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Friday, 30 October, 2026
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‘हमारे हाथ बंधे हैं’—अरुणाचल प्रदेश में BJP कार्यकर्ता पार्टी और लोगों के बीच फंसे

सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की बड़ी पनबिजली और पानी जमा करने वाली बांध परियोजना है.

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यिंगकियॉन्ग: अरुणाचल प्रदेश के अपर सियांग जिले में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दफ्तर इन दिनों बंद पड़ा है. पार्टी की स्थानीय इकाई को डर है कि दफ्तर में तोड़फोड़ हो सकती है या उसके कार्यकर्ताओं पर हमला हो सकता है. पार्टी के सदस्यों का कहना है कि प्रस्तावित सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने की सरकार की कोशिश का बचाव करना उनके लिए लगातार मुश्किल होता जा रहा है.

हालांकि, दफ्तर के अंदर चर्चाएं रुकी नहीं हैं. पार्टी कार्यकर्ता बांध के बढ़ते विरोध के बारे में बात करते हैं, लेकिन साथ ही वे खुद को लंबे समय से नज़रअंदाज़ किए जाने की बात भी करते हैं. बीजेपी कार्यकर्ताओं का कहना है कि आठ जनजातियों वाले अपर सियांग जिले से राज्य सरकार में कोई मंत्री नहीं है. उनका आरोप है कि जिले को बहुत कम ध्यान और पैसा मिलता है, जबकि उनसे जमीन पर पार्टी के अभियानों को चलाने की उम्मीद की जाती है.

इस इलाके में सुरक्षा बलों की तैनाती और इससे स्थानीय संसाधनों पर पड़े दबाव को लेकर भी नाराज़गी है. कार्यकर्ता इसका एक उदाहरण खाना पकाने वाले गैस सिलेंडरों की कमी का देते हैं. उनका कहना है कि इलाके में तैनात केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के लिए गैस की आपूर्ति होने के कारण उनके लिए सिलेंडर लेना मुश्किल हो गया है.

बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच नाराज़गी है और कई बार वे खुद को मजबूर भी महसूस करते हैं. वे पार्टी के प्रति अपनी वफादारी और उस जमीन और समुदाय से अपने रिश्ते के बीच फंस गए हैं, जो बांध का विरोध कर रहे हैं.

बीजेपी की अपर सियांग जिला इकाई के महासचिव टैगो जिजोंग ने दिप्रिंट को बताया, “हम बांध के बारे में खुलकर बात नहीं कर सकते, क्योंकि हम बीजेपी से जुड़े हैं और ऊपर से जो कहा जाता है, हमें उसका पालन करना होता है, लेकिन अगर आप देखें, तो हम भी इन्हीं गांवों और इसी जमीन से हैं. जिस दफ्तर में हम बैठे हैं, बांध बनने के बाद वह भी पानी में डूब जाएगा. कोई भी ऐसा नहीं चाहता, लेकिन हमारे हाथ बंधे हैं.”

जिजोंग ने कहा कि पार्टी के राज्य नेतृत्व ने स्थानीय कार्यकर्ताओं को परियोजना के समर्थन में प्रचार करने का निर्देश दिया है. उन्होंने इसे राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा बताया है.

उन्होंने कहा, “बीजेपी के राज्य कार्यालय से हमें आदेश मिलता है कि यह बांध बनना ही चाहिए. यह राष्ट्रीय मुद्दा है. आपको सियांग और अपर सियांग में गांव-गांव जाकर प्रचार करना है और लोगों को समझाना है.”

पार्टी कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि अपर सियांग को बहुत कम ध्यान और पैसा मिलता है, जबकि उनसे जमीन पर अभियान चलाने की उम्मीद की जाती है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट
पार्टी कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि अपर सियांग को बहुत कम ध्यान और पैसा मिलता है, जबकि उनसे जमीन पर अभियान चलाने की उम्मीद की जाती है | फोटो: वितस्ता कौल/दिप्रिंट

कैंपेन चुपचाप चलाना

उन्होंने कहा कि खुले तौर पर कैंपने चलाना मुश्किल हो गया है. इसके बजाय, कार्यकर्ता इसे चुपचाप करने की कोशिश कर रहे हैं. उन्हें पता है कि अपने ही गांव के लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है.

जिजोंग ने कहा, “हम इसे चुपचाप कर रहे हैं. इस तरह की चीज सार्वजनिक तौर पर नहीं की जा सकती.”

