पिछले हफ्ते दक्षिण एशिया में एक अहम कूटनीतिक घटना हुई. मालदीव के राष्ट्रपति पाकिस्तान के दौरे पर गए. मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़ू 20 से 22 अक्टूबर तक तीन दिन के लिए इस्लामाबाद गए थे. 2023 में राष्ट्रपति बनने के बाद पाकिस्तान का यह उनका पहला राजकीय दौरा था. इस्लामाबाद में अपने तीन दिन के दौरे के दौरान मुइज़ू ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ उच्चस्तरीय बैठकें कीं. उन्होंने मालदीव-पाकिस्तान बिजनेस फोरम को भी संबोधित किया.
इससे भी दिलचस्प बात यह है कि मुइज़ू 11 साल के लंबे अंतराल के बाद पाकिस्तान का दौरा करने वाले पहले राष्ट्रपति बने. मालदीव के दूसरे लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने 2015 में पाकिस्तान का दौरा किया था. दोनों देशों के बीच छह दशकों से औपचारिक राजनयिक संबंध हैं, लेकिन कई मायनों में यह साझेदारी खास असर नहीं छोड़ पाई है. मालदीव जैसे द्वीपीय देश के लिए पाकिस्तान के साथ संबंध धार्मिक और शैक्षणिक रिश्तों से आगे नहीं बढ़ पाए हैं.
ऐसा लगता है कि इस दौरे के पीछे इस्लामाबाद की वह कोशिश है, जिसके तहत वह उन देशों के साथ अपने राजनयिक संबंध बढ़ाना चाहता है, जहां नई दिल्ली के प्रति किसी न किसी स्तर पर राजनीतिक असहजता दिखाई देती है. 2023 में राष्ट्रपति चुनाव के पूरे अभियान के दौरान मुइज़ू ने मालदीव में जोरदार ‘इंडिया आउट’ अभियान चलाया था. इससे दिल्ली और माले के बीच तनाव बढ़ गया था. राष्ट्रपति बनने के बाद मुइज़ू ने अपने पहले राजकीय दौरे के लिए भारत को भी नजरअंदाज किया और चीन गए. इससे दिल्ली से राजनयिक दूरी बनाने का प्रतीकात्मक संदेश गया.
दिल्ली में दक्षिण एशिया पर नजर रखने वाले लोगों के लिए मुइज़ू का पाकिस्तान दौरा निश्चित रूप से सवाल खड़े करता है, खासकर सुरक्षा के नजरिए से. पाकिस्तान पर भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं. उस पर कट्टरपंथी विचारधारा को दूसरे देशों तक पहुंचाने के आरोप भी हैं. इसके अलावा, भारत में अस्थिरता फैलाने के लिए दूसरे देशों के इलाकों का इस्तेमाल करने का उसका रिकॉर्ड भी रहा है. इसलिए इस तरह के राजनयिक दौरे पर दिल्ली को सतर्कता बरतने की जरूरत है.
हालांकि, भारत से जुड़े पहलू से अलग हटकर भी मुइज़ू के इस्लामाबाद दौरे को दोनों देशों के आपसी संबंधों के लिहाज से देखना चाहिए.
आर्थिक सहयोग का महत्वाकांक्षी एजेंडा
मुइज़ू के इस्लामाबाद दौरे की सबसे अहम बात अगले दो साल में दोनों देशों के बीच व्यापार को 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य हो सकता है. फिलहाल दोनों देशों के बीच व्यापार सिर्फ 13 मिलियन अमेरिकी डॉलर है. इसमें सूखे फल, पैक की गई दवाएं, प्रोसेस्ड फूड, लकड़ी के फाइबर बोर्ड और लोहे का कबाड़ जैसी चीजों का व्यापार होता है. दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापनों (MoU) में भी कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों और दूसरी वस्तुओं के व्यापार पर जोर दिया गया है.
दोनों देशों के बीच व्यापार की वस्तुओं की संख्या सीमित है और इसे बढ़ाने की क्षमता भी कम है. ऐसे में सवाल उठता है कि 13 मिलियन डॉलर से व्यापार को बढ़ाकर 200 मिलियन डॉलर तक पहुंचाने के लिए आखिर किन चीजों का व्यापार किया जाएगा. यह लक्ष्य मौजूदा व्यापार से लगभग 19 गुना ज्यादा है. सवाल फिर वही है कि दोनों देश क्या खरीदेंगे और क्या बेचेंगे? क्या पाकिस्तान से मालदीव को बड़े पैमाने पर रक्षा उपकरणों का निर्यात इस लक्ष्य को पूरा कर सकता है?
