पिछले महीने जनता की राय जानने के लिए तीसरी पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जारी किया गया. इससे साफ पता चलता है कि मार्क्सवाद से प्रभावित हमारे अपरिपक्व नेताओं ने पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं की गलतियों से कोई सबक नहीं सीखा है. इस योजना में पांच वर्षों (1961–66) के दौरान कुल 10,200 करोड़ रुपये के निवेश का प्रस्ताव है. इसमें 6,200 करोड़ रुपये सार्वजनिक क्षेत्र और 4,000 करोड़ रुपये निजी क्षेत्र के लिए रखे गए हैं. तीसरी योजना के प्रमुख उद्देश्य हैं—राष्ट्रीय आय में हर वर्ष 5 प्रतिशत से अधिक वृद्धि करना, खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनना, इस्पात, ईंधन और बिजली जैसे बुनियादी उद्योगों का विस्तार करना, देश के मानव संसाधनों का बेहतर उपयोग करना, आय और संपत्ति की असमानता घटाना तथा आर्थिक शक्ति का अधिक समान वितरण सुनिश्चित करना. दूसरे शब्दों में, योजना का मुख्य उद्देश्य देश को आत्मनिर्भर आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ाना और पहली तथा दूसरी योजनाओं के दौरान शुरू हुए प्रयासों को गति देना है.
योजना आयोग का अनुमान है कि राष्ट्रीय आय में घरेलू बचत का हिस्सा 1961 में 8 प्रतिशत और 1966 में 11 प्रतिशत तक बढ़ाया जाएगा. इसी तरह, राष्ट्रीय आय में निवेश का अनुपात 1961 में 11 प्रतिशत और 1966 में 14 प्रतिशत करने का लक्ष्य है. प्रो. रोस्टो और अन्य अर्थशास्त्रियों के अनुसार, किसी देश में निरंतर आर्थिक विकास तभी संभव है, जब वह अपनी राष्ट्रीय आय का लगातार 10 से 12 प्रतिशत बचाए और 12 से 14 प्रतिशत निवेश करे. लेकिन असली सवाल यह है कि जब रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, तब क्या हमारे देश के लोग बचत कर सकते हैं? महंगाई के दबाव में अधिकांश लोगों के लिए अपना गुज़ारा करना भी मुश्किल हो गया है. ऐसे हालात में योजना लागू करने के लिए घरेलू बचत पर लगातार अधिक निर्भर रहना अपने आप को झूठी तसल्ली देने जैसा है.
घरेलू बचत बढ़ाने के लिए कीमतों को आर्थिक नियंत्रणों से नहीं, बल्कि उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाकर स्थिर रखना चाहिए. यह तभी संभव है, जब निजी उद्यमों को हर कदम पर रोकने के बजाय उन्हें पूरी स्वतंत्रता दी जाए.
निजी उद्यमों पर पंडित नेहरू की यह आलोचना कि वे एकाधिकार को जन्म देते हैं, अब पुरानी पड़ चुकी है. आधुनिक लोकतांत्रिक देशों में सरकार के पास उचित कानून बनाकर ऐसे एकाधिकारों को तोड़ने की पर्याप्त शक्ति होती है. भारत में निजी क्षेत्र में जानबूझकर एकाधिकार स्थापित किए जाने के उदाहरण नहीं हैं. यह सही है कि कुछ उद्योगों में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा नहीं है, लेकिन इसका मुख्य कारण सरकार द्वारा लगाए गए आयात प्रतिबंध और अन्य आर्थिक नियंत्रण हैं.
फिलहाल सरकार निजी क्षेत्र में एकाधिकार पर रोक लगाने के लिए कीमतें तय करने, वस्तुओं के उत्पादन और वितरण को नियंत्रित करने, उद्योगों को लाइसेंस देने तथा प्रबंधकों और सचिवों की नियुक्ति की निगरानी जैसी शक्तियों का इस्तेमाल कर रही है. वास्तव में, अवांछनीय एकाधिकार सार्वजनिक क्षेत्र में देखने को मिलते हैं और वे नेहरू जी की आंखों के सामने दिन-ब-दिन बढ़ रहे हैं. ये नुकसानदेह हैं, लेकिन नागरिक इन्हें रोकने में असहाय हैं, क्योंकि राजनेताओं और नौकरशाहों के हाथों में आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण के दुष्परिणामों पर अंकुश लगाने के उनके पास कोई प्रभावी साधन नहीं है. जब तक यह नीति जारी रहेगी, तब तक समृद्धि और आर्थिक प्रगति की बातें केवल दिखावा बनी रहेंगी.
