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Sunday, 8 November, 2026
होमदेशचेक बाउंस के 120 से ज्यादा मामले, हरियाणा HC ने महिला को एक ही जमानतदार इस्तेमाल करने की दी अनुमति

चेक बाउंस के 120 से ज्यादा मामले, हरियाणा HC ने महिला को एक ही जमानतदार इस्तेमाल करने की दी अनुमति

अपर्णा पुरी को उनके एम्प्लॉयर ने चेक पर साइन करने के लिए कहा था। जब वे चेक बाउंस हो गए, तो उनके खिलाफ 120 से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं. हर शिकायत के लिए अलग अदालत थी. और हर अदालत के लिए अलग ज़मानत बॉन्ड और अलग ज़मानतदार की ज़रूरत पड़ी.

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चंडीगढ़: यह मामला सिर्फ चेकबुक तक सीमित नहीं है, बल्कि कानून की किताबों में भी दर्ज होने लायक है. एक कंपनी में काम करने वाली अपर्णा पुरी से उनके नियोक्ता ने चेक पर हस्ताक्षर करने को कहा था. जब ये चेक बाउंस हो गए, तो उनके खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत 120 से ज्यादा शिकायतें दर्ज हो गईं.

हर शिकायत के लिए अलग अदालत थी. हर अदालत में अलग जमानत बांड और एक अलग जमानतदार की जरूरत थी. पुरी इतने सारे जमानतदारों का इंतजाम नहीं कर पा रही थीं. 27 अक्टूबर को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इस मामले में दखल दिया.

जस्टिस संजय वशिष्ठ ने आदेश दिया कि पुरी ने पहले ही 10 लाख रुपये के जो जमानत बांड और जमानतदारों के बांड जमा किए हैं, वे कैथल, कुरुक्षेत्र और करनाल की ट्रायल अदालतों में उनके बाकी सभी मामलों में मान्य होंगे. हालांकि, इसके साथ एक शर्त भी रखी गई है. हर मामले में संबंधित अदालत को उनकी जमानत मंजूर करने के लिए अलग-अलग आदेश देना होगा.

वरिष्ठ वकील पी.एस. अहलूवालिया के जरिए पेश हुईं पुरी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपने और अमीरा प्योर फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दर्ज सभी शिकायतों के लिए एक ही व्यक्तिगत बांड और जमानतदार का बांड स्वीकार करने की मांग की थी. इन मामलों में कंपनी मुख्य आरोपी है. यह मामला पहले भी 12 मई 2025 को हाई कोर्ट के सामने आया था. तब अदालत ने कहा था कि अगर उन्हें किसी एक मामले में जमानत मिल जाती है और वह बांड जमा कर देती हैं, तो उन बांड को बाकी मामलों के लिए भी साझा बांड माना जा सकता है.

4 अक्टूबर 2025 को पुरी, एम/एस सत नारायण की ओर से दर्ज एक शिकायत के मामले में कैथल अदालत में पेश हुई थीं. धारा 138 के तहत यह अपराध जमानती है. उन्हें 2 लाख रुपये के जमानत बांड और इतनी ही रकम के एक जमानतदार के साथ रिहा कर दिया गया था.

कैथल में ही एम/एस मनसा देवी की ओर से दर्ज एक अन्य शिकायत में ट्रायल कोर्ट ने हाई कोर्ट के पहले के आदेश का जिक्र किया. अदालत ने यह भी कहा कि पुरी सत नारायण मामले में पहले ही जमानत बांड जमा कर चुकी हैं. इसके बावजूद अदालत ने उनसे 1 करोड़ रुपये के नए साझा जमानतदार के बांड जमा करने को कहा.

यहीं आकर पुरी के लिए मुश्किल खड़ी हो गई. उनके वकील ने हाई कोर्ट को बताया कि उनके खिलाफ करीब 120 शिकायतें हैं, जिनमें से 85 कैथल सेशन डिवीजन में लंबित हैं. उन्होंने कहा कि इतने सारे बांड और जमानतदारों का इंतजाम करना उनके लिए संभव नहीं है. इतने जमानतदार जुटाना किसी के लिए भी लगभग नामुमकिन है. बाकी मामले कुरुक्षेत्र और करनाल में लंबित हैं.

