scorecardresearch
Sunday, 8 November, 2026
होमराजनीति'बिल्कुल नहीं' से 'ठीक है' तक: सोनिया गांधी ने बताया कैसे बदला PM बनने का फैसला

‘बिल्कुल नहीं’ से ‘ठीक है’ तक: सोनिया गांधी ने बताया कैसे बदला PM बनने का फैसला

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने आपातकाल को "आजाद भारत के इतिहास का एक काला अध्याय" बताया और कहा कि इंदिरा गांधी पर संजय गांधी के अलावा "वरिष्ठ सहयोगियों" का भी दबाव था. 

Text Size:

नई दिल्ली: कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के 2004 के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हो गई थीं, लेकिन मनमोहन सिंह को इस पद के लिए चुने जाने से पहले उन्होंने अपना फैसला बदल लिया था. उनकी आने वाली किताब Belonging: A Journey of Love में यह जानकारी दी गई है.

किताब के 10 नवंबर को जारी होने से पहले द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में उस समय कांग्रेस अध्यक्ष रहीं गांधी ने बताया कि चुनाव से कुछ महीने पहले जब उनके एक बच्चे ने उनसे पूछा था कि अगर पार्टी चुनाव जीतती है तो क्या वह प्रधानमंत्री का पद स्वीकार करेंगी, तो उन्होंने साफ कहा था, “बिल्कुल नहीं.” हालांकि, चुनाव नतीजे आने के बाद और पार्टी नेताओं के दबाव के बीच वह आखिरकार मान गईं और उन्होंने कहा, “ठीक है.” लेकिन बाद में उन्होंने अपना फैसला बदल लिया.

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने कभी सोचा कि अगर वह प्रधानमंत्री बनतीं तो यूपीए सरकार कैसी होती, गांधी ने कहा कि यह ख्याल उनके मन में कभी नहीं आया. उन्होंने कहा, “नहीं, बिल्कुल नहीं. मैंने कभी इस बारे में नहीं सोचा. हमारा अनुभव कुल मिलाकर बहुत अच्छा रहा. हमने एक टीम की तरह काम किया और हमारी भूमिकाएं अलग-अलग थीं. वह (सिंह) सरकार का नेतृत्व कर रहे थे और मैं पार्टी का.”

शरद पवार की 1999 की बगावत

गांधी ने 1999 में शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर की बगावत के बारे में भी बात की. कांग्रेस कार्य समिति (CWC) की एक बैठक में इन तीनों नेताओं ने उनके विदेशी मूल का मुद्दा उठाया था और कहा था कि वह भारत में किसी बड़े पद पर नहीं रह सकतीं.

इस टकराव के बाद गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की पेशकश की थी. हालांकि, पार्टी ने तीनों नेताओं को निकाल दिया, जिसके बाद उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) बनाई. इसके बाद गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष पद पर बने रहने के लिए मना लिया गया.

अपनी किताब में गांधी ने याद किया है कि वह बैठक से रोते हुए बाहर निकली थीं. उन्होंने लिखा, “मैं राजनीति में पद और सत्ता हासिल करने के लिए नहीं आई थी. मेरे कुछ साथी ही थे जिन्होंने मुझसे राजनीति में आने का आग्रह किया था और अब वही मेरे खिलाफ हो रहे थे… मुझे इस बात से दुख नहीं हुआ था कि मैं किसी पद पर नहीं रह पाऊंगी. मुझे इस बात से चोट पहुंची थी कि भारत के प्रति मेरी वफादारी पर सवाल उठाए जा रहे थे.”

बाद में उन्होंने फैसला किया कि वह इस घटना को अपनी राजनीतिक जिम्मेदारियों के रास्ते में नहीं आने देंगी. उन्होंने लिखा, “मैं अपनी निजी भावनाओं को अपने बड़े मकसद के रास्ते में नहीं आने दे सकती थी. मुझे आगे बढ़ना ही था.”

गांधी ने कहा कि कई साल तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहने के बाद राजनीति में आने का फैसला उन्होंने तब किया, जब उन्हें लगा कि कांग्रेस कमजोर हो रही है और उनके परिवार के बलिदानों के पीछे जो मकसद था, वह खतरे में पड़ रहा है. उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि मुझे कुछ करना चाहिए.”

इंदिरा गांधी और आपातकाल पर

इस किताब में राजीव और इंदिरा गांधी के उनके राजनीतिक जीवन पर पड़े असर का भी जिक्र है. आपातकाल को आजाद भारत के इतिहास का “निस्संदेह एक काला अध्याय” बताते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि उस समय इंदिरा गांधी पर सिर्फ संजय गांधी की ओर से दबाव नहीं था, बल्कि दूसरे लोगों का भी दबाव था.

उन्होंने कहा, “सिर्फ संजय ही नहीं थे, हालांकि आम लोगों की नजर में अक्सर उन्हें ही आपातकाल का दूसरा नाम मान लिया जाता है. उनकी पार्टी के कुछ वरिष्ठ सहयोगियों की ओर से भी काफी दबाव था. मुझे लगता है कि उनके आसपास राजीव जैसे बहुत कम लोग थे, जिनकी राय अलग थी.”

गांधी ने कहा कि आपातकाल खत्म होने के बाद ही उन्हें उस दौर की गंभीरता का पूरी तरह एहसास हुआ. उन्होंने कहा, “आपातकाल खत्म होने के बाद ही मुझे पता चला कि उस दौरान वास्तव में क्या हो रहा था और हालात कितने गंभीर थे.”

