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Thursday, 29 October, 2026
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FPI ने 2026 में भारतीय बाजार से निकाले 3.07 लाख करोड़ रुपये, अब कैपिटल गेंस टैक्स पर नजर

एक दशक पहले, भारत की मुख्य चिंता FPI की निकासी को रोकना रही होगी. अब इस बात पर विचार किया जा सकता है कि ग्लोबल 'पेशेंट कैपिटल' को कैसे आकर्षित किया जाए—मजबूरी के तौर पर नहीं, बल्कि विकास की गति को तेज करने के लिए.

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इस साल पूरे समय, भारत के किसी छोटे शहर में रहने वाली एक स्कूल टीचर अपनी सैलरी का कुछ हिस्सा, यानी हर महीने कई हजार रुपये, सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के जरिए एक इक्विटी फंड में लगातार निवेश कर रही है. इसी दौरान, दुनिया के कुछ सबसे बड़े फंड भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं. हो सकता है कि उस टीचर को इसकी जानकारी हो या नहीं.

विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने 2026 में अब तक भारतीय शेयर बाजार से कुल 3.07 लाख करोड़ रुपये निकाले हैं. यह कम से कम पिछले 12 साल में सबसे बड़ी निकासी है और 2025 में निकाले गए 1.66 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले लगभग दोगुनी है. लेकिन करीब 15 प्रतिशत की गिरावट के बावजूद भारतीय बाजार मजबूती से टिका हुआ है, क्योंकि उस टीचर जैसे लाखों घरेलू निवेशक लगातार शेयर खरीद रहे हैं.

निवेश के तौर-तरीकों में आए इस बदलाव के कारण भारत सरकार ने भी अपना ध्यान इस ओर बढ़ाया है. 13 अक्टूबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि वह लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (LTCG) टैक्स पर सुझाव लेंगी. उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में सावधानी से आगे बढ़ा जाएगा, क्योंकि इस टैक्स और सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स के बीच कुछ समानताएं हैं. भारत में घरेलू और विदेशी निवेशकों की ओर से शेयर बेचने पर बिना इंडेक्सेशन लाभ के 12.5 प्रतिशत LTCG टैक्स लगाया जाता है. लिस्टेड शेयरों से एक वित्त वर्ष में 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के मुनाफे पर यह टैक्स लागू होता है, जबकि अनलिस्टेड शेयर बेचने पर मुनाफे की ऐसी कोई सीमा नहीं है.

एक दशक पहले सबसे बड़ी चिंता यह होती कि विदेशी निवेशकों को अपना पैसा निकालने से कैसे रोका जाए. लेकिन आज भारत एक ज्यादा रणनीतिक सवाल पर विचार कर सकता है: दुनिया के ऐसे निवेशकों को कैसे आकर्षित किया जाए, जो लंबे समय तक निवेश बनाए रखते हैं. यह काम मजबूरी में नहीं, बल्कि देश की आर्थिक वृद्धि को तेज करने के लिए किया जा सकता है.

Infographic: Manya Aggarwal | ThePrint
इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल | दिप्रिंट

भारतीय परिवार और ‘गिरते चाकू को पकड़ने’ का जोखिम

2026 में भारतीय परिवारों ने बाजार में भारी गिरावट के दौरान निवेश जारी रखा. बाजार के जानकार इस स्थिति को “गिरते हुए चाकू को पकड़ना” कहते हैं.

जनवरी से सितंबर के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से कुल 2.6 लाख करोड़ रुपये निकाले. इसी दौरान, भारत के सक्रिय रूप से मैनेज किए जाने वाले इक्विटी म्यूचुअल फंड में 2.73 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया. खास बात यह है कि मार्च में विदेशी निवेशकों ने सबसे ज्यादा बिकवाली की और बाजार से 1.18 लाख करोड़ रुपये निकाले गए. इसी महीने भारतीय इक्विटी फंड में इस साल का सबसे ज्यादा मासिक निवेश आया, जो 40,450 करोड़ रुपये था.

