नई दिल्ली: ऑर्गेनाइजर वीकली शुरू से ही कोई सामान्य प्रकाशन नहीं था. 1947 में प्रकाशित अपने पहले अंक में उसने साफ कहा था कि वह किसी पार्टी या संगठन का मुखपत्र नहीं है, बल्कि “तेजोमय हिंदू राष्ट्र (Glorious Hindu Nation)” के पक्ष में खड़ा है.
शुरुआत में उसका सबसे पहला काम आजादी की लड़ाई, स्वतंत्रता और विभाजन को “हिंदू पक्ष” से सामने रखना था. समय के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से प्रेरित इस प्रकाशन ने ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए खुद को बदला. इसमें दीनदयाल उपाध्याय का राजनीतिक जीवन पर नियमित कॉलम शुरू हुआ और एल.के. आडवाणी का सिनेमा पर कॉलम भी प्रकाशित होने लगा. इसी दौरान इसका पंडित नेहरू से प्री-सेंसरशिप को लेकर टकराव भी हुआ और इसने हिंदू दक्षिणपंथ की वैचारिक सोच को आकार देने में भी भूमिका निभाई.
3 जुलाई 1947 को पहली बार प्रकाशित होने वाले ऑर्गेनाइजर वीकली ने इस साल 3 जुलाई को अपना स्थापना दिवस मनाया. इस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन और RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले समेत कई लोग मौजूद रहे. कार्यक्रम में पूर्व संपादकों और उनके परिवारों को सम्मानित किया गया. एल.के. आडवाणी की बेटी प्रतिभा आडवाणी भी मौजूद थीं. उन्हें ऑर्गेनाइजर वीकली के शुरुआती दौर में एल.के. आडवाणी के योगदान के सम्मान में सम्मानित किया गया.
भारत प्रकाशन (दिल्ली) लिमिटेड द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका का मुख्यालय नई दिल्ली में है. इसमें राजनीति, राष्ट्रीय सुरक्षा, संस्कृति और सामाजिक मुद्दों पर सामग्री प्रकाशित होती है. भारत प्रकाशन का पंजीकरण 1946 में हुआ था. यह हर साल वार्षिक आम बैठक (AGM) करता है और इसका संचालन शेयरधारकों द्वारा चुने गए निदेशक मंडल के जरिए किया जाता है, जिसमें सदस्य बारी-बारी से चुने जाते हैं.
इसे दूसरे पारिवारिक मीडिया संस्थानों से अलग बनाती है इसकी शुरुआत. यह “देशभर के 14,000 से ज्यादा शेयरधारकों के योगदान से शुरू हुआ था. इसलिए यह देश का इकलौता मीडिया संस्थान है, जिसका मालिक कोई एक व्यक्ति या कॉरपोरेट घराना नहीं है.”
ऑर्गेनाइजर वीकली के संपादक प्रफुल्ल केतकर ने दिप्रिंट से कहा, “इसलिए RSS से हमारा कोई आधिकारिक संबंध नहीं है. हमारे करीब 50,000 पाठक हैं. इसके अलावा हमारी वेबसाइट पर करीब 10 लाख यूनिक विजिटर आते हैं.”
इसके इतिहास के बारे में बताते हुए केतकर ने कहा कि जब 1947 में यह साप्ताहिक अखबार के रूप में शुरू हुआ, तब अंग्रेजी मीडिया में भारतीय दृष्टिकोण के साथ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए कोई जगह नहीं थी. “मुस्लिम लीग के उभार के बाद हिंदू आध्यात्मिक दृष्टिकोण को अचानक ‘सांप्रदायिक’ कहा जाने लगा. आजादी के समय अंग्रेजी बोलने वाले बुद्धिजीवियों के बीच यह भ्रम और अनिश्चितता थी कि हम कौन हैं और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया कैसी होगी. उस समय ज्यादातर नीति निर्माता भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक वास्तविकताओं को ब्रिटिश नजरिए से देखते थे.”