जस्टिस वशिष्ठ ने सुप्रीम कोर्ट के 22 अगस्त 2024 के फैसले गिरीश गांधी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2024 INSC 617) पर भरोसा किया. उस मामले में आरोपी को कई राज्यों में दर्ज कई मामलों में जमानत मिल गई थी, लेकिन वह फिर भी हिरासत में था. वह हर मामले के लिए अलग-अलग जमानतदार नहीं ढूंढ पा रहा था.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जमानतदार जरूरी होते हैं, क्योंकि वे यह सुनिश्चित करते हैं कि आरोपी अदालत में पेश हो. लेकिन अदालत ने यह भी कहा था कि जरूरत से ज्यादा सख्त जमानत की शर्तें, जमानत न देने के बराबर हैं. अगर कोई आरोपी कई मामलों में जमानतदार नहीं ढूंढ पा रहा है, तो अदालत को इस जरूरत और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके आजादी के अधिकार के बीच संतुलन बनाना होगा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसी शर्त, जिसे पूरा करना नामुमकिन हो, रिहाई के मकसद को ही खत्म कर देती है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के आदेश हनी निषाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का भी जिक्र किया था. उस मामले में आरोपी के खिलाफ दर्ज सभी 31 मामलों के लिए 30,000 रुपये का एक व्यक्तिगत बांड और दो जमानतदार स्वीकार किए गए थे. अदालत ने जनवरी 2023 में जमानत नीति पर स्वत: संज्ञान लेकर शुरू किए गए मामले में दिए गए अपने निर्देशों का भी जिक्र किया. इन निर्देशों के मुताबिक, अदालतें स्थानीय जमानतदार पर जोर नहीं दे सकतीं.

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने कहा कि जमानत की शर्तें उचित और मामले के अनुपात में होनी चाहिए. वे इतनी सख्त नहीं होनी चाहिए कि उन्हें पूरा करना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन हो जाए. अदालत ने कहा कि पुरी से हर मामले में अलग और बड़ी रकम के जमानतदार मांगना उन पर बहुत ज्यादा बोझ डालने जैसा होगा.

पुरी की ओर से अहलूवालिया के साथ वकील एच.एस. रंधावा भी पेश हुए. हरियाणा सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता रुचि सेखरी पेश हुईं.

अदालत ने जमानतदार की योग्यता साबित करने से जुड़ी एक व्यावहारिक समस्या पर भी विचार किया. उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 441(4) का जिक्र किया, जिसे अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 485(4) कहा जाता है. इसके तहत अदालत यह साबित करने के लिए हलफनामा स्वीकार कर सकती है कि जमानतदार पर्याप्त और योग्य है. अगर अदालत को जरूरी लगे, तो वह इस बारे में जांच भी कर सकती है.

इस अधिकार का इस्तेमाल करते हुए हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिस जमानतदार के बांड बाकी मामलों में भी मान्य रहेंगे, वह एक साझा हलफनामा दाखिल करेगा. इसमें सभी जरूरी जानकारियां और जमानतदार के तौर पर दी गई प्रतिबद्धताओं का ब्योरा होगा. ट्रायल अदालतें हर मामले में अलग-अलग हलफनामा मांगे बिना इसे स्वीकार कर सकती हैं.

इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि पुरी को सभी जिम्मेदारियों से छूट मिल गई है. हाई कोर्ट ने साफ किया कि कानून के मुताबिक उन्हें हर ट्रायल कोर्ट में पेश होना होगा. अगर वह किसी एक मामले में भी पेश नहीं होती हैं, तो संबंधित अदालत कानून में तय प्रक्रिया के मुताबिक उनके जमानत बांड और जमानतदार के बांड जब्त करने की कार्यवाही शुरू कर सकती है.

हाई कोर्ट ने आदेश की प्रतियां कुरुक्षेत्र, करनाल और कैथल की ट्रायल अदालतों को भेजने के निर्देश दिए हैं, ताकि वे इसका पालन कर सकें.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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