दिवाली से एक हफ्ते पहले बाजार जाना शायद सबसे ज्यादा भागदौड़ वाला काम होता है. खरीदने के लिए तोहफे होते हैं, घर सजाना होता है, कपड़ों की खरीदारी करनी होती है और कामों की लंबी-चौड़ी लिस्ट होती है. बाजारों में भीड़ होती है, दुकानदार व्यस्त होते हैं और खरीदार एक दुकान से दूसरी दुकान के चक्कर लगा रहे होते हैं. इसी दौरान मुझे एक बार फिर एहसास होता है कि टॉयलेट जैसी बुनियादी जरूरत के मामले में अब भी कुछ खास नहीं बदला है.
मैं अपने माता-पिता के साथ दिल्ली के बाजारों में जाते हुए बड़ी हुई हूं. दो दशक पहले खरीदारी का मतलब था चांदनी चौक, सरोजिनी नगर, सदर बाजार, गफ्फार मार्केट, गांधी नगर और कमला मार्केट की गलियों में घंटों घूमना. तब से इन बाजारों में काफी बदलाव आया है. पहले की साधारण दुकानें अब शीशे के सामने वाले शोरूम बन गई हैं, सड़कें बेहतर हो गई हैं और फुटपाथों पर खाने-पीने की दुकानें खुल गई हैं. खरीदारी का अनुभव अब पहले से बिल्कुल अलग हो गया है.
लेकिन एक चीज आज भी वैसी ही है और तकलीफ देती है. बाजारों में अच्छे, साफ और आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले सार्वजनिक टॉयलेट नहीं हैं.
मुझे याद है कि दो दशक पहले मेरी मां खरीदारी के लिए निकलने से पहले हमसे कहती थीं कि ज्यादा पानी मत पीना. वह ऐसा इसलिए कहती थीं क्योंकि तब बाजारों में टॉयलेट नहीं होते थे. बचपन में हमने भी खुद को इसी हिसाब से ढाल लिया था. हम पानी पीने से बचते थे और घर लौटने तक इंतिजार करते थे.
बीस साल बाद आज भी मैं वही कर रही हूं.
जब मुझे पता होता है कि खरीदारी में कई घंटे लगेंगे, तो मैं जानबूझकर कुछ भी पीने से बचती हूं. अब यह आदत लगभग अपने आप हो जाती है. कभी-कभी मुझे एहसास होता है कि बचपन में बनी यह आदत कितनी तकलीफदेह है, जो बड़े होने के बाद भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही.
साफ-सुथरे टॉयलेट कहीं नजर नहीं आते
दिल्ली के बड़े शॉपिंग बाजार कोई छोटे-मोटे मोहल्ले के बाजार नहीं हैं. यहां हर दिन लाखों लोग आते हैं. इनमें महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और शहर के बाहर से आने वाले लोग भी शामिल हैं. इसके बावजूद, यहां ऐसे सार्वजनिक टॉयलेट मिलना मुश्किल है, जहां आसानी से पहुंचा जा सके और जो साफ-सुथरे हों. कुछ बाजारों में टॉयलेट हैं, लेकिन उनकी हालत अक्सर इतनी खराब होती है कि लोग उनका इस्तेमाल करने से बचना चाहते हैं.
पिछले हफ्ते मैं दिवाली की खरीदारी के लिए सरोजिनी नगर गई थी. वहां बहुत ज्यादा भीड़ थी. मैं तीन घंटे तक रही और एक बूंद पानी भी नहीं पिया. टॉयलेट इस्तेमाल करने के लिए मुझे बाजार से बाहर आना पड़ा. वहां जो टॉयलेट मिला, उसकी हालत बहुत खराब थी. फर्श गीला था, हाथ धोने के लिए साबुन नहीं था और कमरे में सीलन की बदबू आ रही थी.
यह समस्या सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है. जयपुर जैसे ऐतिहासिक शहर में भी, जहां देश और दुनिया भर से पर्यटक आते हैं, बाजारों में खरीदारी करने वाले लोगों को टॉयलेट की बुनियादी सुविधा के लिए परेशान होना पड़ता है. जिस शहर को अपनी विरासत, वास्तुकला और शॉपिंग के लिए पहचाने जाने पर गर्व है, वह साफ-सफाई जैसी बुनियादी जरूरत को नजरअंदाज नहीं कर सकता.
हम अक्सर अपने शहरों में बदलाव को चौड़ी सड़कों, नई इमारतों, बेहतर रोशनी, व्यवस्थित बाजारों और शानदार दुकानों से मापते हैं. लेकिन शहरी विकास को इस बात से भी मापा जाना चाहिए कि लोग, खासकर महिलाएं, सार्वजनिक जगहों का कितनी आसानी से इस्तेमाल कर सकती हैं.
किसी महिला को सिर्फ दोपहर में खरीदारी करने के लिए पानी की कमी का सामना नहीं करना चाहिए. किसी बुजुर्ग को सिर्फ इसलिए अपनी खरीदारी बीच में छोड़कर नहीं लौटना चाहिए क्योंकि वहां इस्तेमाल करने लायक टॉयलेट नहीं है. माता-पिता को अपने बच्चों की बुनियादी जरूरतों के हिसाब से खरीदारी का पूरा कार्यक्रम नहीं बनाना चाहिए.
बाजारों का रूप, कारोबार और बुनियादी ढांचा बदल गया है, लेकिन टॉयलेट ढूंढने की परेशानी आज भी हमें पुराने दौर में ले जाती है.
शायद अगली दिवाली की खरीदारी की भीड़ जुटने से पहले हमारे शहर इस बुनियादी जरूरत पर ध्यान दे सकें. आखिर, कोई बाजार खरीदारी के लिए कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर लोगों को वहां अपनी जरूरत पूरी करने के लिए टॉयलेट तक न मिले, तो उसे खरीदारों के अनुकूल कैसे कहा जा सकता है.
विचार निजी हैं.
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