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Thursday, 29 October, 2026
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एकनाथ शिंदे की सियासत का मंत्र: आम लोगों के लिए हमेशा खुले हैं दरवाजे

अगली पीढ़ी को महाराष्ट्र के डिप्टी CM एकनाथ शिंदे जैसे नेताओं से सीखना चाहिए कि सच्ची लीडरशिप का मतलब लोगों से जुड़े रहना और उनकी ज़रूरतों को सबसे पहले रखना है.

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हम अक्सर चुनाव के दौरान राजनीतिक नेताओं को लोगों के बीच जाते हुए देखते हैं. वे वोटरों से मिलते हैं, उनकी परेशानियां सुनते हैं, उनके साधारण घरों में जाते हैं और उनके साथ बैठकर खाना खाते हैं. लेकिन चुनाव खत्म होने के बाद इनमें से कई नेता गायब हो जाते हैं और फिर पांच साल बाद, अगले चुनाव के समय ही नजर आते हैं.

लेकिन कुछ नेता ऐसे होते हैं जो इन सबसे अलग होते हैं. लोगों की सेवा करने का उनका जज्बा चुनाव के साथ शुरू या खत्म नहीं होता. इसके पीछे उनका अपना एक मकसद होता है, जो सिर्फ राजनीतिक फायदे से जुड़ा नहीं होता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी के वरिष्ठ नेता अशोक भट्ट को याद करते हुए बताया था कि मंत्री रहते हुए भी वे आधी रात को लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहते थे. प्रधानमंत्री के शब्दों में, राजनीति में असली मकसद लोगों की सेवा करके उनका भरोसा जीतना है, न कि सिर्फ चुनाव जीतना. ऐसे नेता अपने पीछे ऐसी विरासत छोड़ जाते हैं, जो उनके कामों की कहानी कहती है. प्रधानमंत्री मोदी इसका एक उदाहरण हैं. 2001 में जब भुज में भूकंप के बाद तबाही मची थी, तब वे मुख्यमंत्री भी नहीं थे, फिर भी हालात का जायजा लेने के लिए बाइक से निकले थे. इसके बाद मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने चोबारी का दौरा किया, जो भूकंप से सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में से एक था. वहां उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पहली दिवाली मनाई.

एपीजे अब्दुल कलाम को भी इसी वजह से ‘जनता का राष्ट्रपति’ कहा जाता था. लोगों के लिए उनकी सहज उपलब्धता, सादगी और देश के आम नागरिकों से उनका जुड़ाव उन्हें दूसरों से अलग बनाता था. जब कोई नेता इसी सोच के साथ काम करता है, तो लोगों का प्यार और सम्मान उसे अपने आप मिलता है.

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे में भी यही सोच दिखाई देती है. पिछले कई सालों में उन्होंने अपनी एक ऐसी छवि बनाई है, जिसमें वे लोगों के बीच आसानी से उपलब्ध रहते हैं, उनकी बात सुनते हैं और उनकी समस्याओं के प्रति जवाबदेह रहते हैं. हाल ही में विजयादशमी के मौके पर दिए गए अपने भाषण में, जब शिवसेना ने अपने 60 साल पूरे किए, तो उन्होंने बताया कि सभी पदाधिकारियों को दशहरा मेळावा में शामिल न होने का निर्देश दिया गया था. इसके पीछे यह सोच थी कि कंधों पर भगवा झंडा लेकर शिवसैनिक खेतों में नज़र आएं। इससे पता चलता है कि सच्चे नेतृत्व का मतलब जमीन से जुड़े रहना और लोगों की परेशानियों को समझना है. सरकार किसानों को 12 तरह की छूट दे रही है. इसके साथ ही 5,000 रुपये की तत्काल आर्थिक मदद दी जा रही है और राशन किट भी बांटी जा रही हैं. किसानों की समस्याओं का सिर्फ ऊपरी तौर पर नहीं, बल्कि पूरी तरह समाधान करने के लिए सूखे से प्रभावित खेतों का पंचनामा भी किया जा रहा है.

