scorecardresearch
Sunday, 12 July, 2026
होममत-विमतभारतीय IBG का भविष्य तैनाती और तकनीक पर टिका है, इतिहास इंतिज़ार करने वाली सेनाओं का साथ नहीं देता

भारतीय IBG का भविष्य तैनाती और तकनीक पर टिका है, इतिहास इंतिज़ार करने वाली सेनाओं का साथ नहीं देता

इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स (IBG) को लॉन्च करके, भारत अमेरिकी सेना के लगभग दो दशक और PLA के लगभग एक दशक बाद ब्रिगेड-केंद्रित मॉडल लागू कर रहा है.

Text Size:

भारतीय सेना ने आजादी के बाद अपने सबसे महत्वाकांक्षी संरचनात्मक तथा संगठनात्मक सुधार को लागू करते हुए अभी 1 जुलाई को अपने ‘इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप्स’ (IBG) (एकीकृत युद्ध समूहों) को प्रस्तुत किया. लेकिन इसके साथ एक असुविधाजनक सवाल भी उभरा: भावी युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रही सेना के लिए जिस सुधार की जरूरत 2002 में ही मान्य की जा चुकी थी और जिसकी संकल्पना 2018 में ही तय की जा चुकी थी उस सुधार को लागू करने में क्या 10 साल और लगाए जा सकते हैं?

बहरहाल, सुधार को संकल्पना पत्र से निश्चित ही आगे बढ़ाया जा चुका है. इसके पहले चरण में अगले दो साल में, XVII माउंटेन स्ट्राइक कोर के दो डिवीजनों को पांच IBG और एक फायर सपोर्ट ग्रुप (कोर के स्तर पर) में बदल दिया जाएगा. सुधरे हुए मॉडल को सेना की 42 इन्फैन्ट्री, माउंटेन, रैपिड, आर्मर्ड, और आर्टिलरी डिवीजनों, और 12 आर्मर्ड/ इन्फैन्ट्री ब्रिगेडों पर लागू किया जाएगा.

लेकिन, IBG का गठन पुनर्गठन की लंबी प्रक्रिया में नहीं तब्दील होनी चाहिए. यह भारतीय सेना के भावी रणक्षेत्र की तकनीकी धुरी बननी चाहिए. और यह काम अगले पांच वर्ष में पूरा हो जाना चाहिए.

IBG का विकास

IBG की जड़ें ऑपरेशन संबंधी बुनियादी समस्या में पाई जाती हैं. दो सदियों से, पारंपरिक कंबाइंड-आर्म्स डिवीजन ही सेनाओं के युद्ध लड़ने वाले पूर्वनिर्धारित समूह रहे हैं. इनमें सैनिकों की बड़ी संख्या की, हेडक्वार्टर की ज्यादा जरूरत पड़ती है, और ये अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ते हैं. ये लंबे समय तक चलने वाले अभियान के लिए तैनात किया जाता है, जबकि भावी युद्ध में समय की कमी पड़ने वाली है. ऑपरेशनों के लिए डिवीजनों के संसाधनों से ही तैयार किए जाने वाले ब्रिगेड बैटल ग्रुप्स में संगठनात्मक एकजुटता का अभाव होता है.

भारतीय सेना ने यह सबक 2001-02 में ऑपरेशन पराक्रम के दौरान काफी कष्ट से सीखा, जब उसने सक्रिय होने में तीन सप्ताह लगा दिए थे और पाकिस्तान के खिलाफ पहल करने का मौका और बढ़त गंवा दी थी. इसके बाद 2003-04 से, सेना ने डिवीजन के आकार के बैटल ग्रुप्स के बूते काम करना शुरू कर दिया. इन्हें युद्ध क्षेत्र में ऑपरेशन की आक्रामक, ‘कोल्ड स्टार्ट’ रणनीति को लागू करने के लिए उतारने की योजना थी.

लेकिन इन बैटल ग्रुप्स का आकार भी काफी बड़ा था और इन्हें धीरे-धीरे ही सक्रिय किया जा सकता था. 2018 में, जनरल बिपिन रावत ने चुनौती का सीधा सामना किया और उभरते IBG का विस्तृत अध्ययन करने का आदेश दिया. 2019 में, मैदानी इलाके में 9 कोर में और पहाड़ी इलाके में 17 कोर में IBG के साथ प्रयोगात्मक फील्ड अभ्यास किए गए ताकि संकल्पना का परीक्षण हो और उसमें सुधार किया जाए.

