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Friday, 30 October, 2026
होमफीचरअरुणाचल की आजीविका योजना को लेकर स्पष्टता की कमी से बांध विरोधी प्रदर्शन बढ़े: अपर सियांग डीसी

अरुणाचल की आजीविका योजना को लेकर स्पष्टता की कमी से बांध विरोधी प्रदर्शन बढ़े: अपर सियांग डीसी

अशोक ताजो ने कहा कि आजीविका योजना के बारे में लोगों को ठीक से नहीं बताया गया. इससे लोगों को शक हुआ कि प्रशासन बांध के लिए सहमति लेने के बदले आर्थिक मदद का इस्तेमाल कर रहा है.

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यिंगकियॉन्ग: अरुणाचल प्रदेश सरकार ने प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना से प्रभावित परिवारों के लिए बनाई गई आजीविका योजना के तहत अब तक कोई पैसा नहीं दिया है. वहीं बांध और प्रस्तावित प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट (पीएफआर) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी हैं. इन प्रदर्शनों के कारण गांवों के लोगों से बातचीत करने की कोशिशें भी मुश्किल हो रही हैं. अपर सियांग के डिप्टी कमिश्नर अशोक ताजो ने दिप्रिंट को यह जानकारी दी.

ताजो ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पिछले जून में घोषित 350 करोड़ रुपये की स्पेशल डेवलपमेंट एंड लाइवलीहुड योजना सभी पात्र परियोजना प्रभावित परिवारों के लिए थी. यह सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं थी, जिन्होंने सहमति से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे.

ताजो ने गुरुवार को एक इंटरव्यू में कहा, “आपकी आजीविका से जुड़ी गतिविधियों की बात करें तो यह सिर्फ उन लोगों तक सीमित नहीं होगी, जिन्होंने आवेदन पर हस्ताक्षर किए हैं. यह योजना सभी परियोजना प्रभावित परिवारों के लिए है.”

हालांकि, इस योजना के तहत अब तक पैसे नहीं मिलने से उन ग्रामीणों के बीच अविश्वास बढ़ा है, जिन्होंने इस कार्यक्रम के लिए अपना नाम दर्ज कराया था. अब कुछ लोगों का कहना है कि प्रशासन ने उन्हें गुमराह किया. डिप्टी कमिश्नर ने भी इसे माना.

उन्होंने कहा, “हमें अभी तक एक भी रुपया नहीं मिला है. उन्होंने एक योजना भेजी है.” उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन योजना की शर्तों के बारे में लोगों को जानकारी देने और इसके लागू होने को लेकर उनकी चिंताओं को दूर करने की कोशिश कर रहा है.

ग्रामीणों के आरोपों के बीच विरोध प्रदर्शन तेज़ हो गए हैं. ग्रामीणों का कहना है कि आजीविका योजना में शामिल करने के नाम पर उन्हें प्रस्तावित बांध और इसकी पीएफआर स्टडी से जुड़े दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने के लिए गुमराह किया गया. लोगों ने इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और उन परिस्थितियों पर भी सवाल उठाए हैं, जिनमें समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए.

हालांकि, एमओयू में कहा गया है कि स्पेशल डेवलपमेंट पैकेज को लागू करना “अपने आप में संभावित परियोजना प्रभावित परिवारों की ओर से एसयूएमपी के निर्माण के लिए सहमति नहीं माना जाएगा.”

ताजो ने कहा कि योजना के बारे में लोगों को जानकारी देने और दस्तावेज़ को समझाने के प्रशासन के तरीके ने मौजूदा स्थिति पैदा करने में भूमिका निभाई.

उन्होंने कहा, “अगर तरीका सही होता, तो यह स्थिति पैदा ही नहीं होती.”

भ्रम और संदेह

सियांग और अपर सियांग जिलों के उन गांवों को 350 करोड़ रुपये का पैकेज देने का प्रावधान है, जो इस परियोजना से प्रभावित हो सकते हैं. इस योजना के तहत पात्र परिवारों को 2.5 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जानी है. इसके साथ बागवानी, पशुपालन, हस्तशिल्प, बांस से सामान बनाने और मधुमक्खी पालन जैसी आजीविका गतिविधियों की ट्रेनिंग भी दी जानी है. कुछ परिवारों को अपने घरों को होमस्टे में बदलने के लिए भी मदद मिलने की उम्मीद है.