तीसरी पंचवर्षीय योजना के प्रारूप में यह मान लिया गया है कि निजी क्षेत्र से बड़े परिणामों की उम्मीद नहीं की जा सकती और अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र का प्रभुत्व लगातार बढ़ाया जाना चाहिए. आर्थिक आधार पर इस सोच को सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि निजी क्षेत्र ने न केवल अपने निर्धारित लक्ष्य पूरे किए हैं, बल्कि उनसे बेहतर प्रदर्शन भी किया है. इस रवैये का आधार केवल सत्तारूढ़ दल की राजनीतिक विचारधारा हो सकती है.
यह निर्विवाद है कि सार्वजनिक क्षेत्र उतना निवेश नहीं कर पाया, जितना उसे करना चाहिए था. इसकी एक वजह यह है कि उसने अपनी काफी धनराशि ऐसी कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की, जिनसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले. इसके उलट, इन योजनाओं ने मंत्रियों को गरीबों का शोषण करने और डॉ. काल्डोर की सिफारिशों पर अत्यधिक दंडात्मक कर लगाकर निजी क्षेत्र से धन निकालने का अवसर दिया. भारी करों के बावजूद निजी क्षेत्र ने उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए. यदि सरकार ने निजी उद्यमों के सुचारु संचालन के लिए उचित माहौल बनाया होता, तो दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान ही आर्थिक विकास उस निर्णायक चरण तक पहुंच सकता था, जिसे ‘टेक-ऑफ’ कहा जाता है. भारत अब तक उस चरण तक नहीं पहुंचा है. इसका मुख्य कारण दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान सत्तारूढ़ दल की अव्यवस्थित राजकोषीय और मौद्रिक नीतियां हैं.
“पूर्ण रोज़गार और समृद्धि का आधार अत्यधिक महत्वाकांक्षी योजनाएं नहीं हैं. यह इस बात पर निर्भर करता है कि देश के लोग कितनी मेहनत करते हैं, त्याग करने के लिए कितने तैयार हैं और विदेशों से मिलने वाली बड़ी आर्थिक सहायता के साथ-साथ देश में तर्कसंगत आर्थिक नीतियां अपनाई जाती हैं या नहीं.”
दूसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान सत्तारूढ़ दल की कर नीति ने निजी क्षेत्र के पास उपलब्ध धन पर गहरा असर डाला. तीसरी योजना का प्रारूप बताता है कि निजी क्षेत्र से लगातार धन निकालकर सरकारी क्षेत्र को पालने-पोसने की प्रक्रिया और तेज़ होगी. इसका नुकसान कम होता, यदि सरकार उन धनराशियों को जुटाने पर ध्यान देती जो निजी उद्यमों के लिए उपलब्ध ही नहीं हैं. ऐसा करने से कुल बचत बढ़ सकती थी, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में धन अर्थव्यवस्था के एक क्षेत्र से निकालकर दूसरे क्षेत्र में पहुंचा दिया जाता है.
वर्तमान कर व्यवस्था सीधे अर्थव्यवस्था के उन हिस्सों को प्रभावित करती है, जहां स्वेच्छा से बचत करने की संभावना सबसे अधिक होती है. दूसरी ओर, अर्थव्यवस्था के उन अनेक हिस्सों पर लगभग कोई असर नहीं पड़ता, जहां लोग आम तौर पर बचत नहीं करते. और यदि वे बचत करते भी हैं, तो अपना पैसा अनाज, अन्य वस्तुओं और सोने-चांदी के भंडार में लगाकर महंगाई को और बढ़ा देते हैं.
योजना के प्रारूप में अनुमान लगाया गया है कि पांच वर्षों में 1,650 करोड़ रुपये के अतिरिक्त कर लगाए जा सकते हैं, यानी हर साल 330 करोड़ रुपये. लेकिन यह कठिन लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब महंगाई का दबाव और बढ़े. यह याद रखना चाहिए कि ये अतिरिक्त कर उन करों के ऊपर होंगे, जो दूसरी योजना के दौरान लगाए गए थे और जिन्होंने हमारी अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचाया. दूसरे शब्दों में, सार्वजनिक क्षेत्र को चलाने के लिए निजी क्षेत्र पर लगातार अधिक बोझ डाला जाएगा. इससे बेरोज़गारी बढ़ेगी, निवेश करने की इच्छा घटेगी और यह भी संभव है कि देश की पूंजी विदेशों में शरण लेने लगे.
किसी भी गैर-कम्युनिस्ट लोकतांत्रिक समाज में निजी क्षेत्र का आकार हमेशा बड़ा होगा. कहा जाता है कि भारत लोकतंत्र का गढ़ है, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि लोकतंत्र और समाजवाद साथ-साथ नहीं चल सकते.
