वायुसेना अध्यक्ष एअर चीफ मार्शल (ACM) ए.पी. सिंह के एक बयान ने भारत में ‘इंटिग्रेटेड थिएटर कमांड्स’ (ITC) को लेकर जारी बहस में फिर से तेजी ला दी है. ‘PTI’ से बातचीत करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय वायुसेना फाइटर विमानों की पूरी व्यवस्था को स्थायी रूप से भौगोलिक आधार पर बांटने के पक्ष में नहीं है. इसकी जगह उन्होंने विदेशी मॉडलों की नकल न करते हुए भारत की विशेष सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से ढांचे तैयार करने की वकालत की.
‘ACM’ सिंह ने यह भी कि ‘इस तरह के बड़े बदलाव’ को क्रमबद्ध चरणों में लाया जाना चाहिए ताकि ऑपरेशनों के लिए तुरंत तैयार होने की प्रक्रिया के साथ ‘कभी कोई समझौता न हो’. उन्होंने चेतावनी दी कि भावी युद्ध को ‘बिलकुल निश्चित’ मान कर उसकी संभावना बताने के ‘जाल में फंसने’ से बचा जाए.
‘चीफ ऑफ दि एयर स्टाफ’ (CAS) 31 अक्टूबर 2026 को रिटायर होने वाले हैं. इसके बाद, पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान के अधीन काम करने वाली ‘चीफ़्स ऑफ स्टाफ कमिटी’ (COSC) का पूरा ढांचा बदल जाएगा.
इस विषय पर रक्षा मंत्रालय (MoD) के विचाराधीन प्रस्ताव को पूर्व COSC ने भेजा था. अब नए सदस्यों के आने के बाद इस मसले पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत होगी.
सुधार तुरंत चाहिए
भारत में डिफेंस मैनेजमेंट के ऊंचे हलक़ों में सुधार जरूरी हैं, इस पर सब एकमत हैं. लेकिन किस तरह के सुधार किए जाएं, यह अनिश्चित है और इन्हें गहरे विश्लेषण के बाद ही निश्चित किया जा सकता है. भारत अंततः जिन ढांचों को अपनाता है वे उसकी रणनीतिक आकांक्षाओं, संसाधनों की सीमाओं, विदेश पर निर्भरता, भौगोलक चुनौतियों, खतरों के बोध और संभावित युद्ध के चरित्र के अनुरूप होने चाहिए.
अमेरिकी और चीनी उदाहरणों से बनी व्यापक धारणा के अनुसार भौगोलिक थिएटर कमांड्स दरअसल उधार में लिया गया ढांचा है. वे भारतीय स्थितियों के अनुकूल नहीं हो सकते हैं. भारतीय समस्या को भारतीय समाधान चाहिए. युद्ध लड़ने की मौजूदा शक्ति को भौगोलिक दृष्टि विभिन्न थिएटर कमांड्स में बांटना ऐसा समाधान नजर आता है, जो समस्या की तलाश कर रहा हो.
1962, 1965, और 1971 के युद्धों के बाद उच्च स्तरीय डिफेंस मैनेजमेंट में सुधारों को लेकर चर्चा शुरू हो गई थी. लेकिन इन चर्चाओं में उतनी तेजी नहीं आई कि कोई बड़ा महत्वपूर्ण परिवर्तन हो. संस्थागत जड़ता ने नए आविष्कारों को दबा दिया.
कारगिल (1999) के बाद चीजें बदल गईं.
करगिल युद्ध ने सैन्य ऑपरेशनों के दौरान तालमेल की समस्याओं और उच्च स्तरीय डिफेंस व्यवस्था में गहरी कमजोरी को उजागर किया. करगिल रिव्यू कमिटी (केआरसी) ने दर्ज किया कि सेनाओं के अध्यक्ष सरकार को सलाह देने वाले स्टाफ अफसरों से ज्यादा ऑपरेशन कमांडर की भूमिका में थे. कमिटी ने शीर्ष स्तर पर किए गए फैसलों, और एमओडी तथा सेनाओं के अध्यक्षों के बीच के संबंधों की समीक्षा किए जाने की मांग की.
