यह पंजाब के सीमावर्ती जिलों में पंजाब पुलिस के असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टरों (ASI) पर हुए हमलों पर आधारित दो पार्ट की सीरीज का पहला भाग है.
गुरदासपुर/अमृतसर: पंजाब पुलिस में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (ASI) जोगा सिंह के लिए मई का महीना जिंदगी के सबसे अच्छे दौर जैसा लग रहा था. उनकी तरक्की होने वाली थी, उनके दोनों बच्चे विदेश में बस चुके थे और उनकी नई-नई शादी हुई बहू को कनाडा का वीजा भी मिल गया था.
23 मई को जोगा सिंह ने इंडियन प्रीमियर लीग के एक मैच में अपनी पसंदीदा टीम पंजाब किंग्स को लखनऊ सुपर जायंट्स को हराते हुए देखा. लेकिन सोने से पहले उनके वरिष्ठ अधिकारी के एक फोन ने उनकी योजनाएं बदल दीं. उन्हें अगली सुबह अपनी रोजाना की सुबह 9 बजे वाली ड्यूटी से कुछ घंटे पहले आने के लिए कहा गया.
जोगा अमृतसर पुलिस की ट्रैफिक विंग में तैनात थे. उन्हें आखिरी समय पर ऐसे फोन आने की आदत थी, खासकर उन दिनों जब किसी वीआईपी की आवाजाही होती थी. लेकिन अगली सुबह उनकी दिनचर्या में हुआ एक छोटा-सा बदलाव उनकी जान ले बैठा.
24 मई की सुबह-सुबह, गुरदासपुर और अमृतसर के बीच सफर करते समय मोटरसाइकिल पर सवार हमलावरों ने 9 एमएम की पिस्तौल से जोगा सिंह को गोली मार दी.
उनकी पत्नी कौर ने कनाडा से दिप्रिंट को फोन पर बताया, “पिछले एक साल से वह रोज कार से काम पर जाते थे. कार का टायर पंक्चर हो गया था और उनके पास उसे बदलने का समय नहीं था. इसलिए वह जल्दबाजी में बाइक से काम पर निकल गए. वह सिर्फ उसी दिन बाइक से काम पर गए थे और वही आखिरी दिन था, जब मैंने अपने पति को देखा.” यह बताते हुए वह रो पड़ीं. जोगा सिंह की हत्या के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उनके बच्चे उन्हें कनाडा ले गए.
Today, visited the residence of Martyr ASI Joga Singh of @BatalaPolice to pay my respects and extend my deepest condolences to his bereaved family.
ASI Joga Singh made the supreme sacrifice in the line of duty, exemplifying the highest traditions of Punjab Police through his… pic.twitter.com/Sbfn53rbnA
— DGP Punjab Police (@DGPPunjabPolice) May 30, 2026

जोगा सिंह की हत्या कोई अकेली घटना नहीं थी.
फरवरी से अब तक पंजाब के सीमावर्ती जिलों गुरदासपुर, अमृतसर और तरनतारन में सात पुलिसकर्मियों को गोली मारी जा चुकी है. इनमें से छह एएसआई थे, जिनकी वर्दी पर लगे एक सितारे से उनकी पहचान होती है. इन हमलों में सिर्फ दो पुलिसकर्मी बच पाए. मारे गए लोगों में से तीन हमले के समय वर्दी में थे.
पंजाब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को शक है कि इनमें से एक हत्या को छोड़कर बाकी सभी हत्याओं के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के इशारे पर काम करने वाले पाकिस्तान के खुफिया एजेंट (PIOs) थे. जांचकर्ताओं का मानना है कि इन हमलों का मकसद पुलिस बल में डर पैदा करना, दहशत फैलाना और पहले से ही संवेदनशील सीमावर्ती राज्य को अस्थिर करना था.
पुलिस ने इन हमलों को अंजाम देने के लिए कथित तौर पर भर्ती किए गए 21 लोगों को गिरफ्तार किया है.
