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Sunday, 8 November, 2026
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नोटबंदी के 10 साल: लोगों ने अपनी कमाई गंवाई, सरकार ने क्या कुछ हासिल किया?

8 नवंबर 2016 को लोगों से कहा गया था कि देश के लिए थोड़ी तकलीफ सह लें. लोगों ने सही. आज वही लोग उस फैसले का हिसाब मांग रहे हैं तो इसमें गलत क्या है?

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दिवाली बीते कुछ ही दिन हुए थे. रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी टीवी पर आए और घोषणा कर दी कि आधी रात से 500 और 1000 रुपये के नोट नहीं चलेंगे. देश में चल रहे नोटों के कुल मूल्य का करीब 87 प्रतिशत हिस्सा एक झटके में बेकार हो गया. इस बात को आज पूरे दस साल हो गए हैं.

पैसे लोगों के अपने थे. किसी ने मेहनत से कमाए थे, किसी ने अपनी जरूरत के लिए बचाकर रखे थे. लेकिन अब उन्हें इस्तेमाल करने के लिए भी सरकार की तय की हुई शर्तों से गुजरना था. देश में अफरातफरी मच गई. बैंकों के बाहर कतारें लगने लगीं. लोगों को अपने ही पैसे निकालने के लिए घंटों खड़ा होना पड़ा. किसी के घर शादी थी, किसी को इलाज कराना था, किसी को मजदूरों की मजदूरी देनी थी. ऐसी जरूरतें कुछ दिनों के लिए टाली भी नहीं जा सकतीं.

लेकिन देश से कहा गया कि थोड़ी तकलीफ सह लीजिए. काला धन खत्म हो जाएगा, भ्रष्टाचार रुकेगा, नकली नोट बंद होंगे और आतंकवाद की कमर टूट जाएगी. लोगों ने भरोसा किया. आखिर देश की भलाई की बात कही जा रही थी.

अब दस साल हो गए. क्या हमें नहीं जानना चाहिए कि आखिर हासिल क्या हुआ?

2018 में रिजर्व बैंक ने बताया कि बंद किए गए करीब 15.42 लाख करोड़ रुपये के नोटों में से 15.31 लाख करोड़ रुपये वापस आ गए यानी 99.3 प्रतिशत. लगभग सारे नोट बैंकिंग व्यवस्था में लौट आए. तो फिर सवाल उठता है कि काला धन कहां गया? यह सही है कि बैंकों में लौटे सारे पैसे को ईमानदार कमाई नहीं मान सकते. उसकी जांच हो सकती है. लेकिन जिस उद्देश्य के लिए इतना बड़ा फैसला लिया गया, उसमें कितनी सफलता मिली, यह बताने की जिम्मेदारी किसकी है?

डिजिटल भुगतान के लिए नोटबंदी क्यों?

मुझे लगता है कि नोटबंदी की सबसे बड़ी कीमत उन लोगों ने चुकाई जिनके पास बहुत ज्यादा पैसा था ही नहीं.

हमारे गांवों में कितने लोग ऐसे हैं जिनकी पूरी कमाई रोज के नकद लेनदेन पर चलती है. मजदूर को मजदूरी चाहिए, किसान को खाद-बीज खरीदना है, दुकानदार को सामान मंगाना है. पैसे का लेनदेन रुकता है तो केवल व्यापार नहीं रुकता, घर की जिंदगी भी प्रभावित होती है.

जिस परिवार की रोज की कमाई से शाम का खाना बनता है, उसे अर्थव्यवस्था के भविष्य के लाभ समझाकर कितने दिन भूखा रखा जा सकता है?

और यह केवल गरीबों की परेशानी का भावनात्मक सवाल नहीं है.

मोदी सरकार के अपने आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 ने माना था कि नोटबंदी से असंगठित और नकदी पर निर्भर क्षेत्रों में लोगों की आय और रोजगार प्रभावित हुए. यह भी कहा कि ऐसे नुकसान का पूरा असर GDP के सरकारी आंकड़ों में शायद दिखाई न दे.

मतलब नुकसान हुआ, लेकिन उसका पूरा हिसाब भी हमारे पास नहीं था.