सुधारों में तेजी आई. केआरसीकी सिफ़ारिशों के आधार पर 2001 में ‘मंत्रियों के समूह’ (GoM) का गठन किया गया. जीओएम ने विस्तृत रिपोर्ट सौंपी और उसने उच्च स्तरीय डिफेंस मैनेजमेंट समेत कई मसलों के बारे में सिफ़ारिशें प्रस्तुत की. आगे चलकर इनमें से कई सिफ़ारिशों को लागू किया गया, जिनमें इन सबके मामले शामिल थे : हेडक्वार्टर आइडीएस, डीआइए, अंडमान-निकोबार कमांड, स्ट्रेटेजिक फोर्सेस कमांड, एनटीआरओ से जुड़े तत्व, खरीदारी की व्यवस्था, बॉर्डर मैनेजमेंट में सुधार आदि.
‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ (CDS) वाली सिफ़ारिश अटकी रही. यह सिफ़ारिश 2012 के ‘नरेश चंद्र टास्क फोर्स’ में फिर से स्पष्ट तौर पर उभरी. 2016 में शेकटकर कमिटी ने इसमें कुछ और बातें जोड़ीं. इन प्रयासों के कारण अंततः 2019 में ‘सीडीएस’ का पद बनाया गया और डिपार्टमेंट ऑफ मिलिटरी अफेयर्स’ (DMA) का गठन किया गया. संसद ने ‘इंटर-सर्विसेज़ ऑर्गनाइजिंग एक्ट (2023)’ पारित करके संयुक्तिकरण के प्रयास को नियमबद्ध किया.
DMA को जो प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपी गईं उनमें एक यह भी थी कि वह ऑपरेशनों में संयुक्तिकरण लाकर संसाधनों के अधिकतम उपयोग की दृष्टि से मिलिटरी कमांड्स का पुनर्गठन करे. इसके लिए संयुक्त/थिएटर कमांड्स का गठन किया जाए.
CDS को सौंपी गई प्रमुख जिम्मेदारियों में एक यह व्यवस्था करना भी शामिल था कि प्रथम सीडीएस के पदभार संभालने के तीन वर्षों के अंदर तीनों सेनाएं ऑपरेशन, साज-ओ-सामान, ट्रांसपोर्ट, ट्रेनिंग, सहायक सेवाओं, संचार व्यवस्था, मरम्मत तथा देखभाल आदि संयुक्त रूप से करने लगें.
आकार लेता ITC
ITC के गठन के प्रयास प्रथम सीडीएस जनरल बिपिन रावत के अधीन काफी उत्साह से चले. उनके उत्तराधिकारी जनरल चौहान के कार्यकाल में इन प्रयासों में तेजी आई. बताया जाता है कि जनरल चौहान की टीम ने MoD को एक विस्तृत प्रस्ताव भी भेजा था.
उस प्रस्ताव के ब्योरे उपलब्ध नहीं हैं. लेकिन मीडिया में जो कुछ आता रहा है उसके मुताबिक इन तीन ITC के गठन की योजना पेश की गई थी : चीन के मद्देनजर उत्तरी कमांड; पाकिस्तान के मद्देनजर पश्चिमी कमांड, और सागरों तथा महासागरों में अपने सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए समुद्री कमांड. इस मॉडल के तहत तीनों सेनाओं के सैनिकों को एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के लिए एक थिएटर कमांडर के नेतृत्व में रखा जाएगा. लेकिन इस दिशा में प्रगति तीनों सेनाओं के बीच मतभेदों के कारण रुक गई, खासकर वायुसेना की सीमित व्यवस्था के आवंटन के सवाल पर.
सूत्रों के अनुसार, भारतीय वायुसेना (IAF) अपने सीमित तथा अत्यल्प संसाधनों को छोड़ने के सुझाव के खिलाफ है लेकिन वह CDS और COSC के अधीन संयुक्त हेडक्वार्टर के निर्देश पर संसाधनों का अलग-अलग मामले के लिए आवंटन करने के विचार को कबूल कर सकती है. एसीएम सिंह के ताजा बयान ने वायुसेना के आग्रह को और ठोस रूप दे दिया है.
उनका कहना था कि निर्देशक सिद्धांत यह होना चाहिए कि “जहां जरूरी हो वहां कंट्रोल केंद्रित हो और जहां उपयुक्त हो वहां कार्यान्वयन विकेंद्रित हो”. उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को एक उदाहरण बताया जिसमें एक संयुक्त व्यवस्था के तहत साजोसामान का केंद्रित तथा तीव्र आवंटन निर्णायक साबित हुआ.
