4 नवंबर को सरकार ने घोषणा की कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने “सभी अग्निवीरों को रक्षा बलों में स्थायी रूप से शामिल करने का रास्ता” मंजूर कर लिया है. यह घोषणा ऐसे समय हुई, जब अग्निवीरों का पहला बैच, जिसमें करीब 18,000 जवान हैं, अपने चार साल का कार्यकाल पूरा करने के करीब था. यह सरकार के पुराने रुख से बिल्कुल उलट फैसला है.
जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 14 जून 2022 को अग्निपथ योजना की घोषणा की थी, तब इसे भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में अधिकारी रैंक से नीचे के पदों पर भर्ती की व्यवस्था में बड़ा बदलाव बताया गया था. 17.5 से 21 साल की उम्र के युवा चार साल के लिए अग्निवीर के तौर पर भर्ती हो सकते थे. इसमें ट्रेनिंग का समय भी शामिल था. कोविड के कारण 2022 के भर्ती सत्र के लिए एक बार उम्र सीमा में छूट देकर इसे 23 साल कर दिया गया था. शुरुआती नियमों के मुताबिक, हर बैच के सिर्फ 25 फीसदी अग्निवीरों को योग्यता के आधार पर नियमित सेवा में शामिल किया जाना था. बाकी जवानों को बिना पेंशन या ग्रेच्युटी के एकमुश्त सेवा निधि पैकेज देकर सेवा से बाहर कर दिया जाना था.
2022 में सरकार का मुख्य संदेश था कि यह व्यवस्था भविष्य के लिए जरूरी रास्ता है और इसे वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं है.
पूरे भरोसे के साथ हुई शुरुआत
अग्निपथ योजना शुरू करते समय सरकार ने इसके तीन मुख्य फायदे बताए थे. पहला, सेना को युवा बनाना. इसके तहत छह से सात साल में सेना की औसत उम्र करीब 32 साल से घटाकर 24 से 26 साल करने का लक्ष्य था. दूसरा, रक्षा पेंशन पर होने वाले खर्च को लंबे समय में कम करना. 2022-23 के बजट में यह खर्च पहले ही 1.19 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया था. तीसरा, अनुशासित और अच्छी ट्रेनिंग पाए युवाओं के सशस्त्र बलों से लौटने पर समाज को होने वाला फायदा.
इसके अलावा, योजना के तहत योग्यता को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी. यानी सशस्त्र बलों में स्थायी भर्ती का फैसला योग्यता के आधार पर होना था. साथ ही, भर्ती को ‘अखिल भारतीय, सभी वर्ग’ के आधार पर करने की बात थी. इससे सेना की कई रेजिमेंट में लंबे समय से चली आ रही वर्ग और क्षेत्र के आधार पर भर्ती की व्यवस्था भी कमजोर पड़ सकती थी. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे युवाओं के लिए ‘सुनहरा अवसर’ और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा बदलाव बताया था.
हालांकि, सभी लोगों ने इस योजना को इसी नजर से नहीं देखा. योजना की घोषणा के बाद नौकरी की सुरक्षा खत्म होने की आशंका से भर्ती की तैयारी कर रहे युवाओं ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए. लेकिन विरोध के बावजूद सेना और सरकार के वरिष्ठ नेताओं ने इस व्यवस्था को तय और जरूरी बताया.
19 जून 2022 को तीनों सेनाओं की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में सैन्य मामलों के विभाग के अतिरिक्त सचिव लेफ्टिनेंट जनरल अनिल पुरी ने साफ तौर पर कहा था कि इस योजना को वापस नहीं लिया जाएगा. उन्होंने कहा था, “इसे वापस क्यों लिया जाना चाहिए? देश को युवा बनाने की दिशा में यह एकमात्र प्रगतिशील कदम है… हम देश की रक्षा के साथ प्रयोग कर रहे हैं. इसमें कोई गुंजाइश नहीं है.”
