नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 वाणिज्यिक बौद्धिक संपदा (IP) मामलों में दायर याचिकाएं वापस कर दी हैं. कोर्ट ने कहा कि इन मामलों में याचिकाकर्ता यह साबित करने में नाकाम रहे कि दिल्ली में इन मामलों की सुनवाई के लिए पर्याप्त क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र (टेरिटोरियल जूरिस्डिक्शन) है. इन मामलों में मैरिको, जायडस वेलनेस प्रोडक्ट्स, जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया और बायर्सडॉर्फ समेत कई कंपनियां शामिल थीं.
जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव की अध्यक्षता वाली पीठ ने 3 नवंबर को कहा कि सिर्फ इस वजह से किसी मामले में दिल्ली की अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं बन जाता कि कथित तौर पर उल्लंघन करने वाले सामान ऑनलाइन उपलब्ध हैं, कोई जांचकर्ता सामान का ऑर्डर देकर उसे दिल्ली में मंगवा लेता है या मामले का कोई छोटा-सा हिस्सा दिल्ली से जुड़ा हुआ है.
कोर्ट ने कहा कि बनावटी लेन-देन या दिल्ली से मामूली संबंध दिखाकर अदालत का अधिकार क्षेत्र ‘बनाया’ नहीं जा सकता. उसने जोर देकर कहा कि अदालतों को अपनी क्षेत्रीय सीमाओं का सम्मान करना चाहिए और फोरम शॉपिंग से बचना चाहिए. फोरम शॉपिंग का मतलब है अपने मामले के लिए ज्यादा अनुकूल मानी जाने वाली अदालत को रणनीतिक रूप से चुनना.
याचिकाकर्ता अब भी अपनी याचिकाएं उन अदालतों में दाखिल कर सकते हैं, जिनके पास इन मामलों की सुनवाई का उचित क्षेत्रीय अधिकार है.
पीठ ने माना कि अब ‘लक्ष्मण रेखा खींचना और अपनी सीमाओं से बाहर जाने से खुद को रोकना’ मुश्किल हो सकता है, लेकिन उसने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्रीय सीमाओं का सम्मान करना जरूरी है.
इस फैसले को लेकर कानूनी बिरादरी में अलग-अलग राय है. कुछ लोग इसे अधिकार क्षेत्र को बनावटी तरीके से हासिल करने और फोरम शॉपिंग पर रोक लगाने के लिए जरूरी कदम मानते हैं. वहीं, कुछ लोगों का सवाल है कि क्या कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) और बौद्धिक संपदा से जुड़े कानूनों के तहत याचिकाकर्ताओं को मिलने वाले अधिकार क्षेत्र को सीमित कर दिया है.
वरिष्ठ अधिवक्ता वैभव केनी ने दिप्रिंट से कहा कि इस फैसले की उम्मीद पहले से थी. उन्होंने कहा, “सच कहूं तो हमें इसका अंदाजा था. एक दशक से भी ज्यादा समय से दिल्ली IP मामलों की सुनवाई के लिए एक ऐसी अदालत रही है, जहां हर कोई जाना चाहता था. इसकी एक वजह यह थी कि यहां का IP डिवीजन अच्छी तरह काम करता है. लेकिन इसकी एक वजह यह भी थी कि किसी सामान को खरीदकर जांच करना या किसी ऐसी वेबसाइट का होना, जो दिल्ली में खुलती हो, आमतौर पर अदालत में मामला दाखिल करने के लिए काफी होता था. जस्टिस कौरव ने अब साफ कर दिया है कि इतना काफी नहीं है.”
ब्रांड मालिकों पर इस फैसले के व्यावहारिक असर के बारे में केनी ने कहा, “अब आप अधिकार क्षेत्र को महज एक औपचारिकता मानकर बाद में उस पर बहस नहीं कर सकते.”
उन्होंने कहा कि ऐसे मामले में किसी अदालत से एकतरफा अंतरिम रोक (एक्स पार्टी इंजंक्शन) मांगना जोखिम भरा हो सकता है, जिसका विवाद से कोई ठोस संबंध न हो. एक्स पार्टी इंजंक्शन ऐसा अंतरिम अदालती आदेश होता है, जो दूसरे पक्ष को पहले सुने बिना दिया जाता है. प्रतिवादी अदालत के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दे सकता है. ऐसा होने पर याचिका वापस की जा सकती है. इससे याचिकाकर्ता का कीमती समय बर्बाद हो सकता है और उसके पक्ष में पहले से लागू रोक भी खतरे में पड़ सकती है.
