scorecardresearch
Friday, 30 October, 2026
होममत-विमतमोदी कांग्रेस का सामना कर सकते हैं लेकिन असली चुनौती युवाओं के विरोध से निपटना है

मोदी कांग्रेस का सामना कर सकते हैं लेकिन असली चुनौती युवाओं के विरोध से निपटना है

नरेंद्र मोदी के सबसे मुखर समर्थक पारंपरिक रूप से 'व्हाट्सएप अंकल' रहे हैं. लेकिन अब यह बात और भी साफ होती जा रही है कि इन अंकलों की संतानों को न तो व्हाट्सएप पसंद है और न ही प्रधानमंत्री.

Text Size:

अब जब ऐसा लग रहा है कि शरद ऋतु में हो रहे विरोध प्रदर्शनों पर फिलहाल कुछ समय के लिए रोक लग गई है, कम से कम 1 नवंबर को संसद के सामने होने वाले अगले प्रदर्शन तक, तो यह पीछे मुड़कर देखने और यह समझने का अच्छा समय हो सकता है कि हम अभी कहां खड़े हैं.

इन विरोध प्रदर्शनों के बारे में एक बात याद रखनी जरूरी है कि प्रदर्शन करने वाले दो अलग-अलग समूह हैं. उनके मकसद अक्सर एक जैसे होते हैं, लेकिन उनके अंतिम लक्ष्य अलग-अलग हैं. कांग्रेस का मुख्य मकसद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाना है.

कांग्रेस का मानना है कि ज्ञानेश कुमार बीजेपी के इशारे पर काम करने वाले व्यक्ति हैं. कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करने वाली समिति की बनावट तक बदल दी, ताकि अमित शाह के लंबे समय से करीबी रहे ज्ञानेश को इस पद पर बैठाया जा सके.

कांग्रेस का मानना है कि अगर भारतीय लोकतंत्र को बचाना है, तो ज्ञानेश को उनके पद से हटाना बेहद जरूरी है. उसका कहना है कि ज्ञानेश ने चुनावों में बीजेपी को जिताने के लिए कई काम किए हैं. इनमें मतदाता सूची से ऐसे लोगों के नाम हटाना शामिल है, जिनके दूसरी पार्टियों को वोट देने की संभावना थी. इसके अलावा, चुनाव आयोग के कंप्यूटर सिस्टम का नियंत्रण भी एक जगह केंद्रित कर दिया गया है, ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दखल देना आसान हो जाए.

कांग्रेस के लिए लक्ष्य ज्ञानेश को पद से हटाना है. उसका कहना है कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो बीजेपी केंद्र की सत्ता कभी नहीं हारेगी, क्योंकि वह चुनावों में धांधली करेगी.

दूसरी ओर, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शनों का कोई एक तय मकसद नहीं है. इनकी शुरुआत परीक्षाओं और पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन से हुई थी. अब ये नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एक बड़े आंदोलन में बदल गए हैं. जब मुख्य चुनाव आयुक्त के पक्षपाती होने का मुद्दा उठा, तो CJP के प्रदर्शनकारियों ने ज्ञानेश को हटाने की मांग भी अपने एजेंडे में शामिल कर ली. आगे जब दूसरे मुद्दे सामने आएंगे, तो वे उन्हें भी अपने आंदोलन में शामिल कर सकते हैं.

मोदी और ज्ञानेश का सवाल

CJP अब उन युवाओं के लिए एक ऐसा मंच बन गई है, जो मोदी के भारत चलाने के तरीके से निराश और असंतुष्ट हैं. बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कुछ बड़े उद्योगपतियों के हाथों में ताकत का जमा होना और महंगाई अभी तक आंदोलन के मुख्य मुद्दे नहीं बने हैं. लेकिन ये सभी मुद्दे इसमें शामिल हैं और आने वाले समय में होने वाले प्रदर्शनों में इन पर ज्यादा ध्यान दिया जा सकता है.

कांग्रेस CJP की ज्यादातर बातों से सहमत है. वह इस बात से भी खुश है कि प्रधानमंत्री को सीधे निशाना बनाया जा रहा है. हो सकता है कि युवाओं की शिकायतों से जुड़ी हर चीज का प्रतीक अब प्रधानमंत्री बन गए हों.

इस वजह से मोदी के लिए कांग्रेस के विरोध प्रदर्शनों से निपटना ज्यादा आसान है, जबकि युवा आंदोलन से निपटना मुश्किल है. उनका मानना है कि वह ज्ञानेश को पद से हटने नहीं दे सकते. इसकी वजह यह हो सकती है कि ऐसा करने से उनकी कमजोरी दिखाई देगी. या फिर उन्हें चुनाव जीतने के लिए ज्ञानेश की जरूरत है. आपको इनमें से कौन-सी वजह ज्यादा सही लगती है, यह शायद इस बात पर निर्भर करता है कि आप इस सरकार के बारे में क्या सोचते हैं, न कि किसी सबूत पर.

इसलिए मोदी कांग्रेस की इस मांग को नहीं मानेंगे कि ज्ञानेश को पद से हटाया जाए. उन्हें पूरा भरोसा है कि अगर वह अपनी बात पर अड़े रहे, तो कांग्रेस उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी. सुप्रीम कोर्ट ने अब तक जो कुछ कहा है या किया है, उससे लगभग यही लगता है कि वह भी ज्ञानेश का साथ देगा. इसलिए मोदी को इस बात की चिंता नहीं है. उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं है कि ज्ञानेश को कभी अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देगी.

