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Thursday, 28 May, 2026
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क्या विजय की TVK के पास कोई वैचारिक दिशा नहीं है?

गठबंधन और समझौते पर आधारित यही व्यावहारिक मध्यमार्गी राजनीति. और कठोर वैचारिक शुद्धता की जगह व्यापक समर्थन को प्राथमिकता देने की सोच. उन्हें इस मुकाम तक लेकर आई.

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उनके फैन और समर्थक अक्सर उन्हें शेर कहते हैं. लेकिन विजय आखिर किस तरह के राजनीतिक खिलाड़ी हैं. तमिलनाडु में TVK की जीत के बाद यह सवाल और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. प्रिंट और टीवी मीडिया में इस पर बहस हो रही है. सोशल मीडिया पर तो लोग अपने अंतिम फैसले भी सुना रहे हैं.

क्या विजय वैचारिक रूप से असमंजस में हैं. या जैसा उनके विरोधी कहते हैं कि उनके पास कोई स्पष्ट विचारधारा ही नहीं है. क्या उनके पास शासन चलाने की साफ और मजबूत नीति नहीं है. क्या उनका प्रशासन पहले से ही राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव की कमी से प्रभावित है.

TVK को अक्सर DMK और AIADMK के मुकाबले एक गैर-द्रविड़ विकल्प के रूप में दिखाया जाता है. वहीं कुछ लोग कहते हैं कि वह उनसे बहुत अलग नहीं हैं और TVK को तीसरी द्रविड़ ताकत की तरह देखते हैं. इससे एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आखिर द्रविड़वाद या द्रविड़ पार्टी क्या होती है.

राजनीतिक विचारधाराओं और आंदोलनों को सही तरीके से परिभाषित करना आसान नहीं होता. कई बार वे सिर्फ पहचान बताने वाले शब्द लगते हैं. लेकिन फासीवाद. वोकिज्म और लिबरलिज्म जैसे शब्दों में भावनात्मक अर्थ भी जुड़े होते हैं. यानी, उनके मतलब लोगों की भावनाओं और व्यक्तिगत सोच पर भी निर्भर करते हैं. द्रविड़वाद भी इससे अलग नहीं है. कई संदर्भों में यह एक विवादित पहचान है न कि कोई बिल्कुल साफ विश्लेषणात्मक शब्द.

इसलिए यह ज्यादा जरूरी लगता है कि TVK और दोनों बड़ी पार्टियों के बीच अलग अलग मुद्दों और नीतियों पर फर्क देखा जाए. केवल द्रविड़ और गैर द्रविड़ के नज़रिए से नहीं.

थोड़ा सा देखने पर ही कुछ ऐसे मुद्दे दिख जाते हैं जिन पर तीनों पार्टियां एक जैसी सोच रखती हैं. उन्होंने मिलकर विरोध किया है.

  1. तमिलनाडु में मेडिकल एडमिशन के लिए NEET का. क्योंकि उनका मानना है कि इससे शिक्षा तक बराबर पहुंच प्रभावित होती है.
  2. केंद्र की तीन भाषा नीति का. क्योंकि वे इसे हिंदी को बढ़ावा देने का छिपा तरीका मानते हैं.
  3. वन नेशन वन इलेक्शन के विचार का. क्योंकि उनके अनुसार इससे संघीय ढांचे और राज्यों की स्वायत्तता को खतरा है.
  4. आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा है. क्योंकि उनका मानना है कि तमिलनाडु की जातीय संरचना के हिसाब से यह सामाजिक न्याय को सीमित करती है.
  5. सीमांकन प्रक्रिया का. क्योंकि उन्हें डर है कि इससे संसद में तमिलनाडु का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा और परिवार नियोजन में सफलता के कारण राज्य को नुकसान होगा.

इसके साथ मुफ्त योजनाओं के प्रति साझा प्रेम भी जोड़ लीजिए. जिनमें से कई योजनाएं बिल्कुल गैर उत्पादक मानी जाती हैं. इससे इन पार्टियों में काफी समानता दिखती है.