उन्होंने ऊंचाई वाले इलाकों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से होने वाली मौतों, कारगिल समीक्षा समिति और अरुण सिंह समिति की सिफारिशों का हवाला दिया था. साथ ही उन्होंने कहा था कि सेना में युवाओं के जोश और अनुभव के होश का बेहतर तालमेल जरूरी है. उन्होंने पुष्टि की थी कि भविष्य में अधिकारी रैंक से नीचे के सभी पदों पर भर्ती सिर्फ अग्निपथ योजना के जरिए होगी और यह लंबे समय से लंबित सुधार है.
उस समय ऐसा लग रहा था कि इस मामले में फैसला हो चुका है.
सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे ने इसे ‘बदलाव लाने वाला सुधार’ बताया था. उन्होंने कहा था कि इससे सेना की ऑपरेशनल तैयारी पर कोई असर नहीं पड़ेगा और यह युवाओं, सेना तथा देश, तीनों के लिए फायदेमंद होगा. उन्होंने इंटरव्यू में कहा था कि “अग्निपथ योजना को वापस नहीं लिया जाएगा”. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा था कि “इस पर प्रतिक्रिया मिलती रहेगी और जरूरत के मुताबिक योजना में बदलाव किए जाएंगे”.
नौसेना प्रमुख एडमिरल आर. हरि कुमार ने इसे ‘बहुत पहले हो जाने वाला सुधार’ बताया था और कहा था कि यह सशस्त्र बलों के हित में है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि सशस्त्र बलों में रोजगार देने की कोई योजना नहीं है. वायुसेना के नेतृत्व ने भी सेना की ऑपरेशनल तैयारी और जवानों की कम उम्र को लेकर योजना का बचाव किया था. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने इस फैसले को दशकों तक चली चर्चा का नतीजा बताया था, न कि जल्दबाजी में लिया गया फैसला. उन्होंने भी योजना को वापस लेने की संभावना खारिज कर दी थी.
बड़ा बदलाव
तो अब इस योजना में इतने बड़े बदलाव की वजह क्या है?
बताया जा रहा है कि अग्निवीरों के कामकाज का आकलन करने के बाद यह फैसला लिया गया. इस आकलन में उनके कौशल, काम करने की प्रेरणा, शारीरिक फिटनेस और तकनीकी क्षमता को लेकर ‘सकारात्मक प्रतिक्रिया’ मिली.
पुरानी योजना के तहत सिर्फ 25 फीसदी अग्निवीरों को योग्यता के आधार पर नियमित नौकरी दी जानी थी. अब बाकी 75 फीसदी अग्निवीरों को भी दो साल और सेवा करने के बाद स्थायी रूप से सेना में शामिल होने का मौका दिया जाएगा. अंतिम फैसला उनकी अपनी इच्छा और कुछ तय आकलन मानकों के आधार पर होगा. सिद्धांत रूप में, चार साल और फिर दो साल की सेवा पूरी करने के बाद सभी इच्छुक अग्निवीरों को सशस्त्र बलों में नियमित सैनिक के तौर पर भर्ती किया जा सकता है.
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल एनएस राजा सुब्रमणि ने मीडिया से कहा, “जब अग्निपथ योजना पहली बार शुरू की गई थी, तब हमने इस बात पर जोर दिया था कि यह पत्थर की लकीर नहीं है. हमने कहा था कि हम अग्निवीरों के प्रदर्शन का आकलन करेंगे और लगातार इसकी समीक्षा करेंगे.”
हालांकि, इस प्रेस बातचीत में सशस्त्र बलों की औसत उम्र कम करने, पेंशन पर होने वाला खर्च घटाने और ट्रेनिंग पाए सैनिकों के नागरिक जीवन में लौटने से मिलने वाले फायदों को लेकर योजना की शुरुआती धारणाओं पर चर्चा नहीं हुई.
