हाल के राज्य चुनावों के बड़े निहितार्थ क्या हैं? आसान निष्कर्ष निकालने से बचना ज़रूरी है, चाहे वह कितना भी आकर्षक क्यों न लगे. पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की जीत, जो कि बहुत बड़ी है, इसका मतलब यह नहीं है कि 2029 के लोकसभा चुनाव का नतीजा अभी से तय हो गया है.
2027 में सात विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश, गुजरात और पंजाब शामिल हैं. अगर हाल के चुनावों से कुछ सीख मिलती है, तो वह अगले साल के राज्य चुनावों में ज्यादा काम आएगी, न कि 2029 के राष्ट्रीय चुनावों में. राज्य चुनाव और राष्ट्रीय चुनाव अलग होते हैं, और संभावनाएं पक्के नतीजे नहीं होतीं.
तो हमने क्या सीखा? आइए चार अहम बातों को समझते हैं.
लोकतंत्र के लिए मिली-जुली खबर
पहली बात, हाल के विधानसभा चुनाव फिर दिखाते हैं कि भारत “चुनावी तानाशाही” नहीं है. V-Dem रिपोर्ट, जो दुनिया में लोकतंत्र पर सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली रिपोर्ट है, कई सालों से ऐसा कहती रही है. अगर चुनावों में इतने राज्यों की सरकारें बदल रही हैं—हाल के दौर में चार में से तीन—तो यह साफ है कि भारत का चुनावी लोकतंत्र अभी भी काफी मजबूत है. सरकार बदलना “चुनावी तानाशाही” के विचार का सबसे अच्छा जवाब है.
लेकिन अगर पश्चिम बंगाल में हुआ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) आने वाले चुनावों के लिए एक मॉडल बन जाता है, तो भारत का लोकतंत्र कमज़ोर होगा. मुस्लिम वोटर्स, जिनका बीजेपी के लिए वोट प्रतिशत 2014 से करीब 8% के आसपास रहा है, उन्हें ज्यादा हटाकर SIR ने चुनावी मुकाबले को प्रभावित करने की कोशिश की—इसे “वोटर सप्रेशन” कहा जाता है.
अमेरिका में भी कुछ हद तक ऐसा ही होता है, जहां रिपब्लिकन सरकारें “जेरिमैंडरिंग” करती हैं, जिससे ब्लैक वोटर्स का असर कम हो जाता है, क्योंकि वे आमतौर पर रिपब्लिकन को बहुत कम वोट देते हैं. असम में भी अलग तरीके से ऐसा ही हुआ, जहां अल्पसंख्यक बहुल सीटें करीब 30 से घटकर 20 के आसपास रह गईं.
सत्ता में बने रहने के लिए कई आधुनिक सरकारें ऐसे तरीके अपनाती हैं. कभी-कभी ये तरीके फेल भी हो जाते हैं. जैसे हंगरी में विक्टर ऑर्बन की हार, लेकिन ऐसा तब होता है, जब विरोधियों की जीत इतनी बड़ी हो कि ये सारे तरीके बेअसर हो जाएं.
पश्चिम बंगाल में तीन बार मुख्यमंत्री रहने के बाद ममता बनर्जी की लोकप्रियता कम हो गई थी. वोट कम होने की कोशिशों की भरपाई करने के बजाय, उनका वोट शेयर और गिर गया. उनकी हार को दो कारणों से समझा जा सकता है—एक, लोगों में उनके खिलाफ नाराज़गी और दूसरा, SIR से चुनावी मैदान का झुकाव.
यह सिर्फ SIR की वजह से नहीं हुआ, लेकिन इसमें उसका योगदान था और यही उसका मकसद भी था. शेक्सपियर के शब्दों में कहें तो SIR का मकसद था “जीत सुरक्क्षा को और पक्का करना.”
साउथ का मजबूत गढ़
मेरा दूसरा प्वाईंट कांग्रेस के बारे में है. केरल जीतकर अब पार्टी दक्षिण के 5 राज्यों में से 3 राज्यों में सरकार चला रही है: कर्नाटक, तेलंगाना और केरल. आज इसे मुख्य रूप से दक्षिण की पार्टी कहा जा सकता है. उत्तर और पश्चिम में इसकी मौजूदगी है, लेकिन वहां यह बार-बार हार रही है. यह दो उत्तरी राज्यों (हिमाचल प्रदेश और झारखंड) में सरकार में है या उसका हिस्सा है, लेकिन ये छोटे राज्य हैं. इस वक़्त, कांग्रेस उत्तर और पश्चिम में किसी भी बड़े राज्य की सरकार नहीं चला रही.
कांग्रेस की “साउथ में मजबूत पकड़” के कुछ परस्पर विरोधी असर भी हैं. दक्षिण भारत की अर्थव्यवस्था 2000 से, या उससे पहले से, बहुत तेज़ी से बढ़ रही है—लगभग चीन जैसी रफ्तार से. इसका मतलब है कि कांग्रेस के पास फंड की कमी नहीं होगी, लेकिन सिर्फ दक्षिण पर आधारित रहकर वह दिल्ली में बड़ी ताकत नहीं बन सकती, क्योंकि संसद की केवल एक-चौथाई सीटें ही दक्षिण में हैं. राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत बनने के लिए कांग्रेस को उत्तर और पश्चिम में बेहतर रणनीति बनानी होगी.
