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Thursday, 29 October, 2026
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लिफ्ट से लेकर शौचालय तक पर पाबंदी: दिल्ली-NCR की सोसाइटियों में घरेलू कामगारों से रोजाना का भेदभाव

दिल्ली एनसीआर की गेटेड सोसाइटियों में घरेलू कामगारों के दैनिक अनुभव उन लोगों के खिलाफ मौन भेदभाव के व्यापक पैटर्न को दर्शाते हैं जो परिवारों के लिए खाना बनाते हैं, सफाई करते हैं और उनकी देखभाल करते हैं.

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वसंत कुंज की बी-1 और बी-2 पॉकेट में मरियम को लगभग सभी जानते हैं. पिछले 15 सालों से वह डीडीए की इन कॉलोनियों के अलग-अलग घरों में रसोई साफ करती हैं, बाथरूम के फर्श रगड़ती हैं और घर के सबसे गंदे कोनों तक की सफाई करती हैं. लेकिन इतने सालों तक काम करने के बाद भी उन्हें वहां रहने वाले लोगों के बराबर नहीं समझा जाता और न ही उन्हें अपनापन मिलता है. लोग आज भी उन्हें शक की नजर से देखते हैं. उन्हें पार्क की बेंच पर बैठने तक की इजाजत नहीं है. अगर वह सोसाइटी की सबके इस्तेमाल वाली लिफ्ट में जाती हैं, तो ऐसा व्यवहार किया जाता है, जैसे उन्होंने लिफ्ट को गंदा कर दिया हो या उसे अपवित्र कर दिया हो.

पिछले महीने मरियम एक पेड़ की छांव में बैठकर वीडियो कॉल पर अपनी एक सहेली से बात कर रही थीं. तभी सोसाइटी की एक महिला, जो टहलने निकली थीं, उनके पास आईं. उन्होंने मरियम से कहा कि वह सोसाइटी के अंदर बने पैदल चलने वाले रास्ते से हट जाएं और गेट के बाहर जाकर इंतिजार करें.

45 साल की मरियम ने उस घटना को याद करते हुए कहा, “मैंने उनसे कहा कि मुझे अगले घर में काम करने के लिए 15 मिनट बाद जाना है, इसलिए मैं बस यहां बैठी हूं. लेकिन उन्होंने कहा, ‘पार्क में बैठकर हमारी सोसाइटी को गंदा मत करो. तुम यहां बैठकर सोसाइटी के लोगों की बुराई करती हो.’ मुझे बहुत बेइज्जती महसूस हुई.” मरियम के पास कोई रास्ता नहीं था. उन्होंने सिर झुका लिया और पार्क से बाहर चली गईं.

मरियम के साथ हुई यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है. यह उस बड़े भेदभाव को दिखाती है, जिसका सामना उन लोगों को करना पड़ता है जो दूसरों के घरों में खाना बनाते हैं, सफाई करते हैं और परिवारों की देखभाल करते हैं. घरेलू कामगारों को उन जगहों पर जाने से रोका जाता है, जिनकी उन्हें काम करते समय जरूरत पड़ती है या जहां वे एक घर में काम खत्म करने और दूसरे घर जाने के बीच कुछ देर आराम कर सकते हैं. लिफ्ट इस्तेमाल करने से रोकने से लेकर शौचालय, पार्क और सोसाइटी की साझा जगहों पर जाने की मनाही तक, घरेलू कामगारों को बार-बार उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव झेलना पड़ता है. इस तरह गेट और सुरक्षा व्यवस्था वाली इन सोसाइटियों में उन्हें सबसे निचले दर्जे पर रखा जाता है.

वसंत कुंज सोसाइटी का पार्क, जहां घरेलू कामगारों को बैठने की अनुमति नहीं है | विशेष व्यवस्था

घरेलू कामगारों के साथ होने वाले इस भेदभाव पर बहस एक बार फिर तब शुरू हुई, जब एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गया. इस वीडियो में कथित तौर पर गुरुग्राम के सबसे महंगे रिहायशी परिसरों में से एक, DLF कैमेलियाज में एक महिला अपने घर में काम करने वाली महिला को बेरहमी से पीटती दिखाई दी. ऐसा लगता है कि किसी पड़ोसी ने रसोई के सामने वाली खिड़की से यह वीडियो रिकॉर्ड किया था. वीडियो में महिला घरेलू कामगार को कई बार थप्पड़ मारती, धक्का देती और उसके बाल खींचती दिखाई देती है. इस घटना के बाद महिला के व्यवहार की कड़ी आलोचना हुई और पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई गई. इसके बावजूद कुछ निवासियों ने महिला का बचाव किया.