इस योजना का उद्देश्य उन समुदायों की मदद करना है, जो प्रस्तावित परियोजना से आंशिक या पूरी तरह प्रभावित हो सकते हैं. राज्य सरकार की घोषणा के मुताबिक, पात्र परिवार इस आर्थिक मदद का इस्तेमाल अपनी जरूरत और प्राथमिकता के हिसाब से कर सकते हैं.

ताजो ने कहा कि आजीविका योजना का एक उद्देश्य लोगों को भविष्य में बांध बनने की स्थिति में संभावित विस्थापन और उनकी मौजूदा आजीविका में होने वाले बदलावों के लिए तैयार करना भी था. उन्होंने कहा कि ट्रेनिंग का उद्देश्य लोगों को कमाई के दूसरे साधन तलाशने में मदद करना था. इसमें ऐसे क्षेत्र भी शामिल हैं, जहां पानी का स्तर बढ़ने से मौजूदा कृषि भूमि प्रभावित हो सकती है.

लेकिन उन्होंने कहा कि इस योजना के बारे में लोगों को ठीक से नहीं समझाया गया. इससे लोगों को शक होने लगा कि प्रशासन बांध के लिए सहमति लेने के लिए आर्थिक मदद का इस्तेमाल कर रहा है.

उन्होंने कहा, “यह धारणा बन गई है कि हम यह योजना चुनिंदा लोगों को दे रहे हैं. यह सभी के लिए खुली थी. अब मैं फिर कह रहा हूं कि यह सभी के लिए खुली है.”

इस बीच, पीएफआर स्टडी का उद्देश्य प्रस्तावित परियोजना की व्यवहारिकता का आकलन करना है. ताजो ने जोर देकर कहा कि सिर्फ यह अध्ययन किए जाने का मतलब यह नहीं है कि बांध बनाया ही जाएगा.

उन्होंने कहा, “यहां पीएफआर को लेकर अभी कुछ नहीं हुआ है. लेकिन हम तैयार हैं.” उन्होंने कहा कि प्रशासन को गांव के लोगों को इस अध्ययन का उद्देश्य समझाने और उनके और मुख्यमंत्री के बीच सीधे बातचीत कराने की जरूरत है.

प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना का स्थानीय आबादी के कुछ हिस्सों की ओर से लगातार विरोध किया जा रहा है. इन लोगों को डर है कि परियोजना से उनकी जमीन, आजीविका और बस्तियों पर असर पड़ सकता है.

ताजो ने मौजूदा गतिरोध के एक हिस्से के लिए राजनीतिक दखल और पीएफआर के लिए सहमति लेने की प्रक्रिया को लेकर मतभेदों को भी जिम्मेदार बताया.

उन्होंने कहा कि यह मुद्दा राजनीतिक रूप से विवादित हो गया है. स्थानीय नेता बांध और लोगों से बातचीत करने की प्रशासन की कोशिशों को लेकर अलग-अलग रुख अपना रहे हैं.

ताजो के मुताबिक, जब पीएफआर से जुड़े दस्तावेज़ आजीविका योजना के साथ लोगों के बीच बांटे गए, तब गांव के लोगों को खास तौर पर शक होने लगा. उन्होंने कहा कि लोगों ने सवाल उठाया कि दस्तावेज़ की पूरी जानकारी दिए बिना एमओयू पर हस्ताक्षर क्यों कराए गए.

उन्होंने कहा कि योजनाओं को लागू करने के लिए गांव विकास समितियां (वीडीसी) बनाने से भी चिंता पैदा हुई है, क्योंकि गांवों में पहले से चुनी हुई पंचायतें मौजूद हैं.

ताजो ने कहा, “हमारे यहां चुनी हुई पंचायत है. यहां उन्होंने गांव विकास समितियां बनानी शुरू कर दीं. इनके जरिए वे इन योजनाओं को लागू करना चाहते थे.” उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की समानांतर व्यवस्थाएं गांवों में अधिकार के अलग-अलग केंद्र बना सकती हैं.