तीसरा प्वाईंट तमिलनाडु के बारे में है. विजय की जीत काफी अहम है. एक्टर से नेता बने उनका पूरा नाम सी. जोसेफ विजय है—उनके पिता ईसाई हैं और मां हिंदू. भले ही वह खुद धार्मिक रूप से एक्टिव न हों, पर जन्म से वह ईसाई के रूप में रजिस्टर हैं, लेकिन तमिलनाडु के वोटर्स के लिए यह कोई मुद्दा नहीं था. वहां राजनीति धर्म से ज्यादा जाति और भाषा पर आधारित है. यही वजह है कि बीजेपी की अल्पसंख्यक विरोधी राजनीति विजय के खिलाफ कोई बड़ा माहौल नहीं बना सकी. बीजेपी को खुद भी तमिलनाडु में चुनावी फायदा नहीं मिला.
यह दिखाता है कि भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक जिंदगी में विविधता बहुत अहम है. तमिलनाडु के चुनाव नतीजे पश्चिम बंगाल और असम से काफी अलग हैं. बीजेपी हमेशा यह मानती रही है कि भारत की इतनी बड़ी सामाजिक विविधता राष्ट्रीय एकता के लिए समस्या है और इसे एक “एक देश, एक पहचान” जैसे मॉडल में ढाला जा सकता है, जैसा पश्चिमी यूरोप में हुआ. लेकिन भारत के संस्थापकों का नज़रिया इससे अलग था. तमिलनाडु के लोग भी उसी पुराने संवैधानिक नज़रिए से सहमत हैं, न कि इस हिन्दू राष्ट्रवादी विचार से.
हिंदुत्व की जीत
आखिर में, अब पश्चिम बंगाल की बात करते हैं, जिसकी इन चुनावों में सबसे ज्यादा राजनीतिक अहमियत थी. जैसा मैंने अपने पहले कॉलम में लिखा था, हिंदू राष्ट्रवादी हमेशा से बंगाल को जीतना चाहते थे. इसके पीछे कम से कम तीन कारण हैं.
पहला, उनके मुताबिक हिंदू राष्ट्रवाद की सोच की शुरुआत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की एक साहित्यिक रचना से हुई थी. उनका गीत “वंदे मातरम” उनके लिए बहुत खास है. दूसरा, जनसंघ—जो बीजेपी से पहले की पार्टी थी—की जड़ें भी बंगाल में थीं. इसके संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे. इन दोनों बातों का ज़िक्र मोदी ने अपने भाषण में भी किया. “भाजपा की आज जीत से श्यामा प्रसाद जी की आत्मा को शांति मिलेगी.”
तीसरा अहम कारण पश्चिम बंगाल (और असम) के मुसलमानों से जुड़ा है. अगर मुस्लिम आबादी करीब 30% हो, तो फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली में बीजेपी के लिए जीतना आसान नहीं होता, जब तक हिंदू वोट एकजुट और ध्रुवीकृत न हो जाएं और उनमें से बहुत बड़ी संख्या बीजेपी को वोट न दे. जहां मुसलमानों की संख्या ज्यादा है, वहां उन्हें हराना हिंदू राष्ट्रवाद का एक अहम लक्ष्य रहा है. अलग-अलग तरीकों से यह लक्ष्य कश्मीर, असम और अब बंगाल में हासिल किया गया है. सिर्फ केरल बचा है, जहां शायद ऐसा न हो, क्योंकि वहां धार्मिक विविधता को काफी माना दिया जाता है, जैसे की तमिलनाडु में.
यह साफ नहीं है कि बंगाल में हिंदू-मुस्लिम एकता का क्या होगा, लेकिन बीजेपी ने लाखों बंगालियों को यह समझाने में कामयाबी पाई है कि यह मुद्दा उनके लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए.
बंगाल के इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम मुद्दे काफी रहे हैं, खासकर 1940 के दशक के आखिर तक. कोलकाता में 1946-1947 के दौरान हिंदू-मुस्लिम हिंसा बहुत बढ़ गई थी. 15 अगस्त 1947 को महात्मा गांधी दिल्ली में आजादी का जश्न मनाने नहीं थे, बल्कि कोलकाता में अनशन पर थे, ताकि शहर में गृहयुद्ध जैसी स्थिति न बने. वह इसमें सफल हुए, और बाद की सरकारों ने हिंदू-मुस्लिम एकता को बंगाल की पहचान बनाने के लिए काफी मेहनत की. पश्चिम बंगाल की यह एकजुट हिन्दु-मुस्लिम पहचान राजनीती द्वारा बनाई गयी थी और आज इसका उल्टा भी राजनीतिक के माध्यम से ही बनाया जा रहा है, इस राजनीती की जड़ें हिंदू राष्ट्रवाद में हैं.
संक्षेप में, इन चुनावों में दो तरह के विरोधाभास एक साथ दिखते हैं. एक तरफ यह लोकतंत्र की जीत है, लेकिन दूसरी तरफ लोकतांत्रिक मैदान को छोटा करने की कोशिश भी हुई. एक जगह धार्मिक विविधता की जीत हुई, तो दूसरी जगह उस पर हमला भी सफल रहा.
भारत की विविधता अभी भी बनी हुई है, लेकिन पहले के मुकाबले अब काफ़ी कमजोर नज़र आ रही है.
आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. विचार निजी हैं.
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