पिछले महीने, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा एसआईआर के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में थीं. जंतर-मंतर पर हुए नाटकीय घटनाक्रमों के अलावा, बोरा तब विवादों में आ गईं, जब एक इंटरव्यू का वीडियो वायरल हुआ और उसने एक बड़े मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया. इस इंटरव्यू में उन्होंने सवाल उठाया कि क्या स्थापित जाति-विरोधी पार्टियों ने वास्तव में वंचित समुदायों की मदद की है.
उनके समर्थकों और उनकी विशेषाधिकार वाली सोच पर सवाल उठाने वाले दलित कार्यकर्ताओं के बीच टकराव ने एक पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है: आखिर दलित अधिकारों की लड़ाई का नेतृत्व करने का हक किसे है? इससे एक और गहरा सवाल भी उठता है, जो करीब सौ साल से वामपंथ को परेशान करता रहा है: वामपंथ और उसकी राजनीति के लिए दलितों की अपनी शर्तों पर राजनीतिक दावेदारी को स्वीकार करना इतना मुश्किल क्यों है?
आंबेडकर बनाम कम्युनिस्ट
आंबेडकर ने उस बात को समझ लिया था, जिसे स्वीकार करने में भारतीय वामपंथ के एक बड़े हिस्से को काफी समय लगा. जाति शोषण का केवल एक और रूप नहीं थी, जो अर्थव्यवस्था बदलने के साथ खत्म हो जाती. जाति और उससे जुड़ी व्यवस्थाएं कई चीजें तय करती थीं: किसे सम्मान मिलेगा, कौन किसे छू सकता है, कौन किस संस्थान में जा सकता है और किसके पास सत्ता होगी और उसका इस्तेमाल करने का अधिकार होगा.
उन्होंने बॉम्बे में अपने कड़े राजनीतिक अनुभवों से ये सबक सीखे. 1928 की बड़ी कपड़ा मिल हड़ताल के दौरान दलित मजदूरों को बेहतर वेतन वाले बुनाई विभाग में काम करने से रोक दिया गया, क्योंकि वे अछूत जाति से आते थे. आंबेडकर ने कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाली गिरणी कामगार यूनियन से इस मुद्दे को उठाने के लिए कहा. यूनियन ने साफ तौर पर इनकार कर दिया. बाद में वह तब मानी, जब आंबेडकर ने धमकी दी कि दलित मजदूर हड़ताल में शामिल नहीं होंगे.
दस साल बाद, मनमाड में दलित रेलवे कर्मचारियों के एक सम्मेलन में आंबेडकर ने अपनी बात साफ-साफ रखी. उन्होंने कहा कि भारत के मजदूरों के दो दुश्मन हैं: ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद. इनमें से एक को हराकर दूसरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कम्युनिस्टों के साथ उनका मतभेद कोई मामूली मुद्दा नहीं था. असली सवाल यह था कि शोषितों की आवाज कौन बनेगा और किन शर्तों पर बनेगा.
शर्तों के साथ एकजुटता
इसका मतलब यह नहीं है कि दोनों कभी साथ काम नहीं कर सकते थे.
7 नवंबर 1938 को आंबेडकर की इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी और कम्युनिस्टों ने मिलकर बॉम्बे में इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स बिल के खिलाफ एक दिन की हड़ताल का नेतृत्व किया. इसके बाद, 1956 से 1960 के संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में उनकी शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन (SCF) कम्युनिस्टों और समाजवादियों के साथ एक साझा मोर्चे में शामिल हुई. दलित लेखक और आजीवन कम्युनिस्ट रहे लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे ने इस आंदोलन को अपने गीत दिए और इसमें अहम भूमिका निभाई.
यह समझना जरूरी है कि ये गठबंधन इसलिए कामयाब हुए, क्योंकि दलित राजनीति अपनी अलग पहचान के साथ सामने आई थी. उसकी अपनी पार्टी और अपना नेता था. और जैसे ही लक्ष्य हासिल हुआ, ये गठबंधन टूट गए. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि दोनों के बीच सत्ता में हिस्सेदारी का मुश्किल सवाल कभी सुलझाया ही नहीं गया था.
यही वजह है कि स्वतंत्र दलित राजनीति बार-बार उभरती रही है. आजादी के बाद का भारत इसका गवाह है.
सबसे पहले 1957 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया बनी. इसकी कल्पना मूल रूप से आंबेडकर ने की थी, लेकिन वह इसे बनते हुए नहीं देख पाए. इसके बाद, आजादी के बाद की मुख्यधारा की राजनीति और राजनीतिक प्रक्रियाओं से निराशा के कारण 1972 में दलित पैंथर्स का गठन हुआ. बाद में मान्यवर कांशीराम ने BAMCEF, DS-4 और फिर 1984 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) बनाई.
इन सभी आंदोलनों की शुरुआत एक ही सीख से हुई: मुक्ति के लिए दूसरी पार्टियों की सद्भावना या उनकी पारंपरिक सोच पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. अपनी विशाल किताब ‘द चमचा एज’ में कांशीराम ने चेतावनी दी थी कि पार्टियां ऐसे दलित चेहरों को तरजीह देती हैं, जिनकी पहचान अपनी जनता के बजाय पार्टी की वजह से होती है. इन आंदोलनों की अपनी नाकामियां भी रहीं, लेकिन प्रतिनिधित्व पर उनके जोर ने भारतीय लोकतंत्र को बदल दिया.
