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Saturday, 7 November, 2026
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भारत के युवा नाराज और निराश क्यों हैं? बेरोजगारी, खोखली शिक्षा और राजनीति से टूटी उम्मीदें: वीवी जॉन

1958 में वीवी जॉन ने लिखा था कि आज कांग्रेस एक राष्ट्रीय आंदोलन नहीं रह गई है और उसमें एक वास्तविक राजनीतिक दल के गुण भी नहीं बचे हैं. वह अंदरूनी गुटबाजी से बुरी तरह बंटी हुई है.

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किताबों और पत्रिकाओं को पढ़कर दूर से ही इंग्लैंड के युवाओं के बारे में राय बनाई जाए, तो लगता है कि आज वहां के युवा मुख्य रूप से दो वर्गों में बंटे हुए हैं. एक वे जो नाराज हैं और दूसरे वे जो ऊब चुके हैं. कई बार ये दोनों स्थितियां एक-दूसरे से मिल भी जाती हैं, क्योंकि कल्याणकारी राज्य की व्यवस्था युवाओं में कभी नाराजगी तो कभी ऊब पैदा करती है. शायद वहां के युवाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जीवन से रोमांच और चुनौती का तत्व ही गायब हो गया है.

यह सब देखकर एक युवा भारतीय को ईर्ष्या होना स्वाभाविक है. शायद वह मन ही मन कहे, ‘काश, मेरी शिकायतें भी उसकी शिकायतों जितनी छोटी होतीं.’ इंग्लैंड में भी वे लोग, जिन्होंने तीस के दशक में बेरोजगारी से जूझते इलाकों और काम की तलाश में लगी लंबी कतारों को देखा है, कल्याणकारी राज्य की सुविधाओं को लेकर आज के उन युवाओं जितनी बेरुखी नहीं दिखा सकते, जिन्हें अपनी खुशकिस्मती का एहसास ही नहीं है. जिसने युद्ध से पहले के उन वर्षों में अपने जीवन का कुछ समय भी बिताया हो, वह जानता होगा कि रोजगार की तलाश में रोमांच कम और कठिनाइयां ज्यादा होती हैं.

युवाओं में निंदकता और अविश्वास का भाव, जो आज की इस बेचैनी से काफी मिलता-जुलता है, पश्चिम में कोई नई बात नहीं है. बर्ट्रेंड रसेल ने 1929 में इस विषय पर एक निबंध लिखा था. उसमें उन्होंने पश्चिमी देशों के युवाओं की इस प्रवृत्ति की तुलना भारत और चीन जैसे देशों के युवाओं के उत्साह और गंभीरता से की थी. रसेल ने लिखा था, ‘भारत में गंभीर युवा इस मूल विश्वास से प्रेरित होते हैं कि इंग्लैंड दुष्ट है. इस मान्यता से, ठीक उसी तरह जैसे देकार्त के अस्तित्व से, एक पूरा दर्शन खड़ा किया जा सकता है.’

एक स्नातक छात्र के रूप में जब मैंने यह बात पढ़ी थी, तो मुझे इस सरलीकरण पर खीझ हुई थी. साफ था कि इस दार्शनिक की नजर में ‘भारत के बुद्धिमान युवा’ उतने बुद्धिमान नहीं थे. हालांकि, रसेल की कई चतुर टिप्पणियों की तरह, इसमें भी कुछ सच्चाई थी. स्वतंत्रता आंदोलन के वर्षों में युवा कम-से-कम आंशिक रूप से ऐसे उद्देश्य से प्रेरित थे, जो केवल जीवन में आगे बढ़ने या अपना भविष्य बनाने तक सीमित नहीं था. यहां तक कि स्वार्थी और अपने करियर को लेकर चिंतित लोग भी उन लोगों की खुले तौर पर प्रशंसा करते थे, जिन्होंने विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष में बलिदान दिए थे. इस तरह, सभी लोग उस वीरता का हिस्सा महसूस करते थे.