Infographic: Manya Aggarwal | ThePrint
इन्फोग्राफिक: मान्या अग्रवाल | दिप्रिंट

2008 से तुलना करने पर बड़ा अंतर दिखाई देता है. उस साल विदेशी निवेशकों ने करीब 13 अरब डॉलर निकाले थे और सेंसेक्स की कीमत आधे से भी ज्यादा गिर गई थी. इसके उलट, इस साल विदेशी निवेशकों ने उस रकम से दोगुने से भी ज्यादा पैसा निकाला है, फिर भी शेयर बाजार का प्रमुख सूचकांक पिछली बार की तुलना में बहुत कम गिरा है.

भारत ने घरेलू निवेशकों का इतना मजबूत आधार तैयार कर लिया है कि वह विदेशी निवेश में बड़ी गिरावट का भी सामना कर सकता है. उभरते हुए बाजारों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है.

विदेशी निवेशकों के भारत से पैसा निकालने के पीछे मुख्य रूप से ऐसे कारण थे, जिनका भारत से सीधा संबंध नहीं था.

1993 में गुइलेर्मो काल्वो, लियोनार्डो लीडरमैन और कारमेन रेनहार्ट ने बताया था कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में आने वाला विदेशी निवेश मुख्य रूप से विकसित देशों के हालात से प्रभावित होता है. इनमें अमेरिका की ब्याज दरें और दुनिया भर के निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा जैसे कारण शामिल हैं. इनका असर घरेलू हालात के मुकाबले ज्यादा होता है. दो दशक बाद, लंदन बिजनेस स्कूल की हेलेन रे ने इस स्थिति को ‘ग्लोबल फाइनेंशियल साइकल’ यानी वैश्विक वित्तीय चक्र का नाम दिया.

इस साल इन सभी बाहरी कारणों का असर भारत के खिलाफ रहा. अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने सितंबर में ब्याज दरें बढ़ाईं, कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई और डॉलर मजबूत हुआ. इससे निवेशक अपना पैसा वापस अमेरिकी संपत्तियों में लगाने लगे.

इसके उलट, टैक्स नीति से यह नहीं समझाया जा सकता कि विदेशी निवेशकों ने पैसा निकालना कब शुरू किया. भारत ने जुलाई 2024 में LTCG टैक्स की दर 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दी थी, लेकिन विदेशी निवेशकों ने तुरंत पैसा निकालना शुरू नहीं किया. उन्होंने 2024 का साल 427 करोड़ रुपये के मामूली शुद्ध निवेश के साथ खत्म किया. बड़े पैमाने पर निकासी 2025 में शुरू हुई और 2026 में और तेज हो गई. इसी दौरान दुनिया भर में वित्तीय अस्थिरता बढ़ने लगी. इसी वैश्विक उथल-पुथल के कारण विदेशी निवेशकों ने बड़ी संख्या में अपना पैसा निकालना शुरू किया.

हालांकि, टैक्स नीतियों की वजह से विदेशी निवेशकों ने पैसा नहीं निकाला, लेकिन जब वैश्विक वित्तीय चक्र का रुख बदलेगा और अंतरराष्ट्रीय फंड फिर से यह तय करेंगे कि उन्हें कहां निवेश करना है, तब टैक्स की अहम भूमिका होगी. उस समय टैक्स चुकाने के बाद मिलने वाला मुनाफा एक बड़ा फैसला लेने वाला कारक होगा. भारत अपनी टैक्स व्यवस्था को बेहतर बनाकर विदेशी निवेशकों के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकता है.

भारत की कैपिटल गेंस टैक्स नीति और दूसरे देशों की व्यवस्था

अमेरिका में विदेशी निवेशकों को अमेरिकी शेयरों से होने वाले मुनाफे पर तभी टैक्स देना पड़ता है, जब वे साल के कम से कम आधे समय तक वहां रहते हों या वहां कोई कारोबार चलाते हों.

