कई वर्षों से राजनीतिक हलकों में एक तर्क बार-बार सामने आता रहा है. यह तर्क खास तौर पर हिंदू राष्ट्रवादी समूहों में ज्यादा सुनने को मिलता है. हालांकि, जो लोग हिंदू राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं हैं, उन्होंने भी कभी-कभी यही बात कही है, भले ही कम बार और कम जोर के साथ. तर्क यह है कि व्यावहारिक रूप से “गांधी परिवार” के सदस्य सोनिया, राहुल और प्रियंका अनजाने में ही नरेंद्र मोदी की लगातार बढ़ती राजनीतिक सफलता को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं.
यह तर्क खासकर राहुल गांधी के संदर्भ में दिया जाता है. उनके खिलाफ दो प्रमुख आलोचनाएं की जाती हैं. पहली यह कि वह एक राजनीतिक वंश (डायनेस्टी) से आते हैं, जबकि अब इस तरह की राजनीति को जनता का पहले जैसा समर्थन नहीं मिल रहा है. कहा जाता है कि भारतीय राजनीति अब काफी हद तक वंशवाद विरोधी हो गई है और हाल के वर्षों में साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं को आगे बढ़ाया है. नरेंद्र मोदी इसका सबसे प्रमुख उदाहरण बताए जाते हैं.
दूसरी आलोचना यह है कि राहुल गांधी राजनीतिक रूप से कुशल नहीं हैं. तर्क दिया जाता है कि कांग्रेस पार्टी इन कमियों को देख नहीं पा रही है और अगर कुछ सदस्य इन्हें देखते भी हैं, तो भी पार्टी पूरी तरह से राहुल गांधी (साथ ही सोनिया और प्रियंका गांधी) को विशेषाधिकार और नेतृत्व की स्थिति से हटाने में सक्षम नहीं है. ऐसे में चाहें या न चाहें, मोदी सबसे बड़े लाभार्थी बन जाते हैं.
तर्क यह भी कि मोदी बहुत सारे नागरिकों के लिए बेहद लोकप्रिय नेता हैं, लेकिन ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो उनका समर्थन इसलिए करते हैं क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें कोई मजबूत और भरोसेमंद विकल्प दिखाई नहीं देता. कहा जाता है कि ऐसे मतदाताओं को बेहतर कल्पनाशीलता और अधिक कुशल राजनीतिक रणनीति के जरिए अपनी ओर किया जा सकता है.
हाल ही में इस राजनीतिक सोच को एक बड़े बौद्धिक समर्थन का आधार मिला, और यह समर्थन एक ऐसे व्यक्ति से आया जो लंबे समय से मोदी के आलोचक रहे हैं— रामचंद्र गुहा. वह भारत के प्रमुख सार्वजनिक बुद्धिजीवियों में से एक हैं और एक बेहद सम्मानित इतिहासकार भी हैं. द टेलीग्राफ में लिखे अपने एक लेख में गुहा ने गांधी परिवार को “मोदी का मददगार” (Modi’s Enablers) बताया है .
इतिहासकार गुहा का गुस्सा खास तौर पर राहुल गांधी की ओर केंद्रित है, हालांकि वह यह भी स्वीकार करते हैं कि राहुल “एक अच्छे इंसान” हैं.
राहुल गांधी पर गुहा की राय
गुहा की आलोचनाएं क्या हैं? उनके अनुसार राहुल गांधी में “अनुशासन, गंभीरता और मजबूत अनुभव (करिकुलम वीटाए) की कमी है.” गुहा का कहना है कि राहुल गांधी ने अनुशासन केवल भारत जोड़ो यात्रा के कुछ महीनों के दौरान ही दिखाया. उनकी मेहनत करने की क्षमता लगातार नहीं, बल्कि बीच-बीच में दिखाई देती है. इसके विपरीत, उनके बीजेपी प्रतिद्वंद्वी हर समय बिना थके काम करते रहते हैं. गुहा का मानना है कि राहुल गांधी एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर जितनी ऊर्जा खर्च करते हैं, उसे “अपनी पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करने” में लगाना चाहिए.
