नीमराना: राजस्थान के अरावली हिल्स के बीच, नई दिल्ली से कुछ घंटे की दूरी पर एक विशाल किला है, जिसका इतिहास बहुत पुराना है. यह किला एक औद्योगिक इलाके के ऊपर बना हुआ है. नीमराना फोर्ट पैलेस की जड़ें 15वीं सदी तक जाती हैं. 20वीं सदी आते-आते किला टूटने लगा और इसमें दरारें पड़ने लगी थीं. इसके बाद 1980 के दशक में शुरू हुई एक पुनर्निर्माण परियोजना ने इसे एक आलीशान होटल के रूप में स्थापित करने में मदद की.
जनता के लिए दोबारा खोले जाने के पांच साल के भीतर ही इस किले में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कोशिश हुई—भारत और पाकिस्तान के नागरिक समाज के सदस्यों के बीच बातचीत. यह उस समय हुई थी, जब दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव एक बार फिर बहुत बढ़ गया था.
शुरुआत में अमेरिका की मदद से यह बातचीत 1991 में शुरू हुई थी. यह दोनों देशों के बीच ट्रैक-2 कूटनीति की शुरुआती कोशिशों में से एक थी. उस समय तक दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ तीन युद्ध लड़ चुके थे.
पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त अजय बिसारिया ने अपनी किताब ‘एंगर मैनेजमेंट’ में लिखा है कि यह बातचीत “अमेरिका के दबाव और कश्मीर में बढ़ते संकट” के बीच शुरू हुई थी.
बिसारिया ने किताब में लिखा, “राजस्थान के एक किले में ‘नीमराना डायलॉग’ अक्टूबर (1991) में लड़खड़ाती आधिकारिक बातचीत के साथ ‘ट्रैक-2’ के रूप में शुरू हुआ. (रॉबर्ट) गेट्स मिशन के प्रस्तावों में से एक यह था कि ‘गैर-आधिकारिक बातचीत’ को बढ़ावा दिया जाए, ताकि आधिकारिक बातचीत रुक जाने पर दोनों पक्ष एक-दूसरे से बात कर सकें.”
पिछले 35 साल में ट्रैक-2 व्यवस्था के विकास के बारे में बताते हुए काउंसिल फॉर स्ट्रैटेजिक एंड डिफेंस रिसर्च के रिसर्च एसोसिएट बशीर अली अब्बास ने दिप्रिंट को बताया कि 2019 से पहले ट्रैक-2 प्रक्रियाओं में शामिल प्रतिनिधिमंडल “आमतौर पर बड़े होते थे. इनमें दोनों तरफ के राजनीतिक मतभेदों से जुड़े लोग शामिल होते थे.”
अब्बास ने कहा, “इस वजह से ट्रैक-2 दोनों पक्षों के लिए भी अलग तरह के मंच बन गए थे. इनमें सरकार के कट्टर आलोचक और सरकार के मजबूत समर्थक, दोनों एक ही प्रतिनिधिमंडल में होते थे और भारत के रुख को समझाने के लिए अपने-अपने तर्क रखते थे.”
उन्होंने आगे कहा, “इससे सिर्फ एकजुट रुख ही नहीं दिखता था, बल्कि यह भी दिखता था कि अलग-अलग विचारधारा वाले समूह राष्ट्रीय हित की सेवा और उसकी रक्षा के लिए एक साथ आ सकते हैं, लेकिन शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इससे पाकिस्तान की उस कोशिश को कमजोर किया जाता था, जिसमें वह भारत में सरकार के आलोचकों के सार्वजनिक बयानों का इस्तेमाल अपने तर्कों के समर्थन में करना चाहता था. यह दोनों तरफ से होता था.”
हालांकि, भारत-पाकिस्तान के व्यापक रिश्तों की तरह ही नीमराना बातचीत और ट्रैक-2 बातचीत के कई दूसरे तरीकों की उपयोगिता भी समय के साथ बढ़ती और घटती रही है. पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त टी.सी.ए. राघवन ने दिप्रिंट को बताया कि शुरुआत में नीमराना बातचीत का खर्च एक तीसरे देश ने उठाया था और बाद में इसे भारत और पाकिस्तान के विदेश विभाग के अधिकारियों ने संभालना शुरू किया.