“लोकतंत्र व्यक्ति की स्वतंत्रता का विस्तार करता है, जबकि समाजवाद उसे सीमित करता है. लोकतंत्र हर व्यक्ति को महत्त्व देता है, जबकि समाजवाद प्रत्येक व्यक्ति को केवल एक साधन, महज़ एक संख्या बना देता है. लोकतंत्र और समाजवाद में समानता के एक शब्द के अलावा कुछ भी साझा नहीं है.”
कम-से-कम 5,000 करोड़ रुपये निजी क्षेत्र के लिए निर्धारित किए जाने चाहिए. तीसरी योजना में सार्वजनिक क्षेत्र को कृषि, सामुदायिक विकास, छोटे उद्योगों और सड़क परिवहन तक फैला दिया गया है. इससे सरकारी दखल बहुत बढ़ जाएगा और कामकाज में भ्रम तथा दोहराव पैदा होगा.
“अब यह बात सामान्य रूप से स्वीकार की जानी चाहिए कि हाल के वर्षों में विशुद्ध वैचारिक विचारों का महत्त्व कम हुआ है. सार्वजनिक स्वामित्व अपने आप में कोई विशेष गुण नहीं है. बल्कि इसमें एक लोकप्रिय सरकार के लिए खतरा भी है, क्योंकि जब भी राष्ट्रीयकृत उपक्रमों में श्रमिक विवाद होगा, सरकार स्वयं एक पक्ष बन जाएगी. आर्थिक संगठन का स्वरूप लोगों की प्रबंधकीय क्षमता और उसके वितरण के अनुरूप होना चाहिए. हमारे लोकतांत्रिक मंत्रियों के पास पहले ही इतने काम हैं कि उन्हें समाजवादी विचारधारा की अस्पष्ट धारणाओं के आधार पर और ज़िम्मेदारियां अपने ऊपर नहीं लेनी चाहिए.”
तीसरी योजना में सामुदायिक विकास परियोजनाओं और सहकारी आंदोलन को देश के सभी गांवों तक पहुंचाने का प्रस्ताव है. छह से ग्यारह वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा ग्रामीण क्षेत्रों में पीने का पानी, हर गांव को निकटतम मुख्य सड़क या रेलवे स्टेशन से जोड़ने वाली सड़कें और गांव में स्कूल की इमारत जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की बात भी कही गई है. स्कूल की इमारत का इस्तेमाल सामुदायिक केंद्र और गांव के पुस्तकालय के रूप में भी किया जा सकता है.
लेकिन ये केवल कल्पनाएं हैं और योजना बनाने की प्रक्रिया में ऐसी अव्यावहारिक उम्मीदों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. आज देश में खाद्य समस्या दूसरी पंचवर्षीय योजना के समय से बेहतर नहीं है. हमारी खाद्य आवश्यकताएं अब भी काफी हद तक अमेरिका और दूसरे देशों से होने वाले आयात पर निर्भर हैं. इसके बावजूद, खाद्य मंत्री श्री एस. के. पाटिल पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि देश 1965–66 तक खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा.
भारत आर्थिक विकास के उस निर्णायक चरण तक तभी पहुंच सकता है, जब निजी उद्यमों को काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिले.
“घरेलू बचत की दर में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि करनी होगी, यह मानते हुए कि प्रस्तावित निवेश का 21.5 प्रतिशत हिस्सा विदेशी सहायता से आएगा. बचत में इतनी तेज़ वृद्धि के लिए उपभोग पर पर्याप्त संयम रखना होगा. यह तभी संभव है, जब आम जनता, विशेषकर औद्योगिक और कृषि क्षेत्र के श्रमिक, समझदारी और सहयोग की भावना से इसमें पूरा योगदान दें.
आज मध्यवर्ग और श्रमिक वर्ग में जो बेचैनी दिखाई दे रही है, वह एक गंभीर संकेत है. इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता और न ही इसे अस्थायी विचलन मानकर खारिज किया जाना चाहिए. व्यावहारिक सोच की मांग है कि योजना में भोजन, कपड़े, चीनी और आवास की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और उनकी कीमतें ऐसी हों कि जीवन-यापन की लागत और न बढ़े. लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्था को विकास के निर्णायक चरण तक पहुंचाने के लिए यह एक अनिवार्य शर्त है.”
यह लक्ष्य तभी हासिल किया जा सकता है, जब देश के आर्थिक विकास में निजी क्षेत्र को उसकी उचित भूमिका निभाने का अवसर दिया जाए. गरीबों का पेट खोखले नारों और अत्यधिक महत्वाकांक्षी योजनाओं के मसौदे से नहीं भरा जा सकता.
यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे “फ्रीडम फर्स्ट” पुस्तिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “निजी क्षेत्र और तीसरी पंचवर्षीय योजना” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से अगस्त 1960 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.
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