रुख में बड़ा बदलाव
दोनों समय के बयानों में साफ अंतर दिखता है. 2022 में सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने सार्वजनिक तौर पर चार साल के कार्यकाल और 25 फीसदी अग्निवीरों को ही नियमित सेवा में रखने की व्यवस्था को अंतिम मॉडल बताया था. उनका कहना था कि सेना को युवा बनाए रखने और सरकारी खर्च को संभालने के लिए यही जरूरी है. भविष्य में कुछ बदलाव किए जाने की बात जरूर कही गई थी, लेकिन योजना को वापस लेने से साफ इनकार और इसे ‘एकमात्र प्रगतिशील कदम’ बताने से ऐसा लग रहा था कि फैसला अंतिम है.
2026 में वही सैन्य नेतृत्व कह रहा है कि शुरुआती व्यवस्था में बदलाव हो सकता है, इसकी लगातार समीक्षा की जाएगी और जरूरत के मुताबिक इसमें संशोधन किए जा सकते हैं.
यह पहले से तय रास्ते में सुधार है या सेना की जरूरतों, राजनीति और जवानों को सेवा में बनाए रखने से जुड़ी चुनौतियों के जवाब में लिया गया अचानक फैसला, यह समझने का नजरिया अलग-अलग हो सकता है. लेकिन रुख और फैसले में आया बदलाव साफ दिखाई देता है.
शुरुआती लक्ष्यों का क्या होगा?
योजना में अब किए गए बदलावों से इसके शुरुआती लक्ष्यों पर सवाल उठ रहे हैं.
पहला, पेंशन पर होने वाले खर्च में कमी. योजना के पक्ष में सरकार की शुरुआती दलील यह थी कि हर बैच के 75 फीसदी अग्निवीर चार साल बाद सेवा से बाहर हो जाएंगे और सरकार को उन्हें जीवनभर पेंशन नहीं देनी होगी. उस समय की खबरों और सरकारी बयानों में इस योजना को पेंशन पर बढ़ते खर्च को नियंत्रित करने से जोड़ा गया था. यह खर्च सेना की ऑपरेशनल तैयारी पर भी दबाव डाल रहा था.
अगर अब ज्यादातर अग्निवीर चार या छह साल सेवा करने के बाद नियमित भर्ती के लिए पात्र हो जाते हैं और उनका चयन मुख्य रूप से उनकी इच्छा तथा तय मानकों के आधार पर होता है, तो पेंशन पाने वाले नियमित सैनिकों की संख्या काफी बढ़ सकती है. इससे बचत में देरी होगी और खर्च में कमी भी पहले के मुकाबले कम हो सकती है. लंबे समय में खर्च घटाने का जो बड़ा तर्क दिया गया था, अब उस पर भरोसा करना मुश्किल होगा.
दूसरा, सेना को युवा बनाए रखने पर जोर. औसत उम्र घटाने का लक्ष्य इस बात पर आधारित था कि कम समय के लिए भर्ती होने वाले जवानों की संख्या लगातार ज्यादा रहेगी और वे जल्दी सेवा से बाहर हो जाएंगे. अगर ज्यादातर भर्ती हुए जवान चार या छह साल सेवा करने के बाद पूरे करियर के लिए नियमित सेवा में शामिल होने के पात्र हो जाते हैं, तो सेना की औसत उम्र कम होने के बजाय बढ़ सकती है. ज्यादातर अग्निवीरों को नियमित सेवा का दर्जा मिलने से पहले छह साल तक ‘प्रोबेशन’ यानी शुरुआती सेवा अवधि पूरी करनी होगी. ऐसे में नियमित कैडर में शामिल होने के समय जवानों की उम्र ज्यादा होगी.
अनुशासित युवाओं के नागरिक जीवन में लौटने को भी इस योजना का एक फायदा बताया गया था. लेकिन अब ये युवा चार या छह साल की शुरुआती सेवा पूरी करने के बाद ही लौटेंगे. इसके बाद वे 15 से 20 साल तक नियमित सेवा भी कर सकते हैं.