पार्टी कार्यकर्ताओं को जो मुख्य बातें लोगों को बताने के लिए कही गई हैं, उनमें से एक यह है कि चीन की ऊपरी हिस्से में बन रही पनबिजली परियोजना का मुकाबला करने के लिए प्रस्तावित बांध ज़रूरी है, लेकिन यह बात भी गांव के लोगों के सवाल खड़े करती है.

जिजोंग ने कहा, “लोग हमसे पूछते हैं कि अगर चीन का बांध टूट गया तो क्या होगा? क्या तब हमारा बांध पानी को रोक पाएगा?”

बीजेपी कार्यकर्ताओं का कहना है कि परियोजना को लेकर सरकार के रवैये ने भी उन्हें निराश किया है. उनका मानना है कि सरकार के पूर्व-व्यवहार्यता रिपोर्ट (पीएफआर) के चरण में जाने से पहले गांव के लोगों से सही तरीके से बात नहीं की गई.

2024 में अपने चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के स्थानीय विधायक आलो लिबांग ने बांध बनाने का विरोध किया था. लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव जीतने के बाद सरकार के दबाव ने उनका रुख बदल दिया.

जिजोंग ने कहा, “अब लोग हमें अलग नजर से देखते हैं. पार्टी के लोग जमीन पर काम करने की मुश्किलों को नहीं समझते. हमारा ज्यादातर काम अपने पैसे से होता है.”

‘यह अरुणाचल प्रदेश से आगे भी फैलेगा’

बीजेपी की अपर सियांग जिला इकाई के अध्यक्ष ओजिंग पेयांग के लिए यह स्थिति उस राजनीति के उलट है, जिसे उन्होंने वर्षों से इस इलाके में देखा है.

उन्हें याद है कि 2012-13 के आसपास वह विपक्ष में थे. उस समय जिस पार्टी से वह जुड़े थे, उसने बांध के खिलाफ अभियान चलाया था. उस समय की बहस में उस जमीन की कीमत को लेकर बात होती थी, जिस पर कई पीढ़ियों से परिवारों का जीवन चल रहा था.

पेयांग को याद है कि उन्होंने प्रभावित इलाकों की जमीन के लिए मुआवजा बढ़ाने का प्रस्ताव दिया था. उस समय जमीन की कीमत करीब 200 रुपये प्रति वर्ग मीटर थी और उन्होंने इसे 6,000 रुपये प्रति वर्ग मीटर करने का प्रस्ताव रखा था.

उन्होंने कहा कि लेकिन इसके बाद राजनीतिक रुख बदल गए.

पेयांग ने कहा, “जो भी सरकार आती है, वह बांध चाहती है. और अपने आप विपक्ष बांध विरोधी बन जाता है.”

कार्यकर्ता आंदोलन के आसपास बदलते राजनीतिक माहौल पर भी चर्चा करते हैं. इसमें पीपीए नेता और पूर्व विधायक उम्मीदवार नोबेंग बोरेन का सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम (एसआईएफएफ) के अध्यक्ष के तौर पर चुना जाना भी शामिल है. एसआईएफएफ ही परियोजना का विरोध कर रहा है.

बातचीत आखिरकार बांध के खिलाफ बढ़ते विरोध प्रदर्शनों पर लौट आती है. बीजेपी के एक कार्यकर्ता का कहना है कि इलाके में सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने गुस्सा और बढ़ा दिया है. इससे बातचीत की कोई भी कोशिश और मुश्किल हो गई है.

कार्यकर्ता ने कहा, “यह लोकतंत्र है. अब ईटानगर में प्रदर्शन हुए हैं और दिल्ली में भी होंगे. हमें वहां जाने की ज़रूरत भी नहीं है. पूर्वोत्तर और अरुणाचल के लोग और छात्र वहां हैं. वे बाहर निकलेंगे.”

उनके मुताबिक, इस आंदोलन के अरुणाचल प्रदेश से बाहर फैलने की काफी संभावना है.

कार्यकर्ता ने कहा, “यह व्यवस्था और जिस तरह से इस मुद्दे को उठाया गया, वह सही नहीं है. हमें शून्य से शुरुआत करनी होगी. यह चीज फैलेगी. सेना और बाकी सभी के मौजूद रहते कोई शांति वार्ता नहीं हो सकती.”

बंद पड़े दफ्तर में बैठे इन कार्यकर्ताओं के लिए समस्या सिर्फ यह नहीं है कि बांध पर बीजेपी के रुख का बचाव कैसे किया जाए. असली समस्या यह है कि वे उन लोगों को कैसे समझाएं, जिनसे उन्हें बात करने की उम्मीद की जा रही है, जबकि विवाद के केंद्र में मौजूद जमीन और वहां रहने वाले लोग दोनों उनके अपने हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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