IBG के गठन में तेजी लाने का एक कारण यह भी है कि भारत और इसके प्रतिद्वंद्वी चीन और पाकिस्तान परमाणु हथियारों से लैस हैं जिसकी वजह से पूर्ण पैमाने वाले निर्णायक पारंपरिक युद्ध की संभावना खत्म हो गई है. भविष्य के युद्ध सीमित समय और स्थान में लड़े जाएंगे; उनमें सटीक मार करने वाले घातक सैन्य टेक्नोलॉजी और तेज कार्रवाई का बोलबाला रहेगा. इस मामले में ऑपरेशन सिंदूर सटीक उदाहरण है. ऐसी लड़ाई में, विवादित सीमा पर जमीन पर कब्जा करने के लिए अग्रिम ऑपरेशन किए जाने की ज्यादा संभावना रहेगी. ऐसे खतरे पैदा करने या उनका मुक़ाबला करने के लिए बहुत तेज कार्रवाई करने वाले समूहों की जरूरत पड़ेगी.

इरादा साफ है: सक्रिय होने में कम समय लगाओ, सेंसर से शूटर तक के चक्र को कम समय में पूरा करो, और ऑपरेशन में लचीलापन बढ़ाओ. संकल्पना तो मुकम्मिल है, लेकिन चुनौती उसे लागू करने की है.

आदर्श भारतीय IBG कैसा हो?

पारंपरिक ब्रिगेडों को तो ऑपरेशन से पहले डिवीजनों के संसाधनों से मजबूत बनाकर कंबाइंड आर्म्स ग्रुप्स में तब्दील किया जाता था, लेकिन IBG का गठन 5,000-6,000 सैनिकों वाले आत्मनिर्भर कंबाइंड आर्म्स समूह के रूप में किया जाता है. इसका गठन युद्धक्षेत्र के स्वरूप, मिशन, और दुश्मन की ओर से संभावित खतरों के मद्देनजर किया जाता है. यह मेकेनाइज्ड फोर्स हो सकता है या मुख्यतः पैदल सेना वाला या दोनों के मेल वाला हो सकता है. एक अकेले कमांडर के अधीन इसकी अपनी तोपें, अपने यूएवी, इंजीनियर, एअर डिफेंस, खुफिया तंत्र, इलेक्ट्रोनिक साज-ओ-सामान, संचार व्यवस्था, और सैन्य साजोसामान होंगे. तेजी और लचीलापन बनाए रखने के लिए कोर के संसाधनों से युद्ध लड़ने के साधन और साजोसामान से मदद जारी रहेगी.

यहां यह बताना उपयुक्त होगा कि 17 कोर के अंदर पांच IBG और एक FSG का गठन एक पाइलट प्रोजेक्ट है, जिसे दो साल में पूरा किया जाना है. इसलिए संगठन और संयोजन में और बदलाव हो सकता है. लेकिन हरेक IBG में कुछ समान विशेषताएं होंगी.

पहली विशेषता यह होगी कि सच्चा कंबाइंड-आर्म्स एकीकरण होगा जिसमें लड़ाई लड़ने, लड़ाई के लिए समर्थन जुटाने, और साजोसामान से समर्थन के तत्व शामिल होंगे. आर्मर, इन्फैन्ट्री, और मेकेनाइज्ड इन्फैन्ट्री का एकीकरण जरूरत के मुताबिक होगा या संयुक्त यूनिटों के रूप में होगा.

दूसरी विशेषता यह होगी कि हरेक IBG के साथ एक अभिन्न खुफिया तंत्र, निगरानी और टोही (ISR) यूनिट जुड़ी होगी, जिसमें सिर्फ उसके लिए टोही, यूएवी, इलेक्ट्रोनिक युद्ध और सिग्नल इंटेलिजेंस सब-यूनिटें होंगी.

तीसरी विशेषता: हर एक IBG का अपना तोपखाना होगा, और दूर तक सटीक मार करने वाली क्षमता होगी जो पारंपरिक तोपों की रेंज से आगे तक मार कर सकेगी, और यह सब उसका अपना होगा या एफएसजी से हासिल होगा. फायर करने की व्यवस्था तत्काल सक्रिय होने वाले सेंसर नेटवर्क से जुड़ी होगी. भावी युद्धक्षेत्र इस बात से परिभाषित होगा कि जो नजर में आ रहा है उसे पहचाना जाए और मिनटों में खत्म किया जाए.

चौथी विशेषता: कमांड और कंट्रोल सिस्टम एआइ-सक्षम युद्धक्षेत्र प्रबंधन और ऐसे निर्णय व्यवस्था का इस्तेमाल करे जो उपग्रहों, ड्रोनों, रडारों, और जमीनी सेंसरों से हासिल डाटा को मिलाकर ऑपरेशन की एक साझा तस्वीर तैयार करे.

पांचवीं विशेषता: साजोसामान को पूरी तरह से नया डिजाइन दिया जाए जिसके साथ भविष्य के लिए रखरखाव, स्वायत्त आपूर्ति, गोला-बारूद के अलग-अलग भंडार, और डिजिटल इनवेंटरी के प्रबंधन की व्यवस्था शामिल हो.