योजना के फायदे भी नजरअंदाज न करें
अग्निपथ योजना को लेकर उठ रहे सवालों का मतलब यह नहीं है कि इसके संभावित फायदे नहीं हैं.
योग्यता के आधार पर 25 फीसदी अग्निवीरों को नियमित सेवा में रखने से प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलता है. शुरुआती कार्यकाल के दौरान अच्छा प्रदर्शन करने, अनुशासन बनाए रखने और परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने वाले जवानों को स्थायी सेवा का मौका मिल सकता है.
‘अखिल भारतीय, सभी वर्ग’ के आधार पर भर्ती होने से सेना को पारंपरिक भर्ती क्षेत्रों और वर्गों से बाहर के युवाओं को भी मौका देने में मदद मिलती है. लंबे समय में इससे राष्ट्रीय एकता मजबूत हो सकती है, सेना में अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व का असंतुलन कम हो सकता है और आधुनिक तकनीक तथा शहरी कौशल में बेहतर जानकारी रखने वाले युवा सेना में आ सकते हैं. सेवा निधि पैकेज और उससे जुड़े कौशल प्रमाणपत्र उन लोगों को सेवा से बाहर निकलने का एक व्यवस्थित रास्ता देते हैं, जो सेना में आगे काम नहीं करना चाहते.
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की ओर से पहले बैच के अग्निवीरों के काम करने की प्रेरणा, फिटनेस और तकनीकी क्षमता को लेकर मिली सकारात्मक प्रतिक्रिया बताती है कि कम समय की सेवा वाली इस व्यवस्था से सेना की ऑपरेशनल क्षमता को वैसा नुकसान नहीं हुआ, जैसा कुछ आलोचकों ने आशंका जताई थी. प्रदर्शन के आधार पर नजर रखने वाला एक केंद्रीकृत डेटाबेस, सिद्धांत रूप में, सिर्फ वरिष्ठता के आधार पर चयन करने वाली व्यवस्था के मुकाबले ज्यादा निष्पक्ष तरीके से चयन करने में मदद कर सकता है.
नीति में इस बदलाव से उन अग्निवीरों को काफी नुकसान हो सकता है, जो शुरुआती सेवा अवधि पूरी होने के बाद सेना छोड़ना चाहते थे. लौटने वाले अग्निवीरों को केंद्र और राज्य सरकारों ने कई सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का वादा किया था. इनमें केंद्रीय और राज्य अर्धसैनिक बलों की नौकरियां भी शामिल थीं. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अब ऐसी व्यवस्था की जरूरत नहीं है.
सेना छोड़ने का फैसला करने वाले अग्निवीरों के सामने अब मुश्किल विकल्प है. या तो वे सेना में सबसे निचले पद से अपना करियर शुरू करें या फिर नागरिक जीवन में खुद अपने लिए रोजगार तलाशें.
सशस्त्र बलों के साथ बार-बार प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए
लोकतंत्र में सशस्त्र बल एक सामाजिक समझौते के आधार पर टिके रहते हैं और मजबूत बनते हैं. आसान शब्दों में कहें तो इस समझौते के तहत सैनिक देश की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत लगाता है और जरूरत पड़ने पर अपनी जान भी जोखिम में डालता है. बदले में सरकार वादा करती है कि अगर सैनिक युद्ध में शहीद हो जाता है, तो वह उसके परिवार की देखभाल करेगी.
सशस्त्र बलों में मानव संसाधन से जुड़ी नीति कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं है. इसका असर सरकार और सैनिक के बीच हुए सामाजिक समझौते पर पड़ता है. भर्ती नीतियों का सीधा असर सैन्य इकाइयों के बीच तालमेल, पेशेवर मूल्यों और आपसी भाईचारे पर पड़ता है.