मामले: दिल्ली के अधिकार क्षेत्र पर सवाल क्यों उठा
इन 17 मामलों में ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और पासिंग ऑफ से जुड़े दावे शामिल थे. पासिंग ऑफ का मतलब है किसी कारोबार पर अपने सामान या सेवाओं को दूसरे के सामान या सेवाओं के रूप में पेश करने का आरोप लगना. दिल्ली हाई कोर्ट को यह तय करना था कि इन विवादों का राजधानी से पर्याप्त क्षेत्रीय संबंध है या नहीं.
जस्टिस कौरव ने कहा कि आधे से ज्यादा मामलों में दोनों पक्षों में से कोई भी दिल्ली में स्थित नहीं था. जिन जगहों पर ये पक्ष स्थित थे, वहां की अदालतें इन विवादों की सुनवाई करने में सक्षम थीं.
इसके बावजूद याचिकाकर्ताओं ने कई आधारों पर दिल्ली के अधिकार क्षेत्र का दावा किया. इनमें ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर कथित रूप से उल्लंघन करने वाले उत्पादों की उपलब्धता, दिल्ली में वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट का खुलना, दिल्ली के पतों पर उत्पादों की डिलीवरी, शाखा या अधीनस्थ कार्यालयों की मौजूदगी और जांचकर्ताओं के जरिए की गई खरीदारी शामिल थी.
कुछ याचिकाकर्ताओं ने यह भी दलील दी कि कथित उल्लंघन का उनके कारोबार या दिल्ली में उनकी साख पर ‘गतिशील प्रभाव’ (डायनामिक इफेक्ट) पड़ा है.
यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि CPC की धारा 20 यह तय करती है कि दीवानी मुकदमा कहां दायर किया जा सकता है. इसके तहत मुकदमा उस जगह दायर किया जा सकता है, जहां प्रतिवादी रहता है या कारोबार करता है, अथवा जहां मामले से जुड़ी वजह (कॉज ऑफ एक्शन) पैदा हुई है.
ट्रेड मार्क्स एक्ट और कॉपीराइट एक्ट की धारा 134(2) और धारा 62(2) के तहत अधिकार रखने वालों को मुकदमा दायर करने के लिए कुछ अतिरिक्त विकल्प भी दिए गए हैं. इन प्रावधानों के तहत उल्लंघन से जुड़े कुछ मुकदमे उस जगह दायर किए जा सकते हैं, जहां याचिकाकर्ता रहता है, कारोबार करता है या व्यक्तिगत रूप से काम करके कमाई करता है.
कोर्ट की दलील
कोर्ट की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि बौद्धिक संपदा से जुड़े विवादों में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा, अगर सिर्फ इसलिए किसी अदालत को सुनवाई का अधिकार मिल जाए क्योंकि कारोबार ऑनलाइन हो गया है.
वेबसाइट पूरे देश में खुल सकती हैं और ऑनलाइन ऑर्डर किए गए उत्पाद देश के ज्यादातर हिस्सों में पहुंचाए जा सकते हैं. अगर किसी वेबसाइट का खुलना, सामान की डिलीवरी की संभावना या याचिकाकर्ता की ओर से जानबूझकर किया गया लेन-देन अधिकार क्षेत्र तय करने के लिए काफी माना जाए, तो कोई भी पक्ष देश की लगभग किसी भी अदालत को चुन सकता है.
कोर्ट ने कहा कि इससे क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र और अदालत की ‘स्थानीय सीमाओं’ का मजाक बनकर रह जाएगा.
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को अपने ही कदमों से अधिकार क्षेत्र बनाने की ‘बेलगाम, बिना किसी दिशा-निर्देश और बिना किसी सीमा वाली’ छूट नहीं दी जा सकती.
केनी ने कहा कि इस फैसले के बाद कुछ मामलों को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा, “लेकिन सही मामलों को नहीं”. उन्होंने कहा कि कोर्ट ने ‘ट्रैप परचेज’ की उस प्रथा को खारिज कर दिया है, जिसमें अधिकार क्षेत्र का दावा करने के लिए जानबूझकर ऑनलाइन सामान का ऑर्डर दिया जाता है और उसे किसी खास इलाके के पते पर मंगवाया जाता है. इसके बाद दलील दी जाती है कि मामले का एक हिस्सा उसी इलाके में पैदा हुआ है.