छात्रों में अशांति और आंदोलन उन कीमतों में से एक थे, जिन्हें देश ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के दौरान अनावश्यक रूप से चुकाया. जब छात्रों को राजनीति से दूर रहने की सलाह दी जाती थी, तो वे इसका जवाब विरोध करके देते थे. उनका तर्क था कि इंग्लैंड भी राष्ट्रीय संकट के समय छात्रों से आगे आने की अपेक्षा करता था. उदाहरण के लिए, विश्व युद्ध में लड़ने के लिए या आम हड़ताल के दौरान रेलगाड़ियों और बसों का संचालन करने के लिए. भारत में स्वतंत्रता आंदोलन भी ऐसा ही एक राष्ट्रीय संकट था. इसे चुनाव जीतने और वोट बटोरने वाली सामान्य राजनीति के साथ नहीं मिलाया जा सकता था.

इस तर्क में कुछ सच्चाई थी, लेकिन पूरी सच्चाई नहीं. कॉलेजों और स्कूलों में होने वाली अधिकतर हड़तालों और अन्य उपद्रवों के पीछे राष्ट्रीय स्वतंत्रता की कोई अटूट इच्छा नहीं थी. अपने सबसे अच्छे रूप में, ये युवाओं के उत्साह और रोमांच की चाह का प्रदर्शन थे. यह उस ऊर्जा को बाहर निकालने का एक रास्ता था, जिसके लिए शिक्षण संस्थानों में कोई जगह नहीं थी. सबसे बुरी स्थिति में, ये आलसी और अयोग्य छात्रों की उन छात्रों के खिलाफ साजिश बन जाते थे, जो मेहनती और सक्षम थे. हड़तालों और पढ़ाई ठप होने से अच्छे और कमजोर छात्रों के बीच का अंतर मिट जाता था. क्या सबसे कमजोर छात्र को भी सचमुच यह भ्रम हो सकता था कि पाठ न पढ़कर वह ब्रिटिश साम्राज्य को तोड़ने में मदद कर रहा है? लेकिन हंगामा करके वह अपने सहपाठियों को भी पढ़ने से जरूर रोक सकता था.

तीस और चालीस के दशक में भारत के कई हिस्सों में छात्रों के व्यवहार को भी कुछ इसी तरह समझा जा सकता है. इन घटनाओं का भारत में ब्रिटिश शासन की मौजूदगी से आमतौर पर कोई लेना-देना नहीं था. स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि एक विश्वविद्यालय में छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार किया और शहर में हंगामा खड़ा कर दिया, क्योंकि सिनेमाघरों ने छात्रों को मिलने वाली रियायती दरें बंद कर दी थीं. एक दूसरे विश्वविद्यालय में छात्रों ने इसलिए हड़ताल कर दी क्योंकि प्रशासन ने महिला छात्रावास के चारों ओर दीवार बनाने का फैसला किया था.

छात्रों की यह अशांति स्वतंत्रता आंदोलन से अलग अपनी एक प्रवृत्ति बना चुकी थी, यह बात 1947 के बाद शिक्षण संस्थानों के अनुभवों से भी साबित होती है. हाल के वर्षों में छात्र परीक्षा के प्रश्नपत्र कठिन होने पर परीक्षा कक्षों से बाहर निकल आए हैं. ऐसे मौकों पर वे आमतौर पर कुछ फर्नीचर भी तोड़ देते हैं, ताकि उनके गुस्से की तीव्रता दिखाई दे.

1948 में बिहार के सभी कॉलेजों का कामकाज ठप हो गया था, क्योंकि छात्रों ने उन कॉलेज परीक्षाओं में बैठने से इनकार कर दिया था, जिनके आधार पर यह तय होना था कि वे विश्वविद्यालय की परीक्षा में बैठने के योग्य हैं या नहीं. इसी राज्य में दो वर्ष पहले बस के किराये को लेकर एक छात्र और बस कंडक्टर के बीच हुए विवाद ने बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया. छात्रों का आरोप था कि कंडक्टर ने उनके साथ बदतमीजी की थी. मान लिया जाए कि यह सच था, तब भी उससे निपटने के और भी तरीके हो सकते थे. विश्वविद्यालय के छात्रों को कानून अपने हाथ में लेने की जरूरत नहीं थी.