भर्ती की दशकों पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह बदलने वाली योजना लाना, उसे ऐसा बताना कि उसमें कोई बदलाव नहीं हो सकता और फिर पहले बैच के चार साल पूरे करने के बाद स्थायी सेवा में रखने के मूल नियमों को बदल देना, पहले हुई चर्चा और सलाह-मशविरे की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करता है.
सशस्त्र बल इतना गंभीर पेशा है कि इसमें बार-बार बदलाव नहीं किए जा सकते. इस स्तर की मानव संसाधन नीतियों पर सेना के भीतर और बाहर से जुड़े सभी पक्षों के साथ गहराई से चर्चा होनी चाहिए. ऑपरेशनल जरूरतों और सरकारी खर्च पर इसके असर का आंकड़ों के आधार पर सही आकलन करना जरूरी है. जहां संभव हो, पूरी योजना लागू करने से पहले सीमित स्तर पर इसका परीक्षण भी किया जाना चाहिए.
योजना लागू होने के बाद उसे स्थिर रहने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए, ताकि ट्रेनिंग की व्यवस्था, सैन्य इकाइयों की संस्कृति, चयन प्रक्रिया और करियर से जुड़ी उम्मीदें तय हो सकें. नए आंकड़ों के आधार पर छोटे-मोटे बदलाव करना अलग बात है. लेकिन कार्यकाल, स्थायी सेवा में रखने और पेंशन से जुड़े बुनियादी सवालों को फिर से खोल देने वाले बड़े बदलाव अलग हैं.
अग्निवीरों का पहला बैच अपना कार्यकाल लगभग पूरा कर चुका है. इससे उनके प्रदर्शन के बारे में असली आंकड़े और अनुभव सामने आए हैं. इनसे योजना में सुधार करने में मदद मिलनी चाहिए. लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि योजना को लेकर ऐसा अनिश्चितता भरा माहौल बना दिया जाए, जिसमें हर नए बैच को अलग-अलग नियमों का सामना करना पड़े.
स्थिरता, पहले से तय नियम और संस्थागत जिम्मेदारी भी सेना की ऑपरेशनल जरूरतें हैं. अग्निपथ की बदली हुई व्यवस्था की असली परीक्षा इस बात से होगी कि इसे अपने फायदे दिखाने के लिए पर्याप्त समय तक बिना बड़े बदलावों के चलने दिया जाता है या नहीं.
बदली हुई अग्निपथ योजना में अग्निवीरों को अस्थायी भर्ती के बजाय सेना के मुख्य मानव संसाधन का हिस्सा माना जाना चाहिए. शादी पर लगी रोक में ढील दी जानी चाहिए, ताकि अग्निवीर सेवा के दौरान शादी कर सकें और इसकी सिर्फ सूचना देना पर्याप्त हो. अब जब दो साल की अतिरिक्त सेवा के बाद सभी अग्निवीरों के लिए स्थायी भर्ती का रास्ता खुल गया है, तो इसकी जरूरत और बढ़ गई है. निजी जीवन में स्थिरता से सेना की ऑपरेशनल तैयारी भी मजबूत होती है.
पहले दिन से ही नियमित सैनिकों के बराबर मृत्यु, चोट और हताहत होने पर मिलने वाले सभी लाभ अग्निवीरों को भी दिए जाने चाहिए. इनमें अनुग्रह राशि, दिव्यांगता सुरक्षा, परिवार पेंशन और ईसीएचएस शामिल होने चाहिए. जब सेवा के दौरान जोखिम बराबर है, तो सम्मान और सामाजिक सुरक्षा भी बराबर मिलनी चाहिए.
ग्रुप कैप्टन अजय अहलावत एक रिटायर्ड IAF फाइटर पायलट हैं. वे @Ahlawat2012 पर ट्वीट करते हैं. विचार निजी हैं.
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