

यह अखाड़ा अब मैराथन, इंस्टाग्राम रील्स और फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स के साथ सहयोग के जरिए पारंपरिक कसरत को डिजिटल दौर में नई पहचान देने की कोशिश कर रहा है. यहां इस समय करीब 100 पहलवान प्रशिक्षण लेते हैं, जिनमें से कई यूनिवर्सिटी, जिला और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं.

संकट मोचन मंदिर से जुड़े इस अखाड़े का संचालन उसके महंत विश्वंभर नाथ मिश्र करते हैं, जिनका परिवार 13 पीढ़ियों से मंदिर और अखाड़े दोनों को संभाल रहा है. वह और उनके बेटे पुष्कर मिश्र इस पुरानी व्यवस्था में नई ऊर्जा लाने की कोशिश कर रहे हैं.

“मैं तुलसीदास अखाड़े को पारंपरिक फिटनेस के लिए एक वैश्विक केंद्र बनाना चाहता हूं. और वाराणसी को एक ऐसा स्थान, जहां लोग केवल मंदिरों और घाटों के लिए ही नहीं, बल्कि यहां की विरासत को जीने के लिए आएं.”

— पुष्कर मिश्रा

2016 में आई फिल्म ‘दंगल’ के बाद जब कई लड़कियों की कुश्ती में रुचि बढ़ी, तब तुलसीदास अखाड़े ने परंपरा तोड़ते हुए महिलाओं के लिए भी अपने मिट्टी के अखाड़े के दरवाजे खोल दिए. इसका असर भी दिखा. यहां की खिलाड़ी काशिश यादव ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और खेलो इंडिया में पदक जीते, जबकि खुशी यादव ने पिछले साल उत्तर प्रदेश केसरी का खिताब जीता. पुरुष वर्ग के विजेता काशिक गिरी भी तुलसी अखाड़े से ही थे. पिछले कुछ वर्षों में यहां होने वाले नाग पंचमी कुश्ती आयोजन में नीदरलैंड, स्पेन और इजराइल से भी पहलवान आ चुके हैं.

29 वर्षीय पुष्कर मिश्र, जो महंत के बेटे हैं, तुलसी अखाड़े को 21वीं सदी में नई पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा, “हमें इस अखाड़े की परंपरा को बचाकर रखना है, लेकिन दुनिया जिस तरह बदल रही है उसे नजरअंदाज भी नहीं कर सकते. अगर हम समय के साथ नहीं बदले तो यह परंपरा खत्म हो जाएगी.”

IIT PhD स्कॉलर और पूर्व राज्य-स्तरीय पहलवान पुष्कर मिश्रा गदा के साथ कसरत करते हुए | विशेष व्यवस्था

पुष्कर मिश्र फिलहाल आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में पीएचडी कर रहे हैं. वह वाराणसी की परंपराओं के संरक्षक माने जाते हैं — चाहे तबला बजाना हो या खुद राज्य स्तर के पहलवान रहना. मंदिर और उससे जुड़ी गतिविधियों का नया चेहरा अब वही हैं और अखाड़ा उनका एक खास प्रोजेक्ट है.

मिश्र ने आगे कहा, “लोग अब जिम की तरफ जा रहे हैं और तेज रफ्तार जिंदगी में युवाओं का ध्यान जल्दी भटकता है. हमें इंस्टाग्राम की दुनिया में इस परंपरा को युवाओं के लिए आकर्षक बनाना होगा, लेकिन अपनी संस्कृति को साथ लेकर.”

मिट्टी से इंस्टाग्राम तक का सफर

तुलसीदास अखाड़े में अब एक नई दुनिया दिखाई देती है. जहां कुछ लोग पारंपरिक लाल लंगोट पहनकर दांव-पेंच लगा रहे होते हैं, वहीं कुछ लोग पश्चिमी स्पोर्ट्सवियर में नजर आते हैं. पुराने गदा और मुगदर अब नई ताकत बढ़ाने वाली रस्सी वाली मशीनों के साथ दिखाई देते हैं. एक कोने में एक युवक खुद का वीडियो बनाते हुए गदा उठा रहा था.