पार्टी कार्यकर्ताओं और आम लोगों के लिए हमेशा उपलब्ध

राजनीति में आने से बहुत पहले ही शिंदे ने अपने इसी स्वभाव की झलक दिखाई थी. 1989 के बॉम्बे दंगों के दौरान, जब शहर में हिंसा फैली हुई थी, तब बताया जाता है कि वे रात में अपनी चॉल से ऑटो रिक्शा लेकर निकले और एक महिला और उसके बच्चे को अस्पताल पहुंचाया. यह मदद करने की भावना थी, जो उनके किसी सार्वजनिक पद पर पहुंचने से बहुत पहले सामने आई थी. इससे साबित होता है कि दूसरों की मदद करना उनके लिए किसी फायदे या मकसद से जुड़ा काम नहीं था, बल्कि उनका स्वभाव था.

कई दशक बाद भी उनका यही स्वभाव एक और घटना में देखने को मिला. एक सरकारी कार्यक्रम से लौटते समय शिंदे ने मुंबई में सड़क किनारे एक एंबुलेंस खड़ी देखी. उसमें एक मरीज था, जो शहर में अस्पताल में बेड नहीं मिलने के कारण वापस घर लौट रहा था. शिंदे ने तुरंत मदद के लिए कदम उठाया. उन्होंने उस व्यक्ति को ठाणे के एक अस्पताल में भर्ती कराने का इंतजाम किया और उसे वहां पहुंचाने के लिए अपने काफिले में शामिल एक एंबुलेंस भी उपलब्ध कराई.

उन्हें लोगों का नेता बनाने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि वे खुद को आम लोगों से ऊपर नहीं समझते. उनके अपने शब्दों में, वे चाहते हैं कि कतार में सबसे आखिर में खड़े व्यक्ति की बात भी सुनी जाए. उनका मानना है कि भले ही हर समस्या का समाधान करना संभव न हो, लेकिन लोगों की परेशानियां सुनना जरूरी है. मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनका यही नजरिया दिखाई दिया. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के आधिकारिक आवास वर्षा में उन्होंने कहा था, “इस घर के दरवाजे सभी के लिए 24 घंटे खुले हैं. मैं जानता हूं कि मैं यहां लोगों की वजह से हूं. मैं उनकी सेवा करने के लिए यहां हूं, इसलिए मैं कभी भी उनके लिए अपने दरवाजे बंद नहीं करूंगा.”

दूर-दराज के इलाकों से लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास आते थे. शिंदे अधिकारियों की एक टीम के साथ मिलकर उनकी परेशानियों को दूर करने की कोशिश करते थे. नेतृत्व का यह तरीका बालासाहेब ठाकरे की भी याद दिलाता है. वे हर सुबह अखबार पढ़ते थे, उसमें नागरिकों से जुड़ी समस्याओं पर निशान लगाते थे और फिर संबंधित अधिकारियों को फोन करके उन पर कार्रवाई की जानकारी लेते थे.

सबसे ऊंचे पद पर बैठा नेता पूरे संगठन और प्रशासन के काम करने का तरीका तय करता है. शिंदे ने शिवसेना के मंत्रियों को मुंबई स्थित पार्टी मुख्यालय में जनता दरबार लगाने का निर्देश दिया था. यह भी इसी सोच का हिस्सा था. इसका मकसद आम लोगों की समस्याएं सुनना और उनका समाधान करने की दिशा में काम करना था. उनका मानना था कि जिस पार्टी की सरकार हो, उसे अपने कार्यकर्ताओं और आम जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहना चाहिए.