ज्ञानेश जैसी स्थिति में कुछ लोग शायद कहें, “मैं इतना विवादों में घिर गया हूं कि भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि मैं अपने पद से इस्तीफा दे दूं. मैंने कुछ गलत नहीं किया है, लेकिन मैं एक जिम्मेदार और सम्मानजनक कदम उठाते हुए इस संवैधानिक संकट को खत्म करना चाहता हूं.”

आप निश्चिंत रहें, ज्ञानेश ऐसा नहीं करेंगे. वह चुनाव आयोग से तभी जाएंगे, जब उन्हें घसीटकर, हाथ-पैर मारते हुए उनके दफ्तर से बाहर निकाला जाएगा.

लालच और सख्ती की रणनीति

भले ही प्रधानमंत्री ज्ञानेश को पद पर बनाए रखकर और अपने फैसले पर अड़े रहकर कांग्रेस का सामना कर लें, लेकिन युवा आंदोलन से निपटना ज्यादा मुश्किल है. अब तक मोदी सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ सख्ती भी की है और उन्हें मनाने की कोशिश भी की है. यह ऐसा है जैसे डंडे के साथ गाजर भी बांध दी गई हो.

यहां डंडे का मतलब है पुलिस, अर्धसैनिक बलों और पैसे देकर बुलाए गए गुंडों द्वारा युवा प्रदर्शनकारियों पर की गई बेमिसाल हिंसा. सरकार को लगा कि ये बच्चे जोश में आकर आंदोलन कर रहे हैं और जब उन्हें पीटा जाएगा और जेल में बंद किया जाएगा, तो वे डरकर पीछे हट जाएंगे.

गाजर का मतलब है सरकार की वे कोशिशें, जिनके जरिए उसने सीधे युवाओं से बात करने की कोशिश की. इनमें ऐसे अटपटे सेल्फी वीडियो शामिल हैं, जिनमें प्रधानमंत्री कैमरे के सामने अपना चेहरा आगे करके बात करते हैं. इसके साथ ही इंस्टाग्राम पर भी ज्यादा ध्यान दिया गया.

सरकार को सच में लगा कि अगर वह सोशल मीडिया पर किसी ऐसे अंकल की तरह युवाओं को डांटे, जो अपने पड़ोस के शरारती बच्चों को समझा रहा हो, तो प्रदर्शनकारी अपना आंदोलन छोड़ देंगे और एक साथ बोलेंगे, “सॉरी अंकल.”

कम से कम अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं है कि यह रणनीति काम आई है. प्रधानमंत्री के लिए यह चिंता की बात होनी चाहिए. उनके सबसे मुखर समर्थक हमेशा से ऐसे लोग रहे हैं, जिन्हें आमतौर पर व्हाट्सऐप अंकल कहा जाता है. वे मोदी की ताकत और तुरंत फैसले लेने की क्षमता के प्रशंसक रहे हैं.

लेकिन अब यह साफ होता जा रहा है कि इन अंकलों के बच्चे न तो व्हाट्सऐप को पसंद करते हैं और न ही नरेंद्र मोदी को. वे मोदी की ताकत की तारीफ भी नहीं करते, खासकर इसलिए क्योंकि इसी ताकत का इस्तेमाल उनके खिलाफ किया गया है.

इनमें से कई युवा अगले चुनाव में वोट डालेंगे. उनके विरोध प्रदर्शन चुनाव प्रचार के दौरान लोगों की सोच और माहौल को प्रभावित करेंगे. सरकार उन्हें अपने खिलाफ नहीं करना चाहती.

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि आखिर में क्या होगा. क्या ज्ञानेश अपने पद पर बने रहेंगे? अगला चुनाव कौन जीतेगा? लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों के कुछ नतीजे अभी से दिखाई देने लगे हैं. ये नतीजे थोड़े समय के लिए हो सकते हैं, लेकिन इनका असर लंबे समय तक रह सकता है.

इन प्रदर्शनों से पता चलता है कि यह मानना गलत है कि मोदी को हराया नहीं जा सकता और जब भी मुश्किल समय आएगा, लोग हमेशा उनका ही साथ देंगे.

अगर किसी सरकार को लोग इतना ही प्यार करते हैं, तो उसे बच्चों पर लाठियां चलाने और महिला प्रदर्शनकारियों के साथ बुरा व्यवहार करने की जरूरत नहीं पड़ती.

अब तक सरकार यह मानकर चलती रही है कि प्रदर्शनकारी चाहे कुछ भी कहें, बीजेपी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीत जाएगी और उसके आलोचकों की आवाज बंद हो जाएगी.

हो सकता है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश का चुनाव जीत भी जाए. लेकिन क्या इससे उसके आलोचकों की आवाज बंद हो जाएगी? या फिर लोग इसे इस बात का एक और सबूत मानेंगे कि बीजेपी ज्ञानेश को उनके पद पर इसलिए बनाए रखती है, क्योंकि वह चुनावों में उसे जीत दिला सकते हैं?

वीर सांघवी, प्रिंट और टेलीविजन पत्रकार और टॉक शो होस्ट हैं. वे @virsanghvi पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: अरब संघर्ष में पाकिस्तानी सेना ने चुना एक पक्ष—वह नतीजों से बच नहीं सकती


 

share & View comments