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Thursday, 28 May, 2026
होमफीचरकुनो के चीतों को प्रोजेक्ट से पहले दो साल में 110 बार बेहोश किया गया—रिपोर्ट में दावा

कुनो के चीतों को प्रोजेक्ट से पहले दो साल में 110 बार बेहोश किया गया—रिपोर्ट में दावा

जिन देशों में चीते लाए गए हैं, वहां के वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट्स ने भी MP के कुनो नेशनल पार्क में बार-बार ट्रैंक्विलाइज़ेशन पर अपनी चिंता जताई है.

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भोपाल: भारत के प्रोजेक्ट चीता को बड़ी सफलता बताया जा रहा है. अब चीते नए इलाकों में घूम रहे हैं और शावकों की संख्या भी बढ़ रही है. इसे भारत में प्रजाति पुनर्जीवन की बड़ी कहानी के रूप में पेश किया जा रहा है. लेकिन अंदर की स्थिति पूरी तरह ठीक नहीं है. मध्य प्रदेश वन विभाग के एक दस्तावेज से संकेत मिलता है कि चीतों पर बिना जरूरत बार बार ट्रैंक्विलाइजर यानी बेहोशी के इंजेक्शन का इस्तेमाल किया गया. वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय में यह चीतों के लिए खतरनाक हो सकता है.

मध्य प्रदेश के उस समय के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक वी एन आंबाडे की 2024 की निरीक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि सितंबर 2024 तक यानी प्रोजेक्ट चीता शुरू होने के केवल दो साल के भीतर कुनो नेशनल पार्क के चीतों को 110 बार ट्रैंक्विलाइज किया गया. दिप्रिंट के पास इस रिपोर्ट की कॉपी है.

रिपोर्ट में कहा गया. “निरीक्षण के दौरान मेरी चर्चा पशु चिकित्सक टीम से हुई जिसमें माधव नेशनल पार्क के डॉक्टर जितेंद्र जाटव और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के एक अन्य डॉक्टर शामिल थे.”

रिपोर्ट में आगे कहा गया. “डॉ जाटव ने बताया कि उन्होंने अब तक चीतों को 110 बार सफलतापूर्वक ट्रैंक्विलाइज किया है.”

बार बार केमिकल बेहोशी देने का जिक्र पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय यानी MoEFCC की ‘इंट्रोडक्शन ऑफ चीता इन इंडिया’ वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 में भी किया गया है. भारत में चीतों को दोबारा बसाने के पहले साल का विश्लेषण करते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि “विभिन्न पशु चिकित्सा और प्रबंधन कार्यों के लिए कुल 34 बार चीतों को केमिकल तरीके से पकड़ा या बेहोश किया गया.”

रिपोर्ट में लिखा गया. “चीतों में पकड़ने की प्रक्रिया के दौरान शारीरिक असर होने का खतरा ज्यादा रहता है. फिर भी सावधानी और समन्वय के कारण कुनो में पकड़ से जुड़ी बीमारी या मौत का कोई मामला नहीं हुआ.”

दिप्रिंट ने MoEFCC और मध्य प्रदेश वन विभाग से संपर्क किया लेकिन कोई आधिकारिक जवाब नहीं मिला.

कुनो नेशनल पार्क के एक अधिकारी ने पहचान गुप्त रखने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा कि चीतों को ट्रैंक्विलाइज करते समय सभी जरूरी नियमों का पालन किया जाता है. अधिकारी ने कहा कि एक विशेष पशु चिकित्सा टीम पूरी प्रक्रिया पर नजर रखती है और जानवर की सेहत की जांच पहले और बाद में की जाती है.

अधिकारी ने कहा. “हम अभी भी प्रोजेक्ट चीता के पहले चरण में हैं. इस दौरान हमें जानवरों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना पड़ा और कई बार इधर उधर शिफ्ट करना पड़ा. इसके लिए थोड़ी मात्रा में केमिकल बेहोशी का सहारा लेना जरूरी होता है.”

लेकिन इन आश्वासनों के बावजूद ट्रैंक्विलाइजेशन के ज्यादा इस्तेमाल से वन्यजीव विशेषज्ञ चिंतित हैं.

मध्य प्रदेश के वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने कहा कि इससे जानवरों की सेहत पर लंबे समय में असर पड़ सकता है.

दुबे ने कहा. “यह चिंताजनक स्थिति है. सोचिए अगर कोई हर समय बेहोशी जैसी हालत में रहे और हर बार होश आने पर उसे फिर केमिकल इंजेक्शन दिया जाए. थोड़ी बहुत समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि इसके लंबे समय के असर अच्छे नहीं होंगे.”