डीएलएफ कैमेलियाज में रहने वाले एक व्यक्ति ने इससे पहले दिप्रिंट से बात करते हुए कहा था, “हर कहानी के दो पहलू होते हैं. उसने जरूर कुछ ऐसा किया होगा, जिसकी वजह से ऐसी प्रतिक्रिया हुई. हमें हमेशा दोनों पक्षों की बात सुननी चाहिए.”

ये वही निवासी हैं, जो घरेलू कामगारों पर लगाई जाने वाली पाबंदियों को भी सही मानते हैं. उनका कहना है कि घरेलू कामगार पान और गुटखा खाकर जगह-जगह थूकते हैं, साझा जगहों पर कचरा फैलाते हैं और साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखते.

वसंत कुंज की एक रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अलग-अलग रखना जरूरी है. अगर घरेलू कामगारों को बिना किसी रोक-टोक के आने-जाने दिया जाए, तो वे साझा जगहों का सम्मान करना बंद कर देते हैं. हमें पान और गुटखे के दागों के साथ-साथ साझा जगहों पर कचरा फैलाने की भी शिकायतें मिलती हैं. यह चिंता भी रहती है कि कामगार आपस में मिलकर किसी खास घर में काम करने से मना कर सकते हैं या वहां रहने वाले लोगों से बदतमीजी कर सकते हैं. निवासियों को लगता है कि कुछ नियम होने चाहिए और सभी को उनका पालन करना चाहिए.”

हालांकि, घरेलू कामगारों को अपमान, गाली-गलौज और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, लेकिन नियम बनाते समय उनकी बात नहीं सुनी जाती. न ही उनकी शिकायतों को दूर करने का कोई ऐसा तरीका है, जिससे उन्हें सच में मदद मिल सके. उन्हें डर रहता है कि कहीं उनकी नौकरी न चली जाए. मालिकों के मुकाबले उनकी स्थिति भी कमजोर होती है. इसलिए उनके लिए उन लोगों के खिलाफ आवाज उठाना बहुत मुश्किल हो जाता है, जिन पर उनकी रोजी-रोटी निर्भर करती है.

मालवीय नगर की एक रिहायशी सोसाइटी में काम करने वाली बसंती ने कहा, “हम उनके घरों में काम करते हैं. वे हमारे नाम और चेहरे तक जानते हैं. लेकिन जब हमारी परेशानियों की बात आती है, तो वे तुरंत मुंह फेर लेते हैं. हम हर बार शिकायत नहीं कर सकते और न ही विरोध कर सकते हैं, क्योंकि हमारी रोजी-रोटी इन्हीं कामों पर निर्भर करती है.”

उन्होंने आगे कहा, “हममें से कई लोगों के लिए अपमान सहना रोजमर्रा की बात बन गया है. हमसे उम्मीद की जाती है कि हम सब कुछ चुपचाप सहते रहें.”

टॉयलेट करने तक की जगह नहीं

गुरुग्राम के पॉश सेक्टर 53 में तीन घरों में काम करने वाली विनीता बताती हैं कि उन्होंने सोसाइटियों में प्रवेश के लिए कागज वाले पास की जगह डिजिटल रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था शुरू होते देखी है. उन्होंने यह भी देखा है कि साझा जगहों पर हर समय सीसीटीवी कैमरों से नजर रखी जाती है. लेकिन आज भी घरेलू कामगारों के लिए ऐसे शौचालय की व्यवस्था नहीं है, जिसका वे आसानी से इस्तेमाल कर सकें.

उन्होंने कहा, “जरा सोचिए, अगर कोई आपसे कहे कि आप उसका बाथरूम इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि आप उसे गंदा कर देंगे, तो आपको कैसा लगेगा? जबकि उसी बाथरूम की सफाई मैं करती हूं.”