2022 में प्रकाशित अपनी किताब दि राइज ऑफ दि बीजेपी: दि मेकिंग ऑफ दि वर्ल्ड्स लार्जेस्ट पॉलिटिकल पार्टी में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और अर्थशास्त्री इला पटनायक ने ऑर्गेनाइजर वीकली के महत्व का जिक्र किया है. उनके मुताबिक, RSS ने 1948 तक “अपने विचारों को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजी साप्ताहिक ऑर्गेनाइजर शुरू कर दिया था.”
उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, “इसे शुरू करते समय गोलवलकर ने कहा था, ‘राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के विषयों पर साफ, सीधे और निष्पक्ष विचार जानने और शुद्ध देशभक्ति की भावना विकसित करने के लिए ऑर्गेनाइजर पढ़ना उपयोगी है. यह समसामयिक विषयों पर सही मार्गदर्शन की अपेक्षाओं को पूरा करेगा.'”
केतकर ने कहा कि उद्देश्य इस कमी को पूरा करना और भारतीय सभ्यता के अनुभवों पर आधारित अलग-अलग स्वदेशी विचारों के लिए एक मंच उपलब्ध कराना था.
दिल्ली स्थित RSS से जुड़े थिंक टैंक विचार विनिमय केंद्र के रिसर्च डायरेक्टर और लेखक अरुण आनंद ने कहा कि संविधान का पहला संशोधन, जिसे नेहरू सरकार लेकर आई थी, “दरअसल सरकार की आलोचना करने वाली आवाजों को दबाने की मंशा का नतीजा था.”
ऑर्गेनाइजर वीकली भी उन्हीं आवाजों में से एक था. दूसरा प्रकाशन था कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ी पत्रिका क्रॉसरोड्स, जिसे रोमेश थापर ने शुरू किया था और संपादित किया था.
अरुण आनंद ने दिप्रिंट में लिखा, “दिलचस्प बात यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगाने के लिए नेहरू को प्रेरित करने वाली सबसे बड़ी वजहों में से एक उनकी और RSS समर्थित अंग्रेजी साप्ताहिक ऑर्गेनाइजर के बीच चल रही लड़ाई थी.”
इसके बाद ऑर्गेनाइजर वीकली सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 26 मई 1950 को सुप्रीम कोर्ट ने दो ऐतिहासिक फैसले दिए. बृज भूषण बनाम दिल्ली राज्य और रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य. शीर्ष अदालत ने कहा कि “किसी पत्रिका पर प्री-सेंसरशिप लागू करना प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का अहम हिस्सा है.”
लेकिन सेंसरशिप ही अकेली चुनौती नहीं थी. केतकर ने बताया कि आडवाणी ने एक बार उनसे कहा था कि एक समय ऐसा भी था जब संसाधन बहुत कम थे और कई बड़े लेखकों को बिना नाम छपे लेख देने पड़ते थे. “वे दफ्तर आए बिना चुपचाप हाथ से लिखे लेख दे जाते थे. वितरण का नेटवर्क बनाना भी बहुत बड़ी चुनौती थी. अच्छे पत्रकार ऑर्गेनाइजर से जुड़ने से डरते थे,” केतकर ने कहा.
ऑर्गेनाइजर वीकली में लिखना एल.के. आडवाणी की कई भूमिकाओं में से एक था.
RSS स्वयंसेवक और वकील रहे आडवाणी, जो आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संस्थापकों में शामिल हुए और बाद में भारत के उपप्रधानमंत्री बने, 1960 से 1967 तक यहां सहायक संपादक रहे.
‘यह हमारी अपनी पत्रिका है’: उपाध्याय ने आडवाणी से क्या कहा था
2020 में ऑर्गेनाइजर वीकली में प्रकाशित दि ऑर्गेनाइजर इयर्स: एलके आडवाणी रिकॉल्स हिज स्टिंट ऐज अ जर्नलिस्ट शीर्षक वाले लेख में आडवाणी ने बताया कि प्रचारक और राजनीतिक कार्यकर्ता का जीवन चुनने और कच्छ आने के बाद उन्हें अपने पिता और बड़े चचेरे भाई की जिम्मेदारी भी संभालनी पड़ी.