इस दौरे के दौरान कुल 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए. इनमें से दो रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े थे. समझौता ज्ञापन 06 मालदीव और पाकिस्तान के बीच ‘रक्षा सहयोग’ से संबंधित था. दूसरा समझौता ‘समुद्री सुरक्षा सहयोग’ पर था. हालांकि, इनमें से किसी में भी ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है. पाकिस्तान से रक्षा उपकरणों का निर्यात बड़े पैमाने के व्यापार का एक जरिया हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मालदीव को वास्तव में अपने रक्षा उपकरणों को बेहतर बनाने की जरूरत है? एक अन्य संभावित क्षेत्र चिकित्सा सेवाएं हो सकती हैं, लेकिन इस क्षेत्र में पाकिस्तान की क्षमता पर भी सवाल बने हुए हैं.
अगले दो साल में 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर के व्यापार का लक्ष्य व्यावहारिक से ज्यादा प्रतीकात्मक लगता है. और अगर यह लक्ष्य हासिल करना संभव भी हो, तब भी पाकिस्तान की क्षमता पर संदेह किया जा सकता है.
सहयोग के अलग-अलग क्षेत्रों में अंतर
दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापनों के मुताबिक, मालदीव और पाकिस्तान के बीच तकनीक, मानव तस्करी और नशीले पदार्थों की तस्करी तथा उनके दुरुपयोग से मुकाबला करने, स्वास्थ्य, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में भी सहयोग होना है. इनमें से बाकी क्षेत्रों में पाकिस्तान की क्षमताओं को देखते हुए सहयोग की गुंजाइश सीमित है. हालांकि, स्वास्थ्य क्षेत्र दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का एक अहम माध्यम बन सकता है.
मालदीव में भारत की मदद से बना सिर्फ एक प्रमुख अस्पताल है. इस वजह से कई लोग विशेषज्ञ इलाज के लिए भारत आते हैं.
भारत स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में मालदीव का भरोसेमंद और विश्वसनीय साझेदार बना हुआ है. हालांकि, कुछ लोग इलाज के लिए पाकिस्तान भी जाते हैं. सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग बढ़ सकता है और क्या पाकिस्तान विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधाएं दे सकता है? इसे लेकर संदेह बना हुआ है. शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग भी आकर्षक हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान में शिक्षा के साथ धार्मिक पहलू भी गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसके गंभीर प्रभाव हो सकते हैं.
वेस्ट पॉइंट स्थित काउंटरटेररिज्म सेंटर की 2013 की एक रिपोर्ट में ‘विदेशी मदरसों’ को स्थानीय स्तर पर मालदीव के लोगों को कट्टरपंथी बनाने का एक प्रमुख जरिया बताया गया है. रिपोर्ट में मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम के हवाले से कहा गया है, “मालदीव के लोग दुनिया में हो रही घटनाओं से प्रभावित होते हैं. वे पाकिस्तान जाते हैं, मदरसों में पढ़ते हैं और कट्टर धार्मिक विचारों के साथ वापस लौटते हैं.”
मालदीव में ज्यादातर समय शांति रही है, लेकिन वहां कट्टरपंथ बढ़ने की घटनाएं भी सामने आई हैं. देश में इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (ISIS) जैसे आतंकवादी संगठनों की मजबूत मौजूदगी भी पाई गई है. अमेरिका के विदेश विभाग की 2019 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 से 2019 के बीच, “सरकार के मुताबिक, धार्मिक कट्टरपंथ से जुड़े 188 मामले दर्ज किए गए. इनमें से 14 मामलों में अभियोजन की प्रक्रिया शुरू की गई.”
आखिरकार, मालदीव ने 2015 में आतंकवाद विरोधी कानून भी पारित किया था.
मालदीव और पाकिस्तान के बीच चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग का भविष्य क्या होगा, यह देखना बाकी है. लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि पाकिस्तान कट्टरपंथी विचारधाराओं को दूसरे देशों तक पहुंचाने की कोशिशों से पीछे नहीं हटेगा और भारत के खिलाफ दुष्प्रचार को बढ़ावा देने की कोशिश करेगा.
एक बार फिर सार्क का जिक्र
पाकिस्तान दौरे के दौरान राष्ट्रपति मुइज़ू ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) पर जोर दिया. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुइज़ू ने कहा कि मालदीव “सार्क के महत्व में पूरा विश्वास रखता है और सार्क को फिर से सक्रिय करने में रचनात्मक और सक्रिय भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है.”
उन्होंने आगे कहा, “मालदीव सार्क के सभी सदस्य देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है, ताकि जल्द से जल्द अगला सार्क शिखर सम्मेलन आयोजित करने के लिए जरूरी परिस्थितियां बनाई जा सकें.”
इस साल की शुरुआत में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को संबोधित करते हुए मुइज़ू ने सार्क के सदस्य देशों के बीच मौजूदा गतिरोध को दूर करने के लिए ‘मध्यस्थ’ की भूमिका निभाने की पेशकश की थी. हालांकि, उन्होंने भारत या पाकिस्तान का नाम नहीं लिया था.
