गेकू, अपर सियांग: गेकू में महिलाओं के एक समूह के साथ बैठीं नूम पनिया सियांग नदी और उसके किनारे की जमीन के बारे में बात करती हैं. उनके लिए 11,200 मेगावाट की प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना कोई सिर्फ बुनियादी ढांचे की परियोजना नहीं है. यह उस जगह के लिए खतरा है, जहां उनका परिवार कई पीढ़ियों से रहता आया है.
उन्होंने कहा, “यह हमारे पूर्वजों की जमीन है. हम इसे कभी खत्म नहीं होने देंगे. बीजेपी सरकार, पेमा खांडू सरकार, हमें हमारे पूर्वजों के घरों से जबरदस्ती हटा रही है. हमारी पूरी जमीन सियांग के नीचे डूब जाएगी.”
पनिया गेकू की उन महिलाओं में शामिल हैं, जो प्रस्तावित डैम और प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट (पीएफआर) के सर्वे के विरोध का चेहरा बनकर सामने आई हैं. आदिवासी आदि समुदाय के सदस्यों की अगुवाई में यह विरोध पिछले एक महीने में तेज हुआ है. गांववालों ने सड़कें रोक दी हैं, सर्वे के लिए लाई जा रही मशीनों का विरोध किया है और सियांग घाटी से सुरक्षा बलों को हटाने की मांग की है.
23 अक्टूबर को तनाव और बढ़ गया, जब परियोजना के खिलाफ 12 घंटे के बंद के दौरान गेकू और पास के कोमकर के प्रदर्शनकारी डाइट-डाइम में इकट्ठा हुए. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के बाद कम से कम चार महिलाएं घायल हो गईं. भीड़ को हटाने के लिए सुरक्षा बलों ने आंसू गैस के गोले छोड़े थे. महिलाओं ने प्रदर्शन में सबसे आगे रहते हुए पुलिस बैरिकेड पर अपने कपड़े उतार दिए. यह परियोजना और सुरक्षा बलों की तैनाती के खिलाफ विरोध जताने का एक नाटकीय तरीका था.
पनिया ने कहा, “हमने अपनी जमीन के लिए विरोध किया था और उसी दौरान उन्होंने हम पर आंसू गैस छोड़ी. इसी वजह से हम गुस्से में हैं. आंसू गैस की वजह से लोग घायल हुए और उन्हें अस्पताल में भी भर्ती कराना पड़ा. आंसू गैस के कारण सांस लेना मुश्किल हो गया था.”
उन्होंने इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा, “यह सब बीजेपी, पेमा खांडू सरकार की तरफ से किया जा रहा है. हम महिलाएं ऐसा कभी नहीं होने देंगी. डैम नहीं, पीएफआर नहीं.”
‘हम अपराधी नहीं हैं’
अरुणाचल प्रदेश गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (एपीयूएपीए), 2014 के तहत अपर सियांग के चार लोगों की हिरासत ने गांववालों के गुस्से को और बढ़ा दिया है. अदुम तायोम, ओमक पारोन, ओकुट पालोह और ओसन पारोन को इस महीने की शुरुआत में हिरासत में लिया गया था.
पनिया ने कहा, “उन्होंने एपीयूएपीए भी लगा दिया है, जिसे वापस लिया जाना चाहिए. हम चोर या हत्यारे नहीं हैं. हमने सिर्फ अपनी जमीन बचाने के लिए अपनी आवाज उठाई है. जो भी अपनी आवाज उठाता है, उसे जेल में डाल दिया जाता है. पुलिस हमें डराने की कोशिश कर रही है.”
गेकू की एक अन्य महिला बिबेन पनिया ने कहा कि अगर समुदाय पर और दबाव बनाया गया तो वह अपना विरोध और तेज करेगा.
उन्होंने कहा, “हम अपनी जमीन को पानी के नीचे नहीं डूबने देंगे. यह सिर्फ पांगिन की बात नहीं है. अगर वे हमें मजबूर करेंगे तो हम अपने विरोध का स्तर और बढ़ाएंगे. अगर वे ऐसा करते हैं तो हम भी पीछे नहीं हटेंगे. हम उनसे डरते नहीं हैं.”
उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए जाने की घटनाओं से गांववालों में खुद को निशाना बनाए जाने की भावना और बढ़ी है. उन्होंने कहा, “वे बिना किसी वजह के हमें जेल में डाल रहे हैं. हमने कुछ भी गलत नहीं किया है.”
गेकू की कई महिलाओं के लिए सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने रोजमर्रा की जिंदगी भी बदल दी है. एक महिला, जिसने अपना नाम नहीं बताने की इच्छा जताई, ने कहा कि सुरक्षा बलों की तैनाती के कारण खेतों तक जाना भी असुरक्षित लगने लगा है.
उन्होंने कहा, “उन्होंने गेकू में इतनी बड़ी संख्या में हथियारबंद सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं कि हमें अपने खेतों तक जाने में भी डर लगता है. वे हमें अपना दाओ तक ले जाने नहीं देते. इतनी पुलिस किस वजह से लगाई गई है? हम अपराधी नहीं हैं.”
दाओ एक पारंपरिक उपयोगी चाकू है, जिसका इस्तेमाल इस इलाके के किसान पेड़-पौधों को साफ करने और फसल काटने के लिए करते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि बार-बार जांच और सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी ने खेती-किसानी की रोजमर्रा की गतिविधि को भी चिंता का कारण बना दिया है.
अपर सियांग जिला प्रशासन का कहना है कि पीएफआर सिर्फ शुरुआती व्यवहार्यता अध्ययन है और डैम बनाने को लेकर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है. डिप्टी कमिश्नर अशोक ताजो ने दिप्रिंट को बताया कि अपर सियांग में पीएफआर का कोई काम शुरू नहीं हुआ है और प्रशासन गांववालों, एनएचपीसी और सरकार के बीच बातचीत के लिए एक मंच बनाने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि, प्रशासन के आश्वासन से गांववालों की चिंता कम नहीं हुई है. उन्होंने प्रस्तावित आजीविका योजनाओं को लेकर स्पष्टता की कमी पर सवाल उठाए हैं.
गेकू की महिलाओं के लिए सियांग परियोजना को लेकर बहस सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि आखिर डैम बनेगा या नहीं. यह इस सवाल से भी जुड़ी है कि जिस जमीन पर वे पीढ़ियों से रह रहे हैं, उसके बारे में फैसला लेने का अधिकार किसके पास है.
पनिया ने कहा, “उन्हें हमारे पास आकर हमसे बात करनी चाहिए, लेकिन तब तक हमारी मांग साफ है: डैम नहीं, पीएफआर नहीं.”
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