साझा सांस्कृतिक और भाषाई राष्ट्रवाद इन पार्टियों को इन और दूसरे मुद्दों पर एक साथ जोड़ता है. लेकिन बड़े और व्यापक स्तर पर इनके बीच महत्वपूर्ण अंतर भी हैं.

जहां DMK, AIADMK और TVK अलग हैं

DMK खुद को द्रविड़ विचारधारा का असली संरक्षक मानती है क्योंकि उसकी शुरुआत कट्टर तर्कवादी सामाजिक आंदोलन द्रविड़ कड़गम से हुई थी. लेकिन राजनीतिक शक्ति तक पहुंचने की यात्रा में मूल सिद्धांत अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं. उदाहरण के लिए DMK के संस्थापक सी एन अन्नादुरई व्यक्तिगत रूप से अपने गुरु पेरियार की तरह कट्टर नास्तिक हो सकते थे. लेकिन उनका राजनीतिक नारा “ओन्द्रे कुलम ओरुवने देवन” यानी “एक मानवता एक ईश्वर” एकता का संदेश भी था और कठोर तर्कवाद से दूरी भी.

AIADMK ने लगभग पूरी तरह तर्कवाद का दिखावा छोड़ दिया है. उसके कई नेता जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता भी शामिल हैं. उन्होंने अपनी धार्मिक आस्था छिपाने की कोशिश नहीं की. पहले के मुकाबले अब DMK के कुछ मंत्री भी अपनी धार्मिक मान्यताओं को खुलकर बताते हैं. पार्टी भी आधिकारिक रूप से व्यक्तिगत आस्था और धर्म का इस्तेमाल लोगों को बांटने के लिए करने में फर्क मानती है.

फिर भी पार्टी का हिंदू धर्म के साथ रिश्ता जटिल है और कई बार उकसाने वाली और ध्रुवीकरण करने वाली भाषा से भरा होता है. उदाहरण के लिए उदयनिधि स्टालिन द्वारा सनातन धर्म की आलोचना.

लोग मानें या न मानें, स्टालिन जाति व्यवस्था की आलोचना कर रहे थे न कि हिंदू धर्म का अपमान. जैसा उनके विरोधियों ने कहा. लेकिन पूर्व उपमुख्यमंत्री को यह जरूर पता होगा कि उनके बयान से विवाद खड़ा होगा. और संस्कृत शब्द के अलग अर्थ बताकर यह विवाद खत्म नहीं होगा.

एक ईसाई होने के बावजूद विजय ने जानबूझकर और रणनीतिक तरीके से धार्मिक समावेशिता की छवि बनाने की कोशिश की है. उन्होंने मंदिरों और मस्जिदों के सार्वजनिक दौरे किए और खुद को सभी समुदायों का चेहरा दिखाने की कोशिश की.

उनका यह बयान कि “हर धर्म मेरा धर्म है” गांधीजी के “सर्व धर्म समभाव” की याद दिलाता है. इसमें केवल सभी धर्मों की समानता ही नहीं, बल्कि उनकी आध्यात्मिक एकता का विचार भी शामिल है.

विजय का धार्मिक उदार दृष्टिकोण नास्तिकता के साथ भी सहज दिखाई देता है. जीत के बाद जिन पहली जगहों पर वह गए उनमें से एक द्रविड़ कड़गम का मुख्यालय था. वहां उन्होंने वीरमणि से मुलाकात की. वीरमणि खुद को पेरियार की कट्टर नास्तिकता, ब्राह्मण विरोध और सामाजिक न्याय के विचारों का सबसे बड़ा वाहक मानते हैं. नए चुने गए मुख्यमंत्री ने इसके सिर्फ एक दिन बाद एम के स्टालिन से भी मुलाकात की.

विजय की विचारधारा क्या है?

अगर धर्म से आगे देखें तो क्या विजय के पास कोई बड़ी वैचारिक सोच नहीं है, जैसा उनके आलोचक कहते हैं. यह कहना पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि उनकी कुछ स्पष्ट सीमाएं हैं. उनमें से एक सीमा उन्होंने दक्षिणपंथी सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ खींची है. विजय ने संकेत दिया है कि BJP उनकी वैचारिक दुश्मन है. इसके विपरीत DMK को उन्होंने “बुरी ताकत” कहा लेकिन केवल एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बताया.