गोलीबारी में इस्तेमाल किए गए हथियार भी पाकिस्तान से कथित संबंध का संकेत देते हैं. चीन में बनी नोरिनको .30-बोर पिस्तौल और ऑस्ट्रिया में बनी तीसरी पीढ़ी की 9 एमएम ग्लॉक पिस्तौल भारत में प्रतिबंधित हैं. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, ये हथियार तस्करी के नेटवर्क के जरिए देश में लाए जाते हैं. अधिकारियों का आरोप है कि पाकिस्तान में हथियारों के तस्कर मोल्डिंग मशीनों का इस्तेमाल करके इन हथियारों की पहली नकल यानी हूबहू दिखने वाली नकली प्रतियां बना रहे हैं. उनका अनुमान है कि हर दिन सीमा पार से ड्रोन के जरिए 80 से 100 हथियार पंजाब में तस्करी करके लाए जाते हैं.
जांचकर्ताओं को शक है कि इन हमलों के पीछे पाकिस्तान में बैठे ऐसे लोग हैं, जो ‘तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान’ (TTH) नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह एक ऐसा संगठन है, जिसके बारे में बहुत कम जानकारी है और पुलिस इसे अपने अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक मुखौटा बताती है.
सीमा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक गुरप्रीत सिंह भुल्लर ने दिप्रिंट को बताया, “इन PIOs और विदेश में बैठे उनसे जुड़े लोगों ने देश में अपने दोस्तों और साथियों के जरिए समाज के आर्थिक रूप से कमजोर तबके के युवाओं को अपने जाल में फंसाया है. वे उन्हें लाखों रुपये देने और विदेश में बसाने जैसे बड़े-बड़े, लेकिन झूठे वादे करते हैं.”

गोलीबारी के बीच वर्दी पर लगा एक सितारा
संदिग्ध तरीके से निशाना बनाकर की गई इन हत्याओं के पहले पहचाने गए शिकार एएसआई गुरनाम सिंह और होमगार्ड अशोक कुमार थे. 21 फरवरी को पाकिस्तान सीमा के पास गुरदासपुर जिले के अधियां गांव में दोनों की हत्या कर दी गई थी.
सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में दोनों लोगों को सोते समय बेहद करीब से गोली मारते हुए देखा गया. अगली सुबह गांव वालों को उनके शव मिले.
गुरदासपुर पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया. इनमें अधियां के रहने वाले रणजीत सिंह और दिलावर सिंह तथा अली नंगल गांव का इंदरजीत सिंह शामिल थे. बाद में एक मुठभेड़ में रणजीत मारा गया. उसके परिवार ने दावा किया कि मुठभेड़ फर्जी थी. पुलिस ने अपनी चार्जशीट में आरोप लगाया कि तीनों ने PIOs के निर्देश पर इन हत्याओं को अंजाम दिया था और इसके बदले उन्हें 2 लाख से 4 लाख रुपये तक दिए गए थे.
हालांकि, मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने बताया कि रणजीत की गुरनाम सिंह से निजी दुश्मनी भी थी. अधियां में जिस चेकपोस्ट पर एएसआई तैनात थे, उसके पास दोनों के बीच बहस हुई थी. इसके बाद रणजीत के मन में गुरनाम के खिलाफ रंजिश पैदा हो गई थी.

इसके बाद मई में अमृतसर में जोगा सिंह की हत्या हुई. गुरदासपुर के मामले की तरह इस गोलीबारी का वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आया और TTH ने इसकी जिम्मेदारी ली.
कुछ समय तक हमले रुके रहे, लेकिन सितंबर में फिर शुरू हो गए.
11 सितंबर को अमृतसर सिटी कमिश्नरेट में ड्यूटी से घर लौट रहे एएसआई जसवंत सिंह को मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने पीछे से गोली मार दी. गोली उनके सिर पर लगी, लेकिन पगड़ी की वजह से उनकी जान बच गई.
अमृतसर ग्रामीण पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया. इनमें झनझोटी गांव के करणबीर सिंह उर्फ नंदी पर मोटरसाइकिल चलाने और गुरप्रीत सिंह उर्फ गोपी पर गोली चलाने का आरोप है. पुलिस ने बताया कि अमृतसर में मजदूरी करने वाले गुरप्रीत का संपर्क एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप जिंगा के जरिए पाकिस्तान के गैंगस्टर शहजाद भट्टी से हुआ था.