विनीता ने बताया कि जब उन्हें या दूसरी घरेलू कामगारों को शौचालय जाने की जरूरत होती थी, तो वे किसी घर के पीछे छिपी हुई जगह ढूंढती थीं, क्योंकि उनके पास जाने के लिए कोई दूसरी जगह नहीं होती थी. लेकिन अब हर कोने में सीसीटीवी कैमरे लगे होने के कारण ऐसा करना भी संभव नहीं रहा. कुछ सोसाइटियों में सबके इस्तेमाल के लिए शौचालय बने हुए हैं, लेकिन वहां जाने की इजाजत मिलना भी हमेशा आसान नहीं होता.

विनीता ने कहा, “जब हमें पेशाब करने की जरूरत पड़ती है, तो हम क्या करें? हम जानते हैं कि किसी घर के पीछे जाकर बैठना गलत है, लेकिन हमारे पास दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है. सिर्फ शौचालय इस्तेमाल करने के लिए हम पूरे रास्ते अपने घर नहीं जा सकते. ऐसा करने में हमारा एक घंटा आने-जाने में ही निकल जाएगा.”

विनीता तीन घरों में काम करके महीने में 20,000 रुपये से ज्यादा कमाती हैं. लेकिन घरेलू काम करते हुए इतने साल बीत जाने के बाद भी लोग उन्हें शक की नजर से देखते हैं. सोसाइटी की साझा जगहों पर घरेलू कामगारों को दो घरों के काम के बीच इंतजार करने की इजाजत तो होती है, लेकिन वहां से गुजरने वाले लोगों की घूरती नजरें उन्हें एहसास कराती हैं कि उनका वहां बैठना लोगों को पसंद नहीं है.

विनीता ने कहा, “अगर मैं लॉबी में सिर्फ दस मिनट के लिए भी बैठ जाऊं, तो वहां से गुजरने वाले लोग मुझे घूरने लगते हैं. ऐसा लगता है, जैसे वे पूछ रहे हों कि मैं वहां क्या कर रही हूं. इसलिए मैं वहां से चली जाती हूं.”

गुरुग्राम के सेक्टर 54 की एक आरडब्ल्यूए के सदस्य ने कहा, “यह सुनिश्चित करना एक चुनौती है कि सोसाइटियां और वहां रहने वाले लोग घरेलू कामगारों को बुनियादी सुविधाएं दें. इसके लिए हर व्यक्ति को अपने स्तर पर बदलाव लाने की जरूरत है.”

उन्होंने यह भी बताया कि कई सोसाइटियों में सबके इस्तेमाल के लिए शौचालय बने हुए हैं, जिनका इस्तेमाल आने वाले लोग और घरेलू कामगार कर सकते हैं. हालांकि, इन सुविधाओं तक उनकी पहुंच अक्सर सोसाइटी के नियमों और इस बात पर निर्भर करती है कि वहां रहने वाले लोग उन्हें इनका इस्तेमाल करने देने के लिए तैयार हैं या नहीं.

वसंत कुंज की एक आरडब्ल्यूए के सदस्य ने यह भी बताया कि कुछ सोसाइटियों में जगह की कमी और संबंधित अधिकारियों से मंजूरी लेने की जरूरत के कारण घरेलू कामगारों के लिए अलग शौचालय बनाना मुश्किल होता है. इसके अलावा, अगर निवासी इस बात पर सहमत नहीं हो पाते कि शौचालय बनाने के लिए कौन-सी जगह तय की जाए, तो यह काम और लंबा खिंच जाता है और कई बार बीच में ही रुक जाता है.

रोजमर्रा का भेदभाव, जिसके बारे में कोई बात नहीं करता

अपमान और भेदभाव का सामना सिर्फ घरेलू कामगारों को ही नहीं करना पड़ता. दिल्ली-एनसीआर की आलीशान रिहायशी सोसाइटी में सुरक्षा गार्डों, मालियों और कूड़ा उठाने वाले कर्मचारियों के साथ भी भेदभाव की घटनाएं सामने आती रही हैं.

वसंत कुंज के सेक्टर बी में कूड़ा उठाने का काम करने वाले 27 वर्षीय हामिद हौक ने कहा, “वे हमें अपना निजी नौकर समझते हैं और उनके लिए बात वहीं शुरू होती है और वहीं खत्म हो जाती है. जिस पल वे हमें कामगार के बजाय अपना नौकर समझने लगते हैं, उसी पल हमारे लिए उनका सम्मान खत्म हो जाता है.”