इसके उलट, ब्रिटेन, जापान और कनाडा विदेशी निवेशकों पर केवल कुछ खास परिस्थितियों में टैक्स लगाते हैं. उदाहरण के लिए, जब किसी निवेशक की ऐसी कंपनियों में बड़ी हिस्सेदारी हो, जिनके पास काफी संपत्ति है. सिंगापुर और हांगकांग में कैपिटल गेंस टैक्स नहीं लगाया जाता, जबकि संयुक्त अरब अमीरात में फिलहाल गैर-निवासियों के लिए विदहोल्डिंग टैक्स की दर शून्य है. इसके अलावा, चीन में स्टॉक कनेक्ट और विदेशी निवेशकों के लिए अधिकृत माध्यमों से होने वाले मुनाफे पर टैक्स में छूट दी जाती है.

भारत में सालाना 1.25 लाख रुपये से ज्यादा के मुनाफे पर 12.5 प्रतिशत टैक्स लगाया जाता है. इसके अलावा सरचार्ज और सेस भी देना पड़ता है.

यह व्यवस्था जानबूझकर बनाई गई है. 1986 में अर्थशास्त्री रोजर गॉर्डन ने बताया था कि छोटी और खुली अर्थव्यवस्था वाले देश को आम तौर पर ऐसे निवेश पर उसके स्रोत पर टैक्स लगाने से बचना चाहिए, जिसे आसानी से दूसरे देशों में ले जाया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि निवेशक टैक्स लगने से पहले ज्यादा मुनाफे की मांग करते हैं. इससे टैक्स का बोझ उन चीजों पर पड़ता है, जिन्हें आसानी से दूसरी जगह नहीं ले जाया जा सकता, जैसे मजदूर और जमीन.

इसी वजह से जापान अपने नागरिकों को शेयरों से होने वाले मुनाफे पर 20 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स लगाता है, जबकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को ज्यादातर इससे छूट देता है. कनाडा अपने नागरिकों के मुनाफे के केवल आधे हिस्से पर टैक्स लगाता है.

भारत की यह बात सराहनीय है कि वह विदेशी और भारतीय निवेशकों के साथ टैक्स के मामले में समान व्यवहार करता है. हालांकि, यह सिद्धांत निष्पक्ष है, लेकिन इसके कारण भारत उन कुछ बड़े बाजारों में शामिल हो जाता है, जहां लंबे समय तक निवेश बनाए रखने वाले विदेशी निवेशकों को पैसा निकालते समय टैक्स देना पड़ता है.

लेकिन इस मामले का सबसे अहम पहलू अब तक काफी हद तक नजरअंदाज किया गया है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के मुनाफे की गणना रुपये में की जाती है. इस साल रुपये की कीमत गिरकर करीब 90 रुपये प्रति डॉलर से लगभग 95 रुपये प्रति डॉलर हो गई है.

मान लीजिए कि किसी फंड ने जनवरी में 100 डॉलर निवेश किए और उसके भारतीय शेयरों की कीमत 9,000 रुपये थी. अगर इन शेयरों की कीमत 5 प्रतिशत बढ़कर 9,450 रुपये हो जाती है, लेकिन इसी दौरान रुपये की कीमत भी 5 प्रतिशत गिर जाती है, तो उस फंड की निवेश की गई रकम की डॉलर में कीमत फिर भी 100 डॉलर ही रहेगी. यानी उसे वास्तव में कोई मुनाफा नहीं हुआ. इसके बावजूद उसे रुपये में हुए 450 रुपये के ‘मुनाफे’ पर टैक्स देना पड़ेगा. इससे उसके निवेश की शुद्ध कीमत घटकर करीब 99.40 डॉलर रह जाएगी. इस तरह भारत असल में विदेशी निवेशकों पर रुपये की कीमत गिरने के कारण भी टैक्स लगा रहा है. इसका सबसे ज्यादा असर तब पड़ता है, जब भारत इन निवेशों को अपने यहां बनाए रखना चाहता है.