भारत का प्रोजेक्ट चीता सितंबर 2022 में शुरू हुआ था. तब नामीबिया से आठ चीते लाए गए थे जिनमें पांच मादा और तीन नर थे. फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत लाए गए. यह MoEFCC और दक्षिण अफ्रीका सरकार के बीच हुए समझौते के तहत हुआ था.

2026 तक भारत में 57 चीते हैं. इनमें से ज्यादातर मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क और गुजरात के गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी में रखे गए हैं.

हाल की घटनाएं और बढ़ती चिंता

कुनो प्रशासन द्वारा प्रोजेक्ट चीता पर जारी हालिया प्रेस बयान में भी कई बार ट्रैंक्विलाइजेशन का जिक्र हुआ है.

दिप्रिंट ने 2024 से 2026 के बीच के प्रेस बयान और सरकारी रिपोर्ट का अध्ययन किया और पाया कि “ट्रैंक्विलाइजेशन” शब्द कम से कम 12 बार इस्तेमाल हुआ.

सबसे हालिया मामले में 8 मई को राजस्थान के रणथंभौर टाइगर रिजर्व में घूम रहे एक चीते को ट्रैंक्विलाइज करके वापस मध्य प्रदेश भेजा गया. फरवरी में बोत्सवाना से भारत लाए गए चीतों को भी ट्रैंक्विलाइज करके अलग अलग बाड़ों में शिफ्ट किया गया.

पिछले दस साल में प्रकाशित कई रिसर्च स्टडी में बार बार ट्रैंक्विलाइजेशन के नुकसान बताए गए हैं. इन स्टडी में कहा गया है कि चीते स्वभाव से नाजुक जानवर होते हैं और तनाव सहने की उनकी क्षमता कम होती है. ट्रैंक्विलाइजेशन के दौरान उन्हें सांस की दिक्कत. हाई ब्लड प्रेशर. शरीर का तापमान बढ़ना और गंभीर शारीरिक समस्याओं का खतरा रहता है. इस प्रक्रिया को करने वाली पशु चिकित्सा टीम को यह सुनिश्चित करना होता है कि पूरी प्रक्रिया पर सावधानी से नजर रखी जाए और जानवर जल्दी सामान्य हो सके.

भारत के “चीता मैन” कहे जाने वाले एम के रंजीतसिंह. जिन्होंने प्रोजेक्ट चीता का रास्ता तैयार किया और 1972 के वन्यजीव संरक्षण कानून के पीछे प्रमुख भूमिका निभाई. उन्होंने कहा कि वन विभाग को यह बताना चाहिए कि ट्रैंक्विलाइजेशन क्यों किया गया और किस जानवर को कितनी बार बेहोश किया गया.

रंजीतसिंह ने कहा. “आमतौर पर आप चीतों को पकड़ने के लिए ट्रैंक्विलाइज करते हैं. देशों के बीच उन्हें लाते समय तनाव कम रखने के लिए शुरुआत में ऐसा करना जरूरी होता है. लेकिन कई मामलों में चीतों को इसलिए ट्रैंक्विलाइज किया गया क्योंकि वे पार्क की सीमा से बाहर चले गए थे. वन विभाग को चीतों के क्षेत्र को बढ़ाने और उनके लिए पर्याप्त शिकार सुनिश्चित करने पर काम करना चाहिए ताकि उन्हें बार बार वापस लाने की जरूरत न पड़े.”

जिन देशों से चीते भारत लाए गए हैं वहां के वन्यजीव विशेषज्ञ और प्रेमियों ने भी ज्यादा ट्रैंक्विलाइजेशन पर चिंता जताई है.

वन्यजीव प्रेमी फ्रांस्वा होवेल ने पिछले साल अगस्त में फेसबुक ग्रुप ‘द चीता क्लब’ में लिखा. “एक और चीते को ट्रैंक्विलाइज किया गया. शुरुआत से ही यह प्रोजेक्ट सिर्फ दिखावा है. इन्हें सिर्फ पैसों की चिंता है और बाड़ों में बंद चीतों की भलाई की कोई परवाह नहीं है. यह शर्मनाक है.”

‘सेव द चीता’ जैसे सोशल मीडिया ग्रुप भी भारत में दोबारा बसाए गए चीतों को जरूरत से ज्यादा ट्रैंक्विलाइज किए जाने का मुद्दा उठाते रहे हैं. Change.org पर भी कई याचिकाएं आई हैं जिनमें भारत को चीते भेजना बंद करने की मांग की गई है.

रंजीतसिंह ने कहा. “चीतों को दोबारा बसाना समस्या नहीं है. भारत में उनके खत्म होने के बाद हममें से कई लोगों ने उन्हें वापस लाने के लिए काम किया. लेकिन हमें यह काम सही तरीके से करना होगा.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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