दिप्रिंट की एक रिपोर्ट में भी बताया गया था कि सुरक्षा गार्डों को अक्सर सोसाइटी में रहने वाले लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ता है. कई बार उन्हें ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, जिनसे उनका कोई लेना-देना तक नहीं होता.

वसंत कुंज के B1 ब्लॉक की एक इमारत में लगी निजी लिफ्ट, जिसमें घरेलू सहायकों का प्रवेश वर्जित है | विशेष व्यवस्था

हौक ने आगे कहा, “अब तो हमें इस बेइज्जती की आदत-सी हो गई है. हमें आए दिन डांट पड़ती है और कहा जाता है कि उनके घरों के बाहर लगी दीवारों या गमलों को हाथ मत लगाओ. साझा जगहों और लिफ्ट में जाने की इजाजत मिलने की तो बात ही छोड़ दीजिए.”

शहरी महिला कामगार यूनियन (एसएमकेयू) की सह-संस्थापक अनीता कपूर ने कहा कि जिन घरों में घरेलू कामगार काम करते हैं, वहां उन्हें पीने के पानी और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं दी जातीं.

उन्होंने बताया कि घरेलू काम करने वाली ज्यादातर महिलाएं मुस्लिम हैं और उन्हें अपने धर्म के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है. कई मामलों में तो नौकरी पाने के लिए उन्हें अपना नाम बदलकर हिंदू नाम रखने तक के लिए मजबूर किया जाता है.

कपूर ने कहा, “बहुत से लोग मुस्लिम महिलाओं को काम देने से मना कर देते हैं. वहीं, कुछ लोग वाल्मीकि समुदाय की महिलाओं से अपने घर में खाना बनवाना नहीं चाहते. भेदभाव के ये तरीके बरसों से चले आ रहे हैं, लेकिन कोई इनके बारे में खुलकर बात नहीं करता.”

कपूर ने घरेलू कामगारों को होने वाले मानसिक उत्पीड़न की ओर भी ध्यान दिलाया. उन्होंने दिल्ली के पॉश ग्रीन पार्क इलाके में काम करने वाली एक घरेलू कामगार का उदाहरण दिया. वहां उसकी मालकिन अक्सर उसके धर्म का मजाक उड़ाती थी और उसके समुदाय से जुड़ी हर घटना के लिए उसे जिम्मेदार ठहराती थी.

कपूर ने उस घटना को याद करते हुए बताया, “मालकिन उसे खबरें दिखाकर कहती थी, ‘देखो, तुम्हारे समुदाय के लोग क्या कर रहे हैं. तुम सब ऐसे ही होते हो.’” उन्होंने बताया कि पिछले साल लाल किले पर हुए विस्फोट से जुड़ी खबरें भी मालकिन उस घरेलू कामगार को दिखाती रहती थी.

जब ऐसे ऐप आए, जिनके जरिए लोग घर पर सफाईकर्मियों, रसोइयों और दूसरे घरेलू कामगारों को घंटे के हिसाब से बुला सकते थे, तो उम्मीद की गई कि इससे घरेलू काम के क्षेत्र में एक व्यवस्थित व्यवस्था बनेगी. लेकिन पिछले पांच-छह सालों में इसका उलटा असर देखने को मिला है. इस दौरान अनियमितताएं, विवाद और भेदभाव की घटनाएं बढ़ी हैं.

कपूर ने कहा, “पहले घरेलू कामगारों और जिन घरों में वे काम करते थे, उनके बीच एक रिश्ता होता था. लेकिन इन ऐप के आने के बाद वह रिश्ता धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. लोग एक घंटे के लिए आते हैं, अपना काम करते हैं और चले जाते हैं. दोनों पक्षों के बीच न भरोसा रह गया है और न बातचीत. इससे वर्ग के आधार पर बना ऊंच-नीच का अंतर और मजबूत होता है.”

कपूर ने इस बात पर भी जोर दिया कि घरेलू कामगारों के पास अपने मालिकों के खिलाफ शिकायत करने के पर्याप्त रास्ते नहीं हैं, जबकि मालिकों के पास उनसे कहीं ज्यादा ताकत और सुविधाएं होती हैं.