उसने कहा, “मैं इसे कूल और लोकप्रिय बनाने की कोशिश कर रहा हूं. लोगों को यह पसंद आता है. कौन जाने, शायद मैं अगला वायरल लड़का बन जाऊं और मेरे साथ यह कला भी वायरल हो जाए.”

संकट मोचन मंदिर का इंस्टाग्राम अकाउंट अक्सर तुलसीदास अखाड़े की रील्स शेयर करता है. इनके कैप्शन अंग्रेजी में होते हैं, जो शायद सिर्फ पहलवानों के लिए नहीं बल्कि बड़े और अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को ध्यान में रखकर लिखे जाते हैं.

हरियाणा के अखाड़ों की उन रील्स से अलग, जिनमें अक्सर ‘गैंगस्टर’ गानों पर ताकत और मर्दानगी दिखाई जाती है, यहां का कंटेंट परंपरा को आधुनिक अंदाज में पेश करता है. एक रील में कोच “पारंपरिक ताकत बढ़ाने वाली ट्रेनिंग” दिखा रहे थे, जिसे शंकर एहसान लॉय के गाने ‘ब्रोकन सोल्स’ पर बनाया गया था. उसे 5,300 लाइक्स मिले. दूसरी रील में #KashiOlympics हैशटैग के साथ एक पहलवान ‘रामा रामा रटते रटते’ गाने पर डंडे घुमा रहा था. यहां विदेशी लोग भी अक्सर दिखाई देते हैं. एक फेसबुक रील का कैप्शन था — “मुन्ना पहलवान बनाम पुर्तगाल.”

“मेरा लक्ष्य इस कला को आधुनिक जिम का विकल्प बनाना है. मैं पूरी निष्ठा के साथ इसके बारे में जागरूकता फैलाता हूं. यह हमारी परंपरा है और हमें इसे सुरक्षित रखना तथा बढ़ावा देना है.”

— उत्कर्ष यादव, पहलवान, जिन्होंने ‘बनारस अखाड़ा बचाओ सोसाइटी’ का गठन किया है.

अखाड़ा किसी से फीस नहीं लेता और विश्वंभर नाथ मिश्र इसे अपनी सेवा और दान का काम बताते हैं. अखाड़े के बाहर रहने वाला मिश्र परिवार एक अलग तरह का धार्मिक परिवार है — पुजारी भी और इंजीनियर भी. पिछले महंत वीर भद्र मिश्र भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (BHU) वाराणसी में सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे. गंगा सफाई के काम के लिए उन्हें 1999 में TIME मैगजीन का ‘हीरो ऑफ द प्लैनेट’ पुरस्कार मिला था. उनके बाद विश्वंभर नाथ मिश्र उसी संस्थान में इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग पढ़ाते हैं और वाराणसी की संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण की आवाज के रूप में पहचाने जाते हैं.

तुलसीदास अखाड़े में लाल लंगोट और वेस्टर्न स्पोर्ट्सवियर एक साथ मौजूद हैं | फोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

अब एक और इंजीनियर पुष्कर उसी सोच को अखाड़े तक पहुंचा रहे हैं. उन्होंने 2024 में तुलसीदास अखाड़े पर एक छोटी डॉक्यूमेंट्री भी बनवाई, जिसे यूट्यूब पर जारी किया गया.

वीडियो में आवाज आती है, “गंगा घाट की सीढ़ियों से ऊपर, नीम के पेड़ के नीचे तुलसीदास अखाड़ा खड़ा है. हिंदू पौराणिक कथाओं में महाभारत में मल्ल-युद्ध नाम के एक विशेष खेल का जिक्र मिलता है, जो बाद में कुश्ती कहलाया. यहीं से इसकी शुरुआत हुई.”

अखाड़े में किसी फैंसी सामान की ज़रूरत नहीं | फ़ोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

डॉक्यूमेंट्री में विश्वंभर नाथ मिश्र बताते हैं कि उनकी महंत परंपरा में हर कोई कुश्ती करता था, जिसमें वह खुद भी शामिल थे. वह याद करते हैं कि उन्हें चेतावनी दी जाती थी कि पढ़ाई करने वालों की गर्दन को चोट लग सकती है, क्योंकि वहीं “सोच और समझ” रहती है. लेकिन वह मुस्कुराते हुए कहते हैं कि यह नियम उन पर कभी लागू नहीं हुआ.