एक हफ्ते बाद, 18 सितंबर को अमृतसर शहर के दाना मंडी इलाके में रात की गश्त के दौरान एएसआई हरजीत सिंह को पीछे से गोली मार दी गई.
सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण से पता चला कि दो संदिग्ध बाजार में घूम रहे थे. उन्होंने हरजीत सिंह को ड्यूटी पर तैनात बाकी दो पुलिसकर्मियों से कुछ दूर अकेले देखा. इसके बाद कथित तौर पर वे उनके पास पहुंचे और पीछे से गोली मार दी.
अमृतसर पुलिस ने एक आरोपी दीपक सिंह को गिरफ्तार किया, जिसे बाद में एक मुठभेड़ में मार दिया गया. अमृतसर पुलिस के एक अधिकारी ने बताया, “उसके फोन की जांच से पता चला कि वह सीमा पार बैठे एक हैंडलर के संपर्क में था. जानलेवा हमले से पहले के एक हफ्ते के दौरान उसे 16,000 रुपये मिले थे.” दूसरा आरोपी अब भी फरार है.

4 अक्टूबर को अमृतसर ग्रामीण पुलिस जिले के जगदेव खुर्द गांव में अपने घर से कुछ मीटर दूर एएसआई सुखचैन सिंह पर बाइक सवार हमलावरों ने गोली चला दी. वह शहर में सरकारी रेलवे पुलिस में ड्यूटी करने के बाद घर लौट रहे थे. एक गोली उनके बाएं बाजू में लगी, लेकिन उन्होंने बाइक चलाना जारी रखा और किसी तरह घर पहुंच गए.


एक हफ्ते बाद, 11 अक्टूबर को एएसआई इकबाल सिंह की तरनतारन में उनके घर से कुछ मीटर दूर गोली मारकर हत्या कर दी गई. वह गुरुद्वारे से लौट रहे थे. पुलिस ने आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया. इनमें जेल में बंद एक स्थानीय गैंगस्टर भी शामिल था. वह पहले इकबाल के भतीजे का दोस्त था, लेकिन बाद में दोनों के बीच दुश्मनी हो गई. पुलिस का कहना है कि यह मामला बाकी मामलों से अलग था. इसके पीछे गैंगों के बीच आपसी दुश्मनी थी, जिसमें इकबाल का बेटा और भतीजा शामिल थे. पिछले महीने उनके भतीजे की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.
एएसआई को ही निशाना क्यों बनाया गया
बाकी मामलों में अधिकारियों का कहना है कि सबसे चिंताजनक बात यह थी कि हमले अचानक मिले मौकों का फायदा उठाकर करने से आगे बढ़कर खास लोगों को निशाना बनाकर की गई हत्याओं में बदलते दिखे. जांचकर्ताओं को शक है कि स्थानीय हमलावर विदेश में बैठे हैंडलरों के खास निर्देशों पर गोलीबारी कर रहे थे. ये हैंडलर खुद PIOs के संपर्क में थे.
पुलिस सूत्रों का मानना है कि शुरुआती हमलों को आसानी से अंजाम देने और उनसे पैदा हुए डर के कारण हमलावरों ने ज्यादा सोची-समझी रणनीति अपनानी शुरू कर दी. इसके बाद पूरे इलाके में कम समय के भीतर एक के बाद एक हमले होने लगे.
पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “शुरुआत में यह अचानक सामने आए एक मौके का मामला था और शुरुआती कुछ घटनाएं संयोग से हुई थीं. लेकिन धीरे-धीरे यह एक सोची-समझी रणनीति बन गई. हमलावरों ने निशाना बनाए जाने वाले लोगों की पहचान और उनके बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी. उनके आने-जाने के रास्तों की रेकी की गई और उन जगहों को चिह्नित किया गया, जहां उन्हें निशाना बनाया जा सकता था. सुखचैन और जसवंत के मामलों में ऐसा ही देखने को मिला.”