राघवन ने कहा, “कई वर्षों तक नीमराना बातचीत को दोनों देशों के संबंधित विदेश विभाग के अधिकारियों ने संभाला. 2017 के आसपास यह बातचीत खत्म हो गई, जब दोनों देशों के विदेश विभाग ने इसके लिए पैसा देना बंद करने का फैसला किया.”
पूर्व उच्चायुक्त का कहना है कि ऐसी बातचीत कितनी प्रभावी होगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि “बातचीत में शामिल देश” इसे कितनी अहमियत देते हैं.
ट्रैक-2 बातचीत की शुरुआत और गिरावट
ट्रैक-2 कूटनीति 1970 के दशक के आखिर में विकसित हुई एक खास व्यवस्था है. उस समय शीत युद्ध के दौरान दुनिया की बड़ी ताकतों की सरकारों के बीच बातचीत बहुत कम होती थी.
इसका मकसद यह था कि नागरिक समाज के सदस्य, रिटायर्ड सरकारी अधिकारी, रिटायर्ड सैन्य अधिकारी और शिक्षाविद मिलकर उस समय की सरकारों के सामने मौजूद समस्याओं के अलग-अलग समाधान खोजने की कोशिश कर सकें.
जैसा कि बिसारिया ने ‘एंगर मैनेजमेंट’ में लिखा है, 35 साल की बेनजीर भुट्टो दिसंबर 1988 में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं. उनका इरादा भारत के साथ रिश्तों को संभालने का था, हालांकि उनका तरीका 1978 से 1988 तक राष्ट्रपति रहे जिया उल हक से अलग था. सत्ता में आने के कुछ ही हफ्तों बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी चौथे सार्क (साउथ एशियन एसोसिएशन फॉर रीजनल कोऑपरेशन) शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए पाकिस्तान गए. यह करीब तीन दशक में किसी भारतीय नेता की पाकिस्तान की पहली यात्रा थी.
गांधी-भुट्टो के बीच रिश्तों में आई नरमी जल्द ही कमजोर पड़ गई. घरेलू दबाव बढ़ने के बाद बेनजीर ने कश्मीर के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाने का फैसला किया. 1989 में हुए चुनाव के कुछ ही हफ्तों बाद वी.पी. सिंह के नेतृत्व में बनी नई भारतीय सरकार एक संकट में फंस गई. बिसारिया के मुताबिक, इसमें तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी के अपहरण में पाकिस्तान की भूमिका भी थी.
इसी समय कश्मीर में उग्रवाद भी बढ़ गया. इस स्थिति में इस्लामाबाद ने किसी भी भूमिका से इनकार किया, जबकि भुट्टो भारत के खिलाफ अपनी बयानबाजी लगातार तेज़ करती रहीं. कश्मीर में बढ़े उग्रवाद के कारण आखिरकार कश्मीरी पंडितों को वहां से पलायन करना पड़ा.
1990 के मध्य तक दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव इतना बढ़ गया कि अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश ने स्थिति को शांत करने के लिए रॉबर्ट गेट्स को एक गुप्त मिशन पर भेजा. गेट्स बाद में अमेरिका के रक्षा मंत्री बने.
अमेरिका का कहना है कि इस मिशन ने क्षेत्र में संभावित परमाणु युद्ध को रोकने में सफलता हासिल की. हालांकि, बिसारिया इस दावे को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया मानते हैं. गेट्स मिशन के नतीजों के बाद अगले साल, 1991 में नीमराना बातचीत शुरू हुई.
उस समय इस बातचीत में कई मुद्दे शामिल थे, जिनमें कश्मीर, सर क्रीक से जुड़े सीमा विवाद और सीमा पार आतंकवाद शामिल थे. बाद में दोनों देशों के विदेश विभाग ने इन बातचीत को संभाल लिया. इसके अलावा भी ट्रैक-2 बातचीत के दूसरे तरीके शुरू किए गए, जिनमें अक्सर तीसरे देशों ने मदद की.
2025 में ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ट्रैक-2 बातचीत के कई दौर हो चुके हैं. इनमें ज्यादा गंभीर मानी जाने वाली कुछ बातचीत पश्चिम एशिया के दो शहरों में और एक थाईलैंड में हुई है.
2018 में नीमराना में ट्रैक-2 बातचीत का एक दौर हुआ था, लेकिन इसके बाद से ज्यादातर नागरिक समाज की अगुवाई वाली ये बातचीत तीसरे देशों में हुई हैं, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच यात्रा करना मुश्किल है.