लेकिन विरासत पर बनी इस वीडियो में भी बदलाव साफ दिखाई देता है. इसमें हारबर्ट हार्टे एगबर्ट्स उर्फ ‘द फ्लोइंग डचमैन’ भी नजर आते हैं, जो गदा और मुगदर से वर्कआउट करने वाले फिटनेस इन्फ्लुएंसर हैं.

डॉक्यूमेंट्री में वह कहते हैं, “मैं नीदरलैंड से हूं. मैं भारत इसलिए आया क्योंकि यहां ये प्राचीन परंपराएं अभी भी जीवित हैं. हमारे यहां इन्हें स्टील और आधुनिक जिम ने बदल दिया है.” वीडियो में वह बिना शर्ट के गदा घुमाते दिखाई देते हैं.

उनकी इंस्टाग्राम की एक पिन की हुई पोस्ट में वह वाराणसी की सड़कों पर 40 किलो का गदा घुमाते दिखाई देते हैं और आसपास लोग तालियां बजा रहे होते हैं. उन्होंने लिखा, “मुझे नहीं पता था कि मैं सड़क के बीचोंबीच अपनी जिंदगी का सबसे भारी गदा घुमाऊंगा.” इस पोस्ट को 17 लाख लाइक्स मिले.

तुलसीदास अखाड़े में नाग पंचमी समारोह के दौरान फिटनेस इन्फ्लुएंसर हार्बर्ट हर्ट एग्बर्ट्स उर्फ ​​द फ्लोइंग डचमैन | स्क्रीनग्रैब

एक दूसरी रील में वह एक बड़ी रस्सी के सहारे खुद को ऊपर खींचते दिखाई दिए. उसके कैप्शन में लिखा था कि अखाड़े में नई दीवार पेंटिंग्स, नए उपकरण और रस्सी खींचने वाली व्यवस्था जोड़कर इसे बेहतर बनते देखना “शानदार अनुभव” था.

उन्होंने लिखा, “रस्सी खींचना पहलवानों के लिए बहुत जरूरी है और अब वाराणसी में यह ज्यादा देखने को नहीं मिलता.”

एगबर्ट्स उन कई अंतरराष्ट्रीय इन्फ्लुएंसर्स में शामिल हैं जिन्हें पुष्कर ने बुलाया है. पुष्कर ऐसे लोगों की तलाश में रहते हैं जो पहलवानों को “प्रेरित” कर सकें. उनका कहना है कि इन यात्राओं के लिए इन्फ्लुएंसर्स को पैसे नहीं दिए जाते.

पुष्कर ने कहा, “हम फिटनेस इन्फ्लुएंसर्स, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण से जुड़े अभियानों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं ताकि अखाड़ा अपनी परंपरा बचाए रखते हुए आज के समय में भी प्रासंगिक बना रहे.”

सोशल मीडिया से आगे बढ़कर पुष्कर ऐसे कार्यक्रम भी आयोजित कर रहे हैं जो परिवार की विभिन्न प्राथमिकताओं को जोड़ते हैं. मार्च में उन्होंने वाराणसी में ‘क्लीन गंगा’ मैराथन आयोजित की, जिसमें तुलसीदास अखाड़े के 20 से ज्यादा पहलवानों ने हिस्सा लिया. इस कार्यक्रम में पहलवानों ने अपने दांव-पेंच और अभ्यास दिखाए, जिसने मिलिंद सोमन का ध्यान खींचा.

मिलिंद सोमन, पुष्कर मिश्रा और गले में ‘गर नल’ (पत्थर का छल्ला) पहने एक पहलवान | विशेष व्यवस्था

सोमन ने मैराथन कार्यक्रम में कहा, “ऐसी पारंपरिक गतिविधियों को ज्यादा बढ़ावा मिलना चाहिए.” उन्होंने जोड़ी और गदा ट्रेनिंग में भी दिलचस्पी दिखाई.