अधिकारी ने कहा, “इसी वजह से उन पुलिसकर्मियों पर भी हमले हुए, जो वर्दी में नहीं थे. तब तक गोली चलाने वाले हमलावरों को उनकी दिनचर्या और आवाजाही के बारे में सटीक जानकारी और निर्देश मिल चुके थे.”
पंजाब पुलिस और खुफिया एजेंसियों के आकलन के मुताबिक, इन हमलों का मकसद मौके पर तैनात पुलिसकर्मियों का मनोबल तोड़ना और उन्हें “वापस अपनी बैरकों में धकेलना” था.
हालांकि, तरनतारन में हुई हत्या के पीछे अलग विवाद नजर आता है, लेकिन बाकी हमलों में एक बात खास तौर पर दिखाई देती है. हमले के शिकार ज्यादातर लोग एएसआई थे, जिनकी वर्दी पर लगे एक सितारे से उनकी पहचान होती है.
पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने कहा, “इस बात का कोई पक्का जवाब नहीं है कि हमलों में सिर्फ एएसआई को ही क्यों निशाना बनाया गया. लेकिन इसकी एक संभावित वजह यह हो सकती है कि उनका रैंक इतना छोटा नहीं है कि उन पर हमला करने का कोई खास असर न हो और न ही वे इतने बड़े अधिकारी हैं कि हमलावरों की साजिशों और हमलों से पूरी तरह सुरक्षित रहें.”
उन्होंने आगे कहा कि कांस्टेबल का रैंक बहुत छोटा होता है, इसलिए उसे निशाना बनाने से हमलावरों को वह असर हासिल नहीं होगा, जो वे चाहते हैं. वहीं, सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी के साथ आमतौर पर हर समय एक या दो लोग रहते हैं.
हालांकि, अधिकारी ने आगाह किया कि ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि एएसआई को किसी खास निशाना सूची में रखा गया था.

पर्दे के पीछे का संगठन, हैंडलर और पैसों का लेन-देन
सुखचैन सिंह पर हुए हमले की जांच से पंजाब पुलिस को यह समझने में मदद मिली कि कथित तौर पर इन हत्याओं को किस तरह अंजाम दिया जा रहा था. इस हमले में स्थानीय शूटर, जेल में बंद एक बिचौलिया, विदेश में बैठे हैंडलर, छिपाकर रखे गए हथियार और छोटी-छोटी रकम का लेन-देन शामिल था.
अमृतसर ग्रामीण पुलिस ने इस हमले के सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें साहिब सिंह उर्फ गोरी, सिमरनजीत सिंह और बलजीत सिंह शामिल थे. उनसे पूछताछ के बाद जांचकर्ताओं को बलजीत सिंह उर्फ बब्बन के बारे में पता चला. बब्बन गोइंदवाल साहिब जेल में बंद था. उसी जिले के भिंडी सैदां पुलिस थाने पर मार्च में हुए ग्रेनेड हमले के मामले में उसे जेल भेजा गया था.
पुलिस जांच के मुताबिक, विदेश में बैठे दो गैंगस्टरों ने इस हमले के लिए बब्बन को भर्ती किया था. इनमें मोगा का रहने वाला हरमनप्रीत सिंह शामिल था, जो यूरोप में रहता है. दूसरा बब्बन का स्कूल का पूर्व साथी बादलप्रीत सिंह था, जिसका पता पुर्तगाल में चला है.
गोलीबारी से पांच दिन पहले बादलप्रीत ने कथित तौर पर एक हथियार का इंतजाम किया और बब्बन के फोन पर कुछ निर्देशांक भेजे. इन निर्देशांकों से अमृतसर ग्रामीण पुलिस जिले के मजीठा इलाके में भोमा गांव के पास हथियार छिपाकर रखने की जगह का पता चलता था.
एक अधिकारी ने कहा, “हथियार को गुप्त तरीके से पहुंचाने के लिए ‘डेड लेटर बॉक्स’ का तरीका अपनाया गया था.”
