बेंगलुरु: 23 अक्टूबर को चार बड़े राज्यों में विधान परिषद की सीटों के लिए हुए द्विवार्षिक चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने जिन 28 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 16 पर जीत हासिल की. हालांकि, इस जीत की खुशी थोड़ी फीकी रही, क्योंकि विपक्षी पार्टियों ने वाराणसी, पटना, नागपुर, लखनऊ और आगरा जैसे अहम गढ़ों में जीत दर्ज की.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने देशभर में हुए चुनावों में विधान परिषद सदस्य (MLC) की 28 सीटों में से 13 पर जीत हासिल की. वहीं, उसके एनडीए सहयोगियों शिवसेना (एकनाथ शिंदे), जनता दल (यूनाइटेड) और जनता दल (सेक्युलर) ने एक-एक सीट जीती. इस तरह गठबंधन की कुल सीटें 16 हो गईं.
कर्नाटक में एनडीए ने सभी चार सीटों पर जीत हासिल की. चुनावी राज्य उत्तर प्रदेश में उसने 11 में से छह सीटें जीतीं. बिहार में तीन और महाराष्ट्र में दो सीटों पर गठबंधन को जीत मिली.
अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी (SP) ने उत्तर प्रदेश में पांच सीटें जीतकर विपक्षी गठबंधन INDIA को बड़ी राहत दी. पार्टी ने राज्य में लखनऊ और आगरा की स्नातक सीटों पर बीजेपी को हराकर उसकी जगह जीत हासिल की. उत्तर प्रदेश में एमएलसी चुनावों में करीब 15 लाख लोगों ने वोट डाला.
शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) ने दो सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को तीसरी सीट मिली. इससे महाराष्ट्र में चुनाव वाली पांच सीटों में से एनडीए को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली. बिहार में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने पटना शिक्षक सीट जीती, जबकि प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जन सुराज पार्टी ने दरभंगा शिक्षक सीट पर जीत हासिल की.
शुरुआती रुझान सामने आने के बाद बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि वह पहले अपने पास मौजूद चारों सीटें भी नहीं बचा पाई.
प्रधानमंत्री ने एक पोस्ट में कहा, “चार बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक की 28 सीटों पर एमएलसी चुनाव हुए. चुनाव बैलेट पेपर से कराए गए. अंदाजा लगाइए कि कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?”
इसके बाद बीजेपी से जुड़े लोगों और नेताओं की ओर से टिप्पणियों की बाढ़ आ गई. कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी प्रधानमंत्री के साथ कांग्रेस का मजाक उड़ाया और उसके ‘वोट चोरी’ अभियान पर निशाना साधा.
हालांकि, कुछ घंटे बाद करीब दो दिन तक चली मतगणना के बाद नागपुर स्नातक सीट से कांग्रेस के अभिजीत वंजारी को विजेता घोषित किया गया. उन्होंने बीजेपी के सुधाकर कोहले को 3,271 वोटों से हराया.
चुनाव से पहले कांग्रेस के पास एमएलसी की चार सीटें थीं. इनमें दो महाराष्ट्र में और एक-एक बिहार और कर्नाटक में थीं. कांग्रेस ने तीन राज्यों में कुल 12 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इनमें बिहार की पांच, कर्नाटक की चार और महाराष्ट्र की तीन सीटें शामिल थीं. लेकिन वह सिर्फ नागपुर की सीट जीत सकी.
बिहार
बिहार में एनडीए ने अपनी आठ में से चार सीटें बचा लीं. जीतने वालों में जेडीयू के नीरज कुमार भी शामिल थे, जिन्होंने अपनी सीट पर जीत हासिल की. बीजेपी के नरेंद्र प्रसाद सिंह ने तिरहुत शिक्षक सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के संजय कुमार सिंह को हराया.
बिहार में पांच जिलों में चुनाव हुए थे. विधानसभा चुनावों में हाल की सफलता को देखते हुए बीजेपी को उम्मीद थी कि वह इससे ज्यादा सीटें जीतेगी.
बीजेपी के लिए सबसे बड़ा झटका पटना शिक्षक सीट पर लगा, जहां नवल किशोर यादव लगातार पांच बार जीत चुके थे. पटना की बांकीपुर सीट से बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन सांसद हैं. नवल यादव को आरजेडी के संजीव कुमार ने हरा दिया. इस जीत के साथ संजीव कुमार ने विपक्षी गठबंधन INDIA के खाते में एक और सीट जोड़ दी.
बीजेपी से निकाले गए नेता राहुल राज ने छपरा शिक्षक सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की. उन्होंने अफाक अहमद को हराया, जिन्होंने पिछली बार जन सुराज पार्टी (JSP) के समर्थन से यह सीट जीती थी.
