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Sunday, 8 November, 2026
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भारत को वॉशिंगटन के दोनों पक्षों से रिश्ते बनाए रखने होंगे और लंबी रणनीति पर काम करना होगा

वाशिंगटन में भारत के इतने सारे हित जुड़े हैं कि वह इस रिश्ते को किसी एक पक्ष के साथ दांव पर नहीं लगा सकता.

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2026 के अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में डेमोक्रेट्स के दोनों सदनों में जीत हासिल करने के बाद, जनवरी में नई कांग्रेस के कामकाज संभालने पर अमेरिका में बंटी हुई सरकार होगी. इससे ट्रंप के लिए अमेरिकी संसद (कैपिटल हिल) में अपनी बात मनवाना मुश्किल होगा. वहीं, विदेश नीति के मामले में व्हाइट हाउस के पास अब भी काफी अधिकार रहेंगे. अमेरिका के सहयोगी देशों के लिए फर्क इस बात का है कि देश में राष्ट्रपति की राजनीतिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद विदेशों में उनके पास कितने अधिकार बने रहते हैं.

अब नई दिल्ली को यह समझना होगा कि वॉशिंगटन किन वादों को राष्ट्रपति के कार्यकारी आदेशों के जरिए पूरा कर सकता है और किनके लिए संसद से बजट या कानून की मंजूरी जरूरी होगी. अगले दो साल और उसके बाद भारत और अमेरिका अपने रणनीतिक एजेंडे पर कितना काम कर पाएंगे, यह इसी पर निर्भर करेगा.

ट्रंप को झटका, कांग्रेस की परीक्षा

मध्यावधि चुनावों में महंगाई और रोजमर्रा के खर्च का मुद्दा अहम रहा. AP वोटर पोल में करीब 10 में से 9 मतदाताओं ने कहा कि कांग्रेस के लिए वोट देते समय जीवनयापन की लागत उनके फैसले में एक अहम या बड़ा कारण थी. यह अभी साफ नहीं है कि डेमोक्रेट्स के पक्ष में ज्यादा मतदान, मतदाताओं के पाला बदलने और रिपब्लिकन मतदाताओं के घरों में रहने में से किसका कितना असर रहा. हालांकि, रिपब्लिकन पार्टी को बड़े पैमाने पर हुए नुकसान से पता चलता है कि मतदाताओं ने स्थानीय चुनावों के जरिए वॉशिंगटन के कामकाज पर अपना फैसला सुनाया.

ट्रंप की अपनी पार्टी पर मजबूत पकड़ और कांग्रेस में रिपब्लिकन नियंत्रण ने उन्हें सरकार चलाने की काफी छूट दी थी. जब उनके वादों का फायदा आम परिवारों तक नहीं पहुंचा, तो वॉशिंगटन की पूरी जिम्मेदारी ट्रंप पर थी और मतदाताओं ने उन्हें ही इसका जवाबदेह माना. लोग खुशहाली को घर के किराये, किराने के सामान, स्वास्थ्य सेवाओं और पेट्रोल की कीमतों से मापते हैं. डेमोक्रेट्स ने बढ़ते खर्च के लिए उस पार्टी को जिम्मेदार ठहराया, जिसके पास व्हाइट हाउस और कांग्रेस दोनों का नियंत्रण था. ईरान युद्ध के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ीं और विदेश नीति का एक फैसला आम परिवारों के बजट पर असर डालने लगा. ट्रंप ने विदेशों में ताकत दिखाने और देश के भीतर लोगों को राहत देने का वादा किया था. लेकिन युद्ध ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या विदेशों में अमेरिकी ताकत के इस्तेमाल से खुद अमेरिका के लोगों की जिंदगी महंगी हो रही है.

यह देखना बाकी है कि इस नाराजगी से विचारधारा में लंबे समय तक बदलाव आएगा या नहीं. डेमोक्रेट्स ने प्रतिनिधि सभा की वे सीटें भी जीतीं, जहां 2024 में ट्रंप को आसानी से जीत मिली थी. लेकिन 2028 में डेमोक्रेट्स का गठबंधन कितना मजबूत रहेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी मिली हुई सत्ता का इस्तेमाल कैसे करती है.