उन्होंने माना कि उस दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर रोक लगा दी गई थी और बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) का अधिकार भी निलंबित कर दिया गया था. उन्होंने आपातकाल से पहले हुए हिंसक प्रदर्शनों, आगजनी और नौकरशाही तथा सशस्त्र बलों से आदेश न मानने की अपीलों का भी जिक्र किया.

गांधी ने यह भी कहा कि इंदिरा गांधी ने मार्च 1977 में चुनाव कराए थे और बाद में सार्वजनिक रूप से आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर अफसोस जताते हुए माफी भी मांगी थी.

धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक समझौतों पर कांग्रेस का रुख

कांग्रेस के अंदरूनी मामलों पर बात करते हुए गांधी ने कहा कि पार्टी के कुछ सदस्यों का मानना था कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर अडिग रुख नहीं अपनाना चाहिए. हालांकि, उन्होंने कहा कि यह पार्टी का रुख नहीं था.

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि अपनी नीतियों और कामों में हम इस बात पर कायम रहे हैं कि हमारे लोगों को बिना किसी डर के अपने धर्म और आस्था को मानने और उसका पालन करने का संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए.”

उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान किए गए राजनीतिक समझौतों पर भी बात की. अपनी किताब में उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या उन फैसलों से वह मकसद हासिल हुआ, जिसके लिए उन्हें लिया गया था. उन्होंने कहा कि उन फैसलों का बोझ आज भी उनके मन पर है.

इंटरव्यू में गांधी ने माना कि राजनीतिक मजबूरियों के चलते कभी-कभी कांग्रेस को ऐसी पार्टियों के साथ हाथ मिलाना पड़ा, जिनकी विचारधारा उससे अलग थी.

उन्होंने कहा, “मैं कभी भी इस बात को लेकर सहज नहीं रही.” साथ ही उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने कभी बीजेपी या RSS के साथ कोई समझौता नहीं किया है. उन्होंने कहा, “हमने कभी बीजेपी और RSS के साथ कोई समझौता नहीं किया और न कभी करेंगे.”

बीजेपी, RSS और नरेंद्र मोदी पर

मौजूदा राजनीतिक हालात पर गांधी ने कहा कि पिछले 12 साल में भारत के लोकतांत्रिक संस्थानों को काफी नुकसान पहुंचा है और उन्हें फिर से मजबूत करने के लिए बहुत मेहनत करनी होगी.

उन्होंने कहा, “पिछले 12 साल में हमारे देश के ताने-बाने, हमारे लोकतंत्र और संस्थानों को बहुत नुकसान पहुंचा है. इस सरकार के जाने के बाद भी हमारी व्यवस्था को फिर से ठीक होने में समय लगेगा. इसके लिए राजनीतिक दलों को भी बहुत मेहनत करनी होगी.”

यह पूछे जाने पर कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के सफर से कांग्रेस क्या सीख सकती है, गांधी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि दोनों नेता कांग्रेस में अलग-अलग रास्तों से शीर्ष पद तक पहुंचे हैं.

उन्होंने कहा, “मुझे नहीं लगता कि हमें RSS से कुछ खास सीखने की जरूरत है.”

उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह संस्थानों, खासकर चुनाव आयोग और मुख्यधारा के मीडिया को अपने नियंत्रण में रख रही है. साथ ही, उन्होंने कहा कि सरकार अपने राजनीतिक फायदे के लिए पैसे, ताकत और धर्म का इस्तेमाल कर रही है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विपक्षी दलों को चुनाव में बराबरी का मौका नहीं दिया गया.

कांग्रेस के रिकॉर्ड का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह एकमात्र पार्टी है जिसने इस हमले का सामना करने की क्षमता दिखाई है.” उन्होंने कहा कि पार्टी समान विचारधारा वाले संगठनों और समूहों के साथ मिलकर काम कर रही है.

राजीव गांधी और अपनेपन का सफर

गांधी ने अपने बचपन से मिले संस्कारों के बारे में भी बात की. इनमें “परिवार और दोस्तों के प्रति वफादारी, ईमानदारी, दूसरों के लिए संवेदना और अपने कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को समझना” शामिल हैं.

अपनी किताब को सिर्फ राजीव गांधी की प्रेम कहानी से कहीं ज्यादा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसमें यह भी बताया गया है कि कैसे धीरे-धीरे उनका जुड़ाव राजीव के परिवार और भारत से बढ़ता गया.

उन्होंने कहा, “यह इस बात की कहानी भी है कि कैसे मुझे राजीव के परिवार और उस देश से प्यार हो गया, जिससे उनका संबंध था. और फिर धीरे-धीरे मैं भी उस देश का हिस्सा बन गई.”

उन्होंने कहा कि वह आज भी वही इंसान हैं, जिससे राजीव गांधी 60 साल पहले मिले थे. हालांकि, उन्होंने हंसते हुए कहा, “लेकिन उस समय मैं ज्यादा मुस्कुराती थी और ज्यादा हंसती थी!”

सोनिया गांधी की इस किताब का प्रकाशक पहले पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया था, लेकिन कथित तौर पर संपादकीय मतभेदों के चलते बाद में इसे हार्परकॉलिन्स इंडिया को दे दिया गया. हालांकि, प्रकाशक बदलने के बारे में पूछे जाने पर गांधी ने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा, “मैं इन विवादों में खुद को शामिल नहीं करना चाहूंगी.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: कृषि कानूनों से अग्निपथ तक: मोदी सरकार ‘जय जवान,जय किसान’ के सुधारों की कसौटी पर विफल रही


 

share & View comments