हाल ही में राजस्थान के अधिकतर स्कूलों और कॉलेजों का कामकाज इसलिए ठप हो गया क्योंकि छात्रों ने ट्यूशन फीस बढ़ाए जाने का विरोध किया था. इस बात पर बहस हो सकती थी कि उच्च शिक्षा पर होने वाला अतिरिक्त खर्च पूरी तरह सरकारी राजस्व से उठाया जाना चाहिए या उसका कुछ हिस्सा छात्रों के माता-पिता को भी देना चाहिए. लेकिन इस मुद्दे के पक्ष और विपक्ष में होने वाली बहस हाशिये पर ही रह गई. टकराव का बड़ा हिस्सा शोर-शराबे, गुस्से और अराजकता में उलझ गया.

युवाओं की गलतियों पर सार्वजनिक जीवन के लोगों का रवैया भी हमेशा कुछ ऐसा ही हिचकिचाहट भरा रहा है. वे अनुशासनहीनता के खिलाफ जोशीले भाषण तो देते हैं, लेकिन ये भाषण एक अशांति के बाद और दूसरी अशांति से पहले के शांत समय में दिए जाते हैं. जब वास्तव में उपद्रव हो रहा होता है, तब वे कुछ नहीं कहते. इसके बजाय वे गंभीरता से यह कहकर छात्रों की वाहवाही बटोरना पसंद करते हैं, ‘आप ही देश की आशा हैं!’ अगर वे ईमानदार होते, तो शायद ज्यादा बार यह कहते, ‘आप देश को निराशा की ओर धकेल रहे हैं!’

इस बीच, जब अशांति फैलती है, तो शिक्षक अपने आसान निंदक रवैये के पीछे छिप जाते हैं और छात्रों का स्वाभाविक नेतृत्व करने की अपनी भूमिका बहुत आसानी से छोड़ देते हैं. दो कारणों से यह धारणा बनने लगी है कि छात्रों का पढ़ाई पर ध्यान देना या न देना कोई खास मायने नहीं रखता. पहला, पढ़ाई का स्वरूप ही आधा-अधूरा है. दूसरा, पढ़ाई पूरी करने के बाद बेरोजगारी या ऐसा रोजगार उनका इंतजार करता है, जो उनकी योग्यता के अनुकूल नहीं होता.

कॉलेजों में पढ़ाई का स्तर कैसा है, इसे एक मजाकिया स्वभाव वाले प्रोफेसर ने कुछ इस तरह बयान किया था, ‘हम ज्ञान की खोज तो करते हैं, लेकिन हमेशा उससे सुरक्षित दूरी बनाए रखते हैं. पूरी सावधानी रखते हैं कि कहीं उसके करीब न पहुंच जाएं.’ कॉलेजों में पढ़ाई की दिशा तय करने वाली परीक्षाएं इतनी रूढ़िबद्ध हो चुकी हैं और कई मामलों में योग्यता परखने का इतना निरर्थक माध्यम बन गई हैं कि औसत छात्र को उनमें पास होने के लिए अपनी क्षमता या ऊर्जा का बहुत बड़ा हिस्सा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती. जहां तक ज्ञान को उसके अपने महत्व के लिए प्राप्त करने की बात है, ऐसी सोच शिक्षकों की निंदकता और छात्रों के आलस्य के बीच मुश्किल से ही जगह बना पाती है.

यह तर्क दिया गया है कि जब सभी के लिए नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं, तो रोजगार के सीमित अवसरों से छात्रों में प्रतिस्पर्धा और कड़ी मेहनत की भावना पैदा होनी चाहिए. अगर अच्छी नौकरियों की तलाश में केवल सबसे योग्य लोग ही सफल होंगे, तो क्या हर कोई कक्षा में सबसे आगे रहने की कोशिश नहीं करेगा? यह तर्क भी सुनने में सही लगता है, लेकिन इसमें भी आधी ही सच्चाई है. असल अनुभव बताता है कि यह सिद्धांत तभी काम करता है, जब अच्छी नौकरियों की संख्या का कॉलेजों से प्रशिक्षित होकर निकलने वाले योग्य लोगों की संख्या से उचित अनुपात हो. लेकिन अगर एक नौकरी के लिए सौ स्नातकों को कोशिश करनी पड़े, तो नतीजा प्रतिस्पर्धा और मेहनत नहीं, बल्कि निराशा और हताशा होता है. इसके अलावा, यह भी कोई अनजानी बात नहीं है कि सबसे अच्छी नौकरियां हमेशा सबसे योग्य लोगों को ही नहीं मिलतीं.