प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जन सुराज पार्टी ने भी विधान परिषद में अपनी पहली जीत दर्ज की. दरभंगा शिक्षक सीट से डॉ. सुरेश प्रसाद राय पार्टी के इकलौते विजेता बने. आखिरी उपलब्ध रुझानों के मुताबिक, उन्होंने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी मदन मोहन झा को सिर्फ 324 वोटों के अंतर से हराया. विधान परिषद में यह जीत अगस्त में बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में जन सुराज पार्टी की पहली जीत के कुछ ही समय बाद मिली है.
तिरहुत स्नातक सीट से बंशीधर ब्रजवासी एक बार फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुने गए.
उत्तर प्रदेश
उत्तर प्रदेश में 2020 के एमएलसी चुनावों में बीजेपी ने छह सीटें जीती थीं. बाद में उसकी सीटों की संख्या एक बढ़ गई, क्योंकि गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से पहले निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने वाले ध्रुव कुमार त्रिपाठी मोदी के नेतृत्व वाली पार्टी में शामिल हो गए थे.
इस हिसाब से बीजेपी ने एक सीट गंवाई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 2020 के मुकाबले दो सीटें ज्यादा जीतीं. अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा ने वाराणसी और लखनऊ की स्नातक सीटों पर बीजेपी को हराकर जीत हासिल की. वहीं, 2020 में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीतने वाले आकाश अग्रवाल ने इस बार सपा के टिकट पर आगरा शिक्षक सीट जीत ली.
ये नतीजे इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हर सीट पर बीजेपी उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया था. वहीं, सपा ने समर्थन जुटाने के लिए मुख्य रूप से अपने स्थानीय नेताओं पर भरोसा किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सपा ने स्नातक सीट बीजेपी से छीन ली. इसके साथ ही उसने शिक्षक सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा, जिसे उसने 2020 में जीता था.
बीजेपी को लखनऊ में भी हार का सामना करना पड़ा. लखनऊ से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सांसद हैं.
अखिलेश यादव ने एक पोस्ट में कहा, “बीजेपी की हालत खराब है. वाराणसी एमएलसी चुनाव में हार से वह परेशान है. लखनऊ वाले दिल्ली वालों के फोन नहीं उठा रहे हैं. सच यह है कि उत्तर प्रदेश के एमएलसी चुनावों में बीजेपी का पूरी तरह सफाया हो गया है.”
वाराणसी में एमएलसी चुनाव में हार से हताश भाजपा की हालत ख़राब है। लखनऊ वाले दिल्ली वालों का फ़ोन नहीं उठा रहे हैं।
सच तो ये है कि भाजपा यूपी एमएलसी चुनाव में ऑल आउट हो गई है।
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) October 28, 2026
उत्तर प्रदेश में न तो कांग्रेस और न ही बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने कोई उम्मीदवार उतारा. राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं.
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में बीजेपी के कौस्तुभ गावड़े ने पुणे शिक्षक सीट पर कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी जयंत असगांवकर को हराया. गावड़े को निर्दलीय उम्मीदवार सचिन सनप से कड़ी टक्कर मिली. सनप को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना का समर्थन था, जो एनडीए की सहयोगी पार्टी है.
पुणे स्नातक सीट पर शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी की हर्षदा देशमुख-जाधव ने बीजेपी की स्मिता जाधव को हराकर पार्टी की सीट बरकरार रखी. छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीट पर एनसीपी के प्रताप पाटिल ने एनडीए के सतीश चव्हाण को हराया. सतीश चव्हाण एनसीपी के सुनेत्रा पवार गुट का प्रतिनिधित्व करते थे.
अमरावती शिक्षक सीट पर मौजूदा एमएलसी किरण सरनाइक ने अपनी सीट बचा ली. इसके साथ ही महाराष्ट्र में एनडीए की सीटों की संख्या दो हो गई.
बीजेपी के लिए, खासकर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए, सबसे बड़ा झटका नागपुर में लगा. यहां कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने करीब दो दिन तक चले कड़े मुकाबले के बाद अपनी सीट बरकरार रखी.
नागपुर में चुनाव के दौरान काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिले. पहले बीजेपी ने जीत का जश्न मनाया, लेकिन बाद में उसे अपने बयान वापस लेने पड़े.
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को अपना “एक बड़ा मोटा शून्य” वाला ट्वीट हटाना पड़ा. इसके बाद उन्होंने कांग्रेस पर मोदी की टिप्पणी को दोबारा पोस्ट किया.