उन्होंने कहा कि असली लेन-देन अब भी प्रासंगिक होंगे. अगर कोई जांचकर्ता ऐसे डीलर, वितरक या स्टॉकिस्ट से सामान खरीदता है, जो पहले से ही उस क्षेत्र में कारोबार कर रहा है, तो यह खरीदारी वैध सबूत हो सकती है. इसी तरह, अगर कोई वेबसाइट किसी खास इलाके के ग्राहकों को निशाना बनाती है और वहां पूरे हुए व्यावसायिक लेन-देन को साबित किया जा सकता है, तो ‘बनयान ट्री’ सिद्धांत लागू होता रहेगा. यह सिद्धांत ट्रेडमार्क उल्लंघन और पासिंग ऑफ के मामलों में क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र तय करता है.
कोर्ट ने बौद्धिक संपदा से जुड़े कानूनों को विकसित करने में दिल्ली हाई कोर्ट की अहम भूमिका को भी स्वीकार किया. इसके लिए उसने अदालत के विशेष बौद्धिक संपदा विभाग (IP डिवीजन), उसकी प्रक्रिया और अनुभवी IP वकीलों का जिक्र किया.
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि दूसरे हाई कोर्ट भी IP मामलों की सुनवाई के लिए विशेष व्यवस्था विकसित करने में उतने ही सक्षम हैं. उसने चेतावनी दी कि दिल्ली हाई कोर्ट उन विवादों की सुनवाई के लिए डिफॉल्ट अदालत नहीं बनना चाहिए, जिनका राजधानी से बेहद मामूली संबंध है.
एक अहम उदाहरण देते हुए कोर्ट ने कहा कि भारत में IP से जुड़े कानूनों का विकास ‘बनयान के पेड़ के नीचे हुआ है, जो दिल्ली हाई कोर्ट है’. लेकिन उसने यह भी कहा कि बरगद का पेड़ ‘छाया और आराम’ तो देता है, लेकिन उसके नीचे दूसरे पेड़ों का विकास भी रुक सकता है.
कोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह मुद्दा ‘अधिकार क्षेत्र खोने का नहीं, बल्कि संस्थागत अनुशासन का है’. जिन विवादों का मुख्य संबंध किसी दूसरे राज्य से है, उन्हें लगभग जबरदस्ती दिल्ली लाने से उस राज्य की अधिक उपयुक्त अदालत को उनकी सुनवाई करने का मौका नहीं मिलेगा.
सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘कारोबार करना’ का मतलब सिर्फ किसी जगह पर सामान बेचना या उसकी उपलब्धता होना नहीं है. किसी कंपनी के उत्पाद किसी बाजार में ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं, सिर्फ इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि कंपनी वहां कारोबार कर रही है.
कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र से जुड़े कानूनी सिद्धांतों की सीमाएं तय कीं
कोर्ट ने ‘डायनामिक इफेक्ट’ के सिद्धांत को खारिज कर दिया. इस सिद्धांत के तहत याचिकाकर्ताओं ने दलील दी थी कि दिल्ली के बाहर हुआ उल्लंघन भी राजधानी में अधिकार क्षेत्र का आधार बन सकता है, क्योंकि उसका असर उनके कारोबार या साख पर दिल्ली में पड़ता है.
कोर्ट ने कहा कि इस सिद्धांत की इतनी व्यापक व्याख्या करने से याचिकाकर्ता की व्यावसायिक मौजूदगी के आधार पर अधिकार क्षेत्र तय होने लगेगा. इससे ट्रेडमार्क और कॉपीराइट कानूनों के तहत तय अधिकार क्षेत्र की व्यवस्था कमजोर होगी.
जस्टिस कौरव ने ‘फोरम नॉन कन्वीनियंस’ के सिद्धांत पर भी काफी जोर दिया. इस सिद्धांत के तहत कोई अदालत किसी मामले की सुनवाई करने से इनकार कर सकती है, अगर किसी दूसरी सक्षम अदालत में उस विवाद की सुनवाई करना ज्यादा उचित हो.
