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Saturday, 7 November, 2026
होमदेशउद्योगों को वापस लाने की कोशिश में जुटी बंगाल सरकार, जमीन और भारी कर्ज बनी बड़ी चुनौती

उद्योगों को वापस लाने की कोशिश में जुटी बंगाल सरकार, जमीन और भारी कर्ज बनी बड़ी चुनौती

उद्योग विशेषज्ञों ने बंगाल की नई औद्योगिक नीति का सतर्कता के साथ स्वागत किया है. 2008 के ज़मीन आंदोलन की वजह से टाटा नैनो प्रोजेक्ट के हट जाने के बाद राज्य में इंडस्ट्रियलाइज़ेशन रुक गया था.

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नई दिल्ली: बीजेपी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार ने गुरुवार को राज्य की पहली निवेश प्रोत्साहन नीति का एलान किया. इस नीति में उद्योगों को वापस लाने और राज्य में औद्योगिक गतिविधियों को फिर से बढ़ावा देने के लिए कई अहम कदम उठाए गए हैं. पश्चिम बंगाल की पहचान कभी सिंगूर से टाटा नैनो परियोजना को बाहर जाने के लिए मजबूर करने वाले राज्य के रूप में रही है. उद्योग जगत के नेताओं ने इस नीति का स्वागत किया है और इसे सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है. हालांकि, उन्होंने इसके असर का बेहतर आकलन करने के लिए अभी इंतजार करने और स्थिति पर नजर रखने की बात भी कही है.

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने इस नीति को जारी किया. इसके तहत रोजगार पैदा करने को बढ़ावा दिया गया है. साथ ही, कम औद्योगिक विकास वाले इलाकों में विकास को प्राथमिकता दी गई है. सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स, उभरती डिजिटल तकनीकों, इलेक्ट्रिक वाहनों और बैटरियों जैसे खास प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में काम करने वाली इकाइयों को प्लांट और मशीनरी में किए गए पात्र स्थायी पूंजी निवेश (FCI) का 120 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता देने का प्रावधान है.

दूसरी इकाइयों के लिए यह सहायता अधिकतम 100 प्रतिशत तय की गई है. यह सहायता तय सीमा पूरी होने पर या उत्पादन शुरू होने के 10 साल बाद, इनमें से जो भी पहले हो, खत्म हो जाएगी.

औद्योगिक विकास सूचकांक के आधार पर राज्य के उन उपमंडलों को प्राथमिकता वाले इलाके घोषित किया गया है, जिनका स्कोर राज्य के औसत से कम है. यह सूचकांक औद्योगिक विकास और बुनियादी ढांचे का आकलन करता है.

राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “इस तरह का तरीका पहली बार अपनाया गया है. इससे राज्य के सभी इलाकों का समावेशी विकास सुनिश्चित होगा.”

इस नीति के दायरे में कुछ प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को शामिल नहीं किया गया है. इनमें स्पंज आयरन, कोयला और कोक प्रोसेसिंग, चारकोल और पत्थर की क्रशिंग जैसे उद्योग शामिल हैं.

बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष अभिजीत बनर्जी ने इस नीति को “समावेशी” बताया. उन्होंने द प्रिंट से कहा, “इसमें उन इलाकों पर जोर दिया गया है, जिन्हें वे प्राथमिकता वाले इलाके कहते हैं. उन्होंने औद्योगिक विकास सूचकांक के आधार पर राज्य को अलग-अलग हिस्सों में बांटा है. जिन इलाकों का स्कोर औसत से कम है, वहां निवेश को प्राथमिकता दी जाएगी और ज्यादा प्रोत्साहन राशि मिलेगी. यह एक दिलचस्प कदम है.”

हालांकि, यह नीति सिर्फ उन निवेशों पर लागू होगी, जो इस साल 9 मई को बीजेपी की नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद किए गए हैं. इस बात को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने जिन 50,000 करोड़ रुपये के औद्योगिक प्रोत्साहनों का एलान किया था, उनका क्या होगा.