दिलचस्प बात यह है कि अगला सार्क शिखर सम्मेलन पाकिस्तान में होना है, अगर वह कभी आयोजित होता है. इस्लामाबाद के लिए इस देरी का दोष दिल्ली पर डालना आसान रहा है. ऐसे में पाकिस्तान की धरती से मुइज़ू का सार्क का समर्थन करना कई सवाल खड़े करता है. इससे भारत की ओर उंगली उठाने का संकेत भी मिलता है. मुइज़ू के विदेश नीति सलाहकार शायद चाहेंगे कि वह क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए इस मामले में थोड़ा संभलकर बोलें.
संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में आतंकवाद का जिक्र पूरी तरह गायब रहा. सार्क की नाकामी की असली वजह आतंकवाद है, लेकिन संगठन को फिर से सक्रिय करने पर चर्चा भी एक तरह के राजनीतिक सौदे से कम नहीं थी, जिसे माले और इस्लामाबाद ने क्षेत्रीय मुद्दों पर करने की कोशिश की.
मुइज़ू के पाकिस्तान दौरे की मालदीव में आलोचना
राष्ट्रपति मुइज़ू का पाकिस्तान दौरा मालदीव में चर्चा का विषय बना और वहां के लोगों ने इसकी आलोचना भी की. आलोचना का एक प्रमुख मामला कथित तौर पर पाकिस्तान में रहने वाले मालदीव के नागरिकों से जुड़ा था. बताया गया कि राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज़ू के साथ उनकी तय बैठक आखिरी समय में रद्द कर दी गई, जिससे वहां रहने वाले मालदीव के नागरिकों ने नाराजगी जताई.
इससे भी ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान में रहने वाले मालदीव के नागरिकों ने कथित तौर पर इस बात पर नाराजगी जताई कि प्रथम महिला साजिदा मोहम्मद को पाकिस्तान की एक फैशन और लाइफस्टाइल मैगजीन को खास इंटरव्यू देने का समय मिल गया, लेकिन राष्ट्रपति के पास अपने ही देश के नागरिकों से मिलने का समय नहीं था.
इसके अलावा, मालदीव में पूर्व राष्ट्रपति यामीन ने भी पाकिस्तान की ओर से मुइज़ू को मानद डॉक्टरेट की उपाधि दिए जाने की आलोचना की. यामीन पहले मालदीव और पाकिस्तान के संबंधों के मजबूत समर्थक रहे थे.
यामीन ने कहा, “इससे मुझे गहरा दुख हुआ है. मैं अपना विरोध दर्ज करा रहा हूं. सामाजिक और आर्थिक हालात को लेकर पाकिस्तान की दलीलों को देखते हुए मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि उसने मुइज़ू को मानद डॉक्टरेट की उपाधि क्यों दी. क्या वे मालदीव में हो रही घटनाओं पर शोध भी करते हैं?”
मुइज़ू को मानद डॉक्टरेट की उपाधि देने के पाकिस्तान के फैसले पर यामीन की आलोचना का निशाना मुख्य रूप से राष्ट्रपति थे. लेकिन इससे दोनों नेताओं के बीच बढ़ती राजनीतिक खाई और मालदीव के नेतृत्व के भीतर गहरे होते मतभेद भी सामने आए. इन मतभेदों ने ‘इंडिया आउट’ अभियान को भी काफी बढ़ावा दिया है.
इसी दौरान मालदीव के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने भी मुइज़ू के पाकिस्तान दौरे की आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि मुइज़ू मालदीव की विदेश नीति को “लापरवाही से” चला रहे हैं. नशीद ने आगे कहा, “छोटे देशों, खासकर मालदीव के सामने आने वाले खतरे काफी गंभीर हैं. इसके बावजूद राष्ट्रपति मुइज़ू ने पूरी सावधानी बरते बिना पाकिस्तान का दौरा किया. इससे एक बार फिर मालदीव को भारत और पाकिस्तान के बीच विवादों के बीच ला खड़ा किया गया है.”
निष्कर्ष के तौर पर, राष्ट्रपति मुइज़ू के नेतृत्व में मालदीव की विदेश नीति भारत से दूर जाने की कोशिश करती रही है. नई दिल्ली के साथ मतभेदों को सामने रखने में भी उसने कोई झिझक नहीं दिखाई है. साथ ही, मालदीव की विदेश नीति पर धार्मिक विचारधाराओं का गहरा प्रभाव देखने को मिला है. इसी वजह से तुर्किये और अब पाकिस्तान के साथ मजबूत संबंध बनाने की कोशिश की जा रही है.
यह रुख राजनीतिक संकेत दे सकता है और कुछ नेताओं को फायदा भी पहुंचा सकता है, लेकिन इससे देश के भविष्य को खतरा हो सकता है. मालदीव जैसे छोटे द्वीपीय देश को ऐसे भरोसेमंद साझेदारों की जरूरत है, जो वास्तव में उसकी मदद कर सकें.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रेटेजिक मामलों पर कमेंटेटर हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह से लेखक के अपने हैं और इनका लेखक के वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों से कोई संबंध नहीं है.
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