22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान के समर्थन वाले ‘कबायली हथियारबंद हमलावर’ जम्मू-कश्मीर की रियासत में घुस आए. यह कश्मीर विवाद में पहला हमला था. इसी घटना के बाद महाराजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर का भारत में विलय करने का फैसला किया.
करीब आठ दशक बाद, उस हमले का इतिहास एक बड़े विरोधाभास को दिखाता है. पाकिस्तान ने कश्मीर के लोगों के नाम पर इस इलाके में दखल देने को सही ठहराया था, लेकिन जिन इलाकों पर उसने कब्ज़ा किया, वे आज भी भारतीय उपमहाद्वीप के उन इलाकों में शामिल हैं, जहां लोगों को राजनीतिक अधिकार बहुत कम मिले हैं और आर्थिक विकास भी बहुत कम हुआ है.
इसलिए पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (पीओजेके) की कहानी सिर्फ एक विवादित इलाके की कहानी नहीं है. यह उन वादों की कहानी भी है, जो कश्मीरियों के नाम पर किए गए, लेकिन शायद ही कभी पूरे किए गए.
असली हमलावर और वह सवाल जिसे भुला दिया गया
कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का बड़ा हिस्सा जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद की घटनाओं से शुरू होता है, लेकिन भारत के नज़रिए से सबसे अहम सवाल आसान है: संघर्ष की शुरुआत किसने की?
अक्टूबर 1947 में जब पाकिस्तान के समर्थन वाली कबायली सेनाएं जम्मू-कश्मीर में घुसीं, तब तक इस रियासत का भारत या पाकिस्तान, किसी भी देश में विलय नहीं हुआ था. हमले का सामना कर रहे महाराजा ने भारत से सैन्य मदद मांगी और विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद भारतीय सैनिक वहां पहुंचे.
इस तरह, भारत के पक्ष के अनुसार, पाकिस्तान कश्मीर में किसी अन्याय का जवाब देने के लिए वहां नहीं आया था. बल्कि उसी ने सबसे पहले संकट पैदा किया था.
अगर पाकिस्तान ने कश्मीरियों की भलाई के लिए दखल देने का दावा किया था, तो उसने उस इलाके में रहने वाले लोगों के लिए क्या किया?
इस सवाल का जवाब इस्लामाबाद के लिए असहज करने वाला है.
दशकों तक विकास को नज़रअंदाज़ किया गया
पाकिस्तान के कब्ज़े वाले इन इलाकों में कुदरती संसाधनों की कोई कमी नहीं है. गिलगित-बाल्टिस्तान में पनबिजली बनाने की बहुत ज्यादा क्षमता है. यहां व्यापार के लिए अहम रास्ते हैं और पर्यटन के लिए भी बेहद खूबसूरत जगहें हैं. पाकिस्तान के कब्ज़े वाले जम्मू-कश्मीर में उपजाऊ घाटियां, पानी के संसाधन और ऐसे लोग हैं, जिनकी सामाजिक स्थिति से जुड़े आंकड़े काफी अच्छे हैं.
लेकिन दशकों तक नियंत्रण में रहने के बावजूद पाकिस्तान इन खूबियों का इस्तेमाल करके लोगों को बड़े पैमाने पर खुशहाली नहीं दे पाया है. यहां की अर्थव्यवस्था काफी हद तक विदेशों में रहने वाले लोगों से मिलने वाले पैसे, सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद और सरकारी नौकरियों पर निर्भर है. उद्योगों का विकास बहुत कम हुआ है. उच्च शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं, बेहतर बुनियादी ढांचे और बड़े स्तर पर निजी निवेश के मौके नियंत्रण रेखा के भारतीय हिस्से की तुलना में काफी कम हैं.
आज भारत के जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था कहीं बड़ी है और इसमें कई तरह के काम-धंधे शामिल हैं. यह दुनिया के सबसे बड़े राष्ट्रीय बाजारों में से एक से जुड़ी हुई है. दशकों तक आतंकवाद और हिंसा का सामना करने के बावजूद यहां सड़कों, रेल संपर्क, दूरसंचार, विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य संस्थानों, बैंकिंग नेटवर्क और पर्यटन से जुड़े बुनियादी ढांचे का लगातार विस्तार हुआ है.