2008 में जमीन को लेकर हुए आंदोलन के बाद बंगाल में औद्योगीकरण की रफ्तार थम गई थी. इस आंदोलन के चलते हुगली के सिंगूर से टाटा नैनो परियोजना गुजरात चली गई थी. इस आंदोलन का चेहरा तृणमूल नेता ममता बनर्जी थीं. इसने उनकी पार्टी को राज्य की सत्ता तक पहुंचाया और माकपा के तीन दशक लंबे शासन का अंत किया.

बंगाल में जमीन हमेशा से भावनात्मक मुद्दा रही है. उद्योगपति यह देखने के लिए इंतजार कर रहे हैं कि नई सरकार इस चुनौती से कैसे निपटती है.

पश्चिम बंगाल सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि नई भूमि नीति तैयार की जा रही है और इसे जल्द ही जारी किया जाएगा.

स्पष्ट समयसीमा और तय लक्ष्य

इस नीति में समयसीमा और आंकड़ों के आधार पर लक्ष्य तय किए गए हैं. इसके तहत नए उद्योगों को 30 दिनों के भीतर इरादा प्रमाणपत्र, 45 दिनों के भीतर पात्रता प्रमाणपत्र और सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ दावा जमा होने के 30 दिनों के भीतर मंजूरी देने का वादा किया गया है.

अपने संबोधन में अधिकारी ने कहा कि कमीशनखोरी और जबरन वसूली की संस्कृति अब बीते समय की बात हो गई है.

नई नीति के तहत एक सिंगल-विंडो पोर्टल बनाया जाएगा. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जहां तक संभव हो, आवेदन, मंजूरी और प्रोत्साहन राशि जारी करने की पूरी प्रक्रिया बिना किसी आमने-सामने संपर्क के ऑनलाइन हो. अगर किसी आवेदन में कोई कमी होगी, तो इसकी जानकारी सात दिनों के भीतर एक ही बार में दे दी जाएगी.

मुख्यमंत्री खुद और मुख्य सचिव स्तर तक के नामित वरिष्ठ अधिकारी परियोजनाओं की गहराई से समीक्षा करेंगे. उदाहरण के लिए, 100 करोड़ रुपये या इससे ज्यादा के निवेश वाली परियोजनाओं के लिए एक नामित अधिकारी होगा. सबसे बड़ी परियोजनाओं की जिम्मेदारी विशेष सचिव या सचिव स्तर के अधिकारियों को दी जाएगी.

राज्य की नोडल एजेंसी हर 15 दिन में ऐसी प्रत्येक परियोजना की प्रगति की समीक्षा करेगी. मुख्यमंत्री हर महीने इनकी समीक्षा करेंगे.

इस नीति में यह भी अनिवार्य किया गया है कि राज्य सरकार उद्योगों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) की ओर से पैदा की गई हर नौकरी को प्रोत्साहित करेगी. इसमें महिलाओं के लिए पैदा की गई नौकरियां भी शामिल हैं. इसके लिए नियोक्ता की कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) में जमा की गई रकम का एक हिस्सा वापस किया जाएगा. MSMEs में महिला और ट्रांसजेंडर कर्मचारियों के लिए नियोक्ता के EPF योगदान की पूरी रकम वापस की जाएगी.

इस नीति में एक और नई बात यह है कि अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, विश्वविद्यालय और इसी तरह की सुविधाओं में निवेश करने वाले गैर-लाभकारी संस्थानों को भी प्रोत्साहन दिया जाएगा.

नीति में बीमार औद्योगिक इकाइयों में बेकार पड़ी संपत्तियों का इस्तेमाल शुरू करने का ढांचा भी तय किया गया है. साथ ही, ऐसी इकाइयों को फिर से शुरू करने की इच्छा रखने वालों को सहायता देने का प्रावधान है.

लागू करने में कई चुनौतियां

उद्योग जगत ने निवेश नीति को “व्यावहारिक” और “नई सोच वाली” बताया है. हालांकि, इसे लागू करने में कई बड़ी चुनौतियां होंगी. इनमें सबसे बड़ी चुनौती राज्य पर करीब 8 लाख करोड़ रुपये का भारी कर्ज है.

कोलकाता के इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट के अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर अभिरूप सरकार का मानना है कि इस नीति ने निवेश के लिए सही माहौल बनाया है, लेकिन राज्य की खराब वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखना होगा. इसकी वजह से सरकार के पास खर्च और फैसले लेने के लिए “बहुत कम गुंजाइश” बचती है.