उन्होंने कहा, “अगर गलती किसी घरेलू कामगार की हो, तो मालिक पुलिस में शिकायत कर सकता है, व्हाट्सऐप ग्रुप या सोशल मीडिया पर उसके बारे में लिख सकता है और आरडब्ल्यूए के पास भी जा सकता है. लेकिन घरेलू कामगारों को शायद ही कभी ऐसा मौका मिलता है. उनकी बात तभी सुनी जाती है, जब उनका मामला खबरों में आ जाता है.”

जो घरेलू कामगार मालिकों के घर में ही रहते हैं, उनकी हालत और भी खराब

32 वर्षीय अफसाना बीबी अपने पति और 13 साल के बेटे के साथ महरौली के पास मसूदपुर में रहती हैं. जब उन्होंने पूरे समय बच्चों की देखभाल करने का काम शुरू किया था, तब वह सिर्फ 16 साल की थीं. तब से लेकर अब तक उन्होंने सालों दूसरों के बच्चों की देखभाल करने, उनके लिए खाना बनाने और उनके घरों की सफाई करने में बिताए हैं. लेकिन एक ऐसे घर में, जहां उन्होंने छह साल तक काम किया, उन्हें सोने के लिए एक बिस्तर मांगने तक का हक नहीं मिला.

अफसाना को वसंत कुंज के सेक्टर ए में चार साल के एक बच्चे की देखभाल करने के दिन याद हैं. उन्होंने बताया कि बच्चे की दादी उनसे अपने बर्तन अलग रखने को कहती थीं. साथ ही, उन्हें अपना खाना खाने के लिए तब तक इंतजार करना पड़ता था, जब तक परिवार के सभी लोग खाना नहीं खा लेते थे.

अफसाना ने कहा, “मैंने उनके यहां सालों तक काम किया. मैं उनके घर में रहती थी और दिन-रात, चौबीसों घंटे उनके लिए काम करती थी, लेकिन उन्होंने मुझे सोने के लिए कभी बिस्तर तक नहीं दिया. रात में मैं हॉल में ही किसी तरह बिस्तर लगाकर सो जाती थी, चाहे गर्मी हो या सर्दी. जैसे ही हम किसी के घर में कामवाली बनकर कदम रखते हैं, उनका व्यवहार हमारे प्रति बदल जाता है. वे अपने बच्चों, अपने सामान और पूरे घर की जिम्मेदारी हमें सौंप सकते हैं, लेकिन हमारे साथ बैठकर खाना खाना उन्हें मंजूर नहीं होता.”

घरों में कुछ घंटों के लिए काम करने वाली महिलाओं और मालिकों के साथ रहकर पूरे समय काम करने वाली महिलाओं की स्थिति की तुलना करते हुए कपूर ने कहा कि उम्मीद तो यही की जाती है कि जो महिलाएं मालिकों के घर में रहती हैं और जिनसे चौबीसों घंटे काम के लिए तैयार रहने की उम्मीद की जाती है, उनके साथ ज्यादा संवेदनशीलता और सम्मान से पेश आया जाएगा. लेकिन हकीकत हमेशा ऐसी नहीं होती.

कपूर ने एक घटना याद करते हुए बताया, “हमने एक नाबालिग लड़की को बचाया था, जो ग्रेटर कैलाश (जीके) के एक घर में काम करती थी. उसे बिस्तर और खाना देना तो दूर, सैनिटरी पैड तक नहीं दिए जाते थे.”

कई युवा घरेलू कामगार अपने मालिकों के साथ ही रहते हैं और उनसे दिन-रात काम करने की उम्मीद की जाती है. इसके बावजूद उन्हें परिवार के सदस्यों वाला बाथरूम इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं होती. उन्हें या तो छत पर बने छोटे कमरे, यानी बरसाती में ठहरा दिया जाता है या फिर हॉल में गद्दा बिछाकर सोने के लिए कहा जाता है.

कपूर ने कहा, “आप किसी के लिए दो घंटे काम करें या चौबीस घंटे, इससे यह तय नहीं होता कि आपको कितनी इज्जत और संवेदनशीलता मिलेगी. यही वजह है कि इन महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त कानून होने चाहिए.”