दूसरी ओर, जांचकर्ताओं को पता चला कि हमले के लिए पैसे एक हफ्ते से भी ज्यादा पहले भेज दिए गए थे. पुलिस का आरोप है कि बब्बन ने गोली चलाने के लिए गोरी को भर्ती किया था और पैसे तरनतारन में काम करने वाले एक मनी एक्सचेंजर के जरिए भेजे गए थे, जो वेस्टर्न यूनियन का इस्तेमाल करता था.
पुलिस ने इस मामले में वेस्टर्न यूनियन के एजेंट रितिक शर्मा को भी आरोपी बनाया है. अधिकारी ने कहा, “पैसे चार-पांच लेन-देन में भेजे गए थे और हर बार 10,000 रुपये से कम की रकम भेजी गई थी.”
हरजीत सिंह के मामले में भी कथित तौर पर इसी तरह पैसे दिए जाने के संकेत मिले हैं. पुलिस के मुताबिक, गोलीबारी से कुछ समय पहले आरोपियों को 16,000 रुपये मिले थे.
जांचकर्ताओं का मानना है कि स्थानीय हमलावर आखिरकार TTH नाम से काम करने वाले हैंडलरों के निर्देशों पर चल रहे थे. हालांकि, पंजाब पुलिस के मुताबिक, जांचकर्ताओं को अब तक ऐसा कोई डिजिटल सबूत नहीं मिला है, जिससे यह साबित हो कि यह संगठन एक संगठित इकाई के रूप में मौजूद है.
आतंकवाद से जुड़े मामलों की जांच का अनुभव रखने वाले पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने कहा, “यह एक काल्पनिक संगठन है, जो ISI और उसके एजेंटों को इस बात से इनकार करने का मौका देता है कि अगर उनके नाम पर कोई बड़ी घटना होती है, तो उससे उनका कोई संबंध है.”
अधिकारी ने कहा कि ऐसे संगठन अक्सर सिर्फ नाम के होते हैं और उनके पीछे कोई बड़ा या मजबूत संगठन नहीं होता.
पाकिस्तानी गैंगस्टर शहजाद भट्टी, जिस पर पुलिस ने जसवंत सिंह पर हुए हमले में शामिल होने का आरोप लगाया है, उन लोगों में से एक है जिनके बारे में जांचकर्ताओं को शक है कि वे ISI के हैंडलरों के निर्देश पर काम करते हैं.
अधिकारी ने कहा, “भट्टी और TTH ही ऐसे अकेले लोग या संगठन नहीं हैं, जो ISI के लिए यह गंदा काम कर रहे हैं. TTH या खालिस्तान लिबरेशन आर्मी (KLA) जैसे नाम दरअसल ‘खालिस्तान’ और ‘हिंदुस्तान’ शब्दों का चालाकी से इस्तेमाल करके बनाए गए हैं. इनके जरिए यह दावा करने की कोशिश की जाती है कि ये संगठन भारत में काम कर रहे हैं, अगर कोई बड़ी घटना होती है.”
मई में दो धमाके हुए थे. इनमें से एक अमृतसर के सेना शिविर में और दूसरा जालंधर में बीएसएफ मुख्यालय के बाहर हुआ था. इसके बाद पंजाब के पुलिस महानिदेशक गौरव यादव ने ऐसे संगठनों और उनके लिए काम करने वाले लोगों को “अस्तित्वहीन संगठन” और “ISI के कठपुतली” बताया था.
पंजाब में पुलिसकर्मी दहशत में
सुखचैन सिंह गोली लगने के बावजूद मौत से बच गए, लेकिन जिस तरह से उन पर हमला हुआ, उसे लेकर उनका परिवार अब भी परेशान है. परिवार को चिंता है कि नौकरी के बचे हुए सालों में उनकी सुरक्षा कैसे होगी.
जब दिप्रिंट उनसे मिलने उनके घर पहुंचा, तो उनकी पत्नी काफी देर तक ड्राइंग रूम की दीवारों को निहारती रहीं. फिर उन्होंने चुप्पी तोड़ी और सुखचैन की सुरक्षा को लेकर अपने डर के बारे में खुलकर बताया.