स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय पहलवानों के एक समूह के साथ पुष्कर मिश्रा | विशेष व्यवस्था

खत्म होते अखाड़े

19 वर्षीय उत्कर्ष यादव तुलसीदास अखाड़े के चौथी पीढ़ी के पहलवान हैं. उनके पिता अपने समय में उत्तर प्रदेश केसरी रह चुके हैं और उनका परिवार पीढ़ियों से इस अखाड़े से जुड़ा हुआ है. लेकिन यादव की सबसे बड़ी चिंता खिताब जीतना नहीं, बल्कि अखाड़ों को बचाना है.

मार्च में उन्होंने और कई अखाड़ों के सदस्यों ने मिलकर ‘बनारस अखाड़ा बचाओ सोसाइटी’ बनाई, जिसका उद्देश्य शहर के खत्म होते अखाड़ों को बचाना है. इस अभियान का लक्ष्य तीन चीजें हैं — जिन अखाड़ों की जमीन पर कब्जा हो गया है उसे वापस लेना, उन पहलवानों को दोबारा जोड़ना जो इस परंपरा से दूर हो गए हैं, और युवाओं के बीच मुगदर और गदा जैसी पारंपरिक कलाओं को लोकप्रिय बनाना.

उत्कर्ष यादव ने कहा, “कुछ अखाड़ों की जमीन पर लोगों ने जबरन कब्जा कर लिया है और कई पहलवान भी इस कला को छोड़ चुके हैं. इसलिए हम दोनों तरफ काम कर रहे हैं — अखाड़ों के कागजात ढूंढकर उन्हें वापस लेने की कोशिश कर रहे हैं और पहलवानों से मिलकर उन्हें दोबारा इस कला से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.”

पहलवान उत्कर्ष यादव और शिवम, लेनी रोमेन को गदा चलाना सिखाने के लिए तैयार | फ़ोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

कुछ अनुमान बताते हैं कि कभी वाराणसी में करीब 500 अखाड़े हुआ करते थे. लेकिन अब सिर्फ तीन दर्जन से थोड़ा ज्यादा अखाड़े बचे हैं. यह जानकारी बनारस कुश्ती संघ के अध्यक्ष राजेश रणु सिंह ने दी. उनके मुताबिक, अखाड़ों का पतन 1990 के दशक के आखिर में तेज शहरीकरण के साथ शुरू हुआ.

उन्होंने कहा, “आज सिर्फ करीब 40 अखाड़े काम कर रहे हैं और उनमें से भी मुश्किल से 20 सक्रिय हैं. करीब 15 साल पहले इनकी संख्या लगभग 125 थी. 2008 के बाद थोड़ा सुधार जरूर हुआ, लेकिन संख्या अभी भी पहले जैसी नहीं है.”

अखाड़ों के घटने की कई वजहें हैं. समय के साथ जमीनों पर कब्जा हो गया, पहलवान मिट्टी की कुश्ती छोड़कर मैट कुश्ती की तरफ चले गए और युवाओं का रुझान शहर में खुल रहे आधुनिक जिमों की तरफ बढ़ गया.

आज भी वाराणसी के अखाड़ों में करीब 800 पहलवान अभ्यास करते हैं, जिनमें 30 से ज्यादा महिलाएं शामिल हैं. लेकिन उनके लिए ज्यादा सहायता उपलब्ध नहीं है, क्योंकि ज्यादातर अखाड़े दान के सहारे चलते हैं. पिछले साल भारतीय पारंपरिक खेल संघ ने वाराणसी में 1 लाख रुपये इनाम वाली ‘महादंगल’ प्रतियोगिता आयोजित की थी, लेकिन ऐसे आयोजन अक्सर नहीं होते. आमतौर पर इनाम की राशि 5,000 से 21,000 रुपये तक ही होती है.

“आज केवल 40 के आस-पास अखाड़े ही चालू हैं, और उनमें से भी मुश्किल से 20 ही सक्रिय हैं. पहले, यानी करीब 15 साल पहले, इनकी संख्या लगभग 125 थी. 2008 के बाद कुछ हद तक इनमें फिर से जान आई, लेकिन इनकी संख्या अब भी उस स्तर से काफी पीछे है, जो पहले हुआ करती थी.”