अब अफसाना ने मालिकों के घर में रहकर पूरे समय काम करने का वह दौर पीछे छोड़ दिया है. आज वह तीन अलग-अलग घरों में खाना बनाने और सफाई करने का काम करती हैं. इस बदलाव ने उन्हें वह चीज दी है, जो पहले उनके पास नहीं थी. अब उनके पास अपने लिए और अपने परिवार के लिए समय है, खासकर अपने किशोर बेटे के साथ वक्त बिताने का मौका.

वह महीने में करीब 13,000 रुपये कमाती हैं. हालांकि, वह अपनी नई दिनचर्या से खुश हैं, क्योंकि इससे उन्हें थोड़ी-सी आजादी मिली है. मौजूदा मालिकों के यहां उन्हें काम करते हुए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, लेकिन उनका कहना है कि ये लोग उनके साथ उन कई परिवारों के मुकाबले ज्यादा सम्मान से पेश आते हैं, जिनके यहां वह पहले काम कर चुकी हैं.

अफसाना ने कहा, “हर उंगली एक जैसी नहीं होती. हर इंसान अलग होता है. मैं ऐसे परिवारों के यहां काम करती हूं, जो मुझे अपने साथ बैठकर खाना खाने के लिए कहते हैं. किसी इंसान की इंसानियत इस बात से तय नहीं होती कि आपने उसके यहां कितने साल काम किया है. यह इस बात पर निर्भर करती है कि आपका मालिक कैसा इंसान है.”

उन्होंने अपनी एक मौसी के साथ हुई घटना भी याद की, जो खुद घरेलू कामगार हैं. उनकी मौसी गुरुग्राम में एक परिवार के यहां 15 साल से काम कर रही थीं, लेकिन एक दिन उसी परिवार ने उन पर चोरी का आरोप लगा दिया.

अफसाना ने बताया, “एक दिन उस महिला को अपने हीरे के झुमले नहीं मिले. लेकिन उसने उन्हें ढूंढ़ने की बजाय मेरी मौसी पर शक किया, जिन्होंने एक दशक से भी ज्यादा समय तक उसके घर की देखभाल की थी. महिला ने पुलिस बुलाने की धमकी तक दे दी, जबकि मेरी मौसी बार-बार कहती रहीं कि उन्होंने झुमले नहीं लिए हैं. आखिरकार, जब परिवार ने सीसीटीवी फुटेज देखी, तो पता चला कि झुमले उसी महिला के अपने बेडरूम में पड़े थे.”

इस घटना से अफसाना को गुस्सा सिर्फ इसलिए नहीं आया कि उनकी मौसी पर चोरी का झूठा आरोप लगाया गया था, बल्कि इसलिए भी कि उनकी मौसी की 15 साल की मेहनत और ईमानदारी को एक पल में भुला दिया गया.

अफसाना ने कहा, “बात जब कामवाली पर आती है, तो लोग इंसानियत ही भूल जाते हैं. हम आपके घर का ध्यान रखते हैं. आप हम पर थोड़ा भरोसा तो कर ही सकते हैं, है ना?”

हालांकि, सोसाइटी में रहने वाले लोग कहते हैं कि मालिकों और घरेलू कामगारों के बीच संबंध हमेशा इतने सीधे-सादे नहीं होते. वसंत कुंज के सेक्टर ए में रहने वाले एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि चोरी की घटनाओं, वेतन को लेकर होने वाले विवादों और बिना बताए काम छोड़कर चले जाने वाले कामगारों के कारण अब वे घरेलू कामगारों को लेकर सतर्क रहते हैं.

उस व्यक्ति ने इस बात पर जोर दिया कि सोसाइटी के नियमों का पालन करना जरूरी है. इनमें लिफ्ट और साझा जगहों के इस्तेमाल से जुड़े नियम भी शामिल हैं, ताकि रिहायशी परिसर की व्यवस्था ठीक से चलती रहे.

उन्होंने कहा, “सोसाइटी में रहने वाले लोगों को भी कई नियम-कायदों का पालन करना पड़ता है, तो फिर वही नियम घरेलू कामगारों पर क्यों लागू नहीं होने चाहिए? अगर हमसे उनकी मांगों का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है, तो उन्हें भी हमारी चिंताओं को समझना चाहिए. सिर्फ इसलिए कि कुछ घटनाएं हुई हैं, इसका मतलब यह नहीं कि हर निवासी ही गलत है.”