ट्रैक-2 की उपयोगिता
अगस्त 2019 में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद खास तौर पर भारत और पाकिस्तान के रिश्ते खराब हुए हैं. इसके बाद दोनों देशों की सरकारों के बीच बातचीत के रास्ते बहुत कम रह गए हैं.
आधिकारिक बातचीत के रास्ते नहीं होने के कारण कुछ लोग ट्रैक-2 के तरीकों को दोनों देशों के बीच तनाव की स्थिति पर नजर बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं. जैसा कि अब्बास ने दिप्रिंट को बताया, आज इसका मकसद “विवादों को सुलझाना या ट्रैक-1 के तय रुख को बदलना नहीं है.”
बिसारिया का कहना है कि ये तरीके “दोनों देशों के बीच अंदर ही अंदर चल रही घटनाओं और हालात का तापमान जांचने” के लिए उपयोगी हैं. वह इस बात पर भी जोर देते हैं कि भारत और पाकिस्तान को “किसी न किसी तरीके” से बातचीत में शामिल रहना चाहिए.
हालांकि, पूर्व राजनयिक इन बातचीत को गोपनीय तरीके से करने की अहमियत बताते हैं, ताकि बातचीत प्रभावी बनी रहे. साथ ही, इससे मीडिया में इन बातचीत को “रोमांस” या “उससे भी बदतर” बताकर मजाक का विषय बनने से भी बचाया जा सकता है.
अब्बास बताते हैं कि पहले ट्रैक-2 के तरीके “ट्रैक-1 कूटनीति के लिए एक गैर-सरकारी अतिरिक्त चैनल” के तौर पर काम करते थे. भारत-पाकिस्तान के मामले में उनका कहना है कि इससे विवादों को सुलझाने में मदद मिली. पहले चाओफ्राया डायलॉग के नतीजों को भी सार्वजनिक किया गया था. यह थाईलैंड में होने वाली ट्रैक-2 बातचीत का एक तरीका था.
अब्बास ने कहा, “हालांकि, 2019 के बाद ट्रैक-1 का रास्ता काफी हद तक गायब हो गया. धीरे-धीरे यह लगभग शून्य तक पहुंच गया. इसका मतलब था कि भारत-पाकिस्तान के ट्रैक-2 अब सिर्फ ट्रैक-1 के सहायक नहीं रह गए थे, बल्कि उन्हें अपनी भूमिका फिर से तय करनी पड़ी. पहला बदलाव यह हुआ कि इन चैनलों ने विवाद सुलझाने के बजाय संकट को संभालने के रास्ते का रूप ले लिया. इनमें अचानक तनाव बढ़ने से रोकने पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा.”
उन्होंने आगे कहा, “दूसरा, 2025 से पहले और उसके बाद भी कम से कम कुछ ट्रैक-2 चैनल अब दोनों देशों के बीच बातचीत के मुख्य संगठित रास्ते के रूप में काम करते हैं. दोनों तरफ के प्रतिनिधिमंडल अपने विचार साझा करते हैं और दोनों देशों की सरकारों को जानकारी देते हैं. यह पूरी तरह अपनी इच्छा से किया जाने वाला प्रयास है.”
हालांकि, अब्बास बताते हैं कि करतारपुर गलियारा खोलने का मुद्दा, जिससे भारतीय श्रद्धालुओं को पाकिस्तान में गुरुद्वारे जाने की अनुमति मिली, चाओफ्राया ट्रैक-2 बातचीत के दौरान गंभीरता से उठाया गया था. इसके बाद दोनों देशों की सरकारों ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाया और आखिरकार गलियारा खोल दिया गया.
नीमराना के किले से शुरू हुई भारत-पाकिस्तान की ट्रैक-2 बातचीत जैसे-जैसे आगे बढ़ी, उसने दोनों पक्षों के लिए एक-दूसरे पर नजर रखने के एक महत्वपूर्ण रास्ते की जगह बना ली है. ऐसा उस समय हुआ है जब दोनों सरकारों के बीच बातचीत बहुत कम है.
फिर भी, राघवन ने दिप्रिंट को बताया कि ट्रैक-2 एक तरीके के रूप में “कूटनीति का बहुत कमजोर विकल्प” है. उनका कहना है कि पड़ोसी देशों के बीच कुछ न कुछ कूटनीतिक बातचीत जरूर होनी चाहिए—खासकर “खराब पड़ोसियों” के साथ.
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