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Saturday, 7 November, 2026
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कृषि कानूनों से अग्निपथ तक: मोदी सरकार ‘जय जवान,जय किसान’ के सुधारों की कसौटी पर विफल रही

कृषि क़ानूनों से लेकर अग्निपथ तक के संदर्भ में आप कह सकते हैं कि मोदी सरकार ‘जय जवान, जय किसान’ वाली भावना की कसौटी पर विफल रही है. उसने हिंदी पट्टी के किसानों और सैनिकों सरीखे अपने सबसे वफादार जनाधार के समर्थन को अपने लिए गारंटीशुदा मानने की भूल की है.

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मोदी सरकार ने ‘अग्निपथ’ योजना में पिछले दिनों बड़े दावे के साथ जो बदलाव किया उसके लिए आप कूटनीतिक किस्म का या राजनीतिक रूप से सुविधाजनक किस्म का कोई विशेषण प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन कुल मिलाकर इसे पलटी खाना ही कहा जाएगा. मूल योजना के मुताबिक, पहली खेप के 75 फीसदी अग्निवीर चार साल तक ‘अग्निपथ’ पर चलने या अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद दिसंबर तक अपने-अपने घर लौट जाते. 

कोई उत्तर प्रदेश जाता, कोई उत्तराखंड, तो कोई पंजाब या मणिपुर तक लौट जाता, जहां आगामी फरवरी महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं. इन राज्यों से सेना में ज्यादा जवान भरती होते हैं. भाजपा के लिए इनमें से पहले दो राज्य इतना महत्व रखते हैं कि वहां वह कोई जोखिम नहीं मोल ले सकती.   

बेरोजगार किए गए ये सैनिक लौटकर विपक्ष की रैलियों में शामिल होते, या कॉक्रोच जनता पार्टी में शामिल हो जाते. यह अब तक अजेय होने के गर्व से सीना फुलाए भाजपा के लिए काफी खतरनाक बात हो जाती. ऐसा खतरा मोल लेने लायक नहीं माना गया. ऊपर से, अगले साल नवंबर के आसपास हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं. गुजरात को लेकर तो भाजपा निश्चिंत रह सकती है लेकिन अपने गढ़ हिमाचल प्रदेश में वह पिछली बार हार गई थी. हिमाचल प्रदेश में पूर्व सैनिकों की बड़ी आबादी रहती है और वहां से सेना में भर्तियां भी खूब होती हैं. भाजपा अब जोखिम लेने से इतना घबराने लगी है कि जो कभी उसका पसंदीदा सुधार था उसे वह किसी चुनाव की कसौटी पर कसने का खतरा नहीं उठाना चाहती. लेकिन वह सुधार का एक कदम तो था ही. कैसे, यह हम आगे बताएंगे, और यह भी बताएंगे कि अपनी पहली ही परीक्षा में यह असफल कैसे हो गया. 

सरकारों को तीन बातों के लिए याद किया जाता है. एक चौथी बात भी है : सरकारें अच्छे कदम तो उठाती हैं लेकिन दबाव में घबराकर उन्हें वापस भी खींच लेती हैं. पहले दो कदम अच्छे या बुरे होते हैं. तीसरा, अच्छा कदम वे प्रस्तावित करती हैं लेकिन उसे लागू करने की हिम्मत या हुनर उनमें नहीं होता. इसके उदाहरण के तौर पर हम यूपीए सरकार के कई कदमों को गिना सकते हैं. ‘आधार’ और उस पर आधारित ‘इंडिया स्टैक’, जनकल्याण के तहत ‘डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (डीबीटी), और केवल गरीबों तथा पात्रता रखने वालों को रियायती दर पर रसोई गैस सीधे पहुंचाने की योजना को ही लें. 

उसने इन्फ्रास्ट्रक्चर की राष्ट्रीय महत्व की जो भव्य तथा साहसी परियोजनाएं प्रस्तावित की थी उन्हें भी उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. वे सब या तो उसके अनिर्णय के जाल में उलझकर रह गईं या पार्टी बनाम सरकार के आंतरिक द्वंद्व या वैचारिक विरोध के कारण अटक गईं. उन अधिकतर परियोजनाओं को बाद में मोदी सरकार ने पूरा किया. जैसे श्रीनगर तक रेल, मुंबई मेट्रो, मुंबई का ट्रांस हार्बर लिंक, कई नये एक्स्प्रेसवे, रेलवे की ‘डेडीकेटेड फ्रेट कॉरीडोर’ या सशस्त्र माओवाद का खात्मा— ये सब यूपीए की परियोजनाएं थीं जिन्हें बीच रास्ते में ही छोड़ दिया गया. मोदी सरकार ने इन सबको शानदार ढंग से पूरा किया. लेकिन वह अपनी ही कुछ योजनाओं के मामले में लड़खड़ा गई. 

