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Saturday, 7 November, 2026
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ट्रंप की हार से अमेरिकी संस्थाओं को मिली ताकत, लेकिन क्या लोकतंत्र पर दबाव कम होगा?

अमेरिकियों ने ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के काम को नकार दिया है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ट्रंपइज़्म को ही नकार दिया हो. केवल एक चुनाव के जरिए संस्थाओं को ठीक नहीं किया जा सकता, और न ही वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक अविश्वास को दूर किया जा सकता है.

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अमेरिकी मिडटर्म चुनावों ने यूनाइटेड स्टेट्स से भी पुरानी एक बहस को फिर से खोल दिया है: एक डेमोक्रेसी अपनी आज़ादी को उन लोगों की निजी इच्छाओं से कैसे बचाती है जिन्हें उस पर राज करने के लिए चुना गया है? यह सवाल हर लोकतंत्र से जुड़ा है, भले ही अमेरिका के अनुभव के परिणाम बहुत दूर-दूर तक असर डालते हों.

ट्रंप राष्ट्रपति पद नहीं हारे हैं; उनकी पार्टी कांग्रेस (संसद) हार गई है. इन दोनों बातों में बड़ा अंतर है और इससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि विदेशों में अमेरिका के बर्ताव में कोई बहुत बड़ा बदलाव आएगा. फिर भी, रिपब्लिकन पार्टी की हार का पैमाना चौंकाने वाला है. डेमोक्रेट्स ने दोनों सदनों में जीत हासिल की है, और उन्होंने उन इलाकों में भी बढ़त बनाई है जिन्हें लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी का पक्का गढ़ माना जाता था. टेक्सास और कंसास इसके प्रमुख उदाहरण हैं. चूंकि चुनाव के नतीजों में आए इस बड़े बदलाव के बारे में पहले ही काफी कुछ लिखा जा चुका है, इसलिए मेरे द्वारा इसे फिर से दोहराने से आपको, प्रिय पाठक, कोई खास नई जानकारी नहीं मिलेगी.

इससे भी दिलचस्प बात यह है कि एक पुरानी संवैधानिक बहस फिर से सामने आ गई है. अमेरिकी प्रेसीडेंसी, जो शायद आज की दुनिया का सबसे ताकतवर चुना हुआ एग्जीक्यूटिव ऑफिस है, उसे कभी भी बिना किसी इंस्टीट्यूशनल रोक-टोक के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए नहीं बनाया गया था. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दो वर्षों में, कांग्रेस को राष्ट्रपति की बेलगाम शक्तियों के आगे झुकना पड़ा था. हालांकि, मिडटर्म चुनावों ने कांग्रेस के प्रेसिडेंट से अलग होकर काम करने की असली संभावना को फिर से कायम कर दिया है.

सर्वोच्च सत्ता के प्रति पुराना संदेह

आठ सदी से भी पहले, 1215 के ‘मैग्ना कार्टा’ ने एक स्थायी सिद्धांत को लिखित रूप दिया: इसके अनुसार, इंग्लैंड का राजा भी कानून के दायरे में आता था. यह राजा जॉन और उनके सामंतों (बैरोन्स) के बीच हुए टकराव का नतीजा था, न कि कोई ऐसा घोषणापत्र जिसमें सभी के लिए राजनीतिक अधिकारों की बात कही गई हो. लेकिन मैग्ना कार्टा से जो राजनीतिक विचार निकले, उनका दायरा उस तात्कालिक विवाद से कहीं अधिक व्यापक था, जिसकी वजह से यह अस्तित्व में आया था.

कुछ सदियों बाद, राजशाही और संसद के बीच संघर्ष, 1689 का ‘इंग्लिश बिल ऑफ राइट्स’ और जॉन लॉक के राजनीतिक दर्शन ने धीरे-धीरे ‘सीमित सरकार’ (लिमिटेड गवर्नमेंट) की अवधारणा को विकसित किया. फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने इस तर्क को एक संस्थागत रूप दिया. अपनी किताब ‘द स्पिरिट ऑफ द लॉज़’ (1748) में, उन्होंने चेतावनी दी कि कानून बनाने, उसे लागू करने और न्याय करने की शक्तियां एक ही व्यक्ति या समूह के हाथों में नहीं होनी चाहिए. यह सिद्धांत क्रांतिकारी फ्रांस तक पहुँचा: 1789 के ‘मानव और नागरिक अधिकारों के घोषणापत्र’ (डिक्लेरेशन ऑफ द राइट्स ऑफ मैन एंड ऑफ द सिटीजन) के अनुच्छेद 16 में शक्तियों के पृथक्करण को लोकतांत्रिक संविधान के लिए अनिवार्य माना गया.

