नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट का नवंबर 2019 का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद फैसला एक इतिहासकार की नज़र से “पूरी तरह गलत” था, जाने-माने इतिहासकार इरफान हबीब ने दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में कहा.
उन्होंने कहा, “यह गलत है क्योंकि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि वहां कोई मंदिर था. उन्होंने यह मान लिया, लेकिन पुरातात्विक तौर पर इसका कोई सबूत नहीं था…बाबरी मस्जिद के पहले मंदिर होने का सबूत बहुत कम है.”
हबीब ने अलीगढ़ में दिप्रिंट को दिए इंटरव्यू में यह बात कही. 95 साल के हबीब कई किताबें लिख चुके हैं और फिलहाल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एमेरिटस हैं.
उन्होंने आगे कहा, “पहले आप एक मस्जिद को गिराते हैं और फिर खुदाई शुरू करते हैं. इसलिए जब मुस्लिम निर्माण से जुड़ी कोई ईंट निकलती है, तो आप उसे फेंक देते हैं, लेकिन जब कोई पत्थर निकलता है, तो आप कहते हैं कि यह किसी मूर्ति का हिस्सा है. बाबरी मस्जिद के पहले मंदिर होने के जो सबूत पेश किए गए हैं, वे शायद ही टिक पाएंगे. किसी भी जाने-माने पुरातत्वविद ने इसका समर्थन नहीं किया है.”
उन्होंने कहा कि जब मस्जिदें बनाई जाती थीं, तो कभी-कभी मंदिर में इस्तेमाल किए गए पत्थरों का भी इस्तेमाल किया जाता था. “इसलिए अगर यहां कोई पत्थर मिलता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह पत्थर यहां किसी मंदिर को तोड़े जाने के बाद आया था. उसे कहीं और से भी लाया गया हो सकता है.”
उनके मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत का हर मस्जिद में ‘शिवलिंग’ न तलाशने का संदेश इसलिए आया क्योंकि “उन्होंने इसे जरूरत से ज्यादा कर दिया था.”
भागवत के समझौते वाले रुख पर हबीब ने कहा कि उन्हें नहीं पता कि यह कोई ईमानदार कोशिश है या नहीं, लेकिन “आरएसएस की तरफ से अपने आक्रामक बयानों के बाद किसी न किसी तरह का समझौता जरूरी है.”
उन्होंने कहा, “कम से कम मोहन भागवत ने इसे रोक दिया है.”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से अक्सर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना किए जाने पर हबीब ने कहा कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान अक्सर नहीं पढ़ते, लेकिन उन्होंने सवाल किया, “नेहरू सबसे महत्वपूर्ण विचारकों में से एक हैं और मौजूदा प्रधानमंत्री जैसे लोग उनके बारे में जो कहते हैं, वह बेकार है. उस पर ध्यान देने लायक भी कुछ नहीं है. उन्होंने इतिहास में क्या किया है?”
हबीब ने सामाजिक विज्ञान की किताबों और स्कूल के कोर्स में किए जा रहे बदलावों के जरिए इतिहास को दोबारा लिखने की कोशिशों की भी आलोचना की.
उन्होंने कहा, “दुर्भाग्य से, यह भारत में मौजूद है. पहले पाकिस्तान इस पर गर्व करता था, लेकिन अब हम गलत इतिहास लिखने के मामले में लगभग पाकिस्तान से भी आगे निकल रहे हैं…कोर्स में जाति व्यवस्था को प्राचीन भारत के बजाय मध्यकालीन भारत के तहत रखा गया है, जैसे मनुस्मृति सल्तनत काल में लिखी गई थी.”
हबीब ने आगे कहा, “भारत सरकार और शिक्षा मंत्रालय के नाम पर तैयार किया गया पाठ्यक्रम बहुत खराब है. ऐसा लगता है जैसे इसे तैयार करने वाले को भारतीय इतिहास की कोई जानकारी नहीं है, जाति व्यवस्था की शुरुआत के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है.”
उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अशोक ऐसा व्यक्ति है, जिस पर भारत को गर्व हो सकता है, लेकिन उसे किताबों से बाहर किया जा रहा है.
हबीब ने कहा, “जब मैं हाई स्कूल में था, तब अशोक को जितनी अहमियत दी जाती थी, अब उतनी नहीं दी जा रही है. क्योंकि अब किसी वजह से मनुस्मृति का महिमामंडन किया जा रहा है. मुझे नहीं पता कि इसकी वजह क्या है.”
यह इतिहासकार एक समय कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया से अपने जुड़ाव के कारण सरकारी छात्रवृत्ति पर विदेश में पढ़ाई करने के लिए पासपोर्ट पाने से भी वंचित रह चुके हैं. वह कहते हैं, “एक शब्द है—‘अल्टीमेट’—जिसका शायद कोई मतलब नहीं है. इसलिए किसी को लगता है कि आखिरकार पूंजीवाद को जाना ही होगा. यह भी एक ऐसी व्यवस्था है जो पूरी तरह गलत है, बिल्कुल सामंतवाद की तरह.”
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया और आरएसएस दोनों के 100 साल पूरे हो चुके हैं. हबीब ने पिछले वर्षों में दोनों के सफर को देखा.
उन्होंने कहा, “पाकिस्तान में आप मुस्लिम लीग को देख सकते हैं. आरएसएस और मुस्लिम लीग एक ही तरह के हैं, वे एक ही तरह की भावनाओं को उकसाते हैं. वे धर्म और एक हद तक जातिवाद की अपील करते हैं…कम्युनिस्टों और मजदूर वर्ग के साथ कुछ गलत नहीं हुआ है, लेकिन हमने पर्याप्त काम नहीं किया, बस यही बात है.”
‘1,200 साल की गुलामी’
हबीब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अक्सर उद्धृत किए जाने वाले “1,200 साल की गुलामी” वाले वाक्य पर भी प्रतिक्रिया दी. प्रधानमंत्री इस वाक्य का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के साथ-साथ उस दौर को भी शामिल करने के लिए करते हैं, जब देश के प्रमुख शासक मुस्लिम थे.
उन्होंने कहा, “उस तरह की गुलामी, यानी गैर-लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, का इतिहास इससे कहीं ज्यादा लंबा रहा है. मौर्य साम्राज्य में संसद नहीं थी और अशोक ने अपने सभी शिलालेखों के बावजूद कभी अपनी प्रजा को सरकार में हिस्सा लेने के लिए नहीं बुलाया. इसलिए यह कहना कि जहां भी शासक मुस्लिम थे, वहां गुलामी थी, बिल्कुल गलत है.”
पिछले कुछ वर्षों में मंदिर-मस्जिद विवादों के फिर से उठने पर बात करते हुए हबीब ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) स्मारकों को पर्याप्त सुरक्षा नहीं दे रहा है.
उन्होंने कहा, “खास तौर पर मौजूदा सरकार के तहत मुस्लिम स्मारकों की सुरक्षा बहुत खराब तरीके से की जा रही है…मैं इस बात से इनकार नहीं कर रहा हूं कि मंदिर तोड़े गए थे. मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि जब वहां एक मस्जिद है, तो क्या वहां मूर्ति रखना सही है? यह ठीक वही है जो मुसलमानों ने मंदिरों को मस्जिदों में बदलते समय किया था.”
उन्होंने कहा, “अगर मुसलमानों ने मंदिरों को तोड़ा होता, तो इतने सारे मंदिर नहीं होते…औरंगजेब ने मंदिर तोड़े, अकबर और जहांगीर ने नहीं. और औरंगजेब ने भी सीमित संख्या में ही (मंदिर) तोड़े.”