पत्रकारिता में हम लोग ‘तीन उदाहरण’ का नियम लेकर चलते हैं; तीन उदाहरण, जो एक सीधी रेखा बनाते हैं. या आप अपना तर्क पेश करें. मोदी सरकार ने जो ‘कदम वापसी’ की उनमें कृषि क़ानूनों को लिया जा सकता है, जिन्हें 2020 में बड़े भरोसे के साथ लाया गया और किसानों के विरोध के कारण 2021 में ही वापस ले लिया गया. अब दूसरी ‘कदम-वापसी’ की मिसाल यह ‘अग्निवीर’ योजना है. और तीसरी के लिए मैं जातीय जनगणना का नाम लेना चाहूंगा. मोदी सरकार हमेशा से इसके खिलाफ रही है, लेकिन अचानक इसे 2021 की जो जनगणना जारी है उसमें जोड़ दिया गया है. यह राहुल गांधी के दबाव में किया गया. 

अगर आपको लगता है कि यह तीसरा उदाहरण बनाने लायक नहीं है तो मैं एक और उदाहरण दे सकता हूं, हालांकि मैं मानता हूं कि इसके जो नतीजे हो सकते हैं उनके कारण यह तीसरे नंबर पर आ सकता है. वैसे, प्रधानमंत्री मुफ्त सुविधाओं को ‘रेवड़ी संस्कृति’ कहकर निंदा करते रहे थे. जुलाई 2022 में, उत्तर प्रदेश के जालौन में बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे का उदघाटन करते हुए उन्होंने कहा था, “यह रेवड़ी संस्कृति देश के विकास के लिए बहुत खतरनाक है. रेवड़ी संस्कृति चलाने वाले लोग आपके लिए नये एक्सप्रेसवे, नये हवाईअड्डे, या सुरक्षा कॉरीडोर कभी नहीं बनाएंगे.” उन्होंने ज़ोर देकर कहा था कि “हमें इस सोच को हराना है, इस रेवड़ी संस्कृति को देश की राजनीति से मिटाना है.” 

लेकिन 2023 के जाड़ों के महीने में छत्तीसगढ़ के चुनाव के दौरान उन्होंने घोषणा कर डाली कि कोविड महामारी के दौरान मुफ्त अनाज देने की जो योजना शुरू की गई थी उसे जारी रखा जाएगा. उन्हीं चुनावों के दौरान भाजपा ने महिलाओं को खाते में नकदी भुगतान करने वाली ‘लाड़ली बहन योजना’ पेश कर डाली. इसके बाद 2024 में, शायद बहुमत खोने के कारण पार्टी ने जबरदस्त ‘रेवड़ी क्रांति’ ही ला दी, और नकदी भुगतान की सीमा बिहार में एकमुश्त 10,000 रुपये तक पहुंचा दी, कोई उद्यम शुरू करने वाली महिला को 2 लाख रुपये तक देने का वादा कर डाला.   

यह सब इतना बोझिल हो गया कि महाराष्ट्र जैसे धनी राज्य को भी ऐसे भुगतान करना मुश्किल साबित हो रहा है और वह लाभार्थियों की संख्या कम करने पर विचार कर रहा है. महिलाएं विरोध कर रही हैं कि उन्हें ‘लाड़ली बहन योजना’ के तहत भुगतान नहीं किया जा रहा है. आप चाहें तो इसे तीसरा उदाहरण मान सकते हैं. 

आप जिस नजर से भी देखें, यही पाएंगे कि इस सरकार में जोखिम उठाने का जज्बा काफी घट गया है, चाहे यह आर्थिक सुधारों के मामले में ही क्यों न हो जिनके प्रति वह काफी प्रतिबद्धता जताती रही है. ये चार उदाहरण यह बताने के लिए काफी हैं कि मोदी सरकार को वास्तव में अच्छे विचार (अग्निपथ योजना समेत) पेश करने और उनसे कदम वापस खींचने के लिए भी याद किया जाएगा. सनद रहे कि यह कॉलम उन विचारों का समर्थन करता रहा था. 

कृषि क़ानूनों से लेकर अग्निपथ तक के संदर्भ में आप कह सकते हैं कि मोदी सरकार ‘जय जवान, जय किसान’ वाली भावना की कसौटी पर विफल रही है. उसने हिंदी पट्टी के किसानों और सैनिकों सरीखे अपने सबसे महत्वपूर्ण तथा वफादार जनाधार के समर्थन को अपने लिए गारंटीशुदा मानने की भूल की है. 