जनवरी 2027 में कांग्रेस का कामकाज शुरू होने पर डेमोक्रेट्स विधायी और जांच से जुड़े एजेंडे तय करेंगे. सुनवाई और दस्तावेजों की मांग के जरिए वे सरकार की नाकामियों को सामने ला सकते हैं और कार्यकारी फैसले लेने की राजनीतिक कीमत बढ़ा सकते हैं. सीनेट पर नियंत्रण से डेमोक्रेट्स को जजों, राजदूतों और उन वरिष्ठ पदों के लिए ट्रंप के नामांकन पर सीधा प्रभाव डालने का मौका मिलेगा, जिनके लिए सीनेट की मंजूरी जरूरी होती है. हालांकि, ट्रंप की ओर से पहले नियुक्त किए गए लोग उन संस्थानों को प्रभावित करते रहेंगे, जहां वे काम कर रहे हैं.

सरकारी खर्च पर नियंत्रण होने से डेमोक्रेट्स को बजट पर बातचीत करने और जानकारी सार्वजनिक करने की मांग करने का मौका मिलेगा. इससे व्हाइट हाउस के लिए अपनी शर्तों पर नए बजट या कानूनी अधिकार हासिल करना मुश्किल हो सकता है. बातचीत से समझौते होंगे या बार-बार टकराव की स्थिति बनेगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों पक्ष समझौते और टकराव की कीमत को किस तरह देखते हैं.

ट्रंप के पास अब भी कार्यपालिका का नियंत्रण, वीटो का अधिकार और कांग्रेस की ओर से पहले दिए गए अधिकारों के तहत फैसले लेने की शक्ति है. डेमोक्रेट्स के लिए किसी कार्यकारी फैसले की कमियों को सामने लाना उसे पलटने के मुकाबले आसान होगा. राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित करने वाले किसी विधेयक को दोनों सदनों से मंजूरी मिलनी जरूरी है. अगर ट्रंप उस पर वीटो लगाते हैं, तो उसे लागू कराने के लिए दोनों सदनों में मौजूद सदस्यों के दो-तिहाई वोट की जरूरत होगी. इसके लिए सदन में सदस्यों की न्यूनतम जरूरी संख्या भी मौजूद होनी चाहिए.

कांग्रेस की असली परीक्षा यह होगी कि उसकी निगरानी से ट्रंप के सरकार चलाने के तरीके में कितना बदलाव आता है. इसका असर सामने आए गलत कामों, सरकार से नियमों का पालन कराने और राष्ट्रपति के अधिकारों पर लागू की जा सकने वाली सीमाओं से पता चलेगा. लेकिन बढ़ते खर्च से परेशान मतदाता डेमोक्रेट्स के आर्थिक एजेंडे को भी परखेंगे. इस मामले में रिपब्लिकन झुकाव वाले राज्यों और कड़े मुकाबले वाले चुनावी क्षेत्रों से आने वाले डेमोक्रेट सांसदों के लिए चुनावी दबाव उन सहयोगियों से अलग होगा, जो सुरक्षित सीटों से जीतकर आए हैं. इन मतभेदों से तय होगा कि पार्टी किन मुद्दों पर एकमत हो पाती है.

रिपब्लिकन पार्टी को भी ट्रंप के चुनावी नतीजों को लेकर आत्ममंथन करना होगा, जबकि कुछ मतदाताओं पर उनकी पकड़ अब भी बनी हुई है. ये तनाव 2028 तक दोनों पार्टियों की राजनीतिक राह तय करेंगे.

विदेशों में राष्ट्रपति के अधिकार

कांग्रेस ईरान युद्ध के मकसद, खर्च और उसके कानूनी आधार पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठा सकती है. बजट पर बातचीत के दौरान भी वह जवाब मांग सकती है. लेकिन नीति बदलने के लिए इससे ज्यादा की जरूरत होगी. सांसदों को इस बात पर सहमत होना होगा कि ट्रंप की नीति की जगह क्या लाया जाना चाहिए और उस विकल्प को बाध्यकारी बनाने के लिए जरूरी वोट जुटाने होंगे. राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए ट्रंप कोई बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं. या फिर संसद में उनकी गुंजाइश कम होने पर वे एकतरफा फैसलों पर ज्यादा निर्भर हो सकते हैं. वॉशिंगटन में उनकी कमजोर स्थिति से दूसरे देशों को इस बात की कोई गारंटी नहीं मिलती कि व्हाइट हाउस का रुख ज्यादा संयमित हो जाएगा.

चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के मुद्दे पर दोनों पार्टियों के पास घरेलू स्तर पर सेमीकंडक्टर उत्पादन बढ़ाने और आपूर्ति की सुरक्षित व्यवस्था बनाने का समर्थन करने के कारण हैं. CHIPS और साइंस एक्ट के पक्ष में दोनों पार्टियों का समर्थन दिखाता है कि किन मामलों में नीतियों में निरंतरता बनी रह सकती है. लेकिन टैरिफ और तकनीक से जुड़ी पाबंदियों के स्वरूप पर मतभेद की गुंजाइश ज्यादा है. अमेरिका के व्यापारिक साझेदारों को हर फैसले का अलग-अलग आकलन करना चाहिए.