हबीब के पिता, जो उस समय के एक जाने-माने इतिहासकार भी थे, कांग्रेस के सदस्य थे. उन्होंने याद किया कि उनके पिता हमेशा खादी पहनते थे.
उन्होंने कहा, “वह (हबीब के पिता) कम्युनिस्ट पार्टी के समर्थक भी थे, लेकिन उस समय उसकी पाकिस्तान समर्थक नीति के खिलाफ थे.”
हबीब ने समझाया, “हमने (कम्युनिस्ट पार्टी) उस समय बड़ी गलतियां की थीं. हमने कांग्रेस को मुस्लिम लीग के बराबर मान लिया, जो हमारी मूल गलती थी. इसलिए कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने कई मुस्लिम सदस्यों को खो दिया, क्योंकि उन्हें मुस्लिम लीग में भेज दिया गया और वहां उन्होंने कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए, जिनकी कम्युनिस्ट पार्टी ने निंदा की थी. इसलिए वे लगभग पार्टी से अलग हो गए.”
उन्होंने साफ किया कि वह आजादी से पहले के दौर की बात कर रहे थे, जब वह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल भी नहीं हुए थे.
नेहरू की ‘डांट’
बातचीत के दौरान हबीब ने नेहरू से मिली एक “डांट” को भी याद किया.
उन्होंने बताया कि उन्हें ब्रिटेन में पढ़ाई के लिए सरकारी छात्रवृत्ति मिली थी, लेकिन उन्हें पासपोर्ट नहीं मिल सका क्योंकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की तरफ से आपत्ति आई थी. इसमें कहा गया था कि वह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सदस्य हैं. इसके बाद उन्होंने नेहरू को एक चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने मजाक करते हुए कहा था कि सरकार को छात्रवृत्ति के विज्ञापन में यह भी लिख देना चाहिए था कि ‘कम्युनिस्ट आवेदन न करें’.
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि उन्हें मेरी यह बात कुछ पसंद आई.”
इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने हबीब से मिलने को कहा. हबीब ने याद किया, “उन्होंने मुझे करीब 10 मिनट तक डांटा. उन्होंने कहा कि चीन और रूस में कम्युनिस्ट ठीक हैं, लेकिन भारत में वे पूरी तरह गलत हैं…उन्होंने कहा, तुम चीन जाओ और देखो कि असली कम्युनिज्म क्या होता है. उन्होंने इतनी मेहनत की… उस समय तक सीमा विवाद शुरू नहीं हुआ था, इसलिए उन्होंने रूस से कम और चीन से ज्यादा बात की.”
नेहरू ने उसी दिन 12 अगस्त 1955 को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर जाकिर हुसैन को एक चिट्ठी लिखी. इसमें उन्होंने हबीब से हुई अपनी बातचीत का जिक्र किया.
नेहरू की चिट्ठी में लिखा था, “व्यक्तिगत रूप से मुझे कम्युनिस्टों से कभी कोई दुश्मनी नहीं रही, लेकिन अब मुझे लगातार यह महसूस होने लगा है कि गैर-कम्युनिस्ट देशों में कम्युनिस्ट पार्टियां समय से पीछे रह गई हैं.”
नेहरू ने लिखा कि वह शिक्षा मंत्रालय को हबीब को विशेष मामले के तौर पर छात्रवृत्ति देने की सलाह दे रहे हैं. उन्होंने कहा, “किसी भी स्थिति में, कुल मिलाकर मुझे लगता है कि हमें इरफान हबीब के पक्ष में विशेष मामले के तौर पर फैसला करना चाहिए. ऐसा सोचने की मेरी मुख्य वजह यह है कि वह एक बुद्धिमान युवा हैं और मेरा मानना है कि उनमें ईमानदारी भी है. निस्संदेह, ये दोनों गुण उनके आगे के विकास को प्रभावित करेंगे…स्वाभाविक रूप से, उनके भविष्य के व्यवहार को भी ध्यान में रखना होगा.”
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