उपरोक्त क्षमताओं के बिना गठित IBG छोटे डिवीजन से थोड़े ही बेहतर होंगे.

दूसरी सेनाएं किस तरह बदल रही हैं

भारत ब्रिगेड-केंद्रित मॉडल को अमेरिकी सेना द्वारा इसे अपनाए जाने के करीब दो दशक बाद और चीनी सेना पीएलए के एक दशक बाद लागू कर रहा है. इसलिए चुनौती उनके ढांचे की नकल करने की नहीं बल्कि सीधे छलांग लगाकर ड्रोन-समर्थित नेटवर्क से जुड़ी युद्ध प्रणाली को अपनाने की है.

अमेरिकी सेना की ‘स्ट्राइकर’, इन्फैन्ट्री, और आर्मर्ड ब्रिगेड कंबैट टीमों का गठन दूसरे इराक़ युद्ध के बाद 2003 से 2005 के बीच किया गया.

इन सबने करीब दो दशकों में इराक़ और अफगानिस्तान में दिखा दिया है कि ब्रिगेड लेवल के स्थायी कंबाइंड-आर्म्स संगठन सामरिक विकल्पों में वृद्धि करने के साथ रिएक्शन करने के समय में कटौती करते हैं. वैसे, उनकी सफलता की वजह संगठन से ज्यादा नेटवर्क से जुड़ाव, ISR, सटीक निशानेबाजी, और संयुक्त हवाई समर्थन है. गौरतलब है कि कमांड और कंट्रोल के लिए डिवीजन हेडक्वार्टर को कायम रखा गया जिससे ब्रिगेड आकार की कई टीमें जुड़ी होती हैं.

चीन ने सेना में जो सुधार किए हैं वे शायद ज्यादा प्रासंगिक हैं. 2015 के बाद से, पीएलए ने अपने सभी डिवीजनों को 78 ‘कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड’ (CAB) में पुनर्गठित कर दिया है, जो एक कोर के बराबर 13 ग्रुप आर्मीज के अधीन ऑपरेट करती हैं. सीएबी मिशन, इलाके, और खतरे के मुताबिक बड़ी, मझोली, और छोटी (पहाड़ी इलाकों के लिए) होती हैं. हरेक ब्रिगेड को ड्रोनों, लंबी रेंज वाले रॉकेटों, इलेक्ट्रोनिक युद्ध, साइबर क्षमताओं, और अंतरिक्ष आधारित निगरानी व्यवस्था वाली नेटवर्क सिस्टम के साथ ऑपरेट करने के लिए तैयार किया गया है.

पूर्वी लद्दाख ने 2020-24 में दिखा दिया कि संख्या जितनी महत्वपूर्ण है, गति भी उतनी ही अहम है. PLA ने चार-छह कंबाइंड आर्म्स ब्रिगेड तेजी से तैनात करके रणनीतिक झटका देने में सफल हुआ था. बाद में भारत ने करीब तीन डिवीजन की ज्यादा बड़ी युद्ध क्षमता का प्रदर्शन किया लेकिन लामबंदी में उसकी कमजोरी के कारण चीन ने भारत द्वारा पूरी तैनाती करने से पहले सामरिक बढ़त ले ली थी.

रूस-यूक्रेन युद्ध ने सैन्य सोच में और बदलाव लाया है. रूस ने इस युद्ध की शुरुआत बटालियन टैक्टिकल ग्रुप्स के बूते की, जो आर्टिलरी और आर्मर पर बुरी तरह निर्भर थे लेकिन उनमें पर्याप्त इन्फैन्ट्री, साजोसामान, और कमांड की मजबूती का अभाव था. ये कमजोरियां युद्ध के शुरू में ही सामने उभर आईं. तब रूस ने पारंपरिक ब्रिगेडों का फिर से इस्तेमाल किया, जो डिवीजन के हिस्से के तौर पर मॉडुलर कंबाइंड-आर्म्स के रूप में पहले से ही संगठित थीं.

इस बीच, यूक्रेन ने कंबाइंड-आर्म्स ब्रिगेड से शुरुआत की, जिनका स्वरूप ड्रोन और तकनीकी आविष्कारों की मदद से बदल दिया गया था. इसने दिखा दिया कि ड्रोन, व्यावसायिक उपग्रह संचार व्यवस्था, सटीक निशानेबाजी, और विकेंद्रित कमांड की मदद से छोटे, ब्रिगेड आकार के समूह संख्या की ताकत को किस तरह बार-बार नाकाम कर सकते हैं. टेक्नोलॉजी ने पारंपरिक श्रेणियों को नाकाम कर दिया है.