शिक्षा से कुछ हासिल न होने और एक पिछड़े देश में प्रशिक्षित लोगों की योग्यता का सही उपयोग न हो पाने से युवाओं के सामने जो संकट पैदा हुआ है, उसने निराशा और हताशा का संदेश फैलाने वालों के लिए जगह बना दी है. कहा जाता है कि कुछ क्षेत्रों में कम्युनिस्टों ने बड़ी संख्या में छात्रों का समर्थन हासिल किया है. मुझे संदेह है कि फिलहाल यह समर्थन बहुत मजबूत नहीं है. हमारे शिक्षण संस्थानों का बौद्धिक माहौल ऐसा है कि चर्चा अक्सर शब्दों के खेल से आगे नहीं बढ़ पाती. यहां विचारधारा के प्रति निष्ठा बौद्धिक विश्वास से नहीं, बल्कि नाराजगी, ईर्ष्या और अस्थायी परिस्थितियों से पैदा हुई दूसरी प्रतिक्रियाओं से बनती है. यह माहौल निश्चित रूप से कम्युनिज्म के प्रसार के अनुकूल है. लेकिन अब तक उसकी सफलताएं कितनी टिकाऊ होंगी, यह कहना मुश्किल है.

खतरा यह नहीं है कि कम्युनिज्म युवाओं के मन और विचारों पर सीधी लड़ाई जीत लेगा. असली खतरा यह है कि वह उस खाली जगह को भरने के लिए आगे आएगा, जो दुख और निराशा ने पैदा की है. अगर स्वतंत्र संस्थाएं हमें अभाव और भूख से मुक्त नहीं कर सकतीं, तो फिर दूसरे रास्ते को आजमाने में हर्ज ही क्या है?

लोकतंत्र में उच्च शिक्षा का एक उद्देश्य समाज के लिए नेतृत्व तैयार करना भी है. सक्रिय राजनीति के संदर्भ में हमारे कॉलेज और विश्वविद्यालय लगभग इस भूमिका को निभाना बंद कर चुके हैं. कॉलेज में बीस वर्षों तक पढ़ाने के दौरान मुझे केवल एक ऐसा उदाहरण देखने को मिला, जिसमें एक योग्य छात्र ने राजनीति को अपना करियर बनाया. मेरे दूसरे जो छात्र राजनीति में गए, उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उन्हें कोई दूसरा काम नहीं मिला था या वे वकालत जैसे पेशे में जाने के बाद बुरी तरह असफल हो गए थे. मुझे नहीं लगता कि मेरा अनुभव कोई अनोखा है. इस बार गलती कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की नहीं, बल्कि आर्थिक परिस्थितियों और आज की राजनीति की कुछ विशेषताओं की है. हमारे विश्वविद्यालयों से निकलने वाले युवाओं में से कौन राजनीति में जाने का खर्च उठा सकता है?

एक समय था, जब स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अच्छे और प्रतिभाशाली युवाओं ने अपने जीवन में आगे बढ़ने के सभी अवसर छोड़ दिए थे और गांधीजी के नेतृत्व में चल पड़े थे. वह भावना आज की पीढ़ी तक नहीं पहुंच पाई. दरअसल, उस भावना को उन्हीं पुराने ‘राजनीतिक पीड़ितों’ ने खत्म कर दिया, जो 1947 के बाद से अपने बलिदानों के बदले मंत्री पदों और तरह-तरह के लाभों की मांग करते रहे हैं.