आडवाणी ने लिखा कि उन्होंने अपनी यह परेशानी जनसंघ नेता दीनदयाल उपाध्याय को बताई. तब उपाध्याय ने उन्हें ऑर्गेनाइजर वीकली में नौकरी करने की सलाह दी.
उपाध्याय ने कथित तौर पर आडवाणी से कहा था, “यह हमारी अपनी पत्रिका है.”
लेख में आडवाणी के हवाले से कहा गया है कि ऑर्गेनाइजर वीकली में काम करने के दौरान “मेरे पहनावे में भी बदलाव आया. राजस्थान में RSS प्रचारक बनने के बाद मैंने पैंट-शर्ट पहनना छोड़ दिया था और उसकी जगह धोती-कुर्ता पहनना शुरू कर दिया था.”
बाद में आडवाणी ने ‘नेत्र’ नाम से सिनेमा पर नियमित कॉलम लिखना शुरू किया. इसी भूमिका में उन्होंने नई दिल्ली में कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों और सिनेमा से जुड़े कार्यक्रमों में हिस्सा लिया.
1977 में जब मोरारजी देसाई सरकार में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली, तब उनकी मुलाकात कई प्रसिद्ध फिल्मकारों से हुई. उन्हें ख्वाजा अहमद अब्बास और पृथ्वीराज कपूर ने पहचान लिया और कहा, “मैंने आपको पहले कहीं देखा है, लेकिन याद नहीं आ रहा कहां.”
आडवाणी ने उन्हें याद दिलाया कि ऑर्गेनाइजर के फिल्म समीक्षक के तौर पर वह उनकी फिल्मों की प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होते थे. इस पर दोनों ने अलग-अलग उनसे कहा, “हमें खुशी है कि अब हमारे पास ऐसा मंत्री है, जो पहले फिल्म समीक्षक रह चुका है.”
‘हिंदू राजनीति के पक्ष में विमर्श’
ऑर्गेनाइज़र वीकली के पूर्व संपादक आर. बालाशंकर ने दिप्रिंट से कहा कि बंटवारे के तुरंत बाद के दौर में ऐसे प्रकाशनों की कमी थी जो हिंदू दक्षिणपंथ से जुड़ी जानकारी सही तरीके से लोगों तक पहुंचा सकें.
उन्होंने कहा कि हालांकि यह प्रकाशन बंटवारे से पहले शुरू हुआ था, लेकिन उस समय ज़्यादातर मुख्यधारा के अखबार सिर्फ सरकार समर्थक खबरें छापते थे. “इसलिए बंटवारे की कहानी का हिंदू पक्ष, आजादी की लड़ाई का हिंदू पक्ष और स्वतंत्रता आंदोलन का हिंदू पक्ष जैसी जानकारियों की कमी थी. उस समय विपक्ष की आवाज़ के लिए जगह लगभग खाली थी.”
बालाशंकर बताते हैं कि उन्हें वरिष्ठ RSS पदाधिकारियों, जिनमें मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत भी शामिल हैं, से समय-समय पर सुझाव और प्रतिक्रिया मिलती थी.
बालाशंकर ने कहा कि जब उन्होंने संपादक का पद संभाला, उस समय केंद्र में UPA सरकार थी. इसलिए पत्रिका का प्रसार बढ़ाना आसान नहीं था. उन्होंने कहा कि उस समय का माहौल BJP के लिए आज जितना अनुकूल नहीं था.
उन्होंने यह भी कहा कि उनका मुख्य ध्यान ‘हिंदू राजनीति’ के पक्ष में विमर्श को आगे बढ़ाना था. उदाहरण के तौर पर उन्होंने राम सेतु और राम जन्मभूमि जैसे मुद्दों पर विशेष अंक प्रकाशित किए.
80वें स्थापना दिवस समारोह में संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने खुद को एक स्वयंसेवक बताते हुए कहा कि ऑर्गेनाइज़र वीकली ने राष्ट्रीय एकता, अखंडता, सुरक्षा, संस्कृति और सुशासन जैसे मुद्दों पर होने वाली बहसों में सक्रिय भूमिका निभाई है. उन्होंने जम्मू-कश्मीर, प्रजा परिषद आंदोलन, चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों और स्वदेशी की अवधारणा जैसे विषयों पर पत्रिका की भूमिका का भी ज़िक्र किया.