महाराष्ट्र कांग्रेस ने एक पोस्ट में कहा, “ट्वीट हटाकर फडणवीस ने एक बार फिर सावरकर की विरासत बचा ली! पूरे नतीजे आने से पहले ही बड़ा तीर चलाने के चक्कर में फडणवीस ने ट्वीट कर दिया. लेकिन वही तीर पलटकर आया और उनकी छाती में लग गया! आखिरकार उन्हें अपना ट्वीट हटाना पड़ा.”
ये जीत और हार जटिल राजनीतिक समीकरणों के बीच सामने आईं.
अमरावती शिक्षक सीट पर मौजूदा एमएलसी किरण सरनाइक ने शिवसेना के टिकट पर चुनाव लड़ा. उनका मुकाबला कांग्रेस की अदिति पोहरे से था. शिवसेना (UBT) ने भी यहां अपना उम्मीदवार उतारा था.
पुणे स्नातक सीट पर बीजेपी की स्मिता जाधव का मुकाबला एनसीपी (शरद पवार) की हर्षदा देशमुख से था. इस सीट पर शिवसेना (UBT) ने भी उम्मीदवार उतारा था.
पुणे शिक्षक सीट पर बीजेपी ने गावड़े को कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी जयंत असगांवकर के खिलाफ उतारा. शिवसेना ने निर्दलीय उम्मीदवार सचिन सनप का समर्थन किया, जो राज्य मंत्री उदय सामंत के विशेष कार्य अधिकारी हैं.
छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीट पर एनसीपी के मौजूदा एमएलसी सतीश चव्हाण का मुकाबला एनसीपी (शरद पवार) के प्रतापसिंह पाटिल से था. शिवसेना (UBT) ने भी यहां अपना उम्मीदवार उतारा था.
नागपुर स्नातक सीट पर मौजूदा एमएलसी अभिजीत वंजारी का मुकाबला बीजेपी के उम्मीदवार सुधाकर कोहले से था. बीजेपी के बागी अनिल सोले ने चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया और कोहले का समर्थन किया.
यह निर्वाचन क्षेत्र केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह क्षेत्र भी है. साथ ही, यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी है, जो बीजेपी का वैचारिक मार्गदर्शक संगठन माना जाता है.
कर्नाटक
कर्नाटक में बीजेपी अपनी तीनों सीटें बचाने में सफल रही. वहीं, उसकी सहयोगी जेडीएस ने बेंगलुरु शिक्षक सीट पर जीत हासिल की. इस सीट पर पहले कांग्रेस का कब्जा था और यहां कड़ा मुकाबला हुआ.
बाकी तीन राज्यों की तुलना में कर्नाटक की ज्यादातर सीटों के नतीजे जल्दी घोषित कर दिए गए.
चार राज्यों में कुल 28 सीटों पर चुनाव हुए थे, जिनमें से चार सीटें कर्नाटक की थीं. राज्य में करीब 3.25 लाख मतदाताओं ने इन चार एमएलसी सीटों के लिए वोट डाले. बीजेपी-जेडीएस गठबंधन की जीत से मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व वाली सरकार को झटका लगा.
चुनाव में हार से शिवकुमार पर दबाव और बढ़ गया है. खासकर केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी की ओर से उन पर लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं. कुमारस्वामी ने पहले आरोप लगाया था कि मुख्यमंत्री पूरे राज्य में राजनीतिक नेताओं की गुप्त रिकॉर्डिंग करवाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन चला रहे हैं.
जेडीएस के प्रदेश अध्यक्ष कुमारस्वामी ने यह भी आरोप लगाया कि शिवकुमार ने अपने पूर्ववर्ती सिद्धारमैया के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन करवाया था, जिसके कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा.
चुनाव से पहले राज्य की विधान परिषद की कुल 75 सीटों में से 38 पर कांग्रेस का कब्जा था. बीजेपी के पास 24 और जेडीएस के पास छह सीटें थीं. सदन में एक निर्दलीय सदस्य और एक सभापति भी हैं. पांच सीटें खाली हैं.
शिवकुमार ने पहले कहा था, “लोगों ने हमें संदेश दिया है कि हमें समीक्षा करनी होगी, आत्ममंथन करना होगा और अपनी गलतियों को सुधारना होगा.”
हालांकि, इसके बाद उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ अपना विरोध और तेज कर दिया. उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी दोहराई. बैलेट पेपर को लेकर उठे विवाद पर उन्होंने कहा कि कांग्रेस 1 नवंबर के बाद अपनी आगे की रणनीति पेश करेगी.
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