हमारी शिकायतें कौन सुनेगा?

45 वर्षीय रीता देवी साकेत में घरेलू कामगार के रूप में काम करती हैं. उनका कहना है कि 17 साल के काम के दौरान उन्हें कभी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा. लेकिन एक बात है, जो आज भी उन्हें परेशान करती है.

रीता देवी ने कहा, “हमारी नौकरी और वेतन, दोनों को लेकर कोई सुरक्षा नहीं है. इसमें बदलाव होना चाहिए. लेकिन हम अपने अमीर मालिकों से कौन लड़ाई मोल लेगा? हमारी शिकायतें कौन सुनेगा? वे तो हमें हटाकर किसी दूसरे कामगार को रख लेंगे.”

काम खत्म करने के बाद रीता अक्सर दूसरे घरेलू कामगारों के साथ पार्क में बैठती हैं. वहां वे अपने परिवारों, अपने मालिकों और उस बढ़ती खाई के बारे में बात करती हैं, जो उन्हें मिलने वाली सुविधाओं और उनके हक के बीच है. उदाहरण के लिए, दिवाली पर उन्हें बोनस मिलने की उम्मीद होती है, लेकिन बदले में अक्सर उन्हें बचा हुआ खाना दिया जाता है, जिसे वे आमतौर पर आखिर में फेंक ही देते हैं.

रीता ने कहा, “हम आपस में अपनी परेशानियां साझा करते हैं और एक-दूसरे को सलाह देते हैं कि क्या करना चाहिए. काम छोड़ देना चाहिए या फिर हालात से समझौता कर लेना चाहिए. हमारे पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं.”

साकेत के सी ब्लॉक में अपने घर की बालकनी से 68 वर्षीय राकेश डबास अक्सर घरेलू कामगारों को उसी पार्क में इकट्ठा होते देखते हैं. इनमें उनके घर में काम करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं. डबास सोसाइटी की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) के पूर्व सदस्य हैं.

उन्होंने कहा, “यह सुनकर दुख होता है कि घरेलू कामगारों को पार्क से चले जाने के लिए कहा जाता है या सिर्फ इसलिए कुछ लिफ्टों से जाने नहीं दिया जाता, क्योंकि वे इन घरों में काम करते हैं. वे घंटों हमारे घरों की देखभाल करते हैं, फिर भी कुछ लोग उनके साथ साझा जगहों का इस्तेमाल करना बर्दाश्त नहीं कर पाते.”

डबास का कहना है कि उन्होंने कई बार निवासियों को घरेलू कामगारों के सीढ़ियों पर कुछ मिनट बैठने पर भी आपत्ति जताते और उन पर ऊंची आवाज में चिल्लाते देखा है. उनके मुताबिक, वह अक्सर बीच-बचाव करने और कामगारों का पक्ष लेने के लिए आगे आए हैं.

उन्होंने कहा, “सम्मान दोनों तरफ से होना चाहिए. अगर आपको किसी से कोई परेशानी है, तो भी उस पर चिल्लाने या उसे अपमानित करने की जरूरत नहीं है.”

डबास के मुताबिक, निवासियों से बात करने के बाद वह यह सुनिश्चित करने में मदद कर पाए हैं कि घरेलू कामगार पार्क में बैठ सकें, अपना दोपहर का खाना खा सकें और एक घर का काम खत्म होने के बाद दूसरे काम पर जाने तक वहां इंतजार कर सकें.

हालांकि, आरडब्ल्यूए के सदस्यों का कहना है कि उन्हें व्यक्तिगत विवादों, आपसी मतभेदों या घरेलू कामगारों के साथ किए जाने वाले व्यवहार को लेकर निवासियों या कामगारों से बहुत कम शिकायतें मिलती हैं.

जब भेदभाव सुर्खियां बनता है

नोएडा की अम्रपाली सैफायर सोसाइटी में मनु तीन बेडरूम वाले एक फ्लैट में रहती हैं. इस गेटेड सोसाइटी में घरेलू कामगारों और दूसरे कर्मचारियों के लिए अलग से ‘सर्विस लिफ्ट’ बनाई गई हैं. इनमें सुरक्षा गार्ड, डिलीवरी करने वाले कर्मचारी, कूड़ा उठाने वाले और सफाई कर्मचारी भी शामिल हैं.