उन्होंने प्रकाशन की यात्रा को “निरंतरता, मजबूती और कई पीढ़ियों तक सार्वजनिक विमर्श के प्रति लगातार प्रतिबद्धता” की यात्रा बताया. उन्होंने कहा कि प्री-सेंसरशिप के खिलाफ दायर कानूनी चुनौती स्वतंत्र भारत में मीडिया की आजादी के विकास का एक अहम पड़ाव बनी और इसने स्वतंत्र प्रेस के महत्व को मजबूत किया.
80वें स्थापना दिवस समारोह में मौजूद RSS के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि ऑर्गेनाइज़र वीकली ने खास तौर पर 1970 के दशक में, जब वह बेंगलुरु में पढ़ाई कर रहे थे, उनकी वैचारिक समझ को आकार दिया.
उन्होंने कहा कि उस समय राष्ट्रवाद, समाजवाद जैसे विषयों पर बहस की तैयारी के लिए कार्यकर्ता Blitz और Organiser जैसी पत्रिकाएं पढ़ते थे. उन्होंने दावा किया कि यह भारतीय संसद में सबसे ज़्यादा उद्धृत होने वाली पत्रिका है. “ऑर्गेनाइज़र जो लिखता है, वह इस देश के एक बड़े राष्ट्रवादी दृष्टिकोण की आवाज़ है. राजनीतिक, मीडिया और प्रशासनिक हलकों में यह बात जानी जाती है. यहां तक कि चाणक्यपुरी में बैठे राजदूत भी यह जानना चाहते हैं कि ऑर्गेनाइज़र क्या कह रहा है, ताकि दूसरा पक्ष समझ सकें. इस तरह ऑर्गेनाइज़र देश के वैचारिक आंदोलन का हिस्सा बन गया है.”
केतकर ने माना कि ऑर्गेनाइज़र वीकली RSS से प्रेरणा लेता है, लेकिन उन्होंने कहा कि RSS के पदाधिकारी संपादकीय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं होते. उन्होंने इसकी तुलना भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के मुखपत्रों से की, जहां पार्टी प्रमुख संपादकीय नीति तय करते हैं.
उन्होंने कहा, “हर मीडिया संस्थान की अपनी विचारधारा और संपादकीय लाइन होती है. ऑर्गेनाइज़र ने अपने पहले अंक में ही साफ कहा था कि हम किसी पार्टी या संगठन का मुखपत्र नहीं हैं, लेकिन हम ‘तेजोमय हिंदू राष्ट्र’ (Glorious Hindu Nation) के पक्ष में खड़े हैं. यह प्रकाशन RSS से प्रेरित रहा है और इसे लेकर कभी शर्मिंदा नहीं हुआ. लेकिन RSS का कोई भी पदाधिकारी हमारी संपादकीय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. उदाहरण के लिए Peoples Democracy या Samana में पार्टी प्रमुख ही संपादक होते हैं. हमारे कामकाज में हमें पूरी स्वायत्तता है.”
व्यक्तियों की नहीं, विचारधारा की सेवा
बालाशंकर के मुताबिक ऑर्गेनाइज़र वीकली को बाकी मीडिया संस्थानों से अलग बनाने वाली बात यह है कि ज़्यादातर मीडिया संस्थान मुनाफे के लिए काम करते हैं और उन पर दूसरे तरह के दबाव भी होते हैं.
उन्होंने कहा, “उनका मूल काम कारोबार है. वे इससे मुनाफा कमाते हैं. ऑर्गेनाइज़र ऐसा नहीं है. कई मीडिया संस्थानों को कुछ खास हितों को बढ़ावा देना पड़ता है. वह कारोबारी हित भी हो सकते हैं. लेकिन ऑर्गेनाइज़र इससे बिल्कुल अलग है क्योंकि यह मूल रूप से एक वैचारिक प्रकाशन है. यह किसी एक व्यक्ति या किसी खास समूह की मिल्कियत नहीं है.”