— राजेश रानू सिंह, अध्यक्ष, बनारस कुश्ती संघ

उत्कर्ष दिन में कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) की तैयारी करते हैं और हर शाम दो घंटे अखाड़े में अभ्यास करते हैं. खाली समय में वह अपने दोस्तों और युवाओं को समझाने की कोशिश करते हैं कि अखाड़ा जिम से बेहतर है.

देसी पुशअप्स के बीच उत्कर्ष यादव ने कहा, “मैं तीन साल की उम्र से यहां अभ्यास कर रहा हूं. मेरा लक्ष्य है कि यह कला आधुनिक जिम का विकल्प बने. मैं पूरी लगन से इसके बारे में जागरूकता फैलाता हूं. यह हमारी परंपरा है और हमें इसे बचाना और आगे बढ़ाना है.”

खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की लड़ाई

तुलसीदास अखाड़े को दूसरे अखाड़ों से अलग बनाती है इसकी खासियत कि यहां एक साथ तीन तरह की ट्रेनिंग दी जाती है — जोड़ी और गदा अभ्यास, मिट्टी की कुश्ती और मैट कुश्ती. यह जगह अब उन लोगों के लिए दुर्लभ ठिकाना बन गई है जो पारंपरिक कुश्ती को बचाना चाहते हैं, साथ ही उन खिलाड़ियों के लिए भी जो आधुनिक प्रतिस्पर्धी कुश्ती में आगे बढ़ना चाहते हैं. शहर के ज्यादातर अखाड़ों में इनमें से एक या दो तरह की ही ट्रेनिंग मिलती है, लेकिन यहां तीनों उपलब्ध हैं. इस अखाड़े ने कुछ पुरानी बंदिशों को भी तोड़ा है, जिन्हें कई दूसरे अखाड़े अब भी मानते हैं.

उत्कर्ष यादव ने कहा, “पहले महिलाओं को यहां आने की अनुमति नहीं थी, लेकिन अब हम आधुनिक तरीकों को अपना रहे हैं क्योंकि जिंदा रहने के लिए समय के साथ चलना जरूरी है.”

तुलसीदास अखाड़े में महिला पहलवान मैट पर अभ्यास करती हैं। ज़्यादातर दूसरे अखाड़े अभी भी सिर्फ़ मिट्टी और पुरुषों के लिए हैं | फ़ोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

30 वर्षीय मुकेश पहलवान, जिन्हें लोग मुन्ना पहलवान के नाम से जानते हैं, तुलसीदास अखाड़े के बड़े नामों में से एक हैं. लगभग दो दशकों से यहां प्रशिक्षण लेने वाले मुन्ना पहलवान जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीत चुके हैं. खेल कोटे के जरिए उन्हें सरकारी नौकरी भी मिली, जो कई लोगों के लिए गरीबी से बाहर निकलने का रास्ता बनती है.

मिट्टी के अखाड़े की तरफ जाते हुए मुन्ना पहलवान ने कहा, “इस जगह ने मुझे बहुत कुछ दिया है — अनुशासन, निरंतरता और सबसे जरूरी चीज, अपनी जड़ों से जुड़े रहना. मेरे पिता भी यहां अभ्यास करते थे. अब मैं पारंपरिक तरीके से फिट रहने की इस संस्कृति को आगे बढ़ाना चाहता हूं.”

जोरी और गदा के साथ अभ्यास करते मुन्ना पहलवान | फोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

अब अगली पीढ़ी भी धीरे-धीरे यहां आने लगी है. पांच साल तक के बच्चे भी तुलसीदास अखाड़े में प्रशिक्षण लेने आते हैं. इनमें ज्यादातर ऐसे परिवारों के बच्चे होते हैं जिनकी कई पीढ़ियां पहलवानी से जुड़ी रही हैं. अधिकतर पहलवान ऊंची जातियों और यादव समुदाय से आते हैं, हालांकि अखाड़े में जाति के आधार पर कोई रोक नहीं है.

पांच वर्षीय राघव के पिता सूर्यकांत त्रिपाठी ने कहा, “मैं अपनी बीस की उम्र में यहां अभ्यास करता था और अब मैं चाहता हूं कि मेरे बेटे को भी वही संस्कार और ताकत मिले. इसलिए मैंने उसे अखाड़े में भेजना शुरू किया है. अगर मेरी बेटी होती, तो मैं उसे भी यहां भेजता.”