कुछ टिप्पणीकारों ने गतिरोध पर हताशा व्यक्त की है और वायुसेना पर नाराजगी जाहिर करते हुए आशंकाओं को एक हौआ बताया है. राष्ट्रीय सुरक्षा पर टिप्पणी करने वाले प्रमुख विश्लेषक नितिन गोखले ने प्रधानमंत्री से इस मामले में सख्त रुख अपनाने का आग्रह किया है. नौसेना केपूर्व अध्यक्ष एडमिरल अरुण प्रकाश ने CDS की यह कहकर सख्त आलोचना की कि मौजूदा सीडीएस को या तो इस काम को आगे बढ़ाएं या इस ज्वलंत मसले को वापस राजनीतिक नेताओं के हवाले कर दें.
बहरहाल, विवाद जारी है, मतभेद कायम हैं, और हम जहां के तहां अटके हैं. हम इस मसले को हल नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हमें समस्या पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है.
समस्या की भारतीय तरीके से पहचान
उच्च स्तरीय डिफेंस मैनेजमेंट में सुधार जरूरी है. करगिल युद्ध के बाद जो विश्लेषण किया गया था उसमें समस्या की सही पहचान की गई थी कि सेना बिखरी हुई है. एकीकृत परामर्श, संसाधनों पर ज़ोर, और सेनाओं को समानांतर खांचों में कार्रवाई करने से रोकने की व्यवस्था तैयार करने जैसे सुधारों की साफ तौर पर जरूरत है. मौजूदा व्यवस्था के तहत जो 17 सिंगल-सर्विस कमांड हैं वे बहुत ज्यादा हैं. सेना में नौकरशाही वाली परतों को कम करने और संयुक्त प्लानिंग में सुधार की मांग जायज है.
फिर भी, जो सुधार सुझाए जा रहे हैं वे समस्या की पहचान से नहीं उभरे हैं. इस विषय पर अंचित गुप्ता के हाल के विश्लेषण में कहा गया है कि किसी ऑपरेशन के लिए अधिकृत सेनाओं में फील्ड पर तालमेल थिएटर कमांड व्यवस्था के तहत बेहतर हो सकता है. वे खुद इस गंभीर समस्या को हल नहीं करतीं कि सुसंगत सैन्य परामर्श क्या होगा या युद्ध में तेजी लाई जाए या नहीं.
कोई थिएटर कमांडर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटी या ‘सीओएसीस’ द्वारा निर्धारित राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़ने का फैसला नहीं कर सकता. इन दो समस्याओं को मिलाने से ऐसा सांगठनिक बदलाव हो सकता है, जो करगिल युद्ध के बाद उजागर हुई समस्या का आंशिक समाधान ही कर सकेगा.
भारत की समस्या की वास्तविक पहचान आपस में जुड़ी दो वास्तविकताओं से तय हो रही है. पहली वास्तविकता है हमारे पड़ोसी देशों से खतरों के रूप में है जो निकटस्थ हैं, निरंतर हैं और एक साथ जुड़े हैं. हमारे लिए खतरे चीन या पाकिस्तान से अलग-अलग तौर पर भी हैं और संयुक्त दोहरे भी हैं. इंडियन ओशन क्षेत्रों से जुड़े हितों पर बढ़ता ज़ोर हमारी सुरक्षा के लिए चुनौतियों को और जटिल बना रहा है. ये वैसे बिलकुल अलग-अलग थिएटर नहीं हैं जैसे दूरस्थ अमेरिकी या चीनी अभियान के थिएटर हो सकते हैं.
दूसरे, संसाधन सीमित हैं. वायुसेना की ताकत घटकर 29 स्क्वाड्रन वाली हो गई है जबकि इनकी अधिकृत संख्या 42.5 है. टैंकर, अवाक्स, लंबी दूरी वाले ट्रांसपोर्ट, और सहायक ‘ईडब्लू’ विमान और भी कम हैं. पाकिस्तान या चीन या दोनों के साथ एक साथ संपूर्ण युद्ध हुआ तो वायुसेना की सारी एसेट्स उसमें शामिल हो जाएगी. शांतिकाल के लिए और आंतरिक ढांचे के सटीक चार्ट के लिए इन एसेट्स के स्थायी भौगोलिक विभाजन से खतरा यह है कि युद्ध होने पर सेना के अधिकतम से नीचे के स्तर की तैनाती हो सकती है.
आधुनिक युद्ध में अब सीधा आमना-सामना नहीं होता बल्कि लंबी दूरी से निशाना साधा जाता है; ड्रोनों, सटीक मार करने वाले गोला-बारूद, अंतरिक्ष, साइबर क्षेत्र और सूचना तंत्र का इस्तेमाल किया जाता है. यूक्रेन और मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और हमारे ऑपरेशन सिंदूर में मिले अनुभवों ने जाहिर किया है कि संस्थागत कौशल पर, और विकेंद्रित भौगोलिक मुख्यालयों की जगह एक स्रोत से नतीजे हासिल करने पर ज़ोर देने की क्षमता कितनी महत्वपूर्ण है.