अमेरिका के सहयोगी देशों के लिए व्यावहारिक सवाल यह है कि वॉशिंगटन में कौन किसी वादे को पूरा कराने की ताकत रखता है. कांग्रेस का समर्थन किसी समझौते को लंबे समय तक टिकाए रख सकता है. लेकिन राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच टकराव से उसे लागू करने के लिए जरूरी बजट, नियुक्तियों और प्रशासनिक फैसलों में देरी हो सकती है.

बंटे हुए वॉशिंगटन में भारत के हित

वॉशिंगटन में भारत के इतने बड़े हित जुड़े हैं कि वह इस रिश्ते को किसी एक राजनीतिक पार्टी के भरोसे नहीं छोड़ सकता. द्विपक्षीय एजेंडे के बड़े हिस्से पर बातचीत और उसे लागू करने का काम ट्रंप प्रशासन ही करेगा. इसलिए नई दिल्ली को उसके साथ करीबी से काम करना होगा. साथ ही, उसे कांग्रेस के नए नेताओं, अहम समितियों और उन सांसदों से भी संबंध बनाने होंगे, जिनके चुनावी क्षेत्रों को भारत के साथ सहयोग से फायदा मिल सकता है. फरवरी 2025 में दोनों देशों के नेताओं के साझा बयान में रक्षा, व्यापार, ऊर्जा और उभरती तकनीकों से जुड़े एजेंडे तय किए गए थे. फरवरी 2026 के अंतरिम व्यापार ढांचे ने व्यापार वार्ता को ज्यादा स्पष्ट आधार दिया.

भारत यह दिखाकर इस एजेंडे के लिए समर्थन बढ़ा सकता है कि उससे अमेरिका में निवेश और कुशल रोजगार कैसे बढ़ेंगे और अमेरिकी आपूर्ति व्यवस्था कैसे मजबूत होगी. अक्टूबर 2026 में सेबू में हुई रक्षा समीक्षा में सैन्य तैयारी, तकनीक साझा करने और औद्योगिक सहयोग को एजेंडे में शामिल किया गया था. इसे आगे बढ़ाने के लिए तकनीक हस्तांतरण, रखरखाव और खरीद से जुड़े फैसले जरूरी होंगे. उभरती तकनीकों के मामले में सरकारी एजेंसियों, कंपनियों और शोध संस्थानों को इस बात का भरोसा होना चाहिए कि वादों को किस तरह लागू किया जाएगा. तभी वे साझा परियोजनाओं में निवेश करेंगे. इस साझेदारी की असली परीक्षा यह होगी कि क्या इसके संस्थान व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच अगले टकराव के दौरान भी इस काम को आगे बढ़ा पाएंगे.

कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स के नियंत्रण से वॉशिंगटन में यह बदल जाएगा कि किसके पास कितनी ताकत होगी. व्यापार और आव्रजन की राजनीति मुश्किल बनी रहेगी. रोजगार, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और सीमा पर नियम लागू करने के मुद्दों का दबाव दोनों पार्टियों पर रहेगा. नई दिल्ली को कुशल लोगों की आवाजाही के पक्ष में ऐसे तर्क देने होंगे, जिन्हें अमेरिकी संसद में समर्थन मिल सके. उसे दिखाना होगा कि भारतीय प्रतिभाएं अमेरिकी विश्वविद्यालयों को मजबूत कर सकती हैं, नए प्रयोगों को बढ़ावा दे सकती हैं और अमेरिकी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में मदद कर सकती हैं. रूस, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर मतभेदों के लिए लगातार बातचीत और भारत के फैसलों के पीछे मौजूद हितों को स्पष्ट रूप से बताना जरूरी होगा.

भारत को ऐसे वादों की जरूरत है, जिनका सांसद बचाव कर सकें, सरकारी एजेंसियां जिन्हें लागू कर सकें और जिनके बने रहने में कारोबारियों तथा आम लोगों का भी हित हो. रणनीतिक तालमेल की असली परीक्षा यह होगी कि वॉशिंगटन में सत्ता बदलने के बावजूद यह साझेदारी क्या नतीजे दे पाती है.

मोनीष तौरंगबाम नई दिल्ली स्थित चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (CRF) में फेलो हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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