बड़े हथौड़े की जगह सटीक उपाय

LTCG टैक्स को पूरी तरह खत्म करना महंगा और बिना सोचे-समझे उठाया गया कदम होगा. वित्त वर्ष 2024-25 में शेयरों से होने वाले मुनाफे पर टैक्स के जरिए 1.29 लाख करोड़ रुपये मिले, जबकि इससे पिछले साल यह रकम 72,249 करोड़ रुपये थी. सिर्फ विदेशी निवेशकों को टैक्स से छूट देने पर भारत के समान व्यवहार करने के सिद्धांत को नुकसान पहुंचेगा. इससे बेहतर तरीका यह होगा कि लंबे समय तक निवेश करने में आने वाली रुकावटों को दूर किया जाए और साथ ही टैक्स से होने वाली कमाई भी बनी रहे.

पहला, टैक्स वास्तविक मुनाफे पर लगना चाहिए, न कि मुद्रा की कीमत में बदलाव के कारण दिखने वाले मुनाफे पर. नए आयकर कानून की धारा 72(6) के तहत गैर-निवासी कुछ भारतीय शेयरों और डिबेंचर से होने वाले मुनाफे की गणना उस विदेशी मुद्रा में कर सकते हैं, जिसमें उन्होंने निवेश किया था. इस नियम को विदेशी निवेशकों के पास मौजूद लिस्टेड शेयरों पर भी लागू करने से केवल नाममात्र के मुनाफे पर लगने वाला टैक्स खत्म हो जाएगा, जबकि वास्तविक मुनाफे पर टैक्स जारी रहेगा.

दूसरा, तीन से पांच साल से ज्यादा समय तक रखे गए शेयरों पर टैक्स की दर धीरे-धीरे कम की जानी चाहिए. इससे लंबे समय तक निवेश करने को बढ़ावा मिलेगा, जबकि कम समय में शेयरों की खरीद-बिक्री करने वालों पर पूरा टैक्स लगता रहेगा.

तीसरा, वित्त मंत्री को LTCG टैक्स और ट्रांजैक्शन टैक्स के बीच के दोहरे बोझ को दूर करना चाहिए, ताकि निवेशकों को दो अलग-अलग टैक्स देने के बजाय एक ही अच्छी तरह से बनाई गई टैक्स व्यवस्था का सामना करना पड़े.

चौथा, सरकार को टैक्स नीति में स्थिरता बनाए रखने का भरोसा देना चाहिए. हाल ही में एक अध्यादेश के जरिए विदेशी निवेशकों को सरकारी बॉन्ड से होने वाले मुनाफे पर कैपिटल गेंस टैक्स और विदहोल्डिंग टैक्स से छूट दी गई है. यह छूट जून में जारी अध्यादेश के तहत अप्रैल से लागू हुई. यह एक उदाहरण पेश करता है. शेयर बाजार में निवेश के लिए भी कई सालों की स्पष्ट और भरोसेमंद योजना बनाना, केवल एक बार टैक्स कम करने से ज्यादा असरदार होगा.

2026 में सबसे बड़ा बदलाव विदेशी निवेशकों का पैसा निकालना नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिए भारत की विदेशी पूंजी पर कम होती निर्भरता है. इस मजबूत स्थिति के कारण भारत ऐसी नीतिगत सुधार कर सकता है, जिनमें निवेश की मात्रा के बजाय उसकी गुणवत्ता को प्राथमिकता दी जाए. इसका मकसद ऐसे निवेशकों को आकर्षित करना होना चाहिए, जो थोड़े समय में मुनाफा कमाने के बजाय लंबे समय तक निवेश बनाए रखें.

हर महीने SIP के जरिए निवेश करने वाली स्कूल टीचर जैसे घरेलू निवेशक पहले ही भारत की संभावनाओं पर अपना भरोसा दिखा चुके हैं. ज्यादा रणनीतिक टैक्स नीति दुनिया भर के लंबे समय तक निवेश करने वाले निवेशकों को भी भारत की ओर आकर्षित कर सकती है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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