सबसे निराशाजनक बात यह है कि वह ऐसे बुनियादी बदलावों के लिए इन तबकों की स्वीकार्यता हासिल करने और उन तक पहुंचने में विफल रही. लोग अपने जीवन को गहरे रूप से प्रभावित करने वाले बड़े नीतिगत बदलावों को कुलमिलाकर संदेह की नजर से देखते हैं, खासकर तब जब कि इन बदलावों को धमक और धौंस के रूप में पेश किया जाता है. लेकिन इस सरकार की कार्यशैली ऐसी ही रही है. नोटबंदी या कोविड में लॉकडाउन के फैसलों को याद कीजिए. किसानों और सैनिकों को प्रभावित करने वाले फैसले लगभग इसी तरह किए गए. नोटबंदी और लॉकडाउन के फैसलों के लागू होने की समयसीमा तो  बताई गई थी, लेकिन किसानों और सैनिकों वाले फैसले तो हमेशा के लिए कायम रहने वाले थे. यह बताता है कि अपने आधार से क्यों पीछे क्यों हटा गया, मोदी सरकार ने कदम क्यों वापस खींचे.       

शासन करना परिश्रम का काम है, उबाऊ जैसा क्योंकि इसके लिए तैयारी करनी पड़ती है, माहौल को समझना पड़ता है, शतरंजी चालें चलनी पड़ती हैं, या सेना वाले जिसे ‘स्टाफ वर्क’ कहते हैं वह करना पड़ता है. सिविल सेवाएं, नौकरशाही इसी के लिए हैं. इस तत्व की कमी ने इन योजनाओं को कुप्रभावित किया है. यह इसलिए आश्चर्यजनक है क्योंकि मोदी सरकार अफसरशाही पर बुरी तरह निर्भर रही है. सवाल यह है कि क्या उन्हें तैयारी करने के लिए कहा गया था? या फैसला करके उन्हें सौंपा गया था? यह चिंता रही होगी कि फैसले विश्लेषणों या पंगुता के शिकार हो सकते हैं. लेकिन हमेशा आप उस कमांडो की तरह काम नहीं कर सकते, जो पाराशूट की जांच किए बिना हवाई जहाज से कूद जाता हो. इसे निडर होना नहीं माना जाएगा, यह घोर लापरवाही ही है. 

अग्निपथ योजना जब लागू की गई थी तभी सबको पता था कि इसका पहला बैच इन राज्यों के चुनावों के आसपास इस योजना से बाहर हो जाएगा. चार साल के उनके कार्यकाल में ही उनके व्यापक पुनर्वास के कार्यक्रम के जरिए इस झटके से बचा जा सकता था. अब तो ब्याज के साथ मूलधन भी चला गया है.    

‘वन रैंक, वन पेंशन’ (OROP) वाली योजना के मामले में भी इसी तरह तैयारी की कमी देखी गई. वह चुनावी वादा था, सभी दल इस पर सहमत थे, सैनिकों को यह लाभ मिले इस पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती थी. लेकिन अतिरिक्त खर्च का हिसाब लगा लिया जाता और रक्षा बजट में जरूरी प्रावधान कर दिया गया होता तो कहानी कुछ और ही होती. OROP के कारण पेंशन मद में खर्च में अचानक वृद्धि उस रक्षा बजट के कारण महसूस हुई जिसमें बीते वर्षों में मुद्रास्फीति तक का हिसाब नहीं रखा गया था. इसके कारण पूंजी की कमी या ख़रीदारी के बजट में कमी आ गई. 

चिंताएं बढ़ीं, तो अग्निपथ योजना हड़बड़ी में लागू कर दी गई. बुरे ‘स्टाफ वर्क’ ने दो तरह के सैनिक बना दिए, दो तरह के वेतन-भत्ते और युद्ध में शहीद होने वाले सैनिकों के परिवारों के लिए दो तरह के लाभ तय कर दिए. सबसे महत्वपूर्ण, सेनाओं में भी सैनिक अब कम अवधि के लिए नियुक्त किए जाते हैं. लेकिन अनिवार्य भर्ती वाले इन सैनिकों को पूर्णकालिक सैनिकों से अलग श्रेणी में नहीं रखा जाता. लेकिन यहां उन्हें अलग नाम से पुकारा जाता है. हर यूनिट में अग्निवीरों की सब-यूनिट होती थी. यह सब चल नहीं सकता था. 

पेंशन के बोझ को कम करने, और सेना को युवा बनाने, उसकी औसत उम्र 32 से घटाकर 24-26 करने के विचार बेशक अच्छे थे. लेकिन खराब प्लानिंग, हड़बड़ी में लागू करने और अब उन्हें वापस लेने के कारण दोनों विचार खटाई में पड़ गए हैं. अब पहला बैच अपने छह साल 2029 में पूरे करेगा, जब आम चुनाव होंगे. इस विचार की अगर रक्षा की जा सकी तो इसे एक राजनीतिक चमत्कार ही माना जाएगा. फिलहाल तो यह ‘न खुदा मिला, न विसाल-ए-सनम’ वाला मामला लग रहा है.

(नेशनल इंट्रेस्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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