सबक बिलकुल साफ है. आधुनिक ब्रिगेड अपने बड़े आकार के कारण नहीं लड़ते, वे इसलिए मुक़ाबला करते हैं क्योंकि हर सेंसर, शूटर, और कमांडर एक ही डिजिटल युद्धक्षेत्र में ऑपरेट करते हैं. जुड़ाव अब जंग की ताकत बन गया है.

क्रियान्वयन को दशक भर लंबा सुधार न बनाएं

मेरी सबसे बड़ी चिंता सुधारों की सुस्त गति को लेकर है. XVII कोर के दो डिवीजन को अगर पांच IBG और एक एफएसजी में बद्ल्नेमें दो साल लगते हैं तो इस मॉडल को बाकी सेना पर लागू करने में दस साल और लगेंगे.

भारत के लिए जो रणनीतिक माहौल है उसमें यह समयसीमा कारगर नहीं होगी.

पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने इस चुनौती को समझा इसलिए उन्होंने मौजूदा संसाधनों से ‘रुद्र ब्रिगेड’ बनाने का विचार प्रस्तुत किया. लेकिन ‘रुद्र ब्रिगेड’ को अंतिम लक्ष्य नहीं बल्कि एक ऑपरेशनल ब्रिगेड ही माना जाना चाहिए. यह सुधारों की गति को बनाए रखेगा, जबकि सेना पूर्ण रूप से सक्षम IBG के गठन के लिए अधिक विस्तृत तकनीकी परिवर्तन को अंजाम दे सकती है.

सेना को अब मुहिम के मोड में आने की जरूरत है. जबकि पाइलट प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जा रहा है, बाकी दूसरे डिवीजनों को मौजूदा संसाधन के बूते ‘रुद्र’ मॉडल के अनुरूप IBG में बदला जाना चाहिए. इससे सिद्धांत को औपचारिक रूप दिया जा सकेगा, प्रशिक्षण दिया जा सकेगा, और ऑपरेशन की कुशलता को प्रभावित किए बिना टेक्नोलॉजी तथा अतिरिक्त संसाधनों को शामिल किया जा सकेगा.

आगे का रास्ता

सेना को एक साथ तीन सुधार लागू करने चाहिए. पहला : सरकार/रक्षा मंत्रालय परिवर्तन को मंजूर करे और अपनाए, और आधुनिकीकरण को एक अलग प्रक्रिया न मान कर टेक्नोलॉजी को शामिल करने के लिए अलग से फंड देकर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाए.

दूसरे, मौजूदा संसाधन के बूते कई समूहों को एक साथ बदलने की प्रक्रिया के जरिए सुधारों की गति को तेज किया जाए. इस प्रक्रिया को पांच साल में पूरा करने के लिए टेक्नोलॉजी तथा अतिरिक्त संसाधनों को शामिल किया जाए.

तीसरे, निरंतर समायोजन को संस्थागत रूप दिया जाए. ऑपरेशनों के अनुभव, उभरती टेक्नोलॉजी, और दुनिया भर में चल रहे युद्धों से मिलने वाले सबक के मद्देनजर IBG में हर कुछ साल पर विकास किया जाए.

IBG का औपचारिक उद्घाटन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है. यह भविष्य के युद्ध लड़ने की भारत की क्षमता का आधार बन सकती है. लेकिन अगर संगठन के पुनर्गठन की गति तकनीकी परिवर्तन की गति को पीछे छोड़ देती है, या सुधारों को लागू करने में 10 साल लग जाते हैं, तब सुधारों के लागू होने तक युद्ध का स्वरूप फिर बदल जा सकता है. भारत इस सुस्ती को गवारा नहीं कर सकता.

इतिहास उस सेना को शायद ही पुरस्कृत करता है, जो अगला युद्ध शुरू होने के बाद खुद को पुनर्गठित करती है. इसलिए, भारत के IBG को इस आधार पर न परखा जाए कि उसने कितने IBG बना डाले, बल्कि इस बात से परखा जाए कि वे इस क्षेत्र में टेक्नोलॉजी के लिहाज से सबसे सक्षम युद्धक समूह के रूप में कितनी तेजी से उभरते हैं जो अपने प्रतिद्वंद्वियों को गति, निर्णय क्षमता आदि सभी मामलों में पछाड़ सके.

लेफ्टिनेंट जनरल एच.एस. पनाग PVSM, AVSM (रिटायर्ड) ने भारतीय सेना में 40 साल तक सेवा की. वे नॉर्दर्न कमांड और सेंट्रल कमांड में GOC-in-C रहे. रिटायरमेंट के बाद, वे आर्म्ड फोर्सेज़ ट्रिब्यूनल के सदस्य थे. विचार निजी हैं.


यह भी पढ़ें: जातिगत बैठकें और सत्ता की बेचैनी: क्या यूपी की राजनीति नए सामाजिक संतुलन की ओर बढ़ रही है?


 

share & View comments