उन्होंने अपना नाम नहीं बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, “उनकी नौकरी के अभी छह से आठ साल बाकी हैं और वह कई सालों से इसी रास्ते से आते-जाते रहे हैं. अब यह सब कहां जाकर रुकेगा?” उन्होंने आगे कहा, “हमें उनकी सुरक्षा की चिंता है, लेकिन हमें नहीं पता कि उन्हें सुरक्षित रखने के लिए क्या किया जा सकता है.”
गुरदासपुर के गडारियां गांव में गुरनाम सिंह के घर पर भी इसी तरह की चिंता का माहौल है. उनके बेटे संदीप सिंह को कनाडा का वर्क परमिट मिल गया है और अब उनकी भारत में रहने की कोई योजना नहीं है.
ड्यूटी के दौरान गुरनाम सिंह की मौत के बाद पंजाब पुलिस उनके परिवार के एक सदस्य को मुआवजे के तौर पर नौकरी देने वाली है. यह नौकरी उनकी सबसे बड़ी बेटी को मिलनी है, लेकिन परिवार की एक खास मांग है कि उसे दफ्तर में बैठकर काम करने वाली नौकरी दी जाए.
संदीप ने अपने घर पर दिप्रिंट से कहा, “हमने सरकार से अनुरोध किया है कि उसे सिर्फ क्लर्क की नौकरी दी जाए, फील्ड में काम करने की नहीं.” उन्होंने कहा, “महिलाओं को वैसे भी घर से बाहर सुरक्षा से जुड़ी कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. अगर ऐसे लोगों से मिलने वाली धमकियों को भी इसमें जोड़ दें, तो बेहतर होगा कि उसे दफ्तर में बैठकर काम करने वाली नौकरी दी जाए.”
अमृतसर शहर में तैनात एक एएसआई ने पुलिसकर्मियों के बीच फैली चिंता की बड़ी तस्वीर पेश की. नाम न बताने की शर्त पर एएसआई ने दिप्रिंट से कहा, “अमृतसर शहर में तैनात करीब 80 फीसदी मुलाजिम यानी जूनियर पुलिसकर्मी अमृतसर के ग्रामीण इलाकों या गुरदासपुर और बटाला से आते हैं. वे रोजाना ड्यूटी के लिए यहां आते-जाते हैं. इन घटनाओं ने निश्चित रूप से हम सभी को सतर्क कर दिया है.”
एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “हमलों का तरीका साफ संकेत देता है कि या तो जब पीड़ित अकेले वर्दी पहनकर कहीं जा रहे थे, तब हमलावरों ने उनका पीछा किया, या फिर हमलावरों को पहले से ही उनके आने-जाने के रास्तों और समय के बारे में जानकारी थी.” एएसआई ने भी इस बात पर सहमति जताई.
हरजीत सिंह की हत्या के बाद अमृतसर के पुलिस कमिश्नर हरमनबीर सिंह गिल ने पुलिसकर्मियों को निर्देश दिया था कि वे ड्यूटी पर आते-जाते समय वर्दी का कोई भी हिस्सा न पहनें. यह सलाह सार्वजनिक होने के बाद जल्द ही विवादों में आ गई. इसके बाद पंजाब पुलिस ने स्पष्ट किया कि पुलिस मुख्यालय की ओर से ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था.
एकमात्र ऐसा मामला जो अब तक अनसुलझा है
जांचकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने ज्यादातर मामलों में काफी प्रगति की है और हमलों को अंजाम देने के आरोप में 21 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. लेकिन जोगा सिंह की हत्या अब भी एक रहस्य बनी हुई है. उन्हें गोली मारकर हत्या किए जाने के पांच महीने बाद भी पुलिस यह पता नहीं लगा पाई है कि इसके पीछे कौन था.