उनका नजरिया सिर्फ लोगों के लिए उपलब्ध रहने तक सीमित नहीं था, बल्कि वे जवाबदेही पर भी जोर देते थे. अक्सर हम देखते हैं कि कागजों पर बनाई गई नीतियों और जमीन पर उनके लागू होने के तरीके में अंतर होता है. लोगों से मिलने वाली प्रतिक्रिया इस अंतर को दूर करने में मदद करती है. मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया था कि वे अपने-अपने जिलों के सरकारी अस्पतालों, नगर निगम के अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, मेडिकल कॉलेजों और उनसे जुड़े अस्पतालों का दौरा करें और उनकी स्थिति पर रिपोर्ट सौंपें. इस निर्देश के जरिए लोगों की समस्याएं सुनने के साथ-साथ उन सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत की जांच करने पर भी जोर दिया गया, जिन पर आम लोग निर्भर हैं.

उनके अपने शब्दों में, उनका मूलमंत्र है “24/7 सरकार”, यानी ऐसी सरकार जो हर समय लोगों के लिए उपलब्ध रहे. उनकी सरकार ने मुंबई कोस्टल रोड, अटल सेतु, मेट्रो रेल परियोजनाओं, नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, मुंबई-नागपुर समृद्धि महामार्ग और धारावी के पुनर्विकास जैसी बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को भी आगे बढ़ाया.

अगली पीढ़ी के लिए प्रेरणा

अब उपमुख्यमंत्री के रूप में भी शिंदे उसी भावना और जोश के साथ आगे बढ़ रहे हैं. लोगों के लिए उपलब्ध रहने और उनकी शिकायतों का समाधान करने पर उनका जोर उनकी हाल की पहलों में भी दिखाई देता है. इनमें मेडिकल असिस्टेंस सेल और लोगों की शिकायतें सुनने के लिए आयोजित जनसुनवाई शामिल हैं. पद और जिम्मेदारियां भले ही बदल गई हों, लेकिन उनके काम करने के पीछे की सोच आज भी वही है.

जनवरी 2026 में शिंदे ने बचाव के बजाय बीमारी से बचाव और समय पर जांच पर जोर देने वाली स्वास्थ्य पहल ‘आरोग्य आपल्या दारी’ शुरू की. अगस्त 2026 में जब नेपाल में बाढ़ आई, तो उन्होंने वहां फंसे महाराष्ट्र के 80 से ज्यादा लोगों से खुद वीडियो कॉल पर बात की. उन्होंने उनका हालचाल पूछा और भरोसा दिलाया कि उन्हें सुरक्षित घर वापस लाने के लिए कोशिशें की जा रही हैं.

कल्याणकारी योजनाओं से लेकर मेडिकल मदद और संकट के समय दूसरे देश में फंसे लोगों से खुद संपर्क करने तक, लोगों के लिए उपलब्ध रहना शिंदे के जनसेवा के तरीके का एक अहम हिस्सा रहा है. जिम्मेदारी की यही भावना इस साल विजयादशमी के मौके पर शिवसेना के रुख में भी दिखाई दी. पार्टी ने अपना दशहरा मेळावा सूखे से प्रभावित किसानों को समर्पित किया. इनमें से कई किसान फसल खराब होने और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रहे हैं.

संदेश साफ है. नेतृत्व ऐसा होना चाहिए, जो लोगों के लिए हमेशा उपलब्ध रहे, खासकर तब जब उन्हें सबसे ज्यादा मदद की जरूरत हो. मुश्किलों का सामना कर रहे किसी किसान को अकेले अपनी परेशानी से नहीं जूझना चाहिए, खासकर ऐसे त्योहार के समय, जब परिवार मिलकर खुशियां मनाते हैं. अगली पीढ़ी को इन नेताओं से यह सीखना चाहिए कि सच्चे नेतृत्व का असली मतलब लोगों से जुड़े रहना और उनकी जरूरतों को सबसे पहले रखना है.

शाइना एनसी शिवसेना की राष्ट्रीय सचिव और प्रवक्ता हैं. वह @ShainaNC पर ट्वीट करती हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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