तस्वीर जैसा अखाड़ा

जैसे ही गंगा पर सूरज उगता है और सुबह की आरती शुरू होती है, तुलसीदास अखाड़ा पुरानी यादों और खूबसूरत ट्रैवल व्लॉग्स का बड़ा आकर्षण बन जाता है. घाटों पर आने वाले पर्यटकों के लिए यह वाराणसी की उस तस्वीर जैसा दृश्य है जो धीरे-धीरे गायब हो रही है — मिट्टी में कुश्ती लड़ते नंगे बदन पहलवान और सुबह की रोशनी में भारी गदे घुमाते खिलाड़ी.

अक्सर लोग सीढ़ियों पर रुककर यह दृश्य देखते हैं और कैमरों में कैद करते हैं. कुछ लोग खुद भी पारंपरिक व्यायाम करने की कोशिश करते हैं.

मेरठ से अपने पति और देवरानी के साथ आईं 51 वर्षीय भावना त्यागी के लिए यह दृश्य उस परंपरा की याद दिलाता है जो धीरे-धीरे खत्म हो रही है.

तुलसीदास अखाड़े में अपने दांव-पेच आज़माते पहलवान शौकिया फ़ोटोग्राफ़रों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं | फ़ोटो: नूतन शर्मा | दिप्रिंट

उन्होंने किनारे खड़े होकर कहा, “मुझे अपने बेटे से कहना चाहिए कि वह भी ऐसी पारंपरिक चीजों से जुड़े, लेकिन उसे तो जिम का बहुत शौक है. देखिए, अपनी परंपराओं को निभाने में कितना अच्छा लगता है. यहां अनुशासन है, प्रोटीन पाउडर का कोई दबाव नहीं. मुझे यह बहुत पसंद है.”

अखाड़े के पहलवानों से सीखना और उनके साथ अभ्यास करना अब कई लोगों के लिए खास अनुभव बन गया है. इंस्टाग्राम पर इससे जुड़ी एक पूरी अलग दुनिया बन चुकी है — कहीं पहलवानों के चमकते शरीरों की कलात्मक ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीरें, कहीं मिट्टी से सने पहलवानों के साथ पोज देते लोग, तो कहीं गले में पत्थर के ‘गर नाल’ पहनकर ताकत दिखाते वीडियो. कुछ लोग इसे ज्यादा गंभीर नजरिए से भी दिखाते हैं.

सर्जन और इन्फ्लुएंसर श्री गणेश ने पहलवानों के मेंढक कूद अभ्यास का एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें डलेर मेहंदी का ‘दंगल’ गाना लगाया गया था. उन्होंने लिखा, “वाराणसी के तुलसी घाट स्थित अखाड़े का दौरा किया. यह देश के सबसे पुराने अखाड़ों में से एक है और 1600 के दशक का माना जाता है. कहा जाता है कि रामचरितमानस और हनुमान चालीसा लिखने वाले तुलसीदास अपने घर के पास इसी अखाड़े में कुश्ती करते थे. पहलवानों से मिलना और उनकी चुनौतियों को आजमाना मजेदार अनुभव था.”

पुष्कर के लिए तुलसीदास अखाड़ा उनके शहर के प्रति निजी लगाव और मेहनत का हिस्सा है. जैसे उनके दादा ने गंगा बचाने का अभियान शुरू किया था, वैसे ही वह कुश्ती की इस परंपरा को बचाकर वाराणसी के भविष्य का हिस्सा बनाना चाहते हैं.

पुष्कर ने कहा, “मेरे लिए अखाड़ा आध्यात्मिकता और शारीरिक अनुशासन दोनों का प्रतीक है. मैं तुलसीदास अखाड़े को पारंपरिक फिटनेस का वैश्विक केंद्र बनाना चाहता हूं. और वाराणसी ऐसी जगह है, जहां लोग सिर्फ मंदिर और घाट देखने नहीं बल्कि यहां की विरासत को जीने आएं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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