कोर्ट ने कहा कि मामले का कोई छोटा या संयोगवश पैदा हुआ हिस्सा दिल्ली से जुड़ा होने का मतलब यह नहीं है कि वही इस मामले की सुनवाई के लिए सही अदालत है. अदालतों को यह देखना होगा कि विवाद का ‘कामकाज, सामग्री और जरूरी व बुनियादी हिस्सा’ कहां पैदा हुआ है. अगर किसी दूसरी सक्षम अदालत का विवाद से कहीं ज्यादा मजबूत संबंध है, तो अदालत मुकदमा सुनने से इनकार कर सकती है.
फैसले के इस हिस्से की कानूनी व्याख्या को लेकर अलग राय सामने आई है.
अधिवक्ता नैन्सी रॉय ने सवाल उठाया कि क्या इस तरह फोरम नॉन कन्वीनियंस का इस्तेमाल करने से अदालतों को ऐसे न्यायिक विवेक का अधिकार मिल जाता है, जिसका जिक्र CPC की धारा 20(c) में नहीं है. रॉय ने दिप्रिंट से कहा, “धारा 20(c) के तहत मुकदमा वहां दायर किया जा सकता है, जहां मामले से जुड़ी वजह पूरी तरह या आंशिक रूप से पैदा हुई हो. इसमें कहीं नहीं कहा गया है कि उसका कोई बड़ा या जरूरी हिस्सा होना चाहिए.”
उन्होंने कहा कि इस फैसले से विवाद के ‘महत्वपूर्ण, अभिन्न और जरूरी हिस्से’ की एक नई कसौटी तय हो गई है. इससे अदालत को मुकदमा कहीं और भेजने का अधिकार मिल जाता है, भले ही वह पहले यह मान चुकी हो कि मुकदमा सुनवाई योग्य है.
रॉय ने कहा, “CPC में इस तरह के विवेकाधिकार का कोई जिक्र नहीं है.” उन्होंने 2009 के हॉर्लिक्स मामले के एक फैसले का भी हवाला दिया. उनके मुताबिक, उस फैसले में कहा गया था कि CPC के तहत आने वाले दीवानी मुकदमों पर फोरम नॉन कन्वीनियंस का सिद्धांत लागू नहीं होता.
रॉय ने ट्रेड मार्क्स एक्ट की धारा 134(2) और कॉपीराइट एक्ट की धारा 62(2) के तहत अधिकार रखने वालों को मिलने वाले अतिरिक्त विकल्पों पर इस फैसले के असर को लेकर भी सवाल उठाए.
उनका मानना है कि इन प्रावधानों के तहत मुकदमा सुनवाई योग्य होने के बावजूद फोरम नॉन कन्वीनियंस का सिद्धांत लागू करने का मतलब है कि “कानून के तहत मिला अधिकार क्षेत्र अब अदालत के विवेक से छीना जा सकता है”.
उन्होंने कहा, “इस आधार पर यह फैसला कानून के तहत मिले अधिकार क्षेत्र को सीमित करता है.”
कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र के बेबुनियाद दावों को खारिज किया
कोर्ट ने ‘डिमरर’ के सिद्धांत को लेकर भी कहा कि इसका इस्तेमाल जजों को अधिकार क्षेत्र से जुड़े हर दावे को बिना जांचे स्वीकार करने के लिए मजबूर करने में नहीं किया जा सकता. डिमरर का सिद्धांत कहता है कि अदालत आमतौर पर किसी याचिका की कानूनी वैधता की जांच करते समय उसमें बताए गए तथ्यों को सही मानकर चलती है.
कोर्ट ने साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि अदालतों को बिना किसी सबूत के किए गए दावों को स्वीकार करना होगा. खासकर तब, जब चतुराई से याचिका लिखकर क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र होने का भ्रम पैदा करने की कोशिश की गई हो.
इस तरह कोर्ट ने बनावटी तरीके से अधिकार क्षेत्र हासिल करने की कोशिशों के खिलाफ सख्त रुख अपनाया. उसने कहा कि ऑनलाइन बुकिंग, दिल्ली से आने वाला सोशल मीडिया ट्रैफिक, दिल्ली में मौजूद बिचौलियों, GST रजिस्ट्रेशन और राजधानी में कथित उल्लंघन करने वाले सामान की बिक्री के महज दावों से अपने आप अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं बन जाता.
कोर्ट ने कहा, “अधिकार क्षेत्र से जुड़े नियमों की व्याख्या कभी भी इस तरह नहीं की जा सकती कि किसी याचिकाकर्ता को ऐसी गड़बड़ी करने की छूट मिल जाए.”
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