यह अंतर तब और भी साफ दिखाई देता है, जब हम देखते हैं कि भारत ने ये उपलब्धियां उस समय हासिल कीं, जब वह पाकिस्तान के समर्थन वाली ताकतों की ओर से फैलाए गए आतंकवाद, घुसपैठ और हिंसा से भी लड़ रहा था. इस दौरान हज़ारों सुरक्षाकर्मियों और आम नागरिकों की जान गई.
इतने मुश्किल हालात के बावजूद लोकतांत्रिक राजनीति बनी रही. चुनाव होते रहे, चुने हुए प्रतिनिधि संसद में पहुंचे, वोट के जरिए सरकारें बदलीं, लोगों के लिए अदालतों तक पहुंच बनी रही और राजनीतिक दलों ने खुले तौर पर केंद्र सरकार की आलोचना की.
इसके उलट, पाकिस्तान को पीओजेके में ऐसी किसी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा, फिर भी वह वहां आर्थिक विकास के मामले में काफी पीछे रहा. वहां लोगों के लिए राजनीतिक गतिविधियों की गुंजाइश कम रही और संविधान के तहत उनकी स्थिति भी कमजोर रही.
इससे पाकिस्तान का बचाव करने वालों के सामने एक मुश्किल सवाल खड़ा होता है. अगर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों की अक्सर आलोचना होती है, तो उन इलाकों में सख्ती से कार्रवाई करने की वजह क्या है, जहां ऐसे हालात नहीं हैं? यह कश्मीरियों की आकांक्षाओं के साथ धोखा है.
‘आज़ाद’ कश्मीर का विरोधाभास
शायद सबसे बड़ा विरोधाभास उस नाम में है, जो पाकिस्तान ने खुद इस इलाके को दिया है: ‘आज़ाद’ कश्मीर.
हाल के समय तक इस्लामाबाद के खिलाफ पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर के लोगों ने कोई बड़ी हिंसक लड़ाई नहीं लड़ी थी. पाकिस्तान की सरकार के खिलाफ लंबे समय तक आतंकवाद या अलग देश बनाने का कोई अभियान भी नहीं चला. ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि इस इलाके के लोगों को काफी राजनीतिक आजादी और अपने फैसले खुद लेने के ज्यादा अधिकार मिले होंगे.
लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग रही है.
यहां की राजनीतिक व्यवस्था लंबे समय से इस्लामाबाद की ओर से तय की गई सख्त सीमाओं के अंदर काम करती रही है. पाकिस्तान में विलय पर सवाल उठाने जैसे एक बुनियादी राजनीतिक विचार पर संविधान के तहत पाबंदियां हैं. इस इलाके में ऐसी संस्थाएं हैं, जो देखने में आज़ाद लगती हैं, लेकिन अहम रणनीतिक, संवैधानिक और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर आखिरी नियंत्रण इस इलाके के बाहर ही है.
हाल ही में पीओजेके में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान एक बात खास तौर पर सामने आई. दुनिया के दूसरे इलाकों में होने वाले विद्रोहों से अलग, यहां के प्रदर्शन मुख्य रूप से आर्थिक परेशानियों, सरकार से जवाब मांगने, शासन व्यवस्था, बिजली की कीमतों, सब्सिडी, प्रतिनिधित्व और स्थानीय अधिकारों से जुड़ी मांगों को लेकर थे.
दूसरे शब्दों में कहें तो, बहुत से नागरिक कोई असाधारण मांग नहीं कर रहे थे. वे सिर्फ बेहतर शासन चाहते थे, लेकिन सरकार की प्रतिक्रिया ने बहुत कुछ साफ कर दिया.
अधिकारियों ने गिरफ्तारियां कीं, इंटरनेट बंद किया और लोगों के इकट्ठा होने पर पाबंदियां लगाईं. देशद्रोह के मामले दर्ज किए गए और सुरक्षा बलों को तैनात किया गया. ऐसी खबरें आईं कि विरोध-प्रदर्शनों के दौरान लोगों की मौत हुई, वे घायल हुए और आंदोलन को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर सख्त कदम उठाए गए. खबरों के मुताबिक, पाकिस्तान में मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले लोगों ने भी जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग और सरकार की सख्त कार्रवाई पर चिंता जताई. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी गिरफ्तारियों और असहमति की आवाजों को दबाने से जुड़ी चिंताओं को दर्ज किया.