गुहा की इन आलोचनाओं का आकलन कैसे किया जाए? सामाजिक विज्ञान में अक्सर राय (Opinion) और तर्क (Argument) के बीच अंतर किया जाता है. गुहा कहते हैं कि वह केवल अपनी राय नहीं दे रहे, बल्कि तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं. उनके अनुसार उनका लेख “तथ्यों पर आधारित सबूतों” (Empirical Evidence) से प्रेरित है, न कि गांधी परिवार या सामान्य रूप से राजनीतिक वंशवाद के खिलाफ उनकी निजी सोच से.
तो आइए, गुहा के तर्क की जांच करते हैं. गुहा किस राजनीतिक परिणाम को समझाने की कोशिश कर रहे हैं? और उनके अनुसार कौन-से कारण उस परिणाम की व्याख्या करते हैं? गुहा जिस परिणाम को समझाना चाहते हैं, वह है राहुल गांधी की मोदी को हराने में असफलता. और इसके पीछे जो कारण बताए गए हैं, वे कई तरह के हैं. उनके अनुसार राहुल गांधी राजनीतिक रूप से अयोग्य हैं, पर्याप्त मेहनत नहीं करते और एक “विशेषाधिकार प्राप्त वंशवादी नेता” (Entitled Dynast) हैं.
यहीं इस तरह की व्याख्या की सबसे बड़ी समस्या है. इसमें संस्थाओं की कोई भूमिका नहीं दिखाई देती. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से राजनीतिक विश्लेषण में बड़े राजनीतिक परिणामों—जैसे लगातार चुनावी हार या शासन व्यवस्था में बदलाव—की व्याख्या आमतौर पर नेताओं के व्यवहार और संस्थागत या संरचनात्मक बदलावों, दोनों को मिलाकर की जाती है. दूसरे शब्दों में, बड़े राजनीतिक परिणामों को समझने के लिए कई अलग-अलग कारणों (Variables) को एक साथ देखना पड़ताहै. नेतृत्व उनमें से सिर्फ एक कारण होता है.
गुहा यह ज़रूर कहते हैं कि “मोदी सरकार ने सार्वजनिक संस्थाओं को कमजोर किया है, मीडिया और न्यायपालिका पर दबाव बनाया है, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को नुकसान पहुंचाया है”, लेकिन कांग्रेस की चुनावी हार की उनकी व्याख्या में इन बातों की कोई भूमिका नहीं है. संस्थाओं की चर्चा तो है, लेकिन वे उनके तर्क का हिस्सा नहीं हैं.
गुहा यह भी स्वीकार करते हैं कि भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी की राजनीतिक छवि को मजबूत किया था. साथ ही, 2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 2019 की तुलना में लगभग दोगुनी सीटें हासिल कीं. , लेकिन गुहा के अनुसार ये उपलब्धियां राहुल गांधी की राजनीतिक अक्षमता के कारण “बर्बाद हो गईं”. इसी वजह से मोदी फिर से पहले की तरह सबसे मजबूत स्थिति में लौट आए हैं.
ईसीआई, ईडी और न्यायपालिका
व्यक्तियों (नेताओं) पर इतना अधिक ध्यान देना हैरानी की बात है. आइए दो संस्थाओं के प्रभाव पर ध्यान दें: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और न्यायपालिका. इनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. यह भी काफी कहा गया है कि भारत में चुनाव, जो लोकतंत्र में राजनीतिक शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत हैं, अब धीरे-धीरे पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रह गए हैं.
दुनिया के कई हिस्सों, जिनमें अमेरिका भी शामिल है, में लोकतांत्रिक गिरावट पर बड़ा साहित्य मौजूद है. वे यह बताता है कि सत्ता में बने रहने की कोशिश करने वाले नेता और दल संस्थाओं को बदलने की कोशिश करते हैं. उदाहरण के लिए, वे चुनावी व्यवस्था को इस तरह ढालते हैं कि सत्ता पर उनकी पकड़ कमजोर न पड़े. वे यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि न्यायपालिका, जो ऐसे कदमों को रोक सकती है, एक निष्पक्ष निर्णायक (Neutral Referee) की भूमिका निभाना बंद कर दे.