अमेरिका के संस्थापकों ने सत्ता के एक ही जगह केंद्रित होने के प्रति इसी संदेह को अपने संवैधानिक विचार-विमर्श में भी शामिल किया. इनमें वर्जीनिया के युवा जेम्स मैडिसन भी शामिल थे, जो 1787 के फिलाडेल्फिया सम्मेलन में पूरी तैयारी के साथ पहुँचे थे. उन्होंने राजनीतिक संघों की कमजोरियों को समझने के लिए प्राचीन और यूरोपीय परिसंघों (कॉन्फेडरेशन्स) का अध्ययन किया था. आगे चलकर वे अमेरिकी संविधान के मुख्य निर्माताओं में से एक बने, सम्मेलन की बहसों का विवरण दर्ज किया और अंततः अमेरिका के चौथे राष्ट्रपति बने.

मैडिसन को इस बात पर बहुत कम भरोसा था कि केवल अच्छे लोगों को चुन लेने से एक अच्छी सरकार मिल सकती है. ‘फेडरलिस्ट नंबर 51’ में उन्होंने एक अधिक टिकाऊ उपाय सुझाया: “महत्वाकांक्षा को दूसरी महत्वाकांक्षा के जरिए ही नियंत्रित किया जाना चाहिए.” अमेरिकी राष्ट्रपति के पास काफी अधिकार होंगे, लेकिन कानून बनाने और खर्चों पर नियंत्रण रखने का काम कांग्रेस करेगी; संवैधानिक विवादों का फैसला अदालतें करेंगी; और संघवाद (फेडरलिज्म) के जरिए सत्ता को वाशिंगटन (केंद्र) और राज्यों के बीच बाँटा जाएगा. इन संस्थाओं से यह उम्मीद की गई थी कि वे एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करेंगी, असहमति जताएंगी और कभी-कभी एक-दूसरे के काम में रुकावट भी डालेंगी. गणतंत्र को इसी तरह काम करना था, भले ही यह प्रक्रिया कभी-कभी निराशाजनक या परेशान करने वाली लगे. शुरुआत से ही यही योजना थी.

इन तमाम व्यवस्थाओं के बावजूद, शुरुआती अमेरिकी गणतंत्र पूरी तरह से दोषरहित नहीं था. इसके संवैधानिक ढांचे में गुलामी को जगह दी गई थी, महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी से बाहर रखा गया था, और आबादी के एक बड़े हिस्से को प्रभावी वोट देने के अधिकार से वंचित रखा गया था. 1920 में जाकर 19वीं संवैधानिक संशोधन के ज़रिए महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला. गृहयुद्ध के दौरान अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों को गुलामी से आज़ादी मिलने के एक सदी बाद भी, भेदभावपूर्ण कानूनों और डराने-धमकाने की वजह से कई अश्वेत नागरिक वोट नहीं डाल पाते थे. आखिरकार, 1965 के ‘वोटिंग राइट्स एक्ट’ (मतदान अधिकार अधिनियम) ने इन बाधाओं को खत्म करने का काम किया.

इसलिए, इस गणतंत्र की खासियत किसी एकदम आदर्श शुरुआत में नहीं, बल्कि इसके ऐसे संवैधानिक ढांचे में थी, जिसने नागरिकता, प्रतिनिधित्व और समानता के लिए संघर्ष को जारी रखने की गुंजाइश दी. इसके संस्थानों को इस तरह से बनाया गया था कि वे राष्ट्रपतियों सहित किसी भी व्यक्ति की निजी महत्वाकांक्षाओं और कमियों से कहीं अधिक लंबे समय तक टिके रहें.