कड़वी सच्चाइयां
वामपंथ के कुछ हिस्से अब भी दलितों की इस राजनीतिक दावेदारी और अपनी शर्तों पर स्वतंत्र राजनीति की उनकी मांग को स्वीकार नहीं कर पाए हैं. इसका एक उदाहरण 1964 में बनी CPI(M) है. पार्टी की सबसे बड़ी संस्था पोलित ब्यूरो में पहला दलित सदस्य 2022 में ही चुना गया.
यह पुरानी सोच शिक्षण संस्थानों में सबसे ज्यादा दिखाई देती है, जहां युवा पहली बार एकजुटता का मतलब समझते हैं. 2014 में लंबे समय से वामपंथ का गढ़ रहे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में दलित, आदिवासी और पिछड़ी जातियों के छात्रों ने बिरसा आंबेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन (BAPSA) बनाई. उनका मकसद ‘वामपंथ और दक्षिणपंथ, दोनों के वर्चस्व’ को तोड़ना था. वे सिर्फ भीड़ बढ़ाने के बजाय अपना स्वतंत्र एजेंडा तय करना चाहते थे. उस समय भी आरोप-प्रत्यारोप और कीचड़ उछालने का वही सिलसिला देखने को मिला था. वामपंथी छात्र संगठनों के कुछ हिस्सों ने दलितों की इस स्वतंत्र राजनीतिक दावेदारी पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि वे प्रगतिशील वोटों को बांट रहे हैं और दक्षिणपंथ की मदद कर रहे हैं. जब भी आंबेडकरवादी छात्र अपने दम पर चुनाव लड़ते हैं, तो अलग-अलग परिसरों में यही आरोप सुनने को मिलता है.
उंगली उठाने की इस राजनीति का असर पूरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर पड़ता है. जब दलित अपनी आवाज उठाने की मांग करते हैं, तो उन पर एकता तोड़ने का आरोप लगाया जाता है. लेकिन अगर एकता तभी कायम रह सकती है, जब दलित दूसरी कतार में रहें, तो वह एकता नहीं है. वह सिर्फ उन्हें अपने हिसाब से चलाने की व्यवस्था है. कोई छात्र आंदोलन या राजनीतिक आंदोलन, जो बीस साल की उम्र में दलितों के साथ नेतृत्व साझा नहीं कर सकता, उसके लिए चालीस साल की उम्र में उनके साथ सत्ता साझा करना मुश्किल होगा.
आज विपक्ष एक ताकतवर सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ एकजुट होना चाहता है. वह सामाजिक न्याय की बात करता है, रैलियों में संविधान दिखाता है और अपने मंच पर आंबेडकर की तस्वीर लगाता है. क्या वह उन लोगों के राजनीतिक इतिहास को नजरअंदाज कर सकता है, जिनके नाम पर वह बात करता है? दलित मतदाता बहुत सजग हैं. वे तुरंत देख लेते हैं कि मंच पर कौन बैठा है और फैसले कौन ले रहा है. बहुत से दलित उन पार्टियों से दूर हो गए हैं, जो उनके लिए बोलने का दावा करती थीं. इनमें से कुछ तो बीजेपी की ओर भी चले गए हैं, जिसने दलित नेताओं को अहम पद देने में ज्यादा तेजी दिखाई है. हालांकि, आलोचक सही सवाल उठाते हैं कि इन पदों पर बैठे नेताओं के पास वास्तव में कितनी सत्ता होती है.
बराबरी के साथ-साथ आना
ऊपर कही गई किसी भी बात का यह मतलब नहीं है कि जाति के खिलाफ लड़ाई में वामपंथ का कोई योगदान नहीं रहा है. उसके कार्यकर्ता भूमिहीन मजदूरों के साथ खड़े हुए हैं और इसके लिए जेल गए हैं, हिंसा का सामना किया है. इसी तरह, आंबेडकरवादी राजनीति या आंबेडकर के खून और वंश के नाम पर होने वाली राजनीति भी आलोचना से परे नहीं है. उसमें भी अपने मतभेद, समझौते और बड़ी नाकामियां रही हैं.
लेकिन बॉम्बे से मिली सीख यह है कि दोनों पक्षों की अच्छी और बुरी बातों को समझना जरूरी है. दरअसल, आंबेडकर ने 1952 के लोकसभा चुनाव में बॉम्बे सिटी नॉर्थ सीट से अपनी हार के लिए CPI नेता श्रीपाद अमृत डांगे के कड़े विरोध को जिम्मेदार ठहराया था. इस विरोध के कारण मजदूर वर्ग के वोट बंट गए थे.
वामपंथ और दलित राजनीति तब भी सबसे मजबूत थे और आगे भी तब सबसे मजबूत होंगे, जब वे बराबरी के आधार पर साथ आएंगे. 1938 की हड़ताल और 1956 की सड़कों पर इसकी मिसाल देखने को मिली थी. ऐसी राजनीति, जो एकता की मांग करे और बराबरी व सम्मान के आधार पर एकजुटता बनाए, साथ ही दलितों के स्वतंत्र नेतृत्व का सम्मान करे, वही लंबे समय तक चलने वाला गठबंधन बना सकती है. वामपंथ को दलितों का नेतृत्व करने की जरूरत नहीं है. उसे उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलना सीखने की जरूरत है.
निखिल संजय-रेखा अडसुले एक वकील हैं. वे TISS के पूर्व छात्र, USA के ‘क्रेइटन पेडेन स्कॉलर’ और IIT-दिल्ली में सीनियर स्कॉलर हैं. वे @Surajya_Raje_ पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: भारतीय IBG का भविष्य तैनाती और तकनीक पर टिका है, इतिहास इंतिज़ार करने वाली सेनाओं का साथ नहीं देता