A Noida society service lift, which faces maintenance issues frequently, is used by domestic workers | Special arrangement
नोएडा की एक सोसाइटी की सर्विस लिफ्ट, जिसमें अक्सर मेंटेनेंस की समस्या आती रहती है, उसका इस्तेमाल घरेलू कामगार करते हैं | विशेष व्यवस्था

मनु को एक दिन की घटना याद है, जब उन्होंने अपनी घरेलू सहायिका को लिफ्ट के पास इंतजार करते देखा और उसे अपने लिए तय लिफ्ट में आने के लिए कहा.

मनु ने बताया, “दूसरी मंजिल से एक महिला लिफ्ट में आई और जब तक हम बाहर नहीं निकल गए, तब तक मेरी दीदी को घूरती रही. लोग बहुत रूखे तरीके से पेश आ सकते हैं. ऐसा होते देखना वाकई दुखद है.”

हालांकि, सभी निवासी इन पाबंदियों को भेदभाव के रूप में नहीं देखते. सोसाइटी के निवासी और आरडब्ल्यूए के पूर्व सदस्य विश्वेंदु का कहना है कि साझा जगहों के इस्तेमाल को लेकर नियम बनाने के पीछे निवासियों के अपने कारण हैं.

उन्होंने कहा, “निवासी सोसाइटी को साफ-सुथरा रखने और उसका रखरखाव करने के लिए मेंटेनेंस शुल्क देते हैं. कुछ घरेलू कामगार साझा जगहों पर थूकते हैं, लिफ्ट में कचरा फैलाते हैं या खाने का बचा हुआ कचरा छोड़ जाते हैं. इन बातों को भी गंभीरता से लेने की जरूरत है.”

हालांकि, ऐसे विवादों की शिकायतें जरूरी नहीं कि आरडब्ल्यूए या पुलिस तक पहुंचें, लेकिन सोसाइटी के व्हाट्सऐप ग्रुप में इन पर विस्तार से चर्चा होती है. वहीं, डिजिटल गेट-मैनेजमेंट ऐप के जरिए निवासी कामगारों के बारे में अपनी राय और रेटिंग भी दे सकते हैं. इन रेटिंग और शिकायतों का असर इस बात पर पड़ सकता है कि किसी कामगार को आगे काम मिलेगा या नहीं.

नाम न छापने की शर्त पर एक घरेलू कामगार ने कहा, “निवासी हमारी रेटिंग कर सकते हैं, अपने ग्रुप में हमारे खिलाफ शिकायत कर सकते हैं और हमारे काम पर असर डाल सकते हैं. लेकिन क्या हम भी उनके साथ ऐसा कर सकते हैं? असली फर्क यहीं है. उनके हाथ में यह तय करने की ताकत है कि हमें काम मिलेगा या नहीं, लेकिन हम उनके व्यवहार पर सवाल तक नहीं उठा सकते.”

वसंत कुंज में मरियम अब सोसाइटी के उस दूर वाले हिस्से की ओर बढ़ रही हैं, जहां पानी की टंकियां लगी हैं. उन्हें अगले घर में काम पर जाने से पहले 15 मिनट इंतजार करना है. इसलिए वह पार्क और उस महिला से दूर यहां आकर बैठ जाती हैं, जिसने कुछ देर पहले उन्हें डांटकर अपमानित किया था.

मरियम ने कहा, “आपने कितनी बार सुना है कि किसी कामवाली ने चोरी की या किसी निवासी से लड़ाई की और उसकी खबर अखबारों में छपी? लेकिन ऐसी कितनी ही खबरें आती हैं, जिनमें निवासियों ने कामगारों को लिफ्ट इस्तेमाल करने से रोका, उन्हें थप्पड़ मारे या उनके साथ मारपीट की.”

उन्होंने आगे कहा, “हमें पता है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती, लेकिन हमें यह भी पता है कि हमें बराबरी का दर्जा और सम्मान नहीं मिलेगा. हम तो बस इसी बात से खुश हो जाते हैं कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो हमें इज्जत देते हैं और हमारे साथ इंसान समझकर व्यवहार करते हैं.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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