कांग्रेस पार्टी में जो कुछ हो रहा है, उसका भारत के युवाओं के मनोबल पर बहुत गहरा असर पड़ता है. बीस साल पहले यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि कांग्रेसियों के सफेद खादी के कपड़े और सफेद टोपी कभी सादगी और निष्ठापूर्ण समर्पण के प्रतीक नहीं रहेंगे. आज कांग्रेस एक राष्ट्रीय आंदोलन नहीं रह गई है और उसमें एक वास्तविक राजनीतिक दल के गुण भी नहीं बचे हैं. वह अंदरूनी गुटबाजी से बुरी तरह बंटी हुई है. सत्ता का मोह और नेहरू की नाराजगी का डर ही अलग-अलग विचारों वाले लोगों को एक साथ बांधे हुए है.

भारत के युवा काफी समय से यह निराशाजनक तमाशा देख रहे हैं. वे नेहरू और कम्युनिज्म के बीच समय-समय पर दिखाई देने वाले अजीब लगाव को भी समझने की कोशिश कर रहे हैं. चाऊ, ख्रुश्चेव और नेहरू की दोस्ती तथा चीन की आर्थिक उपलब्धियों के प्रति नेहरू की ईर्ष्यापूर्ण प्रशंसा का युवाओं पर उनके लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता जताने और तानाशाही के अत्याचारों की हल्की-सी आलोचना करने से कहीं अधिक प्रभाव पड़ता है.

इस बीच, भारत में कम्युनिस्टों की रणनीति यह है कि वे नेहरू की पार्टी पर हमला करें, लेकिन व्यक्तिगत रूप से उनकी प्रशंसा करते रहें. हाल ही में, जब केंद्र सरकार के कर्मचारियों ने हड़ताल की धमकी दी थी और लोगों को लग रहा था कि यह कदम जल्दबाजी भरा होगा, तभीरेन मुखर्जी ने लोकसभा में नेहरू के उस प्रसारण भाषण की भावना की सराहना की, जो उन्होंने राष्ट्र को संबोधित करते हुए दिया था. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने कहा, ‘यह देखकर हैरानी होती है कि प्रधानमंत्री कैसी संगत में रहते हैं!’ इस तरह की नजदीकी दिखाने की कोशिश शायद नेहरू को भ्रमित न करे, लेकिन देश के बहुत से दूसरे लोगों को जरूर भ्रमित करती है. यह कांग्रेस पार्टी को उसके नेता की उपलब्धियों का श्रेय मिलने से रोकने की एक खतरनाक कोशिश का हिस्सा है. और यह कोशिश पूरी तरह असफल भी नहीं रही है.

भारत की अनेक समस्याओं और उन्हें हल करने के लिए बनाई जा रही महत्वाकांक्षी योजनाओं को देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि ये योजनाएं युवाओं में उत्साह और जोश पैदा करेंगी. पांच वर्षीय योजनाओं से जितनी अधिक नौकरियां मिलती हैं, युवा उनमें उतनी ही अधिक दिलचस्पी लेते हैं. जिन्हें अच्छी नौकरियां मिल जाती हैं, वे खुश हैं. बाकी लोग नाराज और असंतुष्ट हैं. लेकिन इस बात पर गर्व कहीं दिखाई नहीं देता कि वे किसी बड़े प्रयास या अभियान का, भले ही छोटे स्तर पर, हिस्सा हैं. दूसरे शब्दों में कहें, तो व्यक्तिगत अभावों और अपने स्वार्थों की जरूरतों के बीच सच्ची देशभक्ति धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई देती है.

ऐसा होने के कई कारण हैं. पहला, युवाओं को जीवन की शुरुआत के लिए बौद्धिक और नैतिक, दोनों ही स्तरों पर अपर्याप्त तैयारी के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है. दूसरा, कल्याणकारी राज्य की बातें बहुत ज्यादा और बहुत पहले से की जा रही हैं, जबकि वह फिलहाल एक दूर की संभावना भर है. और तीसरा, बड़े-बुजुर्ग खुद युवाओं के सामने इतना बुरा उदाहरण पेश कर रहे हैं.

यह लेख सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की इंडियन लिबरल्स परियोजना नामक इंडियन लिबरल्स आर्काइव की सीरीज़ का हिस्सा है. इसे क्वेस्ट पत्रिका से लिया गया है जिसका शीर्षक “भारत की खोई हुई पीढ़ी: युवाओं की दुविधा” था और इसका प्रकाशन मूलरुप से 1958 में हुआ था. मूल संस्करण को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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