उन्होंने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के कारण उन लोगों के बीच भी डर का माहौल बन गया है, जिन्होंने एमओयू पर हस्ताक्षर किए थे. ताजो ने आरोप लगाया कि गेकू में 31 घरों को नुकसान पहुंचाया गया और योजना का समर्थन करने वाले लोगों को डराने की कोशिश के तहत बगीचों, बागवानी फार्मों और उपज को नष्ट किया गया.

उन्होंने कहा कि इससे लोगों के लिए खुलकर अपनी बात रखना और प्रशासन के लिए विरोध कर रहे अलग-अलग समूहों को बातचीत की मेज पर लाना और मुश्किल हो गया है.

भरोसा फिर से बनाने की कोशिश

प्रशासन अब सरकार और परियोजना का विरोध कर रहे स्थानीय समूहों के बीच बातचीत कराने की कोशिश कर रहा है. ताजो ने कहा कि इन बातचीत की कोशिशें 13 अक्टूबर से चल रही थीं. इसके बाद 23 अक्टूबर को भी बातचीत नहीं हो सकी, क्योंकि मुख्यमंत्री प्रदर्शनकारियों से मुलाकात नहीं कर सके.

उन्होंने कहा कि प्रशासन अब मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से नई तारीख तय किए जाने का इंतज़ार कर रहा है.

ताजो ने कहा कि प्रशासन अलग-अलग संगठनों और समूहों से भी बातचीत कर रहा है. इनकी मांगों में हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) के जवानों को वापस बुलाना और पुलिस मामले वापस लेना शामिल हैं.

उन्होंने कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई का मुद्दा प्रशासन उठा सकता है. वहीं पुलिस मामलों और केंद्रीय बलों की तैनाती पर फैसला क्रमशः पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में है.

ताजो ने कहा कि अशांति के बाद अपर सियांग में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ाई गई है. उन्होंने कहा कि शुरुआत में जिले में सात कंपनियां तैनात की गई थीं. पासीघाट की घटना के बाद यह संख्या बढ़कर आठ हो गई. वह रैपिड एक्शन फोर्स की तैनाती का ज़िक्र कर रहे थे.

ताजो ने कहा कि सुरक्षा बलों की तैनाती का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना था कि सरकारी अधिकारी अपना काम जारी रख सकें. लेकिन उन्होंने माना कि सुरक्षा बलों की मौजूदगी ने सामान्य स्थिति वापस लाने की कोशिशों को और मुश्किल बनाया है.

उन्होंने कहा, “अब यह मेरी जिम्मेदारी है. मुझे शांति वार्ता के लिए उन्हें एक मंच पर लाना है. अभी मेरे सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है.”

उन्होंने कहा कि प्रशासन यह सुनिश्चित करना चाहता है कि गांव के लोग बिना किसी डर या दबाव के बातचीत में शामिल हो सकें.

अरुणाचल प्रदेश अनलॉफुल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (एपीयूएपीए) के तहत इस क्षेत्र के चार लोगों को हिरासत में लिया जाना भी जारी तनाव का हिस्सा है. ताजो ने कहा कि सरकार ने हिरासत के आदेशों को मंजूरी दे दी है और शुक्रवार को रिटायर्ड जज की अध्यक्षता वाला एक सलाहकार बोर्ड इन मामलों की समीक्षा करेगा.

उन्होंने कहा कि इन हिरासतों से आगे की घटनाओं को रोकने में मदद मिली है. लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन शांतिपूर्ण बातचीत की दिशा में काम करता रहेगा.

फिलहाल चुनौती यह है कि उन गांव के लोगों के बीच फिर से भरोसा बनाया जाए, जिन्हें डर है कि आजीविका योजना बांध के लिए सहमति लेने से जुड़ी हुई है. साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि योजना में शामिल हुए लोगों को वादा की गई आर्थिक मदद के लिए अनिश्चित समय तक इंतजार न करना पड़े.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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