आज के पॉपुलिज़्म का अजीब इलिबरलिज़्म

पिछले दशक में, कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी को अपने संस्थानों के सामने एक अजीब चुनौती का सामना करना पड़ा है, जो एक साथ अंदरूनी और बाहरी हैं. राजनीतिक आंदोलन चुनावों के माध्यम से वैधता प्राप्त करते हैं और फिर निर्वाचित सरकार को संवैधानिक बनाने वाले प्रतिबंधों की वैधता पर सवाल उठाते हैं. तब किसी संस्था की किसी विशेष विफलता के लिए आलोचना नहीं की जाती; बल्कि उसे एक अभिजात वर्ग व्यवस्था का हिस्सा बताकर निंदा की जाती है, जिसे जनता के प्रति शत्रुतापूर्ण माना जाता है. यदि यह बात आपको अभी तक समझ नहीं आई है, तो मैं विश्व भर में लोकलुभावन राजनीति के उदय की बात कर रहा हूँ.

लोकलुभावन, ‘जागरूकता-विरोधी’ विद्रोह की भाषा ने इस आरोप को विशेष रूप से सुविधाजनक बना दिया है. न्यायिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक संरक्षण, प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय, सार्वजनिक संस्थानों की स्वायत्तता और यहाँ तक कि स्वतंत्र पत्रकारिता को भी आसानी से उदार-वामपंथी एजेंडा के घटक बताकर खारिज किया जा सकता है. इस प्रोसेस में, लिबरल कॉन्स्टिट्यूशनलिज़्म एक पार्टी का लेबल बन जाता है, जैसे कि आज के प्रोग्रेसिव लोगों ने अपने फायदे के लिए मनमाने अधिकार पर लिमिट बनाई हो.

यह एक उल्लेखनीय ऐतिहासिक उलटफेर है. सार्वजनिक शक्ति सीमित होनी चाहिए, यह सिद्धांत अंग्रेजी संवैधानिक परंपरा से लेकर अमेरिकी गणतंत्रवाद तक, एक विशिष्ट रूढ़िवादी विरासत रखता है. किसी न्यायालय के फैसले या किसी समाचार पत्र की संपादकीय पंक्ति से असहमति पूरी तरह से जायज़ है. लेकिन यह दावा करना कि कोई भी संस्था राजनीतिक आज्ञापालन से इनकार करने के कारण स्वाभाविक रूप से जनता की शत्रु है, बिलकुल अलग बात है.

MAGA ने इस अंतर को एक प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना दिया. आंदोलन की “गहरी सत्ता” की बयानबाजी विपक्ष को अमान्य ठहराने का एक सर्वव्यापी और कारगर बहाना बन गई, जबकि ट्रंप के चुनावी जनादेश को संस्थागत नियंत्रणों को दरकिनार करने के अधिकार के रूप में इस्तेमाल किया गया. 6 जनवरी 2021 को कैपिटल हिल में हुई हिंसक घुसपैठ ने इस बात का चरम उदाहरण पेश किया कि जब चुनावी हार को ही इस बात के सबूत के रूप में देखा जाता है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं ने जनता के साथ विश्वासघात किया है, तो क्या होता है.

ट्रंप ने इस धारणा का असाधारण कुशलता और निरंतरता के साथ फायदा उठाया है. कार्यकारी विवेकाधिकार बढ़ाने, कांग्रेस द्वारा अधिकृत खर्च पर सीमाओं को चुनौती देने और स्वतंत्र निर्णय लेने की अपेक्षा रखने वाली संस्थाओं से वफादारी की मांग करने के उनके प्रयासों ने उनके राष्ट्रपति पद की व्यक्तिगत समझ को बढ़ावा दिया है. अदालतों की स्वतंत्रता को प्रतिपक्षी दृष्टिकोण से देखा जाता है; प्रशासनिक संयम अवज्ञा बन जाता है और कांग्रेस की निगरानी को तोड़फोड़ के रूप में पेश किया जाता है. MAGA की राजनीतिक सत्ता की अवधारणा और मैडिसन के संवैधानिक गणतंत्र के बीच का अंतर बहुत ही गहरा है.

ट्रंप ने न तो शक्तिशाली अमेरिकी राष्ट्रपति पद को बनाया है, और न ही उन्होंने इसे सर्वशक्तिमान बना दिया है. लेकिन उन्होंने यह परखा है कि संवैधानिक व्यवस्था का कितना हिस्सा इस बात पर निर्भर करता है कि संस्थाएं—और उनके भीतर काम करने वाले लोग—अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए कितने तत्पर हैं. मध्यावधि चुनावों ने इस प्रयोग की एक गंभीर राजनीतिक सीमा को उजागर कर दिया है. अब यह देखना बाकी है कि क्या ये चुनाव संस्थागत सीमाओं को भी बहाल कर पाते हैं या नहीं.