भौगोलिक थिएटर कमांड उधार की व्यवस्था
भौगोलिक थिएटर कमांड व्यवस्था में यह मान कर चला जाता है कि निर्धारित क्षेत्र के अंदर कमांड की एकता और निकटता सबसे असरदार नतीजे दे सकती है. यह तर्क उन ताकतों के लिए उपयुक्त है जो दूर समुद्र के पार फोर्स का इस्तेमाल करती हैं या जो अपने क्षेत्र का विस्तार करने के लिए विशाल कंटिनेंटल फोर्सेस को पुनर्गठित करती हैं. भारत के लिए यह समस्या की तलाश करने वाला समाधान साबित हो सकता है.
जून 2025 में यही तर्क पेश किया जा रहा था. प्रस्तावित मॉडल में उन सेनाओं के भौतिक एकीकरण का लक्ष्य रखा गया है, जो सेनाएं ऑपरेशन के मामले में बिलकुल अलग-अलग तीव्रता, साजोसामान, और माहौल में ऑपरेट कर रही हैं. आधुनिक युद्ध में सुपर स्पेशलाइजेशन और सम्मिलित कार्रवाई को ‘को-लोकेशन’ से ज्यादा महत्व दिया जाता है. लंबी दूरी तक मार करने वाले हथियार, ड्रोनों के झुंड, उपग्रह के जरिए युद्धक्षेत्र की साफ तस्वीर, और सूचना संबंधी ऑपरेशन स्पष्ट भौगोलिक सीमाओं को नहीं मानते.
मौजूदा कमांड मुख्यालयों की अधिकता समस्या का एक पहलू है. एक तरह के भौगोलिक मुख्यालयों की जगह दूसरी तरह के मुख्यालय लाने से नयी परतें बनेंगी जबकि चुस्त, सटीक, तथा उपलब्ध फोर्स तैनाती की मुख्य जरूरत पूरी नहीं हो पाएगी.
वायुसेना अरसे से मांग करती रही है कि एअर पावर का केंद्रित नियंत्रण हो, और यह केवल संस्थागत जरूरत नहीं है. एअर पावर मूलतः लचीला होता है और उसे चंद घंटों के भीतर सीमा के पार तैनात किया जा सकता है. थलसेना के बख्तरबंद दस्तों या नौसेना के ‘सीबीजी’ के विपरीत वायुसेना के स्क्वाड्रन तैनात होने और कार्रवाई करने के लिए कई सप्ताह नहीं लेते. उत्तर-पूर्व में स्थित एक फाइटर स्क्वाड्रन पश्चिम में किसी अड्डे पर आठ घंटे के अंदर तैनात हो सकता है और अगले छह घंटे में ऑपरेशन शुरू कर सकता है.
सीमित फाइटर स्क्वाड्रनों को थिएटरों में स्थायी तौर पर बांटने पर उन्हें राजनीतिक या किसी ऑपरेशन से संबंधित मांग पर एकजुट करने की क्षमता घटती है. जैसा की एअर चीफ मार्शल सिंह ने जोर देकर कहा है, जांचने का विषय यह है कि जो ढांचा उपलब्ध है वह एयर पावर को एकीकृत फ्रेमवर्क में इस्तेमाल करने से सबसे अच्छे नतीजे देगा या एक सांचे के अनुरूप चलने से.
उम्मीद जगाती दिशा
ज्यादा संभावनाशील दिशा यह होगी कि नए नक्शे खींचने की जगह कामकाज का ऐसा एकीकरण किया जाए जिसमें नतीजों पर ज़ोर दिया गया हो. इसके तहत कम संख्या में भौगोलिक कमांडों को कायम रखा जाएगा, क्योंकि यह ऑपरेशनों की ‘सर्फ़ेस’ सेना (थलसेना और नौसेना) वाली अवधारणा के तालमेल में होगा. एक पश्चिमी, एक उत्तरी, और एक समुद्री कमांड पर्याप्त होंगे. इसके साथ, हमें साज-ओ-सामान, ट्रेनिंग, संयुक्तता के सिद्धांत, अंतरिक्ष, मानव रहित सिस्टम्स, साइबरस्पेस, और रणनीतिक फोर्सेस के लिए सक्रिय कमांड बनाने और मजबूत करने होंगे.