उन्होंने कहा कि इस प्रकाशन में निवेश करने वाले या इसकी सदस्यता लेने वाले आम स्वयंसेवक हैं. मुनाफा सिर्फ पूंजी निर्माण के लिए इस्तेमाल होता है. “कोई भी इसे अपने पास नहीं ले जाएगा. यहां तक कि शेयरधारक भी मुनाफे में हिस्सेदारी नहीं मांगते.”
उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रकाशन किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा की सेवा करता है. “यह देश के लिए है, देश के हित में जो सबसे अच्छा हो उसके लिए है. वैचारिक रूप से हम अब एक मजबूत धारा बन चुके हैं और राष्ट्रीय स्तर पर हमारी स्वीकार्यता बढ़ी है. इसलिए संगठन का भविष्य उज्ज्वल है और यह आगे भी बढ़ता रहेगा.”
केतकर ने कहा कि ऑर्गेनाइज़र वीकली के हर संपादक को अपने दौर की अलग-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
उन्होंने कहा, “शुरुआत में ए.आर. नायर, जो चीन में काम कर चुके थे और RSS पृष्ठभूमि से नहीं थे, पहले संपादक बने. बंटवारे के कठिन दौर में उन्होंने लगातार शरणार्थी संकट को प्रमुखता से उठाया.”
केतकर ने कहा कि के.आर. मलकानी अलग ही स्तर के व्यक्ति थे और जब सेंसरशिप लागू हुई या आपातकाल घोषित हुआ, तब वह ‘मीडिया की आजादी के योद्धा’ बनकर उभरे.
केतकर के मुताबिक मलकानी ने ही दीनदयाल उपाध्याय को ऑर्गेनाइज़र वीकली के लिए नियमित ‘Political Diary’ कॉलम लिखने के लिए तैयार किया. “उन्होंने आडवाणी जी को फिल्मों और हॉलीवुड फिल्मों में शीत युद्ध की प्रस्तुति पर लिखने के लिए भी प्रोत्साहित किया. चीन युद्ध के दौरान आडवाणी ने अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण और अपने बेबाक विश्लेषण से बड़ा योगदान दिया.”
केतकर ने बताया कि वी.पी. भाटिया के कार्यकाल में पत्रिका ने एक व्यंग्य कॉलम शुरू किया. वहीं शेषाद्रि चारी के समय ग्राउंड रिपोर्टिंग में ‘रंग’ आया, खासकर राम जन्मभूमि और स्वदेशी आंदोलनों के दौरान. “उन्होंने पड़ोसी देशों की नीति पर भी विशेष फोकस शुरू किया. आर. बालाशंकर जी ने सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली UPA सरकार के भ्रष्टाचार और कथित हिंदू विरोधी नीतियों को जोरदार तरीके से उजागर किया.”
जुलाई 2013 में संपादक बनने वाले केतकर ने कहा कि साप्ताहिक अखबार को टैब्लॉयड से मैगजीन फॉर्मेट में बदलना एक अहम कदम था और पूरे प्रबंधन ने इस संपादकीय प्रयास का समर्थन किया.
उन्होंने कहा कि प्रकाशन तकनीक के साथ कदम मिलाकर चलने की कोशिश कर रहा है. “बदलती तकनीक, एल्गोरिदम आधारित मीडिया और खबरें पढ़ने के बदलते तरीकों के साथ ऑर्गेनाइज़र ने भी खुद को बदला है. वेबसाइट, सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल के जरिए हम इस बदलाव के साथ आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.”
केतकर ने कहा कि ऐसे समय में जब डिजिटल स्पेस का इस्तेमाल समाज में नई दरारें पैदा करने या उन्हें बढ़ाने के लिए किया जा रहा है, ऑर्गेनाइज़र वीकली उन्हें ‘भारतीय’ नजरिए से समझने और जवाब देने की कोशिश कर रहा है.
उन्होंने कहा, “हमारे मूल विचार वही रहेंगे, लेकिन समय बदलता है तो मुद्दे और संपादकीय सामग्री भी बदलती है. हम इसी भावना और विश्वास के साथ इस प्राचीन राष्ट्र की मूल एकता के बीच विविधता का उत्सव मनाते रहेंगे.”
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