कांग्रेस: एक ‘असुविधाजनक’ संस्था

डेमोक्रेट्स की जीत इस रिश्ते को बदल देगी, हालांकि जरूरी नहीं कि यह बदलाव उसी तरह का हो जिसकी उम्मीद इसे लेकर जश्न मनाने वाले कर रहे हैं. उनके पास मौजूद भारी बहुमत कांग्रेस के नेताओं को जांच-पड़ताल करने, समितियों को नियंत्रित करने, खर्चों की समीक्षा करने और राष्ट्रपति द्वारा किए गए नामांकनों का विरोध करने की अधिक गुंजाइश देता है.

फिर भी, बहुमत होने का मतलब यह नहीं है कि उनके पास असीमित शक्तियां हैं. ट्रंप के पास अभी भी ‘वीटो’ का अधिकार है; इसे पलटने के लिए कांग्रेस के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है. सीनेट में पेश किए जाने वाले अधिकांश विवादित कानूनों को पारित करने के लिए, बहस खत्म करने हेतु 60 वोटों की सीमा पार करनी पड़ती है. कांग्रेस राष्ट्रपति की पहलों पर रोक तो आसानी से लगा सकती है, लेकिन अपनी तरफ से कोई व्यापक वैकल्पिक कार्यक्रम लागू करना उसके लिए उतना आसान नहीं है. युद्ध और विदेश मामलों पर कांग्रेस की काफी हद तक निगरानी रहती है, लेकिन राष्ट्रपति ही ‘कमांडर-इन-चीफ’ होते हैं और उनके पास कूटनीतिक व रणनीतिक मामलों में काफी हद तक अपने विवेक से फैसले लेने की छूट होती है.

रिपब्लिकन पार्टी के सामने एक और सवाल है. ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती हिस्से में कांग्रेस संवैधानिक रूप से असहाय नहीं थी, लेकिन रिपब्लिकन सांसदों ने अक्सर कड़े सवाल पूछने के बजाय समझौता करने का रास्ता चुना. अब मतदाताओं ने इस राजनीतिक समीकरण को बदल दिया है. ओहियो में ट्रंप समर्थित विवेक रामास्वामी की हार और अन्य जगहों पर रिपब्लिकन पार्टी को मिली हार ने इस धारणा को कमजोर कर दिया है कि ‘MAGA’ (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के प्रति वफादार रहने से चुनावी जीत पक्की हो जाती है. रिपब्लिकन पार्टी की हार के तुरंत बाद जे.डी. वेंस द्वारा ईरान युद्ध की खुलकर आलोचना किए जाने से इस आंदोलन के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं.

अगली कांग्रेस, ट्रंप से जवाबदेही मांगने की कहीं बेहतर स्थिति में होगी. डेमोक्रेट्स इस अधिकार का इस्तेमाल कैसे करते हैं—बिना इसके कि विधायी टकराव एक स्थायी गतिरोध (पैरालिसिस) में बदल जाए—यह अपने आप में एक अलग चुनौती है. एक गणतंत्र में कार्यकारी शक्तियों पर अंकुश होना जरूरी है, लेकिन साथ ही एक ऐसी सरकार का होना भी आवश्यक है जो फैसले ले सके और सुचारू रूप से काम कर सके.

अगली सुबह

अमेरिका की घरेलू राजनीति पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत बड़ी संख्या में लोगों की नजर रहती है. अमेरिका का आर्थिक और वित्तीय दबदबा, दुनिया की प्रमुख आरक्षित मुद्रा (रिज़र्व करेंसी) के रूप में डॉलर की स्थिति, और उसकी सैन्य, तकनीकी व कूटनीतिक पहुंच—ये सभी चीजें वाशिंगटन के फैसलों को उसकी सीमाओं से बहुत दूर स्थित देशों के भाग्य से जोड़ देती हैं. ‘वेगास में जो होता है, वह वेगास में ही रह जाता है’, लेकिन वाशिंगटन में जो होता है, वह शायद ही वहीं तक सीमित रहता है.