24 नवंबर 2016 को डॉ. मनमोहन सिंह ने संसद में चेतावनी दी थी कि नोटबंदी से GDP की वृद्धि दर में करीब दो प्रतिशत अंक की कमी आ सकती है. बाद में अर्थशास्त्रियों के एक अध्ययन में भी सामने आया कि 2016 की आखिरी तिमाही में नकदी की कमी से रोजगार और आर्थिक गतिविधि के कुछ मापकों की वृद्धि पर कम से कम दो प्रतिशत अंक का असर पड़ा था. हालांकि अगले कुछ महीनों में इसका प्रभाव कम हुआ. पूरे साल की GDP दो प्रतिशत गिर गई थी, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा. लेकिन जिस आर्थिक नुकसान की चेतावनी दी गई थी, वह केवल कल्पना नहीं थी.

अब एक दूसरी बात भी समझिए.

सरकार नोटबंदी के पक्ष में डिजिटल भुगतान बढ़ने और टैक्स व्यवस्था में ज्यादा लोगों के आने की बात करती है. डिजिटल भुगतान बढ़ना अच्छी बात है. टैक्स देने वाले बढ़ें, इससे किसे आपत्ति होगी? मगर UPI तो अप्रैल 2016 में ही शुरू हो गया था. उसके बाद मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा, भुगतान के नए तरीके आए. तो क्या इन सबके लिए नोटबंदी जरूरी थी?

10 साल बाद भी नोटबंदी का हिसाब नहीं

आज भी देश में नकदी खूब चल रही है. रिजर्व बैंक के अनुसार मार्च 2026 तक प्रचलित बैंक नोटों का मूल्य 41 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया. दस साल में हमारी अर्थव्यवस्था और कीमतें भी बढ़ी हैं, इसलिए इन रकमों की सीधी तुलना नहीं हो सकती. मगर इतना तो साफ है कि नकदी खत्म नहीं हुई.

नोटबंदी के बाद सरकार दो हजार रुपये का नया नोट भी लेकर आई थी. फिर 2023 में उसे भी चलन से वापस लेने की प्रक्रिया शुरू हो गई. आखिर हम कर क्या रहे थे? इतने बड़े फैसले किस तैयारी के साथ लिए गए थे? क्या इसके अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था?

मैं यह नहीं कहता कि सरकार को काले धन के खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए. बिल्कुल करनी चाहिए. टैक्स चोरी करने वालों को पकड़ना चाहिए. भ्रष्टाचार रोकना चाहिए. लेकिन क्या इसके लिए ईमानदारी से अपनी छोटी-सी कमाई बचाकर रखने वाले व्यक्ति को भी परेशानी में डालना जरूरी था? कानून और नीतियां लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए होती हैं. अगर किसी नीति से लोगों को नुकसान हुआ है तो सरकार को उसका हिसाब भी देना चाहिए.

दस साल बहुत लंबा समय होता है. अब एक स्वतंत्र और सार्वजनिक अध्ययन होना चाहिए कि नोटबंदी से कितना काला धन पकड़ा गया, कितना अतिरिक्त टैक्स मिला, कितने कारोबार प्रभावित हुए और रोजगार का कितना नुकसान हुआ. कितना खर्च हुआ इस पूरी प्रक्रिया पर? क्या लाभ उस खर्च और नुकसान से ज्यादा था?

इससे अगली सरकारों को भी सीख मिलेगी. कोई भी फैसला सिर्फ इसलिए अच्छा नहीं हो जाता कि उसे ऐतिहासिक बता दिया गया है. 8 नवंबर 2016 को लोगों से कहा गया था कि देश के लिए थोड़ी तकलीफ सह लें. लोगों ने सही. आज वही लोग उस फैसले का हिसाब मांग रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? दस साल बाद भी उस रात की कतारें हमारी यादों में हैं. लेकिन उन कतारों में खड़े लोगों की जिंदगी पर क्या बीती, उसका पूरा हिसाब अब तक सामने नहीं आया.

नोट तो लगभग सारे वापस आ गए. लोगों की जो मजदूरी गई, कारोबार में जो नुकसान हुआ, जिंदगी के जो दिन कतारों में निकल गए, उन्हें कौन लौटाएगा?

शुजा गांधी कांग्रेस के राष्ट्रीय संयोजक हैं. वे ‘मिट्टी याद रखती है’ और ‘Vanguard Indira’ किताबों के लेखक हैं. विचार निजी हैं.


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