सरकार ने दिप्रिंट से कहा, “नीति अपने आप में उतनी अहम नहीं है, जितना इसे लागू करना है.” उन्होंने आगे कहा, “सरकार ने उद्योगों को आकर्षित करने के लिए कई तरह के प्रोत्साहनों का एलान किया है. लेकिन राज्य पर कर्ज का बोझ देखते हुए इनका प्रबंधन आसान नहीं होगा. आपको अपने संसाधनों से इसका इंतजाम करना होगा. इन सभी प्रोत्साहनों के लिए कहीं न कहीं खर्च में कटौती करनी पड़ेगी. और यह काफी मुश्किल होगा.”

सरकार ने कहा कि प्रोत्साहनों का खर्च उठाने के लिए सरकार को अपनी कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करनी पड़ सकती है. उन्होंने कहा, “मुझे आशंका है कि अगर सरकार कल्याणकारी योजनाओं में कटौती करती है, तो इसका राजनीतिक असर होगा. मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा जरूर होगा, लेकिन यह आशंका है. इसीलिए मैंने कहा कि नीति को लागू करना अहम है.”

सरकार के सामने जमीन अधिग्रहण का मुद्दा भी एक बड़ी चुनौती है.

बंधन बैंक के CEO और बंगाल बिजनेस काउंसिल के अध्यक्ष चंद्रशेखर घोष ने कहा कि पिछली सरकार ने उद्योगों से कहा था कि वे सरकार की ओर से तय कीमतों पर अपनी जमीन खुद खरीदें. उन्होंने कहा, “यह मुश्किल था. आमतौर पर ऐसा नहीं होता, क्योंकि पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में जमीन बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी हुई है. इसलिए यह काम बेहद मुश्किल है. जमीन के सौदे पर आने वाला खर्च भी बहुत ज्यादा होता है.”

उन्होंने आगे कहा, “किसी भी उद्योगपति के लिए खुद जाकर जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े खरीदना बहुत लंबी और समय लेने वाली प्रक्रिया होगी. कुछ जमीन मालिक तैयार होंगे, कुछ नहीं. कोई उद्योग इतनी बड़ी लेन-देन की लागत और परेशानी क्यों उठाना चाहेगा? इसलिए पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में यह जरूरी है कि सरकार ही जमीन का अधिग्रहण करे और उसे उद्योगों को दे.”

घोष ने कहा कि तैयार की जा रही भूमि नीति में उन समस्याओं का समाधान करना होगा, जो पहले औद्योगिक विकास में रुकावट बनी थीं. उन्होंने कहा, “सिर्फ निवेश नीति से रातोंरात राज्य की औद्योगिक स्थिति नहीं बदलेगी.”

बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष बनर्जी के मुताबिक, सिर्फ निवेश नीति से पूरी स्थिति नहीं बदलेगी. उन्होंने कहा, “इस नीति को लागू करना और साथ ही सही माहौल तैयार करना, इसे असरदार बनाने और निवेश आकर्षित करने में काफी मददगार होगा.”

उन्होंने कहा कि यह नीति सही दिशा में उठाया गया कदम है. बनर्जी ने कहा, “इस पर आगे भी काम करना होगा. लेकिन सिर्फ एक नीति से रातोंरात राज्य की औद्योगिक स्थिति नहीं बदलेगी.”

उदाहरण के तौर पर उन्होंने नई निवेश नीति में शामिल ओपन-एक्सेस बिजली व्यवस्था का जिक्र किया. उन्होंने कहा, “यह पिछली औद्योगिक नीति का भी हिस्सा थी. लेकिन आज तक कितने उद्योगों को मैन्युफैक्चरिंग में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनने के लिए ओपन-एक्सेस बिजली का फायदा मिल पाया है? मेरा मतलब है कि आप सिर्फ नीति को देखकर यह तय नहीं कर सकते कि पिछली सरकार उद्योगों के लिए ज्यादा अनुकूल थी या मौजूदा सरकार ज्यादा अनुकूल है. हमें नीति की बारीकियों को देखना होगा और यह समझना होगा कि उन्हें कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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