व्लादिमीर पुतिन के लिए, डेमोक्रेटिक पार्टी के नियंत्रण वाली कांग्रेस का मतलब यह हो सकता है कि रूस के प्रति अमेरिकी नीति की और अधिक कड़ी जांच-पड़ताल होगी, और यूक्रेन की मदद करने के लिए उन पर और अधिक दबाव डाला जाएगा. यूरोप के सहयोगी देशों को ‘कैपिटल हिल’ (अमेरिकी संसद) में ऐसे लोग मिल सकते हैं जो उनकी बातों को अधिक ध्यान से सुनें. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दक्षिणपंथी आंदोलनों (जैसे जर्मनी की AfD) को MAGA और प्रशासन की 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति से बढ़ावा मिला है. अब उन्हें ट्रंप के साथ जुड़े रहने के राजनीतिक फायदे-नुकसान पर फिर से विचार करना पड़ सकता है. हालाँकि, दक्षिणपंथी लोकलुभावनवाद को हवा देने वाली घरेलू शिकायतें अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद भी खत्म नहीं हुई हैं.

फिलहाल सबसे बड़ी परीक्षा ईरान के मामले में है. युद्ध की वजह से रिपब्लिकन पार्टी को कांग्रेस में अपना बहुमत गंवाना पड़ा, और यह मान लेना आसान हो सकता है कि इस हार के बाद वे पीछे हट जाएंगे. लेकिन, ज्यादा संभावना इस बात की है कि ट्रंप तनाव को फिर से बढ़ने से रोक सकते हैं या बातचीत को और लंबा खींचने का कोई नया कारण ढूंढ सकते हैं. उन्होंने अपने शुरुआती हस्तक्षेप का बचाव किया है, और अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं है कि उनकी नीति की मूल दिशा में कोई बदलाव आया है. एक कमजोर राष्ट्रपति शायद कोई रास्ता खोजना चाहे, लेकिन ट्रंप अपनी उस ‘विरासत’ को हासिल करने के लिए और भी ज्यादा जोर लगा सकते हैं जिसे वे दुनिया के सामने पेश कर सकें. कांग्रेस उनके विकल्पों को मुश्किल तो बना सकती है, लेकिन उन्हें पीछे हटने के लिए मजबूर नहीं कर सकती. और इसका असर उन सभी देशों पर पड़ेगा जो ऊर्जा आपूर्ति में आ रही बाधाओं के बीच फंसे हुए हैं, जिसमें भारत भी शामिल है.

साथ ही, डेमोक्रेटिक पार्टी की बड़ी जीत का मतलब यह भी नहीं है कि सरकार सुचारू रूप से काम करेगी. आने वाले दो सालों में कड़ी निगरानी और कुछ उपयोगी समझौते देखने को मिल सकते हैं, लेकिन साथ ही वीटो, बजट को लेकर गतिरोध और एकतरफा कार्यकारी फैसलों पर ज्यादा निर्भरता भी बढ़ सकती है. यह स्थिति ‘शक्तियों के बंटवारे’ (separation of powers) की व्यवस्था की कोई कमी नहीं दिखाती, बल्कि यह याद दिलाती है कि संवैधानिक तंत्र को चलाने के लिए अभी भी सही राजनीतिक समझ की जरूरत होती है.

अमेरिकी जनता ने प्रशासन के कामकाज को तो नकार दिया है, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि उन्होंने ‘ट्रंपवाद’ से जुड़ी हर सोच को भी खारिज कर दिया है. केवल एक चुनाव के जरिए संस्थाओं को ठीक नहीं किया जा सकता और न ही सालों से चले आ रहे राजनीतिक अविश्वास को खत्म किया जा सकता है.

ट्रंप ने अमेरिका को फिर से महान बनाने का वादा किया था. फिलहाल, उन्होंने इसे फिर से ‘ब्लू’ (डेमोक्रेटिक पार्टी के रंग में) कर दिया है. अब असली सवाल यह है कि क्या अमेरिका के राजनीतिक पक्ष इसे फिर से ठीक से काम करने लायक बना पाएंगे?

स्वस्ति राव दिप्रिंट में कंसल्टिंग एडिटर (इंटरनेशनल और स्ट्रेटेजिक अफेयर्स) हैं. वह @swasrao पर ट्वीट करती हैं.  विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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