क्या इन तर्कों का भारत से भी संबंध है? क्या यह संभव है कि 2024 के चुनाव नतीजों के झटके के बाद मोदी सरकार ने चुनावी व्यवस्था को इस तरह बदलने के बारे में सोचा हो कि 2024 जैसी स्थिति दोबारा न बने?
हरियाणा और महाराष्ट्र में मतदाता सूचियों में हेरफेर के गंभीर आरोप लगाए गए थे. इसके बाद एक और अधिक व्यवस्थित पहल सामने आई. SIR योजना और गैरिमैंडरिंग (Gerrymandering) के जरिए मतदान व्यवस्था को इस तरह बदला गया कि जिन लोगों के वोट बीजेपी को मिलने की संभावना नहीं थी, वे या तो पर्याप्त संख्या में वोट न डाल सकें, या फिर उन्हें ऐसी सीटों में केंद्रित कर दिया जाए जहां उनके वोट प्रभावहीन हो जाएं.
लोकतांत्रिक गिरावट के ऐसे संस्थागत कदमों को अदालतों में चुनौती देना आम बात है. यही वजह है कि सत्ता में बने रहने की कोशिश करने वाले लोग अदालतों को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करते हैं, ताकि अदालत वे “निष्पक्ष निर्णायक” न रह जाएं. इस बड़े तर्क का एक भारतीय रूप भी है. कुछ लोगों का कहना है कि अतीत में जब भी राजनीतिक नेतृत्व बहुत मजबूत रहा है, जिसमें कांग्रेस शासन का दौर भी शामिल है, तब भारत की न्यायपालिका पूरी तरह निष्पक्ष नहीं रही. उनके अनुसार न्यायपालिका ने अपना संवैधानिक दायित्व निष्पक्षता से तभी निभाया, जब सरकारें कमजोर थीं.
इस तर्क के समर्थन में अक्सर 1976 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का उदाहरण दिया जाता है, जिसमें आपातकाल को संवैधानिक माना गया था, लेकिन यह तर्क काफी अधूरा है. 1971 के बाद इंदिरा गांधी की चुनावी जीत और पाकिस्तान के साथ युद्ध में विजय ने उन्हें अभूतपूर्व शक्ति दी थी. उस समय द इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने उन्हें भारत की “निर्वाचित रानी” (Elected Queen) कहा था. फिर भी इलाहाबाद के एक न्यायाधीश ने उनका चुनाव रद्द कर दिया था.
इसी तरह, 1950 के दशक की शुरुआत में नेहरू की शक्ति की बराबरी कौन कर सकता था? फिर भी अदालतों ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार मानते हुए भूमि सुधार कानूनों की वैधता को खारिज कर दिया था जबकि भूमि सुधार नेहरू की कृषि नीति का मुख्य आधार था. बाद में संवैधानिक संशोधन के जरिए भूमि सुधारों की वैधता फिर से स्थापित की गई. इससे स्पष्ट होता है कि मजबूत सरकार होने के बावजूद अदालतें स्वतंत्र रूप से काम कर सकती हैं. लेकिन, हाल के वर्षों में भारत में ऐसा नहीं हुआ है.
मोदी सरकार द्वारा संस्थाओं पर नियंत्रण को लेकर और भी बहुत कुछ कहा जा सकता है. प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) जैसी एजेंसियों के जरिए कानून का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं के खिलाफ एक हथियार की तरह किया गया है. दुनिया के हर जगह मुकदमों और जेल की आशंका विपक्ष को मजबूत चुनौती देने से रोक सकती है. इससे सत्ता में मौजूद सरकार को चुनाव जीतने में फायदा मिलता है और विपक्ष के लिए जीत हासिल करना ज्यादा मुश्किल हो जाता है.
संक्षेप में, राहुल गांधी अपने अभियान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अपने नेतृत्व के तरीके में बदलाव कर सकते हैं और गुहा की कुछ आलोचनाओं को स्वीकार भी कर सकते हैं. लेकिन मोदी के लगातार सत्ता में बने रहने की व्याख्या केवल राहुल गांधी की नेतृत्व संबंधी कमियों पर केंद्रित करके करना बहुत ही अपर्यायत है. हाल के वर्षों में भारत की चुनावी राजनीति को आकार देने में बीजेपी द्वारा संस्थाओं पर बनाए गए प्रभाव की बड़ी भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.
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