सर्विस हेडक्वार्टर्स को अपनी फोर्सेस के गठन, प्रशिक्षण और उन्हें टिकाऊ बनाते रहने पर ज़ोर देना चाहिए. इस बीच, संयुक्त प्लानिंग के तहत फोर्स की तैनाती, और CDS और COSC के अधीन कार्यरत संयुक्त फोर्स हेडक्वार्टर (या ऐसे ही संगठन) पर फोर्स की तैनाती और उसे ऑपरेशन में इस्तेमाल के निर्देश दिए जाते रहें. एसेट्स का हरेक मामले के आधार पर आवंटन का फैसला संयुक्त फोर्स हेडक्वार्टर करे. यह फैसला राजनीतिक नेतृत्व द्वारा तय सैन्य लक्ष्यों के मुताबिक होगा.
पूरे देश के फॉर्मेट में फोर्स की तैनाती का तालमेल बनाने के लिए संयुक्त फोर्स हेडक्वार्टर में डीआरडीओ, इसरो, विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और राष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएं. इन प्रतिनिधियों को संगठन के कमांड चेन में रखा जाए, न कि पेबंद के रूप में. इस तरह का मॉडल एकीकरण को सेनाओं से आगे बढ़ाकर सरकार की दूसरी शाखाओं तक ले जाएगा.
एसीएम सिंह के रिटायर होते ही सीओएससी का स्वरूप बदल जाएगा. इस बदलाव से संस्थागत स्मृतिलोप का खतरा पैदा हो सकता है लेकिन नए विश्लेषण का अवसर भी उभर सकता है. जनरल चौहान के काल में जो प्रस्ताव रखा गया था वह मंत्रालय में विचाराधीन पड़ा है. सेनाओं ने मोटे तौर पर आंतरिक काम पूरा कर लिया है, लेकिन एसेट्स के आवंटन पर प्रमुख मतभेद कायम हैं.
बेहतर यह होगा कि सबसे पहले भारतीय समस्या को सटीक रूप से परिभाषित किया जाए. राष्ट्रीय आकांक्षा, उपलब्ध संसाधन, खतरों का परिदृश्य, दुश्मनों के संभावित एक्शन, और अंततः राजनीतिक निर्देशों आदि पर नए सिरे से विचार किया जाए. बदलाव क्रमिक रूप से इस तरह लागू किए जाएं, जो मौजूदा तैयारी के अनुरूप हों. कार्यवाही के एकीकरण के जिन उपायों के लिए सेनाओं की फिर से बड़े पैमाने पर स्थायी तैनाती की जरूरत नहीं है उन्हें तेजी से लागू किया जा सकता है. भौगोलिक दृष्टि से पुनर्गठन सीमित रूप से किया जाए, जिसे जरूरत पड़ने पर पलटा भी जा सके.
भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के जरिए दिखा दिया है कि वह पूर्ण थिएटराइजेशन किए बिना भी संयुक्त कार्रवाई वाले नतीजे हासिल कर सकता है. करगिल युद्ध के बाद जो उच्च स्तरीय रक्षा सुधार शुरू किए गए थे वे एकीकृत परामर्श और प्राथमिकता के मामलों में अधूरे पड़े हैं. उन सुधारों को पूरा करना और इसके साथ भारत की रणनीतिक सीमाओं तथा अवसरों के अनुरूप कमांड व्यवस्था को डिजाइन करना उस मॉडल को अपनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण है जो जाना-पहचाना लगता है मगर हमारी जरूरतों के लिए अनुपयुक्त है.
CAS ने रिटायर होने से पहले अपना बयान देकर बर्र के छत्ते को छेड़ दिया है. भारत जिस समस्या को वास्तव में हल करने की कोशिश कर रहा है उसे अगर यह साफ तौर पर परिभाषित करने पर मजबूर करता है तो यह काम का है. जो समाधान उभरे वह मूलतः भारतीय हो, गहन विश्लेषण से उभरा हो, और देश की आकांक्षा, चुनौतियों, संसाधनों, और खतरों के आकार के हिसाब से अनुकूल हो. इससे कमतर समाधान उस समस्या का हल होगा जो किसी और की है.
ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत एक रिटायर्ड IAF फाइटर पायलट हैं. वे @Ahlawat2012 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: सैकड़ों करोड़ की साइबर ठगी के शक में बेंगलुरु में 4 गिरफ्तार, 320 सिम स्लॉट मिले