यह कहा जा सकता है कि विजय वास्तव में एक मिश्रित बहुलवाद की राजनीति का समर्थन करते हैं. यानी सभी को साथ लेकर चलने वाली राजनीति. कुछ लोग इसे वैचारिक असमंजस मानते हैं. खासकर वे लोग जो कठोर और शुद्ध विचारधारा में विश्वास करते हैं. उनके द्वारा दो ब्राह्मणों को मंत्री बनाना इसका एक उदाहरण है. बाद में हुए विरोध को TVK ने पुरानी और पारंपरिक ब्राह्मण विरोधी सोच बताया.

शायद यही व्यावहारिक मध्यमार्गी सोच विजय को कांग्रेस के करीब लेकर गई. कांग्रेस भी एक ऐसी बड़ी पार्टी रही है जिसने हमेशा सख्त विचारधारा की जगह अलग-अलग विचारों, जातियों और हितों को साथ लेकर चलने वाली राजनीति की. यह कोई संयोग नहीं है कि विजय दिवंगत कांग्रेस मुख्यमंत्री के कामराज को अपना वैचारिक मार्गदर्शक मानते हैं. विजय ने अपनी जीत से पहले ही कांग्रेस को “स्वाभाविक सहयोगी” कहा था. और जीत के बाद उन्होंने जल्दी ही उसे अपने साथ जोड़कर कई लोगों को चौंका दिया.

उस समय ऐसा माना जा रहा था कि यह रणनीतिक गलती है. और बेहतर होता कि वह पहले से कमजोर AIADMK में टूट को बढ़ावा देते ताकि संख्या की कमी पूरी हो सके. लेकिन बाद में ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ी. विजय ने VCK और IUML को अपनी सरकार में शामिल कर लिया. साथ ही AMMK के अकेले विधायक से भी पार्टी नेतृत्व के खिलाफ जाकर बाहरी समर्थन हासिल कर लिया.

एक बार फिर गठबंधन और समझौते पर आधारित यही व्यावहारिक मध्यमार्गी राजनीति. और कठोर वैचारिक शुद्धता की जगह व्यापक समर्थन को प्राथमिकता देने की सोच. उन्हें इस मुकाम तक लेकर आई.

कुछ हद तक इससे राजनीतिक अनुभवहीनता के आरोप भी कमजोर पड़ते हैं. चुनाव के बाद की घटनाओं से DMK को बड़ा झटका लगा क्योंकि उसके सहयोगी उसे छोड़कर चले गए. वहीं AIADMK एक तरह की अनिश्चित स्थिति में है. उसके कुछ बागी लेकिन अब पछता रहे विधायकों का भविष्य विधानसभा अध्यक्ष के हाथ में है. उन पर दल बदल के आरोप हैं.

स्थिति और खराब तब हुई जब उसके तीन विधायकों ने इस्तीफा देकर TVK जॉइन कर लिया. इससे पार्टी पर खरीद-फरोख्त के आरोप लगे. हालांकि तमिलनाडु में यह पहली बार नहीं हुआ है. लेकिन यह कोई अच्छा बचाव नहीं माना जा सकता.

प्रशासनिक अनुभवहीनता अलग बात है. अभी यह तय करना जल्दबाजी होगी कि यह आरोप कितना सही है. लेकिन इतने ज्यादा नए और अनुभवहीन मंत्रियों वाली किसी भी सरकार को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. आगे के समय में सबसे अच्छा रास्ता यही होगा कि सरकार वरिष्ठ अधिकारियों की सलाह पर ज्यादा भरोसा करे.

यह साफ नहीं है कि विजय ऐसा होने देंगे या नहीं. लेकिन अगर वह ऐसा करते हैं तो यह उसी सोच के अनुरूप होगा जो प्रक्रियात्मक तरीके और व्यावहारिक रूप से विचारधारा से ऊपर उठकर काम करने को गलत नहीं मानती.

मुकुंद पद्मनाभन क्रिया यूनिवर्सिटी में फिलॉसफी के प्रोफेसर और द हिंदू के पूर्व एडिटर हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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