इन घटनाओं का महत्व बहुत बड़ा है.
दशकों तक पाकिस्तान ने इन इलाकों पर अपने नियंत्रण को सही ठहराने के लिए खुद को कश्मीरियों की आकांक्षाओं का रक्षक बताया, लेकिन जब आम लोगों ने बेहतर शासन और सरकार से जवाबदेही की मांग की, तो बातचीत करने के बजाय उनके खिलाफ जबरदस्ती की गई. ऐसा लगा कि सरकार उन नागरिकों के खिलाफ अपने पूरे प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा बलों का इस्तेमाल करने को तैयार थी, जिनकी मुख्य मांगें अलग देश बनाने के बजाय अपने अधिकारों और बेहतर शासन से जुड़ी थीं.
इसलिए पीओजेके की त्रासदी सिर्फ जमीन या इलाके तक सीमित नहीं है. यह बुनियादी रूप से राजनीति और विकास से जुड़ी समस्या है.
कई पीढ़ियों से लोगों को बताया गया कि 1947 में पाकिस्तान ने कश्मीरियों के हितों की रक्षा के लिए दखल दिया था. लेकिन 79 साल बाद भी उन्हीं इलाकों में संविधान को लेकर अनिश्चितता, राजनीतिक अधिकारों की कमी, आर्थिक विकास का अभाव और प्रशासन की दमनकारी कार्रवाई के आरोप बार-बार सामने आते हैं.
अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इस इलाके पर किसका नियंत्रण है. सवाल यह है कि यहां शासन कैसे चलाया गया है.
इस पैमाने पर देखें तो पाकिस्तान का रिकॉर्ड गंभीर सवाल खड़े करता है. नियंत्रण रेखा के पार से बड़े स्तर पर सुनियोजित हिंसा का सामना नहीं करने वाले इस इलाके को खुशहाली, लोकतंत्र और खुद अपना शासन चलाने का एक उदाहरण बनना चाहिए था. लेकिन इसके बजाय यह आज भी दूसरों पर निर्भर है, यहां राजनीतिक अधिकार सीमित हैं और जब नागरिक बदलाव की मांग करते हैं, तो समय-समय पर उनके खिलाफ बल का इस्तेमाल किया जाता है.
22 अक्टूबर की असली विरासत
इसलिए 22 अक्टूबर की बरसी को सिर्फ पाकिस्तान के सैन्य हमले की याद के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. इसे उस हमले के नतीजों की जांच करने के मौके के रूप में भी देखा जाना चाहिए.
पाकिस्तान ने कश्मीरियों की आवाज़ बनने का दावा करते हुए जम्मू-कश्मीर में प्रवेश किया था. लोगों को आज़ादी का वादा किया गया, लेकिन उन्हें निर्भरता मिली. उन्हें अपने भविष्य का फैसला खुद करने का अधिकार देने का वादा किया गया, लेकिन इसके बजाय उन पर निगरानी रखी गई. उन्हें प्रतिनिधित्व देने का वादा किया गया, लेकिन आज भी उनकी संवैधानिक स्थिति साफ नहीं है.
पाकिस्तान की कश्मीर नीति पर सबसे अहम फैसला भारत, अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों या इतिहासकारों की ओर से नहीं आता. इसका सबसे बड़ा सबूत पीओजेके के अंदर बार-बार उभरने वाले विरोध-प्रदर्शन हैं.
22 अक्टूबर 1947 के हमले के करीब आठ दशक बाद भी पीओजेके के लोग एक सीधा सवाल पूछ रहे हैं: अगर पाकिस्तान कश्मीरियों के नाम पर आया था, तो उसके शासन से कश्मीरियों को इतना कम फायदा क्यों मिला?
एसएन श्रीवास्तव पूर्व पुलिस कमिश्नर हैं. लेख में दिए गए विचार उनके निजी हैं.
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