जोगा सिंह के भाई प्रभजीत सिंह के मुताबिक, जांच आगे नहीं बढ़ पाई है और पुलिस महानिदेशक गौरव यादव ने जोगा के बेटे को मुआवजे के तौर पर नौकरी देने का जो वादा किया था, वह भी अब तक पूरा नहीं हुआ है.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मैं हाल ही में एसएसपी से मिला था. मुझे बस यही सुनने को मिला कि मामले में अब तक कोई सफलता नहीं मिली है.” हालांकि, उन्होंने जांच में प्रगति न होने के लिए पुलिस को दोषी नहीं ठहराया.
उन्होंने कहा, “मैं पुलिस से नाराज नहीं हूं. जांच में प्रगति किसी स्विच को दबाने से नहीं हो जाती. यह कई बातों पर निर्भर करती है.” उन्होंने आगे कहा, “लेकिन प्रशासनिक फैसलों के लिए, जैसे मुआवजे के तौर पर नौकरी देने का नियुक्ति पत्र जारी करना, फाइल पर सिर्फ हस्ताक्षर करने की जरूरत होती है. सरकारें इसी तरह के काम करने के लिए चुनी जाती हैं.”
उन्होंने आगे कहा, “डीजीपी साहब ने हमें भरोसा दिलाया था कि वर्दी में ड्यूटी करते हुए उनके पिता ने जो बलिदान दिया, उसके बदले उनके बेटे को पुलिस में नौकरी दी जाएगी. लेकिन इस मामले में आगे क्या हुआ, इसकी हमें कोई जानकारी नहीं मिली है.” उन्होंने पुलिस की जांच और नौकरी देने की सरकार की जिम्मेदारी के बीच अंतर स्पष्ट किया.
उन्होंने कहा, “मैं पुलिस से निराश नहीं हूं, बल्कि सरकार से निराश हूं.” इसके बाद उन्होंने अपने भाई की मौत से जुड़ी परिस्थितियों के बारे में बात की.
उन्होंने कहा, “पूरा गांव और आसपास के गांवों के लोग भी उनके चरित्र और स्वभाव की गवाही देंगे. उनकी किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. वर्दी पहनकर ड्यूटी पर जाने के दौरान उन पर इतना बेरहमी से हमला किया गया. इससे यही पता चलता है कि अपराधियों के मन में वर्दी का कोई डर नहीं रह गया है.”
जांच से जुड़े पंजाब पुलिस के एक अधिकारी ने माना कि हत्या के पांच महीने बाद भी मामले में बहुत कम प्रगति हुई है. अधिकारी ने बताया कि हमले का समय और जगह जांच में मुश्किल पैदा कर रहे हैं. जोगा सिंह को सुबह करीब 5.30 बजे फतेहगढ़ चूड़ियां-मजीठा रोड के एक ऐसे हिस्से में गोली मारी गई थी, जहां आमतौर पर लोगों की आवाजाही कम रहती है और सीसीटीवी कैमरों की कवरेज भी सीमित है.
गोलीबारी के तुरंत बाद जांचकर्ताओं ने कई सुरागों पर काम किया, लेकिन किसी से भी मामले में सफलता नहीं मिली. जांच से जुड़े एक अधिकारी ने कहा, “हत्या के तुरंत बाद हमें एक सुराग मिला था. एक सीसीटीवी कैमरे में कुछ लोग बाइक पर नहर के पास पश्चिम दिशा में जाते हुए दिखाई दिए थे.” उन्होंने आगे कहा, “दुर्भाग्य से, इस सुराग से भी हमें मामले में कोई सफलता नहीं मिली.”
आईजी भुल्लर ने दिप्रिंट से कहा, “हम सभी संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और इस मामले को भी अनसुलझा नहीं छोड़ा जाएगा.”
जोगा सिंह की पत्नी के लिए उन सवालों के जवाब न मिलना उस फैसले से जुड़ा है, जिसकी वजह से उनके पति उस सुबह ड्यूटी पर गए थे. जोगा सिंह समय से पहले रिटायरमेंट लेने के बारे में सोच रहे थे, लेकिन उसी साल बाद में होने वाली तरक्की की उम्मीद में उन्होंने अपना फैसला टाल दिया था.
“अगर मैंने उन पर रिटायरमेंट लेकर घर बसाने का दबाव डाला होता, तो आज मेरे पति जिंदा होते.”
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